फडणवीस का ‘प्रिय ज़िला’ गढ़चिरौली: सिमटता माओवाद, बढ़ती जाती माइनिंग

पिछले कुछ समय से महाराष्ट्र के गढ़चिरौली ज़िले में माओवादी सिमटते गए हैं, उनकी जगह माइनिंग कंपनियां आती गई हैं. यह पूरा कारोबार मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की निगरानी में हो रहा है, जिन्होंने ख़ुद को इस ज़िले का संरक्षक मंत्री नियुक्त कर दिया है. आदिवासियों के इस जंगल पर माइनिंग का क्या प्रभाव पड़ेगा? गढ़चिरौली पर हमारी सीरीज़ की पहली क़िस्त.

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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस. (फोटो साभार: फेसबुक) | पृष्ठभूमि में सुरजागढ़ खदान. (फोटो साभार: lloyds.in)

सात जून को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक अंग्रेजी अख़बार में लेख लिखकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उस दावे को चुनौती दी कि राज्य विधानसभा के चुनावों में धांधली हुई है.

दिलचस्प यह है कि इस लेख के आरंभिक वाक्य एकदम भिन्न विषय पर केंद्रित थे. फडणवीस ने लिखा कि छह जून को वे गढ़चिरौली ज़िले के दौरे पर थे और अबूझमाड़ के घने जंगल जाने वाले पहले मुख्यमंत्री थे. ‘मैंने रात गढ़चिरौली में बिताई थी. मैं अब तक वहां कम-से-कम चार रात बिता चुका हूं.’

यह हैरानी की बात लग सकती है कि राहुल गांधी को जवाब देता हुआ यह लेख, चुनावी प्रक्रिया पर केंद्रित यह लेख गढ़चिरौली से क्यों शुरू हुआ था.

यह संयोग नहीं था. मुख्यमंत्री फडणवीस का इस जिले से विशेष लगाव रहा है.

अक्सर पूछा जाता है कि जब दण्डकारण्य से नक्सलियों को हटा दिया जाएगा, इस बीहड़ जंगल की क्या तस्वीर बनेगी? इसका उत्तर माओवाद-प्रभावित गढ़चिरौली जिले में देखा जा सकता है.

पिछले कुछ सालों से इस जिले में जैसे-जैसे माओवादी आंदोलन कमजोर होकर सिमटता जा रहा है, महाराष्ट्र सरकार ने खदानों और उद्योगों को बढ़ाने की प्रक्रियाएं तेज कर दी हैं.

पिछले दिनों एक अख़बार में दो ख़बरें एक साथ प्रकाशित हुई थीं. एक ख़बर माओवादियों के बड़े नेता के मुठभेड़ में मारे जाने की थी. दूसरी, महाराष्ट्र के माओवाद-प्रभावित गढ़चिरौली जिले में लौह अयस्क संयंत्र के लिए फ़ॉरेस्ट क्लीयरेंस मिलने की थी, जिसमें एक लाख 23 हजार पेड़ों का काटा जाना प्रस्तावित था.

यह मंजूरी लॉयड्स स्टील को मिली थी, जिसे पिछले वर्षों में इस जंगल पर माइनिंग के बेहिसाब अधिकार मिलते गए हैं.

22 मई को पर्यावरण मंत्रालय ने लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी के अयस्क-वाशिंग प्लांट के लिए 900 हेक्टेयर से अधिक जंगल साफ करने और 1,23,000 से अधिक पेड़ों को काटने के लिए हरी झंडी दे दी थी.

7 जून, यानी जिस दिन फडणवीस का वह लेख प्रकाशित हुआ था, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) ने गढ़चिरौली की सुरजागढ़ खदान में लौह अयस्क उत्पादन को दोगुना से अधिक करने के लिए लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी लिमिटेड को पर्यावरण मंजूरी देने की सिफारिश कर दी. यह मंजूरी कंपनी को अपनी वार्षिक उत्पादन क्षमता को 10 मिलियन टन से बढ़ाकर 26 मिलियन टन करने में सक्षम बनाती है. इससे पहले 2023 में इस कंपनी को अपने उत्पादन को 3 मिलियन से बढ़ाकर 10 मिलियन टन प्रति वर्ष करने की मंजूरी मिली थी.

गौरतलब है कि इस परियोजना को पहले ही ‘उल्लंघन मामले’ (violations category case) के रूप में वर्गीकृत किया गया था. लेकिन कंपनी को पर्यावरण उल्लंघन के लिए दोषी ठहराए जाने के बावजूद विस्तार की मंजूरी मिल गयी.

