राजनीतिक इच्छाशक्ति से स्वास्थ्य सेवाओं में भ्रष्टाचार का निवारण संभव

डॉक्टर और दवाई की कंपनियों के गठजोड़ के कारण मरीज़ों को चिकित्सा सेवा के लिए बहुत अधिक ख़र्च वहन करना पड़ता है. मरीज़ दवा के लिए भुगतान करता है, लेकिन दवा के चुनाव पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता है.

दिल्ली में एक बैंक्वेट हॉल में बनाए गए कोविड सेंटर में एक स्वास्थ्यकर्मी. (फोटो: पीटीआई )

(देश में बुनियादी स्वास्थ्य सेवा के अभाव पर केंद्रित दो लेखों की श्रृंखला की यह दूसरी क़िस्त है. पहला भाग यहांं पढ़ें.)

ऐसा नहीं है कि पहले सार्वजनिक व्यवस्थाओं में भ्रष्टाचार व्याप्त नहीं था या अब भी नहीं है. लेकिन, जैसा कि कावेरी गिल तर्क देती हैं कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में भ्रष्टाचार का निवारण और सुधार संभव है. दूसरी ओर, निजी क्षेत्र का भ्रष्टाचार ऐसा है कि न तो उनका निवारण किया जा सकता है और न ही सुधार किया जा सकता है क्योंकि कॉर्पोरेट शक्ति दुर्जेय है, लूट बहुत अधिक है, भ्रष्ट आचरण सर्वव्यापी है और नियामक तंत्र कमज़ोर है. 

वरिष्ठ स्वास्थ्य चिकित्सक मणि भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती दशकों में जब भारतीय स्वास्थ्य परिदृश्य पर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का प्रभुत्व था, उस समय भ्रष्टाचार व्याप्त था. ऐसे सर्जन थे जो मरीज़ों का ऑपरेशन तब तक नहीं करते थे जब तक कि वे पहले उनसे उनके निजी चैंबर में न मिलें और उन्हें मोटी फ़ीस न दें. डॉक्टर कमीशन के लिए मरीज़ों को रोकने और उन्हें अपने क्लिनिक तक फुसलाकर लाने के लिए बस स्टैंड और रेलवे स्टेशनों पर दलालों को नियुक्त करते थे. लेकिन उन्होंने कहा कि ऐसे मामले बेहद कम थे जिनकी निंदा व्यापक चिकित्सक समुदाय द्वारा की जाती थी.

हालांकि, आज ऐसी प्रथाएं आम हो गई हैं. वे कहते हैं, ‘हम ख़ुद का विज्ञापन करते हैं. हम मरीज़ों को लाने के लिए दलालों को नियुक्त करते हैं, हम उन डॉक्टरों को कमीशन देते हैं जो हमारे पास मरीज़ भेजते हैं, हम अनावश्यक और महंगे जाँच करवाते हैं और जांच करने वाली प्रयोगशालाओं से कमीशन लेते हैं, हम सबसे महंगी दवाएं लिखते हैं और इसकेलिए दवा उद्योग से पुरस्कृत होते हैं, और हम बीमा कंपनियों की मदद भी करते हैं ताकि वे हमारे मरीज़ों को धोखा दे सकें. हम किस हद तक गिर सकते हैं?’ 

चिकित्सा पेशा अपनाने का उद्देश्य और प्रेरणाएं बदल गई हैं

अलीबाग़ के एक चिकित्सक डॉ. जॉर्ज मथाई भी इस बात से दुखी हैं कि ‘चिकित्सा पेशा अपनाने का उद्देश्य और प्रेरणाएं बदल गई हैं. आजकल चिकित्सा को पेशा के तौर पर अपनाने का एकमात्र कारण कम-से-कम काम करके जितना संभव हो उतना पैसा कमाना है.’

डॉक्टरों का व्यक्तिगत आचरण और नैतिक व्यवहार बेहद निचले स्तर पर पहुंच गया है, क्योंकि वे मरीज़ों के कल्याण की अपेक्षा मुनाफ़े को प्राथमिकता देते हैं. ‘पहले मरीज़ ‘ का सामाजिक तर्क लगभग पूरी तरह से ‘पहले मुनाफ़ा ‘ के तर्क में बदल चुका है.

दवा उद्योग और कॉर्पोरेट अस्पतालों के मालिकों के बहकावे में आकर और रिश्वत लेकर डॉक्टर अनावश्यक जांच, महंगी दवाइयां और अनावश्यक तथा हानिकारक प्रक्रियाएं पूरी करने के लिए कहते हैं, ये सब बहुत महंगे हैं और इनके लिए बहुत अधित बिल चुकाना होता है. इसका नतीजा यह होता है कि मरीज़ों को अनावश्यक, कभी-कभी बहुत ही अधिक ख़र्च वहन करना पड़ता है क्योंकि निजी अस्पतालों के दवा निर्माताओं, फ़ार्मेसियों और कई तरह के बिचौलियों, यहां तक ​​कि ऑटोरिक्शा चालकों के साथ घिनौने संबंध होते हैं. 

