पॉल फ़ॉर्मर ने पैथोलॉजीज़ ऑफ़ पावर में उस दोराहे के बारे में बात की है, जहां मानव जाति आज ख़ुद को खड़ा पाती है. उनका मानना है कि स्वास्थ्य सेवा को या तो ‘बेची जाने वाली वस्तु‘ माना जा सकता है या ‘एक बुनियादी सामाजिक अधिकार.’ यह दोनों एक साथ नहीं हो सकता. उन्होंने कहा कि इनमें से हम कौन सा रास्ता चुनेंगे, यह बहुत महत्वपूर्ण विकल्प है, ‘ऐसे ख़तरनाक समय‘ में बेहतर समझ रखने वाले लोगों को इनमें से कोई विकल्प चुनना चाहिए. उन्होंने इसे हमारे समय का ‘महान नाटक‘ कहा है.
आज दुनिया में जब यह ‘महान नाटक‘ चल रहा है, तो नीति-निर्माता क्या विकल्प चुन रहे हैं?
अधिकांश लोग सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा और स्वास्थ्य सेवा के वैधानिक अधिकार के तौर पर लाभ कमाने वाले निजी स्वास्थ्य प्रदाताओं की महत्वपूर्ण, यहां तक कि सर्वोपरि भूमिका का विकल्प चुन रहे हैं. उनकी धारणा यह है कि निजी क्षेत्र दक्षता, विकल्प, उच्च-गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवा लाएगा और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में संसाधन की कमी को पूरा करके स्वास्थ्य सेवा को उन लोगों तक पहुंचाएगा जो अभी इससे वंचित हैं. इन नीतिगत विकल्पों का परिणाम प्रत्यक्ष स्वास्थ्य सेवा प्रावधान से राज्य का पीछे हटना, कल्याणकारी राज्य की आकांक्षा का भी समाप्त होना और निजी चिकित्सा क्षेत्र में दुर्लभ सार्वजनिक निधियों का बड़े पैमाने पर हस्तांतरण है.
इस लेख में मैंने इन धारणाओं की वैधता की जांच की है. मैंने जो प्रश्न पूछे हैं वह यह है कि क्या बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों द्वारा बड़े पैमाने पर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रावधान के इस विकल्प में गंभीर हितों के टकराव की संभावना नहीं है? क्या एक तरफ़ मुनाफ़ा कमाने की चाह और दूसरी तरफ़ ज़रूरत के आधार पर, न कि भुगतान करने की क्षमता के आधार पर, समान गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवा के बीच एक अंतर्निहित टकराव नहीं है?
स्वास्थ्य आवश्यकताओं और स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता के बीच की खाई
नीति निर्माताओं के लिए सचमुच जीवन और मृत्यु जैसी चुनौती यह है कि वे स्वास्थ्य आवश्यकताओं और स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता के बीच की खाई को पाटने के सर्वोत्तम तरीक़े खोजें, ख़ास तौर पर ग़रीबों के लिए.
थिंकटैंक ऑक्सफ़ैम ने अपने ब्रीफ़िंग पेपर Sick Development, में बताया है कि ‘एक नैरेटिव सामने आया है, जिसके लिए न तो पर्याप्त साक्ष्य है और न तो जिसे ठीक से चुनौति मिली है, उसमें कहा गया है कि जो लोग स्वास्थ्य सेवा से सबसे अधिक वंचित हैं, उन तक स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाने के लिए लाभ कमाने वाले, शुल्क लेने वाले स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को वित्तपोषित करके और निजी इक्विटी फ़र्मों सहित अधिक निजी वित्त को प्रोत्साहित किया जा सकता है.’
हमारी दुनिया की कठोर और अमानवीय वास्तविकता यह है कि दुनिया की आधी आबादी के पास अभी भी सबसे आवश्यक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं है. प्रति सेकेंड साठ लोग स्वास्थ्य सेवा के लिए अपनी जेब से इतना अधिक भुगतान कर रहे हैं कि जिसके बाद वह भयावह ग़रीबी झेलने के लिए अभिशप्त हो जाते हैं.