दिसंबर 2022 में महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 15, 16 और 19 के तहत गढ़चिरौली की एक अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी कि 2007 की पर्यावरण मंजूरी की पांच साल की अवधि समाप्त होने के बाद भी खदान का संचालन जारी था. मंत्रालय और अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, कंपनी के अधिकारियों ने अपना अपराध स्वीकार किया और उन्हें दोषी ठहराया गया. इसके लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कंपनी पर 5.48 करोड़ रुपये जुर्माना लगाया था.

विवादों से रहा लंबा नाता

यह परियोजना शुरू से ही विवादों के घेरे में रही है क्योंकि यह खनन स्थल संवेदनशील भामरागढ़ रिजर्व वन के अंतर्गत आता है. गढ़चिरौली जिले में लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी लिमिटेड इकलौती खनन कंपनी है जो लौह खदान चला रही है. इस कंपनी को 2007 में सुरजागढ़ खदान का पट्टा 20 वर्षों के लिए मिला था, जिसे बाद में 2057 तक के लिए बढ़ा दिया गया.

सुरजागढ़ खदान. (फोटो साभार: lloyds.in)

देवेंद्र फडणवीस की गढ़चिरौली में विशेष दिलचस्पी

आदिवासी बहुल गढ़चिरौली जिला ‘विकास’ के पैमाने पर काफ़ी पिछड़ा माना जाता है. जबकि यह खनिज और वन संसाधनों से भरा हुआ एक समृद्ध जिला है, जो छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ पहाड़ का सीमावर्ती है.

सुरजागढ़ पहाड़ पर उच्च गुणवत्ता वाले कुल 857 मीट्रिक टन लौह अयस्क का भंडार होने का अनुमान है, जिसमें 156 मीट्रिक टन हेमेटाइट और 701 मीट्रिक टन बैंडेड हेमेटाइट क्वार्ट्ज (बीएचक्यू) शामिल हैं.

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने खुद को गढ़चिरौली का संरक्षक मंत्री और अपने कैबिनेट सहयोगी आशीष जायसवाल को सह-संरक्षक मंत्री नियुक्त किया है. इस तरह जिले की पूरी कमान अपने हाथ में ले ली है.

2025 का पहला दिन फडणवीस ने गढ़चिरौली में बिताया था. वे गढ़चिरौली जिले में रात बिताने वाले महाराष्ट्र के पहले मुख्यमंत्री भी बने थे. इस दौरान उन्होंने जिले में लॉयड्स मेटल कंपनी की कुछ इकाइयों का उद्घाटन भी किया था.

1 जनवरी 2025 को गढ़चिरौली में लॉयड्स मेटल एनर्जी के इकाइयों का उद्घाटन करते मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस. (फोटो साभार: X/@CMOMaharashtra)

आज की तारीख में गढ़चिरौली के लिए 60,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा के निवेश पाइपलाइन में हैं. इसके अलावा, सरकार की योजना एक हवाई अड्डा बनाने और नागपुर-मुंबई एक्सप्रेसवे का विस्तार गढ़चिरौली तक करने की भी है, जिसे ‘समृद्धि महामार्ग’ के नाम से जाना जाएगा.

19 जून को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने प्रस्तावित गढ़चिरौली हवाई अड्डे के लिए एक ख़ास (Immediate obstacle limitation surface survey) सर्वेक्षण का आदेश दिया. साथ ही इलाके में अन्य परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण करने का भी निर्देश दिया.

इस साल फरवरी में स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित वार्षिक विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) में फडणवीस ने जिस पहले मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन पर हस्ताक्षर  किया, वह गढ़चिरौली में निवेश के लिए था.

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस 22 जुलाई 2025 को नक्सल प्रभावित गढ़चिरौली जिले में कई प्रमुख बुनियादी ढांचा और औद्योगिक परियोजनाओं का उद्घाटन करेंगे, जिनमें प्रमुख रूप से हेडरी में 50 लाख टन प्रति वर्ष (एमटीपीए) क्षमता वाले लौह अयस्क ग्राइंडिंग प्लांट के पहले चरण और 10 एमटीपीए क्षमता वाली स्लरी पाइपलाइन परियोजना शामिल हैं.

इसके अलावा कोंसारी में 4.5 एमटीपीए क्षमता वाला एकीकृत इस्पात संयंत्र, 100 बिस्तरों वाला एक मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल, एक स्कूल और नक्सल प्रभावित क्षेत्र में 116 एकड़ में फैली लॉयड्स टाउनशिप शामिल है.