वरिष्ठ और अत्यधिक सम्मानित चिकित्सक डॉ विजय अजगांवकर निजी स्वास्थ्य क्षेत्र की कई नैतिक विकृतियों के बारे में दुखी होकर बताते हैं. 70 और 80 साल के गंभीर रूप से बीमार लोगों को आईसीयू में भर्ती किया जाता है और वेंटिलेटर पर रखा जाता है, तब भी जब उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं होती, सिर्फ़ अस्पताल का बिल बढ़ाने के लिए ऐसा किया जाता है.

इस प्रक्रिया में वे परिवार को बर्बाद कर देते हैं और मरीज़ की पीड़ा को और बढ़ा देते हैं. वे मरीज़ को परिवार के सदस्यों के बीच शांति से मरने नहीं देते. अस्पताल के एजेंट सड़क दुर्घटना स्थलों पर बाज़ की तरह मंडराते रहते हैं और ज़्यादा से ज़्यादा मरीज़ों को पकड़कर अस्पताल में भरती करा देते हैं. डॉक्टर बाद में शेख़ी बघारते हैं कि उन्होंने कितने शिकारपकड़े हैं.

अजगांवकर दवा कंपनियों द्वारा बांटी जाने वाली रिश्वत के बारे में नाराज़गी के साथ बताते हैं, जिसमें विदेश में छुट्टियां मनाना, महंगी शराब, कपड़े, यहां तक ​​कि महंगे आभूषण भी शामिल हैं. इसका नतीजा यह है कि 30 रुपये में बिकने वाला इंसुलिन अब 150 रुपये में मिल रहा है. नैतिक रूप से शोध की लागत बहुत पहले ही वसूल हो चुकी थी, इसलिए लागत कम होनी चाहिए थी. बजाय इसके क़ीमत पांच गुना बढ़ा दी गई है! 

कई अन्य डॉक्टर यह भी बताते हैं कि सस्ती दवाओं की जगह ऐसी दवाएं लिखी जाती हैं जिनका कोई विशेष लाभ नहीं होता मगर दवा कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए ऐसा किया जाता है. कंपनियां दवाओं के फ़ॉर्मूले में छोटे-छोटे बदलाव करती हैं, जिसका कोई अतिरिक्त लाभ नहीं होता, फिर दवाओं की क़ीमत बहुत बढ़ जाती हैं, कंपनियां बाज़ार से सस्ती दवा वापस ले लेती हैं और डॉक्टरों को नयी बनी महंगी दवाएं लिखने के लिए प्रोत्साहित करती हैं.

नैतिक ढंग से काम करने वाले डॉक्टरों को केवल जेनेरिक दवाएं लिखनी चाहिए, जिनकी क़ीमत बहुत कम होती है. इसके बजाय, डॉक्टर महंगी एंटीबायोटिक्स लिखते हैं, जबकि सस्ती दवाएं भी उतनी ही प्रभावी होती हैं.

(प्रतीकात्मक फोटो: मनोज सिंह/ द वायर)

मरीज़ों से होने वाली लूट

मरीज़ों से होने वाली लूट यहीं ख़त्म नहीं होती. अस्पताल अपने बिलों में दवाओं की क़ीमत कभी-कभी अधिकतम ख़ुदरा मूल्य से पांच या 10 गुना तक बढ़ा देते हैं. इससे भी अधिक भयावह बात यह है कि कभी-कभी मरीज़ों को ज़रूरत से कहीं अधिक मात्रा में दवाइयां दी जाती हैं, यहां तक ​​कि मरीज़ के स्वास्थ्य को भी जोखिम में डाला जाता है.

इसी तरह, मरीज़ों से कोरोनरी स्टेंट की क़ीमत दो से पांच गुना अधिक वसूली जाती है और विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत में स्टेंट लगाने की लगभग एक तिहाई प्रक्रियाएं अनुचित हैं. 

एक चिकित्सक ने कहा, ‘डॉक्टर अब दवा कंपनियों के नौकर बन गए हैं.’ मेडिकल रीप्रेज़ेंटेटिव युवा डॉक्टरों को अपनी चुंगल में ले लेते हैं, उन्हें भौतिक लाभ पहुंचाते हैं और उन्हें अपनी प्रैक्टिस को इस तरह से ढालने के लिए ‘पुनः प्रशिक्षित’ करते हैं जिससे कंपनी का मुनाफ़ा अधिकतम हो. वे डॉक्टरों को फ़र्ज़ी मेडिकल ट्रायल में भी शामिल करते हैं.