ब्रीफ़िंग पेपर में कहा गया है कि ग़रीब लोगों के जीवन और स्वास्थ्य को लाभ कमाने वाली बड़ी कंपनियों के हाथों में सौंपने के ये तरीक़े ‘यूरोपीय देशों में बेहद अलोकप्रिय होंगे, लेकिन इन्हें दक्षिणी गोलार्ध के देशों में निर्यात किया जा रहा है, जहां लोकतांत्रिक निगरानी बहुत कम है और करदाताओं द्वारा समर्थित बजट काफ़ी अधिक है’.
निजी स्वास्थ्य प्रावधान के समर्थक जानबूझकर इस व्यापक प्रमाण को नज़रअंदाज़ करते हैं कि लाभ कमाने वाले निजी अस्पताल अक्सर उन मरीज़ों को ब्लॉक कर देते हैं, दिवालिया बना देते हैं या यहां तक कि उन्हें हिरासत में भी ले लेते हैं जो भुगतान नहीं कर सकते. स्वास्थ्य सेवा में वाणिज्यिक और बाज़ार आधारित दृष्टिकोण अमीर तथा ग़रीब, महिलाओं और पुरुषों के बीच की खाई को और गहरा कर सकते हैं.
इससे पहले से ही कम वित्त पोषित सरकारी सेवाओं में संसाधनों की और कमी हो जाती है, जिससे वे लोग इससे बाहर कर दिए जाते हैं, जो भुगतान नहीं कर सकते या सामाजिक रूप से उत्पीड़ित हैं. लाभ कमाने वाले स्वास्थ्य प्रदाताओं के पास बीमारी का इलाज करने के लिए प्रोत्साहन की कमी है. इसके बजाय, सिस्टम ग़लत निदान या अधिक इलाज करने के लिए विकृत सुझाव देता है.

निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को स्वास्थ्य के अधिकार के लक्ष्यों के साथ जोड़ा जाए
नीति निर्माता और विद्वान लाभ तथा देखभाल के बीच हितों के टकराव की संभावना को स्वीकार करते हैं. लेकिन जिस समाधान की हम बार-बार बात करते हैं – जिसका उल्लेख हमने अंतिम अध्याय में किया है – वह है निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को उच्च पेशेवर, नैतिक और समानता मानकों के प्रति जवाबदेह ठहराने के लिए मज़बूत और विश्वसनीय नियामक प्रणाली. तर्क यह है कि यदि राज्य विनियम, क़ानूनी आदेश, क़ानूनी जवाबदेही, पारदर्शिता तथा जवाबदेही का एक सुसंगत और क़ानूनी रूप से लागू करने योग्य मज़बूत पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद है, तो – रोगियों और समुदायों की सक्रिय भागीदारी के साथ – यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को स्वास्थ्य के अधिकार के लक्ष्यों के साथ जोड़ा जाए.
काग़ज़ी तौर पर यह आश्वस्त करने वाला लग सकता है. हालांकि, वास्तविकता यह है कि कमज़ोर कार्यान्वयन, विखंडन और शक्ति असंतुलन जैसे कारकों की वजह से ज़मीन पर जवाबदेही तंत्र अक्सर अप्रभावी पाए जाते हैं.