जिंदल का भी है निवेश

जिंदल के जेएसडब्ल्यू समूह ने भी गढ़चिरौली जिले सहित राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में कई परियोजनाओं में लगभग 3 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया है. इस जिले में जमशेदपुर के बाद भारत का दूसरा स्टील सिटी बनाने का दावा किया जा रहा है.

निवेश की घोषणा करते हुए फडणवीस ने कहा था, ‘महाराष्ट्र में स्टील, सौर ऊर्जा, ऑटो और सीमेंट जैसे प्रमुख क्षेत्रों में विविध निवेश वाली कंपनी जेएसडब्ल्यू स्टील के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करना, गढ़चिरौली को भारत के ‘स्टील सिटी’ के रूप में विकसित करने के हमारे दृष्टिकोण को पूरा करने में एक महत्वपूर्ण कदम है.’

11 अप्रैल, 2025 को आयोजित गढ़चिरौली जिला निवेश शिखर सम्मेलन में 66 एमएसएमई ने 493.4 करोड़ रुपये के समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए थे.

इस बीच, महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (एमआईडीसी) ने गढ़चिरौली में जेएसडब्ल्यू समूह की इस्पात परियोजना के लिए लगभग 3,500 एकड़ भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर दी है. माओवाद प्रभावित जिले के वडसा तालुका में भू-अधिग्रहण के लिए जमीन की पहचान की गई है. माना जा रहा है कि क्षेत्रफल की दृष्टि से यह जिले में सबसे बड़ा भूमि अधिग्रहण होगा, जिसे राज्य इस्पात केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना बना रहा है.

खनन स्वीकृतियों में तेजी लाने के लिए विधेयक

30 जून को महाराष्ट्र सरकार ने गढ़चिरौली जिले में खनन स्वीकृतियों में तेजी लाने और खनिज आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए एकीकृत प्राधिकरण स्थापित करने के लिए विधानसभा में एक विधेयक पेश किया. गढ़चिरौली जिला खनन प्राधिकरण (जीडीएमए) के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अध्यक्ष होंगे.

इस विधेयक के अनुसार, प्राधिकरण के पास सभी मौजूदा कानूनों को दरकिनार करने की शक्ति होगी और किसी भी अदालत को इसके किसी भी कार्य या आदेश के खिलाफ कोई मुकदमा/कार्यवाही चलाने का अधिकार नहीं होगा.

7 जुलाई को इस विधेयक को महाराष्ट्र विधान परिषद ने पारित कर दिया. 7 जुलाई को ही महाराष्ट्र के उद्योग मंत्री उदय सामंत ने गढ़चिरौली को एक स्टील उत्पादन केंद्र में बदलने के लिए एक लाख करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की.

‘खदानों के लिए कंपनियों की लाइन लगी है…’

कंपनियों के इस आगमन से स्थानीय आदिवासी आक्रोशित हैं. आदिवासी कार्यकर्ता लालसू नोगोटी बताते हैं कि गढ़चिरौली जिले में खदानें खोलने के लिए कंपनियों की लाइन लगी हुई हैं. आने वाले दिनों में पूरे जिले में कुल 25 जगहों पर खदान खोलने का प्रस्ताव है.

सुरजागढ़ पहाड़ी शृंखला के दूसरे तरफ भी खदान का विस्तार किया जा रहा है जिसमें छह ब्लॉक अलग-अलग कंपनियों को दिया गया है. इनमें जिंदल का जेएसडब्ल्यू ग्रुप और रायपुर स्थित नेचुरल रिसोर्सेज़ एनर्जी कंपनी भी शामिल हैं. कोरची तहसील की जेंडेपाड़ पहाड़ी और भामरागढ़ तहसील के बाबलाई पहाड़ में भी लौह खदान खोलने का प्रस्ताव है.

लौह अयस्क के अलावा, अडानी समूह की यूनिट अंबुजा सीमेंट्स को गढ़चिरौली के देवलमारी कटेपल्ली क्षेत्र चूना पत्थर खनन के लिए भी अनुमति दी गई है. यह लगभग 538 हेक्टेयर क्षेत्र में स्थित है, जिसमें लगभग 150 मिलियन टन चूना पत्थर होने का अनुमान है.

 मोहगांव ग्रामसभा के अध्यक्ष देवसाय आतला ने बताया कि अभी चामोर्षी तालुका में 1200 हेक्टेयर क्षेत्र में बॉक्साइट के खनन की कोशिशें की जा रही हैं. वहां पर किसी आदिवासी कंपनी को आगे रखकर इलाके को 90 साल के लिए लीज़ पर लेने की योजना है.