ऑक्सफ़ैम को एक मरीज़ ने बताया, ‘कॉर्पोरेट अस्पतालों द्वारा की जाने वाली चालबाज़ियों में से एक यह है कि वे शायद ही कभी आपको सभी दवाओं की सूची वाला पूरा पर्चा देते हैं. नर्स आपको बस एक पर्ची थमा देती है. इस तरह यह जानना मुश्किल है कि वे क्या क़ीमत वसूल रहे हैं.’

ऑक्सफ़ैम ने पाया कि यह समस्या भारत में व्यापक है. इसकी रिपोर्ट में हाल के अध्ययनों का हवाला दिया गया है, जिसमें पाया गया है कि दिल्ली के चार सबसे बड़े निजी अस्पतालों में दवाओं, उपभोग्य सामग्रियों और डायग्नोस्टिक्स के लिए लाभ मार्जिन 100%-1,737% के बीच है, और ये आइटम मरीज़ों के बिल की लागत का लगभग आधा हिस्सा है.

यह उल्लेखनीय है कि डॉक्टर और फ़ार्मास्युटिकल कंपनी के आपसी गठजोड़ के कारण मरीज़ों को चिकित्सा सेवा के लिए बहुत अधिक ख़र्च वहन करना पड़ता है. मरीज़ दवा के लिए भुगतान करता है, लेकिन दवा के चुनाव पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता है. इस निर्णय को लेने का एकाधिकार डॉक्टर के पास है जिसका उपयोग दवा कंपनियां शक्तिहीन मरीज़ की क़ीमत पर अपने मुनाफ़े को अधिकतम करने के लिए करती हैं.

मल्टी-स्पेशलिटी कॉरपोरेट अस्पतालों की संख्या में बड़े पैमाने पर होने वाली वृद्धि ने स्वास्थ्य सेवा को अत्यधिक आकर्षक उद्योग में बदल दिया है. अस्पतालों को उपचार और देखभाल के स्वर्ग से विलासिता और विशेषाधिकार के नखलिस्तान में बदल दिया गया है. 

गद्रे और शुक्ला का मानना ​​है कि उदारीकरण और आईटी उद्योग के विस्तार की वजह से बड़े पैमाने पर विकास के बाद पुणे जैसे भारतीय शहर में कम-से-कम 50 सार्वजनिक अस्पताल होने चाहिए. यहां केवल एक है.

दूसरी ओर, नए, चमकदार, मल्टी-स्पेशलिटी निजी कॉरपोरेट अस्पताल हर जगह बढ़ रहे हैं. वे इनकी तुलना शॉपिंग मॉल से करते हैं, जो न केवल वास्तुकला में बल्कि व्यापार मॉडल में भी उनसे मिलते जुलते हैं. जिस तरह मॉल ने किराने का सामान और उपभोता वस्तुएं बेचने वाले छोटे ख़ुदरा विक्रेताओं को बाहर कर दिया है, उसी तरह कॉरपोरेट अस्पतालों ने पुराने ज़माने के एकल-डॉक्टर प्रैक्टिस और छोटे नर्सिंग होम को लगभग ख़त्म कर दिया है.

अस्पताल मॉल’ ने चिकित्सा क्षेत्र को आक्रामक रूप से बाज़ारों की दया पर छोड़ दिया है. इनमें से कई निजी कॉर्पोरेट अस्पताल धर्मार्थ अस्पताल होने का दावा करते हैं, जिसकी वजह से उन्हें रियायती या मुफ़्त ज़मीन और महत्वपूर्ण कर छूट मिलती है. लेकिन व्यवहार में वे शायद ही कभी मुफ़्त रोगियों को भर्ती करते हैं, या अगर उन्हें भर्ती किया जाता है, तो उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया जाता है. 

ऑक्सफ़ैम ने भी ऐसे मामलों को दर्ज किया है जहां निजी अस्पतालों ने ग़रीबी में रहने वाले रोगियों को मुफ़्त स्वास्थ्य सेवा देने से इनकार कर दिया – हालांकि इसी शर्त पर इन अस्पतालों को मुफ़्त या सब्सिडी वाली ज़मीन आवंटित की गई थी. ग़रीब मरीज़ ने ऑक्सफ़ैम को यह भी बताया कि निजी कॉर्पोरेट अस्पतालों के कर्मचारी उनके साथ अपमानजनक व्यवहार करते हैं. ‘जब उन्हें पता चलता है कि हम झुग्गी में रहते हैं तो वे हमारे साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते हैं. जब उन्हें पता चलता है कि हम झुग्गी में रहते हैं तो अस्पताल के कर्मचारी हमें वहां से भगा देते हैं… अब हम लोगों को वहां नहीं ले जाते… यह हमारे लिए नहीं है. यह ग़रीब परिवारों के लिए नहीं है. यह अमीर लोगों के लिए है. ‘