यहां तक कि जहां पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए औपचारिक तंत्र मौजूद हैं, वे अक्सर संस्थागत कमज़ोरी, नियामक नियंत्रण, क़ानूनी अस्पष्टता और निजी स्वास्थ्य सेवा भागीदारों के बीच सत्ता के संकेंद्रण के कारण व्यवहारिक रूप से विफल हो जाते हैं. राज्य नियामकों को कम वित्तीय सहायता दी जाती है या राजनीतिक रूप से विवश किया जा सकता है. न्यायालय विधायी निष्क्रियता से ख़ुद को अलग कर सकती है या अनुबंधों की संकीर्ण व्याख्या कर सकती है. स्थानीय सरकारों के पास अक्सर स्वायत्तता और संसाधनों की कमी होती है. मरीज़ों और परिवारों को क़ानूनी जानकारी का अभाव, बदले की कार्रवाई का डर और जटिल शिकायत प्रणाली जैसी बाधाओं का सामना करना पड़ता है. ऐसा निम्न – और मध्यम – आय वाले देशों में और भी अधिक होता है जहां निजी कॉरपोरेट स्वास्थ्य सेवा प्रावधान का जादू सबसे अधिक प्रभावी है.
ऑक्सफ़ैम ने प्रभावकारी तरीक़े से स्वास्थ्य सेवा प्रावधान में निहित प्रदाता और रोगी के बीच शक्ति, स्थिति और सूचना में भारी असमानता के प्रभावों की ओर ध्यान आकर्षित किया है. लाभ कमाने वाली स्वास्थ्य व्यवस्था को सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जो चीज़ अलग करती है वह है लाभ के लिए इस असमानता का शोषण. ‘इस शोध के लिए ऑक्सफ़ैम द्वारा मरीज़ों और उनके रिश्तेदारों के साथ किए गए सभी साक्षात्कारों ने इस क्रूर वास्तविकता को उजागर कर दिया कि लाभ कमाने वाले स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं द्वारा मरीज़ों और उनकी देखभाल करने वालों का शोषण और जबरन वसूली करना भयावह रूप से आसान है, क्योंकि मनुष्य अपने प्रियजन की जान बचाने के वास्ते कोई भी क़ीमत चुकाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं.’
डॉक्टरों को जवाबदेह ठहराने के लिए ग़रीब मरीज़ों के सशक्तीकरण की इस दुर्लभ भावना के अलावा, निजी स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रभावी विनियम के लिए संसाधनों और मज़बूत राज्य क्षमता दोनों की आवश्यकता होती है. अध्ययन से स्थापित होता है कि कम – और यहां तक कि मध्यम – आय वाले देशों में भी इन दोनों की कमी है, इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं है कि इन देशों में विनियम अक्सर कम पाया जाता है. लेकिन निजी स्वास्थ्य क्षेत्र के कमज़ोर विनियम का एकमात्र कारण सिर्फ़ बजट और क्षमता की कमी नहीं हो सकती है.

नीति निर्माण में बड़े व्यवसायों की दुर्जेय और लगातार बढ़ती शक्ति
इससे भी अधिक बुनियादी बाधा यह हो सकती है कि शक्तिशाली बड़े व्यवसायों को नियंत्रण में रखने की राजनीतिक इच्छाशक्ति बहुत कम है. और यह केवल निम्न तथा मध्यम आय वाले देशों पर ही नहीं, बल्कि अमीर देशों पर भी समान रूप से लागू हो सकता है. नीति निर्माण में बड़े व्यवसायों की दुर्जेय और लगातार बढ़ती शक्ति दुनिया भर की सरकारों की वास्तविकता है – जिसे ऑक्सफ़ैम ने समकालीन नव-उदारवादी राज्य पर ‘कुलीनों का क़ब्ज़ा’ कहा है, जो इसकी उचित व्याख्या है.
नीति निर्माण पर अभिजात वर्ग का इस तरह का क़ब्ज़ा व्यापक और तेज़ी से सामान्य हो रहा है. जब जनवरी 2025 में डोनाल्ड ट्रम्प ने संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली, तो उपस्थित लोगों में प्रमुख थे दुनिया के तीन सबसे धनी लोग – टेस्ला के सीईओ और दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति इलोन मस्क (433.9 बिलियन डॉलर की संपत्ति), अमेज़न के संस्थापक जेफ़ बेज़ोस (239.4 बिलियन डॉलर की संपत्ति) और मेटा के मार्क ज़ुकरबर्ग ($ 211.8 बिलियन की संपत्ति). उनकी संयुक्त संपत्ति आधे अमेरिकी आबादी की पूरी संपत्ति से अधिक थी. ट्रम्प के राष्ट्रपति पद के शुरुआती महीने – जिस समय मैं यह लिख रहा हूं – दुनिया के सबसे शक्तिशाली कार्यकारी कार्यालय द्वारा लिए गए निर्णयों पर मस्क के स्पष्ट और व्यापक प्रभाव के कारण कलंकित हैं.
