नई दिल्ली: बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने शुक्रवार (27 जून) को कहा कि ढाका में रेलवे की जमीन पर बिना अनुमति के बनाए गए ‘अस्थायी दुर्गा मंडप’ को बांग्लादेशी अधिकारियों ने हटा दिया है. एक दिन पहले भारत ने उस पर आरोप लगाया था कि कट्टरपंथियों द्वारा मंदिर को नष्ट करने का आह्वान करने के बाद उसने मंदिर को ध्वस्त करने की अनुमति दी.
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के अनुसार, हालांकि अधिकारियों ने मंडप के आयोजकों को इसे हटाने के लिए कई बार कहा था, लेकिन अंततः उन्होंने गैर-अनुपालन के कारण इसे सरकारी भूमि से ‘शांतिपूर्ण तरीके से बेदखल’ कर दिया और दुर्गा की मूर्ति को पास की एक नदी में विसर्जित कर दिया. हालांकि मंत्रालय ने एक दिन पहले की भारतीय विदेश मंत्रालय की टिप्पणियों का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं किया.
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि अनधिकृत संरचनाओं को हटाना एक नियमित और वैध गतिविधि है और किसी को भी बिना अनुमति के सरकारी भूमि पर धार्मिक संरचनाएं बनाने की अनुमति नहीं है. साथ ही इसने ‘सभी से तथ्यों और जमीनी हकीकत की अनदेखी करते हुए किसी भी मामले पर प्रतिक्रिया करने से परहेज करने’ का आग्रह किया.
भारत ने उठाया था मुद्दा
इससे पहले भारत के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को कहा था कि ढाका के खिलखेत क्षेत्र में ‘कट्टरपंथी दुर्गा मंदिर को ध्वस्त करने के लिए शोर मचा रहे थे’ और बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने मंदिर को सुरक्षित रखने के बजाय इस घटना को ‘अवैध भूमि उपयोग’ के उदाहरण के रूप में पेश करके इसे नष्ट करने की अनुमति दी.
प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘इससे मूर्ति को स्थानांतरित करने से पहले ही नुकसान पहुंचा है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘हमें इस बात से निराशा है कि बांग्लादेश में ऐसी घटनाएं बार-बार हो रही हैं. मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूं कि हिंदुओं, उनकी संपत्तियों और धार्मिक संस्थानों की सुरक्षा करना बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की जिम्मेदारी है.’
हालांकि, बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय, जिसने गुरुवार को रेलवे अधिकारियों द्वारा की गई कार्रवाई से पहले संरचना को ‘बर्बाद करने’ के आह्वान का कोई उल्लेख नहीं किया, का कहना है कि ‘मंडप’ पिछले साल दुर्गा पूजा समारोहों के दौरान बांग्लादेश रेलवे की ‘निर्विवाद रूप से स्वामित्व वाली’ भूमि पर पूर्व अनुमति के बिना स्थापित किया गया था.
विदेश मंत्रालय ने आरोप लगाया कि रेलवे अधिकारियों ने मंडप को वहां बने रहने की अनुमति इस ‘पारस्परिक सहमति’ वाली शर्त पर दी थी कि जिन लोगों ने इसे स्थापित किया था, वे पूजा समारोह के बाद इसे हटा देंगे, लेकिन बाद में वे इससे मुकर गए और इसके बजाय उस स्थान पर काली की एक मूर्ति स्थापित कर दी.
इसमें कहा गया है, ‘बार-बार याद दिलाने के बावजूद दुर्भाग्यवश उन्होंने रेलवे अधिकारियों के साथ अपनी व्यवस्था की अनदेखी करते हुए मंडप को स्थायी बनाने की कोशिश की.’
ढाका ने कहा कि रेलवे अधिकारियों ने स्थानीय समुदाय के प्रतिनिधियों और मंडप के आयोजकों के साथ परामर्श के बाद दिसंबर में एक सार्वजनिक नोटिस जारी किया, जिसमें दुकानों और राजनीतिक दलों के कार्यालयों सहित सभी अनधिकृत संरचनाओं को हटाने का आह्वान किया गया.
विदेश मंत्रालय ने दावा किया कि मंगलवार और बुधवार को भी बार-बार याद दिलाने के बावजूद अनुपालन न किए जाने पर उन्होंने इन संरचनाओं को हटाने का निर्णय लिया.
गुरुवार को मंडप को ‘शांतिपूर्ण तरीके से खाली कराने’ के दौरान इसकी मूर्ति को स्थानीय हिंदू समुदाय के सदस्यों की भागीदारी के साथ उचित श्रद्धा के साथ पास की बालू नदी में विसर्जित कर दिया गया.
मंत्रालय ने कहा, ‘हालांकि देश के कानून कानून के अनुरूप किसी भी निर्माण के साथ भेदभाव किए बिना सभी पूजा स्थलों को पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं, लेकिन किसी भी परिस्थिति में किसी को भी सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण कर कोई धार्मिक संरचना बनाने की अनुमति नहीं है.’
इसमें कहा गया है कि बांग्लादेश पूजा स्थलों की सुरक्षा सहित सभी समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए दृढ़ता से प्रतिबद्ध है.
उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश के अंतरिम मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के कार्यकाल के दौरान ढाका और नई दिल्ली के बीच द्विपक्षीय संबंधों में खटास आ गई है, भारत ने अंतरिम प्रशासन के कार्यकाल में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं पर हमलों के बारे में बार-बार चिंता जताई है.
हालांकि बांग्लादेश ने कुछ घटनाओं को स्वीकार किया है और कार्रवाई करने का दावा किया है, लेकिन उसका तर्क है कि इन घटनाओं के बारे में भारत का विवरण ‘अतिरंजित’ है और कई घटनाएं राजनीति से प्रेरित थीं.