निजी अस्पतालों द्वारा लोगों को आपातकालीन देखभाल से अवैध रूप से वंचित करने के कई मामले

ऑक्सफ़ैम के शोध में निजी अस्पतालों द्वारा लोगों को आपातकालीन देखभाल से अवैध रूप से वंचित करने के कई मामले भी सामने आए हैं, जबकि भारत में मरीज़ों को सभी अस्पतालों में आपातकालीन सेवा लेने का अधिकार है. उदाहरण के लिए, एक बच्चा सड़क दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गया और बेहोश हो गया, लेकिन निजी अस्पताल ने तब तक इलाज से इनकार किया जब तक कि परिवार ने 1,200 डॉलर का भुगतान नहीं किया. 

अनैतिक व्यवहार प्रिस्क्रिप्शन लिखने के साथ ही शुरू हो जाते हैं. डॉक्टर द्वारा किया गया रोगी की स्थिति का प्रारंभिक निदान अनावश्यक दिशा में किया जाता है, ताकि अनावश्यक निदान, दवाओं और प्रक्रियाओं को सही ठहराया जा सके. अक्सर प्रिस्क्रिप्शन में कोई निष्कर्ष नहीं लिखा होता है, केवल परीक्षण के बारे में लिखा होता है और दवाएं लिखी होती हैं.

हमारी दुनिया की कठोर और अमानवीय वास्तविकता यह है कि दुनिया की आधी आबादी के पास अभी भी सबसे आवश्यक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं है. (प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

कॉरपोरेट अस्पतालों में मरीज़ों को आम तौर पर कई डॉक्टरों द्वारा देखा जाता है और प्रत्येक डॉक्टर मरीज़ को अलग से बिल देता है. योग्यता या मानक उपचार प्रोटोकॉल के बारे में कोई नियम या ज़िम्मेदारी नहीं है. मरीज़ों को अस्पताल में तब भी भर्ती किया जाता है जब उन्हें केवल ओपीडी में इलाज कराने भर की आवश्यकता होती है. डायरिया से पीड़ित बच्चे को घर में ही ओआरएस ट्रीटमेंट देने से बीमारी ठीक हो सकती है. इसके बजाय, उन्हें अस्पताल में भर्ती किया जाता है और सलाइन ड्रिप दी जाती है और अंत में एक भारी बिल थमा दिया जाता है. 

ऑक्सफ़ैम को चिकित्सा कदाचार और शोषण के चौंकाने वाले उदाहरण भी मिले. उदाहरण के लिए, एक मरीज़ ने बताया कि अस्पताल के कर्मचारियों ने कहा कि उसके दिल में 80% ब्लॉकेज है और अगर उसे अपनी जान बचानी है तो आपातकालीन सर्जरी करानी होगी. उसे भरोसा नहीं हुआ, उसने अस्पताल से छुट्टी ले ली और एक सरकारी डॉक्टर से परामर्श किया जिसने फिर से दोबारा वही जांच किया जो अस्पताल ने किया था और जांच के बाद पता चला कि निदान पूरी तरह से ग़लत था.

ऐसे ही एक अन्य मामले में, एक व्यक्ति को पित्त की पथरी को निकलवाने के लिए एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया. अस्पताल ने उसके दिल के स्वास्थ्य की स्थिति की जांच के लिए ईसीजी और इकोकार्डियोग्राम सहित कई परीक्षण किए. सर्जरी के बाद वही परीक्षण किए गए और डॉक्टरों ने कहा कि उसके दिल में 80% ब्लॉकेज है और उसे बचाने के लिए ऑपरेशन करना होगा.

उन्होंने उसकी सहमति के बिना ही इसका इलाज भी शुरू कर दिया. उसे अस्पताल से छुड़ाने के लिए एक प्रभावशाली स्थानीय व्यक्ति को हस्तक्षेप करना पड़ा. फिर उसने एक सरकारी डॉक्टर से परामर्श किया, जिसने फिर से जांच किया और उससे कहा: ‘जो कोई भी आपको बता रहा है कि आपके दिल में ब्लॉकेज है, वह आपको सच नहीं बता रहा है.’ 

ऑक्सफ़ैम ने विश्व बैंक द्वारा वित्तपोषित उच्च-स्तरीय कॉर्पोरेट अस्पतालों में भी नियामकों द्वारा पुष्टि की गई चिकित्सा लापरवाही के गंभीर मामले दर्ज किए हैं.