दवा और चिकित्सा उपकरण कंपनियों, बीमा तथा कॉरपोरेट अस्पताल शृंखलाओं सहित स्वास्थ्य सेवा उद्योग का अनुमानित मूल्य $ 7 ट्रिलियन है. बहुत से देशों में स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाले उद्यमी तेज़ी से और अधिक संख्या में अरबपति की सूचि में शामिल हो रहे हैं.
ब्राज़ील की प्रमुख स्वास्थ्य कंपनियों – प्रोपार्को और रेडे डोर – के अध्यक्ष ब्राज़ील के 10वें सबसे अमीर अरबपति हैं. ब्रिटिश इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट समर्थित मणिपाल ग्रुप के नियंत्रक रंजन पाई की वास्तविक संपत्ति में सिर्फ़ एक साल में ही 1.48 बिलियन अमेरिकी डॉलर की बढ़ोतरी हुई. दशकों की नवउदारवादी नीतियों का संचित प्रभाव यह है कि सार्वजनिक संस्थानों से निजी उद्यमों को सत्ता का प्रभावी हस्तांतरण किया जा रहा है.
सार्वजनिक स्वास्थ्य विश्लेषक अमित सेनगुप्ता का मानना है कि स्वास्थ्य सेवा में निजी क्षेत्र के प्रभुत्व को सुविधाजनक बनाने में राज्य की सक्रिय भूमिका न केवल एक तकनीकी-प्रबंधकीय विकल्प है, बल्कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल की ज़िम्मेदारी लाभ कमाने वाली निजी स्वास्थ्य क्षेत्र को हस्तांतरित करके राज्य द्वारा अपने प्राथमिक कर्तव्यों का जानबूझकर और बेतहाशा किया गया परित्याग है. सेनगुप्ता ने इसे ‘विनियामक क़ब्ज़ा’ कहा है, जिसमें राज्य द्वारा नामित ‘विशेषज्ञों’ को उन उद्योगों के विनियम में सहायता और सलाह देने के लिए बुलाया जाता है, जहां ‘विशेषज्ञों’ की ज़रूरत होती है.
हमारी दुनिया के अधिकांश हिस्सों की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की इस गंभीर वास्तविकता के विपरीत मैं इस धारणा से परेशान हूं जो अभी भी वैश्विक स्तर पर नीति निर्माताओं द्वारा व्यापक रूप से प्रचारित की जाती है कि राज्यों के पास निजी स्वास्थ्य क्षेत्र को विनियमित करने की शक्ति, क्षमता और इच्छा है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे निजी मुनाफ़े के बजाय सार्वजनिक भलाई को बढ़ावा देते हैं. मुझे आश्चर्य है कि हम क़ानून में नियमों और उपायों के कितने प्रभावी होने की उम्मीद कर सकते हैं जिससे वास्तव में न्यायसंगत स्वास्थ्य प्रावधान के कर्तव्य और लाभ की कॉरपोरेट चाह के बीच के संघर्ष को रोका जा सके?
बिलों का भुगतान न करने की वजह से मरीज़ों को निजी अस्पतालों द्वारा क़ैद किया जाता है
ऑक्सफ़ैम ने अपने ब्रीफ़िंग पेपर में इस बात को दर्ज किया है कि कैसे केन्या और भारत में बिलों का भुगतान न करने की वजह से मरीज़ों को निजी अस्पतालों द्वारा क़ैद किया जाता है. आपातकालीन देखभाल के वैधानिक रूप से अनिवार्य अधिकार से इनकार किया जाता है. उपचार बहुत ही महंगा है. मुफ़्त देखभाल के हक़दार मरीज़ों को ग़रीबी में धकेल दिया जाता है. स्वास्थ्य सेवाओं के इस्तेमाल के बदले उच्च शुल्क का भुगतान करने के लिए मजबूर किया जाता है.