देवसाय ने द वायर हिंदी को बताया, ‘चूंकि यह इलाका पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में आता है, यहां कोई बाहरी कंपनी जमीनें नहीं ले सकती. इसलिए कोई बाहरी कंपनी किसी आदिवासी के नाम पर कंपनी बनाएगी, और पहले उस जमीन को उसके नाम करके, बाद में उससे लीज पर ले लेगी.’

उन्होंने बताया कि उनके पास भी कुछ लोग आए थे. उन लोगों ने देवसाय से उस जमीन को उनकी अपनी कंपनी ‘आदिम पारंपारिक संस्था’ के नाम करने के लिए कहा था. उसके बदले में उन्हें कुछ पैसे देने की पेशकश की थी. यह भी कहा कि वे ही जमीन को उनके कंपनी के नाम करवा देंगे और नौ साल बाद उनसे 90 साल के लिए लीज पर लेंगे और खनन करेंगे.

 खनन का विरोध

सुरजागढ़ क्षेत्र में खनन का शुरू से ही स्थानीय आदिवासी विरोध कर रहे हैं. इसको लेकर कई संघर्ष हुए हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनियों ने उन्हें धोखा दिया और अवैध रूप से उनकी ज़मीन हड़प कर उसमें खनन का काम शुरू किया.

लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी लिमिटेड को सुरजागढ़ में खनन की मंजूरी 2007, और 2008 में 340.09 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन लाइसेंस मिलने के बावजूद माओवादियों और आदिवासी समुदायों के विरोध और वन, भूमि अधिकारों से संबंधित मुद्दों के कारण खनन का काम कई सालों तक नहीं चल पाया. कभी माओवादियों ने कंपनी के वाहनों को जला दिया और कर्मचारियों की पिटाई की. 2013 में कंपनी के उपाध्यक्ष जसपाल ढिल्लों और दो अन्य की हत्या भी कथित माओवादियों ने की.

उसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अगस्त 2015 में केंद्रीय गृह मंत्री से क्षेत्र में अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी बढ़ाने का अनुरोध किया ताकि खनन को बेरोकटोक जारी रखा जा सके.

उसके बाद कंपनी ने फिर से खनन शुरू करने की कोशिश की. 5 दिसंबर, 2016 को 70 गांवों के आदिवासी नेताओं, स्थानीय सामाजिक संगठनों और राजनीतिक नेताओं के प्रतिनिधि सुरजागढ़ में इकट्ठे हुए और खनन रोकने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया और मांग की कि सरकार सभी मौजूदा और प्रस्तावित खनन पट्टों को रद्द करे. उन्होंने लोगों की आजीविका की रक्षा के लिए वन अधिकार कानून, 2006 और अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार (पेसा) कानून को लागू करने के लिए भी प्रस्ताव पारित किए.

लेकिन, स्थानीय आदिवासियों के विरोध के बावजूद खुदाई का काम बंद नहीं हुआ. 24 दिसंबर, 2016 को माओवादियों ने सुरजागढ़ खदान पर हमला करके लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी लिमिटेड के दर्जनों ट्रकों और एर्थमूवर्स में आग लगाई. लगभग 80 वाहनों को जला दिया. उससे कंपनी को 13 करोड़ रुपये का नुकसान होने का आकलन किया गया.

इसके बाद इलाके में भारी पुलिस बलों की तैनाती की गई. लालसू ने बताया, ‘खनन का विरोध कर रहे ग्रामीणों को पुलिस और अर्धसैनिक बलों के हाथों उत्पीड़न और गिरफ्तारियों का सामना करना पड़ा’.

2017 में लगभग 70 गांवों के लोगों ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें सरकार द्वारा खनन लाइसेंस के आवंटन का विरोध किया था. उनका मानना है कि उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है.

स्थानीय लोगों के अनुसार, वन अधिकार अधिनियम (2006) के तहत भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 के तहत उनकी सहमति लेने की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई.

उनका कहना है कि यहां उत्खनन कानून, पर्यावरण कानून और पेसा कानूनों को ताक पर रखकर खनन कार्य किया जा रहा है.

पोट्टेगांव के आदिवासी विकास परिषद के कार्यकर्ता विनोद मंडावी ने आरोप लगाया कि 2010 में गढ़चिरौली के कलेक्टर ने फर्जी ग्रामसभाओं के दस्तावेज बनाकर खनन के लिए लोगों की समहति दिखाई. ऐसी फर्जी ग्रामसभाओं के दस्तावेज एटापल्ली ब्लॉक के दमकोंडावाही, बांडे इलाके में गांव के ग्रामसेवकों के जरिए बनाया गया.