ऐसे ही एक मामले में एक मरीज़ को फ़र्श पर गिरा दिया जाता है जिसकी वजह से उसे कई फ़्रैक्चर हो जाता है और फिर उसकी मौत हो जाती है. दूसरे की मौत इसलिए होती है क्योंकि मरीज़ को एंबुलेंस में अकेला छोड़ दिया गया. एक और मौत इसलिए होती है क्योंकि ब्रेन सर्जरी के बाद मरीज़ के दिमाग़ में रूई रह जाती है. एक मरीज़ के ग़लत पैर का ऑपरेशन कर दिया जाता है.

एक दूसरे मामले में एक बच्चा हमेशा के लिए विकलांग हो जाता है. एक बच्चे को डॉक्टर मृत घोषित कर देते हैं लेकिन अंतिम संस्कार के समय पता चलता है कि वह सांस ले रहा है. इसके अलावा ओवरचार्जिंग, क़ीमतों में हेराफेरी और वित्तीय हितों के टकराव जैसी व्यापक समस्याएं भी हैं. 

कॉर्पोरेट अस्पतालों में इस आधार पर जांच नहीं की जाती है कि मरीज़ की बीमारी क्या है या मरीज़ को वास्तव में किसी विशेष जांच की ज़रूरत है या नहीं. बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों को डायग्नोस्टिक टेस्ट लिखने का लक्ष्य दिया जाता है, भले ही ये टेस्ट ज़रूरी हों या न हों.

ऐसा ही एक उदाहरण देखिए, स्वस्थ गर्भवती महिलाओं को बार-बार हेमोग्राम, लिवर फ़ंक्शन टेस्ट और किडनी फ़ंक्शन टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है. अवसाद के पुष्ट निदान वाले मरीज़ों को बेवजह महंगी एमआरआई और सीटी स्कैन जांच कराने की सलाह दी जाती है.

एक गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट कई एंडोस्कोपी करता है, जबकि केवल एक ही पर्याप्त है. कॉरपोरेट अस्पतालों और डायग्नोस्टिक केंद्रों की मार्केटिंग से प्रभावित होकर मरीज़ ख़ुद ही ‘मास्टर चेक-अप ‘ का विकल्प चुनते हैं, जिनमें से अधिकांश टेस्ट की कोई आवश्यकता नहीं होती है. 

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

रेडियोलॉजी और लैब विभागों को निजी क्षेत्र को आउटसोर्स करना

अजगांवकर मुंबई के बड़े सार्वजनिक अस्पतालों की बात करते हैं जिन्होंने केवल निजी निगमों को लाभ पहुंचाने के लिए अपने रेडियोलॉजी और लैब विभागों को निजी क्षेत्र को आउटसोर्स कर दिया है.

पैथोलॉजिस्ट यह भी बताते हैं कि कई पैथोलॉजिकल लैब अनौपचारिक रूप से ‘सिंक टेस्ट’ कहलाने वाले टेस्ट का सहारा लेते हैं, जिसमें सैंपल को सिंक में डाल दिया जाता है और सामान्य रिपोर्ट भेज दी जाती है. यह उन मरीज़ों के लिए ख़तरनाक हो सकता है जिनकी असली बीमारी का पता नहीं चल पाता.

अनावश्यक जांच से भी ज़्यादा चौंकाने वाली बात तब होती है जब ऐसी प्रक्रियाएं और सर्जरी लिख दी जाती हैं जिनकी ज़रूरत नहीं होती. एक डॉक्टर ने बताया कि वह एक कॉरपोरेट अस्पताल की अपनी आकर्षक नौकरी छोड़ने पर विचार कर रहा था.

अस्पताल प्रबंधन के दबाव के कारण उसे ऐसा निर्णय लेना पड़ा, उसे लक्ष्य दिया गया कि वह ओपीडी में आने वाले मामलों में से 40% को अस्पताल के सर्जरी विभाग में ट्रांसफ़र करे. उसका अनुपात 15% था. लेकिन वह दुविधा में फंस गया. इतनी मेहनत से पढ़ाई करने के बाद उसे नौकरी की ज़रूरत थी. और उसे केवल कॉरपोरेट अस्पतालों में ही नौकरी मिल सकती थी. वह कब तक अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनता

एक अन्य वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ ने भी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ के बारे में बताया जिसके कारण उसे एक कॉरपोरेट अस्पताल में अपनी अच्छी-ख़ासी तनख़्वाह वाली नौकरी छोड़नी पड़ी जहां प्रबंधन द्वारा उस पर एंजियोप्लास्टी जैसी अनावश्यक प्रक्रियाओं की सिफ़ारिश करने और उन्हें करवाने का दबाव डाला गया था.

एक अन्य सर्जन ने बताया कि अक्सर ‘कॉर्पोरेट अस्पतालों में पूरी तरह से अनावश्यक सर्जरी की जाती है. उदाहरण के लिए, पित्ताशय की छोटी पथरी से मरीज़ को कोई परेशानी नहीं होती. लेकिन मरीज़ सर्जरी से डरता है.