कोविड-19 महामारी के दौरान, कुछ अस्पतालों ने भयावह तरीक़े से व्यवहार किया, लोगों की पीड़ा और इस नई बीमारी के डर का फ़ायदा उठाकर सामान्य समय की अपेक्षा कहीं अधिक मुनाफ़ा कमाया. ऑक्सफ़ैम ने निष्कर्ष निकाला है कि वैश्विक और घरेलू करदाताओं का पैसा महंगे, लाभ कमाने वाले निजी अस्पतालों में लगाया जा रहा है जो उन रोगियों का इलाज करने से मना करते हैं, उन्हें दिवालिया बनाते हैं या भुगतान नहीं कर पाने की स्थिति में उन्हें हिरासत में रखते हैं.
रिपोर्ट में भयावह कहानियां कही गई हैं कि कैसे केन्या के नैरोबी में एक प्रमुख निजी अस्पताल ने रोगियों की मृत्यु के उपरांत दो साल तक शवों को उनके परिजनों को देने से मना कर दिया क्योंकि उनके परिवार वालों ने बिलों का भुगतान नहीं किया था.
इसी वजह से एक नवजात शिशु को तीन महीने तक बंधक बनाकर रखा गया था, और उसकी मां उसे स्तनपान कराने के लिए हर दिन अस्पताल आती थी. माता-पिता द्वारा बिलों का भुगतान नहीं किए जाने की वजह से एक स्कूली बच्चे को 11 महीने तक बंधक बनाकर रखा गया.

नाइजीरिया में, एक बच्चे की सामान्य तरीक़े से होने वाली डिलीवरी पर नाइजीरिया के सबसे ग़रीब 50% लोगों की नौ महीने की आमदनी ख़र्च हो जाती है. सिज़ेरियन डिलीवरी और भी महंगी है, सबसे ग़रीब 10% लोग 24 साल में जितना कमाते हैं उसके बराबर इसमें ख़र्च होता है. नाइजीरिया के एक निजी अस्पताल में कोविड-19 वायरस से मरने वाले एक मरीज़ का बिल अविश्वसनीय ढंग से 1,16,000 अमेरिकी डॉलर का आया था.
सार यह है: एक सबसे शक्तिहीन, बहिष्कृत महिला या बालिका के बारे में विचार करें – जो अपनी जाति, धर्म, लिंग या किसी भी तरह के दस्तावेज़ के अभाव के कारण क्रूर भेदभाव झेल रही है – जो विशाल और राजनीतिक रूप से शक्तिशाली कॉरपोरेट अस्पतालों के प्रभुत्व वाली अत्यधिक निजीकृत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली से जीवन रक्षक स्वास्थ्य सेवा चाहती है. क्या वह वास्तव में उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य देखभाल के अपने अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए विशाल निजी स्वास्थ्य प्रदाताओं के ऊपर राज्य द्वारा तय किए गए विनियम पर भरोसा कर सकती है ताकि उसका जीवन बच सके?
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए मैं इस लेख में दुनिया के सबसे अधिक निजीकृत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली वाले देशों में से एक भारत के बारे सूक्ष्म अध्ययन प्रस्तुत करूंगा. कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह विश्व की सबसे अधिक निजीकृत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका से भी आगे है.
भारत की निजी और कॉरपोरेट स्वास्थ्य प्रणाली के कामकाज पर क़रीब से नज़र डालना क्यों ज़रूरी है?