वर्ष 2023 में सुरजागढ़ खनन के खिलाफ करीब आठ महीने चले 70 से अधिक गांवों के आदिवासियों के शांतिपूर्ण धरने पर पुलिस ने हमला करके उसे बंद करवा दिया.

लालसू नोगोटी बताते हैं लोगों को पुलिस, प्रशासन और कंपनी लगातार डरा-धमका रहे हैं. उन पर झूठे केस लगा रहे हैं.

तोड़गट्टा में खदान के खिलाफ 2023 में 255 दिन धरना चला था, यह गढ़चिरौली के इतिहास में आदिवासियों के सबसे लंबे आंदोलनों में से एक था.

पुलिस कार्रवाई के बाद टोडगट्टा का आंदोलन स्थल. (फाइल फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

लालसू ने आरोप लगाया कि सरकार ने पुलिस के जरिए उस शांतिपूर्ण आंदोलन को बेरहमी से दबा दिया. लोगों को वहां से भगा दिया, झोपड़ियों में तोड़फोड़ की, 21 लोगों – जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं – को गिरफ्तार किया. उन पर झूठे केस लगाए – 17-18 दिन चंद्रपुर जेल में रखा और बाद में जमानत पर रिहा किया.

विनोद मंडावी ने कहा कि उस इलाके में हर पांच किलोमीटर में एक पुलिस चौकी खोली गई है कोई भी आवाज उठाता है तो उस पर माओवादी होने का ठप्पा लगा दिया जाता है. उन्होंने कहा, ‘मैं भी कई बार हिरासत में लिया गया हूं.’

उस इलाके के अन्य लोगों ने भी द वायर हिंदी को बताया कि लोग अब खदान के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने से कतरा रहे रहे हैं, क्योंकि उन्हें पुलिस और अर्धसैनिक बलों के हाथों उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है. पुलिस उन पर माओवादी होने या यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के तहत केस दर्ज करती है.

विस्थापन का सवाल – आदिवासियों की जमीनों का हाल

लालसू ने बताया कि फिलहाल इस इलाके में खनन की वजह से किसी भी गांव का विस्थापन नहीं हुआ है लेकिन आगे विस्थापित होने का खतरा बहुत ज़्यादा बढ़ेगा. जैसे-जैसे खनन का विस्तार होगा लोगों की जमीनें हड़पना शुरू हो जाएगा. इलाके के कुछ गांवों में लॉयड्स कंपनी लोगों से जमीनें लेना शुरू कर चुकी है.

लालसू ने बताया कि हेडरी गांव में लॉयड्स कंपनी ने एक स्कूल, अस्पताल और एक ट्रेनिंग सेंटर बनाया, इसके लिए आदिवासियों की जमीनें ली गईं. इस तरह खनन जैसे-जैसे बढ़ रहा है, अन्य गतिविधियों के लिए भी आदिवासियों की जमीनें ली जा रही हैं.

हेडरी गांव में लॉयड्स कंपनी द्वारा निर्मित संरचनाएं. (फोटो साभार: lloyds.in)

लालसू कहते हैं कि सरकार से कंपनी को 340.09 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन लाइसेंस मिला हुआ है, लेकिन कंपनी उस इलाके में उससे कहीं ज्यादा जमीनें अन्य गतिविधियों के नाम से ले रही है.

इसके अलावा, एटापल्ली और मदिगुड़ेम में कच्चा माल इकठ्ठा करने के लिए कंपनी ने बहुत सारी जमीनें ले रखी हैं. आलापल्ली और कामनचेरु के आसपास भी पार्किंग और लौह अस्यक के साथ निकले मिट्टी-पत्थर आदि को डंप करने के लिए आदिवासियों की बहुत सारी जमीनें अधिग्रहित की गईं हैं.

इस तरह आदिवासियों की जमीन छीन कर कंपनियों को दी जा रही है.

द वायर हिंदी ने इस पूरे मसले पर, भूमि अधिग्रहण से लेकर आदिवासियों के सरोकारों पर, लॉयड्स कंपनी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कार्यालय को विस्तृत प्रश्न भेजे हैं, रिपोर्ट के प्रकाशन तक जिसका उत्तर नहीं मिला है. जवाब मिलते ही यह ख़बर अपडेट की जाएगी.

(अगली क़िस्त: इन परियोजनाओं का स्थानीय जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?)