यहां तक ​​कि चौंकाने वाली नक़ली सर्जरीभी होती है जिसमें बिना किसी वास्तविक सर्जरी के छोटे-छोटे कट और टांके लगाए जाते हैं, लेकिन भारी भरकम बिल थमा दिया जाता है. स्त्री रोग विशेषज्ञों ने अपने सहकर्मियों के बारे में बताया जो 14 से सोलह घंटे तक प्रसव पीड़ा की निगरानी करने के लिए तैयार नहीं हैं और इसकी जगह सीजेरियन ऑपरेशन का विकल्प चुनते हैं जो बेहद ख़र्चीला है. 

एक डॉक्टर ने स्पष्ट करीक़े से समझाया कि पहले तो अस्पताल आपको एक अच्छा वेतन देता है, लेकिन फिर आपसे उस वेतन को वापस पाने की उम्मीद करता है, यहां तक ​​कि उदाहरण के लिए अनावश्यक किडनी बायोप्सी कराता है. अपेंडिसाइटिस और मोतियाबिंद के ऑपरेशन और हिस्टेरेक्टोमी तब किए जाते हैं जब इनकी कोई आवश्यकता नहीं होती.

प्रतीकात्मक फोटो: सर्जरी करते डॉक्टर. (फोटो साभार: sswain_1999/Flickr, CC BY 2.0)

एक सर्जन को अपनी विवशता का एहसास तब होता है जब वह देखता है कि सर्जरी के बिल कितने बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए हैं. कॉरपोरेट अस्पतालों में सर्जरी की लागत आम तौर पर जायज़ दरों से कहीं ज़्यादा तय की जाती है, लेकिन मरीज़ के पास कोई विकल्प नहीं होता, ख़ासकर तब जब सरकारी अस्पतालों में बेड और यह सर्जरी उपलब्ध न हो. डॉक्टर या अस्पताल कितना चार्ज कर सकते हैं, इसपर कोई नियंत्रण नहीं है.

छोटी प्रक्रियाओं और सर्जरी के लिए ज़रूरत से कई गुना ज़्यादा बिल बनाना कोई असामान्य बात नहीं है. डॉक्टर ने एक बहुत ही मामूली इंगुइनल हर्निया का ऑपरेशन किया, जिसके लिए मरीज़ से 1.5 लाख रुपये लिए गए.

ऑक्सफ़ैम ने निम्न और मध्यम आय वाले देशों में पाया है कि एक बड़े निजी अस्पताल में बिना जटिलता वाली एक नॉर्मल डिलीवरी की औसत शुरुआती लागत सबसे कम आय वाले 40% लोगों की औसत आमदनी के साल भर की राशि से अधिक है. सिज़ेरियन डिलीवरी की लागत उसी व्यक्ति के लिए उसके दो साल की कुल आय से अधिक है. 

सबसे निचले पायदान के 10% औसत कमाने वाले के लिए, निजी अस्पताल में बिना जटिलता वाले नॉर्मल डिलीवरी की शुरुआती लागत उनकी नौ साल की कुल आय से अधिक हो जाती है, और सिज़ेरियन डिलीवरी के लिए यह राशि 16 साल से अधिक हो जाती है.

महामारी के दौरान क्रूर और अत्यधिक शुल्क वसूली

फ़र्स्ट, डू नो हार्म नामक रिपोर्ट में ऑक्सफ़ैम का अनुमान है कि सी-सेक्शन के लिए दिल्ली स्थित आईएफ़सी-वित्त पोषित अपोलो, मैक्स और फ़ोर्टिस अस्पतालों में दो दिन रहने की लागत दिल्ली के औसत वेतन के तीन से चार महीने की राशि के बराबर है.

एक डॉक्टर एक ऐसे व्यक्ति का मामला बताता है जो एक कॉरपोरेट अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से मर गया था. उन्होंने जबरन 16 लाख रुपये का बिल बनाया. उसके रिश्तेदार इतना पैसा नहीं दे सकते थे, इसलिए अस्पताल प्रबंधन ने नैरोबी अस्पताल जैसी ही रणनीति अपनाई, जिसका मैंने पहले उल्लेख किया था. उन्होंने शव को छिपा दिया. शव लेने के लिए परिवार को अंत में पुलिस की मदद लेनी पड़ी. एक अन्य मामले में, कैंसर के एक लाइलाज और जानलेवा मर्ज़ के लिए अस्पताल ने एक महंगी और बेकार व्यवस्था निर्धारित की, जिसकी वजह से रोगी की मृत्यु के लंबे समय बाद तक परिवार ग़रीब बना रहेगा. 