अस्पताल उद्योग भारत के कुल स्वास्थ्य सेवा बाज़ार का 80% हिस्सा है. भारत दुनिया के उन देशों में से एक है, जहां लोग अपनी जेब का पैसा सबसे अधिक स्वास्थ्य पर ख़र्च करते हैं. कुल स्वास्थ्य ख़र्च के अनुपात के रूप में जेब से किया जाने वाला ख़र्च भारत में ग़रीबी का एक प्रमुख कारण है. सैंतीस प्रतिशत भारतीय लोगों को निजी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवा के लिए बहुत अधिक पैसा ख़र्च करना पड़ता है.
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में देश के सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.8% से 1.1% निवेश
स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में राज्य ने जो कोताही की है वह चौंकाने वाला है. 2017 में द इकोनॉमिस्ट ने पाया कि भारत की निजी स्वास्थ्य सेवा पर अत्यधिक निर्भरता वैचारिक नहीं है, बल्कि इस वास्तविकता का परिणाम है कि स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने की दिशा में ‘सरकार ने बहुत घटिया काम किया है‘.
कई वर्षों से, भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में देश के सकल घरेलू उत्पाद का 0.8% से 1.1% निवेश होता रहा है, जो दुनिया में सबसे कम है. स्वास्थ्य पर सार्वजनिक ख़र्च के मामले में भारत वैश्विक स्तर पर नीचे से पांचवें स्थान पर है. और इस मामूली संसाधन का भी बहुत कम हिस्सा सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मज़बूत करने और विशेष रूप से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के निर्माण में ख़र्च गया है. चीन निचले स्तर पर इसका तीन गुना निवेश करता है.
भारत की मिश्रित स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में, जेब से ख़र्च अधिक होता है और सेवाएं बाज़ार से ख़रीदी जाती हैं. भारत में कुल स्वास्थ्य व्यय का केवल एक चौथाई से थोड़ा अधिक हिस्सा राज्य द्वारा वहन किया जाता है; बाक़ी की सेवाएं निजी क्षेत्र द्वरा प्रदान की जाती हैं जिन्हें पैसा ख़र्च करके ख़रीदना पड़ता है. निजी स्वास्थ्य ख़र्च का 87% उन व्यक्तियों द्वारा किया जाता है जिनके पास बीमा कवर नहीं है. आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है निजी क्षेत्र से स्वास्थ्य सुविधाएं लेने की वजह से 55 से 68 मिलियन लोग ग़रीब हो गए हैं.
भारत में होने वाले सभी स्वास्थ्य लेन-देन में निजी स्वास्थ्य सेवा की हिस्सेदारी 80% है. भारत में प्रशिक्षित 100 डॉक्टरों में से 80 निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करते हैं (और यह तब है जब बड़ी संख्या में लोग उत्तरी गोलार्ध के देशों में चले गए हैं, जहां उन्हें उच्च वेतन मिल रहा है, जो उन डॉक्टरों की आकांक्षाओं को और बढ़ा देते हैं जो भारत में रहने और काम करने का विकल्प चुनते हैं). अस्पताल के बिस्तर की उपलब्धता के मामले में भारत 167 देशों में से 155वें स्थान पर है. बहत्तर प्रतिशत अस्पताल और अस्पतालों के 60% बिस्तर निजी क्षेत्र में हैं. सभी बाह्य-रोगी स्वास्थ्य सेवाओं का 80 प्रतिशत और आंतरिक-रोगी स्वास्थ्य सेवाओं का 60% निजी क्षेत्र द्वारा प्रदान किया जाता है.