महामारी के दौरान क्रूर और अत्यधिक शुल्क वसूली और भी अधिक चरम पर पहुंच गई. महाराष्ट्र राज्य में 2,500 से अधिक कोविड-19 रोगियों के एक बड़े सर्वेक्षण में पाया गया कि निजी अस्पतालों ने किसी प्रकार के दंड के भय से मुक्त होकर सरकारी मूल्य सीमा की अनदेखी की. निजी अस्पतालों में इलाज कराने वाले 75 प्रतिशत मरीज़ों से औसतन 1,56,000 रुपये (1,890 अमेरिकी डॉलर) अधिक वसूले गए. शोध में यह भी पता चला कि बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों में अधिक शुल्क वसूलने की औसत राशि कहीं अधिक थी.

कॉरपोरेट अस्पतालों के जनसंपर्क अधिकारी डॉक्टरों पर धावा बोल देते हैं और मरीज़ों को अपने अस्पतालों में रेफ़र करने के लिए उन्हें भारी कटया कमीशन की पेशकश करते हैं. अन्य विशेषज्ञों या डायग्नोस्टिक केंद्रों के पास रेफ़र करने के लिए कटया कमीशन लेने या देने की प्रथा भी आम हो गई है. 

कॉरपोरेट अस्पताल मरीज़ द्वारा ख़र्च किए गए पैसे का एक हिस्सा उसे अस्पताल में रेफ़र करने वाले डॉक्टर को देकर इस कट या कमीशन को संस्थागत रूप देते हैं. कई अस्पताल मरीज़ द्वारा भुगतान किए गए कुल बिल का 10%-15% रेफ़र करने वाले डॉक्टर को देते हैं. डायग्नोस्टिक केंद्र रेफ़र करने वाले डॉक्टर को 20%-50% तक का भुगतान करते हैं. डॉक्टर अक्सर मरीज़ के रोग के इतिहास को विस्तार से दर्ज भी नहीं करते हैं. इसके बजाय, वे कई सारे जांच लिखते हैं, जिसके लिए उन्हें कट या रिश्वत मिलता है. छोटे नर्सिंग होम में इस तरह के जांच की फ़ीस तय नहीं होती और मनमाने तरीक़े से पैसा वसूला जाता है जो और भी अधिक समस्याग्रस्त होता है.

जो डॉक्टर और पैथोलॉजिस्ट चिकित्सा पद्धति के इस अनैतिक कालेकरतूत का हिस्सा बनने से इनकार करते हैं, उनकी ठीक से कमाई नहीं होती और नुक़सान होता है. जो लोग कॉरपोरेट अस्पतालों में काम करते हैं, उनकी हताशा के बारे में रिपोर्ट में लिखा गया है कि अगर वे ईमानदार हैं, तो उनकी ईमानदारी से मरीज़ को कोई फ़ायदा नहीं होता है, अभी मरीज़ों को कमीशन के साथ बिल दिया जाता है. 

कॉरपोरेट अस्पतालों और नर्सिंग होम से किसी तरह से जुड़े अन्य कर्मचारी भी कटके झांसे में आ जाते हैं, यहां तक ​​कि एम्बुलेंस चालक और ऑटो-रिक्शा चालक भी. देर रात जब किसी मरीज़ के रिश्तेदार अपने मरीज़ को अपनी पसंद के किसी विशेष अस्पताल में ले जाने के लिए ऑटोरिक्शा बुलाते हैं, तो ड्राइवर मना कर देता है, और ज़ोर देकर कहता है कि वह उन्हें दूसरे अस्पताल में ही ले जाएगा, जिसने उसे कमीशन देने का वादा किया है.

छोटे अस्पतालों में डॉक्टर कई बार ऐसे मरीज़ों को भर्ती कर लेते हैं, जिनके बारे में उन्हें पता होता है कि वे उनका इलाज करने में सक्षम नहीं हैं. जब मरीज़ की हालत ख़राब होती है, तो वे उससे बहुत ज़्यादा बिल वसूलते हैं, फिर उसे कॉर्पोरेट अस्पतालों में रेफ़र कर देते हैं और उनसे एक और कटवसूल करते हैं. 

मणि ने कई ऐसे तरीक़ों के बारे में बताते हैं जिन्हें डॉक्टर ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से मरीज़ों को अपनाने के लिए कहते हैं. वे छुट्टी पाने या अदालत में पेश होने से बचने के लिए नक़ली बीमारियों को प्रमाणित करते हैं. गिरफ़्तारी के तुरंत बाद प्रभावशाली लोग ऐसे डॉक्टरों को ढूँढ़ लेते हैं, जो प्रमाणित करते हैं कि वे गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं, इसलिए उन्हें उनके जेल वार्ड से कहीं ज़्यादा अस्पताल के कमरे में स्थानांतरित किए जाने की आवश्यकता है.

कुछ बेईमान डॉक्टर भी उच्च शुल्क वाले बीमा धोखाधड़ी में मदद करके ख़ुश होते हैं. डॉक्टर मरीज़ को एक ऐसी गंभीर बीमारी से पीड़ित बताते हैं दरअसल जो बीमारी मरीज़ को है ही नहीं, और महंगे उपचार का बिल बनाया जाता है, जो उपचार उसने कराया ही नहीं. बीमा कंपनी द्वारा मिला पैसा रोगी और डॉक्टर आपस में मिलकर बांट लेता है. 

(फाइल फोटो: पीटीआई)

स्वतंत्र शोध और भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली

स्वतंत्र शोध और भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली के भीतर काम करने वाले कुछ नैतिक लोगों का कहना है कि कमज़ोर, यहां तक ​​कि अक्षम नियामक निगरानी या सुरक्षा उपायों के साथ महंगे निजी अस्पतालों का अपरिमित विस्तार और वर्चस्व, जैसा कि ऑक्सफ़ैम द्वारा संक्षेप में कहा गया है, ‘स्वास्थ्य सेवा असमानता को बढ़ा रहा है, सार्वजनिक धन को अन्य मद में डायवर्ट कर रहा है और वास्तव में सार्वभौमिक तथा न्यायसंगत स्वास्थ्य प्रणालियों के निर्माण के अवसरों को समाप्त कर रहा है.’

ऐसा इसलिए है क्योंकि स्वास्थ्य सेवा में अधिकतम लाभ कमाने की प्रवृत्ति सार्वजनिक स्वास्थ्य और रोगी अधिकारों के लिए जोखिम लेकर आती है. इनसे स्वास्थ्य के परिणाम बदतर हुए हैं और सरकार द्वारा वित्तपोषित स्वास्थ्य सेवा में इसी तरह के निवेश की तुलना में कम वित्तीय सुरक्षा मिली है.

इससे भी बदतर, भारत जैसे देशों से मिले साक्ष्य बताते हैं कि ‘लाभ कमाने वाले अस्पतालों को बड़े पैमाने पर शामिल करने को प्रोत्साहित करके, ग़रीब और हाशिए पर पड़े लोगों, विशेष रूप से महिलाओं पर स्वास्थ्य सेवा ख़र्चे का इतने अधिक भार डाला जाता है जो उनके लिए विनाशकारी और ग़रीबी पैदा करने वाला होता है. ‘ 

निजी स्वास्थ्य प्रावधान की उच्च दक्षता का व्यापक दावा अधिक मूल्य निर्धारण, लूटखसोट वाली मार्केटिंग और अनुचित दवा, प्रक्रियाओं और सर्जरी के इस शर्मनाक रिकॉर्ड से पूरी तरह से ध्वस्त हो जाता है.

जब अधिकतम लाभ कमाने की चाहत मरीज़ के उपचार और स्वास्थ्य से आगे निकल जाती है, जैसा कि हमने इस अध्याय में देखा, निजी स्वास्थ्य क्षेत्र अब मरीज़ों के नैतिक उपचार और देखभाल का स्थान नहीं रह गया है. इसके बजाय, यह किसी भी तरह से धन संचय करने के व्यवसाय में बदल गया है, इनमें से कई अनैतिक और यहां तक ​​कि ग़ैरक़ानूनी भी हैं. 

एक डॉक्टर ने व्यंग्यात्मक तरीक़े से कहा कि कॉर्पोरेट अस्पताल ‘हर चीज़ को पांच सितारा होटल की तरह मेंटेन रखते हैं, लेकिन मरीज़ को भूल जाते हैं ‘. दूसरे ने कहा कि कॉर्पोरेट अस्पताल चाहते हैं कि उनके पास केवल पैसा कमाने के लिए डॉक्टर हों. अगर डॉक्टर नैतिक रूप से काम करना चाहता है, तो उनके पास उसके लिए कोई जगह नहीं है. और यह भी है कि – ‘कॉर्पोरेट अस्पतालों में कोई मानवता नहीं है ‘. 

मैं स्वास्थ्य प्रणाली का वास्तविक मूल्यांकन उस सबसे वंचित और बहिष्कृत महिला या बच्ची के सम्मानजनक देखभाल से करूंगा, जिसकी कहानी के साथ मैंने इस निबंध की शुरुआत की थी. एक बात पर कोई संदेह नहीं हो सकता है. और वह यह है कि हमारे समय के बड़े चमकदार कॉर्पोरेट ‘अस्पताल मॉल ‘ ने उस महिला या बच्ची के पूरी तरह से निराश किया है. 

(शोध सहयोग के लिए ऋषिराज भगवती का आभार)

(लेखक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.)