भारत में कुल दस लाख निजी स्वास्थ्य उद्यमों में से एक चौथाई मध्यम से बड़े चिकित्सा प्रतिष्ठान हैं. 2016 में, निजी अस्पतालों और डायग्नोस्टिक केंद्रों में निवेश 4000 मिलियन अमेरिकी डॉलर को पार कर गया, जिसमें महत्वपूर्ण विदेशी पूंजी हस्तांतरण भी शामिल है. भारत में 425 मेडिकल कॉलेजों में से आधे से ज़्यादा निजी मेडिकल कॉलेज हैं, एमबीबीएस की 48% सीटें इन्हीं में हैं, जिनकी फ़ीस बहुत ज़्यादा है. वे ज़मीन, इमारतों और उपकरणों में बहुत अधिक निवेश करते हैं जिसकी भरपाई बहुत ज़्यादा फ़ीस लेकर की जाती है. स्वाभाविक रूप से, वे जिस तरह की शिक्षा देते हैं, वह छात्रों को सार्वजनिक सेवा के लिए तैयार करने में बहुत कम मदद करती है.
स्वास्थ्य में निजी क्षेत्र के निवेश के बचाव का एक आम तर्क, जिसमें अक्सर अंतरराष्ट्रीय सहायता और वित्तीय संस्थान का महत्वपूर्ण पूंजी निवेश होता है, यह है कि ये कम उपलब्ध सार्वजनिक निधियों के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में आए गैप को कम करते हैं.
ऑक्सफ़ैम ब्रीफ़िंग पेपर फ़र्स्ट, डू नो हार्म, इन दावों की मक्कारी, बल्कि झूठ को पूरी तरह उजागर करता है. इस पेपर में दर्शाया गया है कि विश्व बैंक की निजी क्षेत्र की शाखा, अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम द्वारा वित्तपोषित बड़े कॉरपोरेट अस्पताल कहां स्थित हैं. यह बताया गया है कि इन निजी कॉरपोरेट अस्पतालों तक ग़रीब ग्रामीण आबादी की पहुंच नहीं और इस खाई को पाटने के लिए कुछ नहीं किया गया है.
निजी अस्पताल अत्यधिक आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में केंद्रित
अधिकांश निजी अस्पताल अत्यधिक आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में केंद्रित हैं, और वह भी आर्थिक रूप से अधिक विकसित राज्यों में, क्योंकि यहीं पर अधिक आय वाले लोग रहते हैं और इसलिए अधिक लाभ कमाया जा सकता है. अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम के प्रत्यक्ष निवेश शृंखला के अठत्तर प्रतिशत अस्पताल दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में हैं. साठ प्रतिशत अस्पताल टियर 1 शहरों में हैं, 35% टियर 2 शहरों में हैं और केवल 4% छोटे शहरों में हैं.
इन शृंखलाओं की कॉरपोरेट वेबसाइटों पर सूचीबद्ध 144 अस्पतालों में से केवल एक ग्रामीण क्षेत्र में है. केवल 14% अस्पताल उन 10 राज्यों में हैं जो वार्षिक स्वास्थ्य सूचकांक 2021 के आधार पर स्वास्थ्य प्रणाली के समग्र प्रदर्शन के मामले में सबसे निचले स्थान पर हैं; और इन 10 राज्यों में से चार में एक भी अस्पताल संचालित नहीं होता है.
बीमा इस भ्रम को पैदा करने में मदद करता है कि महंगी स्वास्थ्य सेवा वास्तव में सस्ती है. हालांकि, अध्ययन से पता चलता है 25% से अधिक भारतीय निजी बीमा का बोझ वहन नहीं कर सकते. और ग़रीब परिवारों के निजी बीमा की लागत राज्य द्वारा वहन करने का शुद्ध परिणाम यह है कि सीमित सार्वजनिक संसाधनों को निजी क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया जाता है, जिसे सार्वजनिक क्षेत्र के प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को मज़बूत करने पर बेहतर ढंग से ख़र्च किया जा सकता था.
सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति निर्णय लेने (निजीकरण और चिकित्सा उपकरणों की ख़रीद सहित) में हितों के टकराव को रोकने के लिए तंत्र की लगभग पूर्ण अनुपस्थिति के कारण स्वास्थ्य प्रशासकों और सरकारी डॉक्टरों को रिश्वत और मुनाफ़ाख़ोरी का अवसर मिलता है. हितों के इस टकराव की वजह से अक्सर निर्णय लेने वाले बेहतर, तर्कसंगत और कम लागत वाले विकल्पों का चुनाव नहीं कर पाते हैं.
भारत जैसे कम विनियम वाले माहौल में निजी स्वास्थ्य क्षेत्र वास्तव में कैसे काम करता है, इसका कुछ सूक्ष्म विवरण देने के लिए, मैं अनुभवी स्वास्थ्य चिकित्सकों, शिक्षकों और विद्वानों के निजी विवरणों का आंशिक रूप से हवाला दूंगा.
अठत्तर ऐसे नैतिक डॉक्टर – उनमें से कई कॉरपोरेट अस्पतालों में काम कर रहे हैं और जिन्होंने व्हिसल-ब्लोअर बनने का विकल्प चुना – स्वास्थ्य देखभाल के पेशे में फैल चुकी सड़ांध पर विचार करने के लिए एक साथ आए. उन्होंने अपने विचारों को डिसेंटिंग डायग्नोसिस: वॉयस ऑफ़ कॉन्शियस फ़्रॉम द मेडिकल प्रोफ़ेशन नामक पुस्तक में दर्ज किया, जो लोग समता पर आधारित और नैतिक स्वास्थ्य सेवा के लिए नीति निर्धारण का काम करना चाहते हैं उन्हें ये किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए.

भारतीय नागरिकों की बुनियादी स्वास्थ्य सेवा
इसी तरह की एक गंभीर कहानी हीलर्स ऑर प्रीडेटर्स? हेल्थकेयर करप्शन इन इंडिया नामक पुस्तक के माध्यम से सामने आई है. इस पुस्तक में नीति निर्माता, चिकित्सक और सार्वजनिक स्वास्थ्य विद्वान अधिकांश भारतीय नागरिकों के बुनियादी स्वास्थ्य सेवा से लगातार वंचित किए जाने के गहरे संकट की पड़ताल की है.
मैं भी ऑक्सफ़ैम की रिपोर्टों से अपनी समझ विकसित करता हूं, जो स्वास्थ्य प्रावधान में समानता के लिए काम करने वाली विश्व की अग्रणी संस्था है, जिसने विशेष रूप से दो महत्वपूर्ण ब्रीफ़िंग पेपर्स सिक डेवलपमेंट और फ़र्स्ट, डू नो हार्म में वैश्विक विकास सहायता और अंतरराष्ट्रीय वित्त पोषण संस्थानों द्वारा स्थापित निजी कॉरपोरेट अस्पतालों के कामकाज की बारीकी से जांच की है.
स्वास्थ्य क्षेत्र के अंदरूनी लोगों द्वारा की गई खोजी और साहसी बातों से जो तस्वीर उभरती है, वह घिनौनी, डरावनी और पूरी तरह से अमानवीय है. हम देखते हैं कि 1990 के दशक से, निजीकरण के ‘बवंडर‘ में, सार्वजनिक स्वास्थ्य लगातार धन और निवेश से वंचित है, और सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र का अपेक्षाकृत अच्छी नीयत वाली सेवा-उन्मुख पेशा पहले बाज़ार-आधारित वस्तु में बदला, और फिर कॉरपोरेट-आधारित मुनाफ़ाख़ोरी उद्योग में बदल गया.
दवा कंपनियां, चिकित्सा उपकरण निर्माता, बीमा कंपनियां, निजी मेडिकल कॉलेज, अंतरराष्ट्रीय वैक्सीन निर्माता, कॉरपोरेट अस्पताल और डायग्नोस्टिक सेंटर, सभी मिलकर स्वास्थ्य सेवा को एक उच्च-प्रीमियम वाली वस्तु में बदल देते हैं, जिसे मेहनतकश और बेसहारा ग़रीबों के लिए हासिल कर पाना मुश्किल हो जाता है.
(शोध सहयोग के लिए ऋषिराज भगवती का आभार)
(लेखक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.)
