वो ये कहते हैं कि चारों सिम्त है अमनो-अमान,
हम ये कहते हैं हमारा मुंह तो मत खुलवाइए.
हर सड़क पर दार होगा आने वाले हैं वो दिन,
सरफ़रोशी पर अभी से इतना मत इतराइए.
इन पंक्तियों में शोषक सत्ताओं और उनके शिकार हो रहे लोगों को अलग-अलग बेहद साफगोई से दिखाये गए ‘आईने’ ने कुछ याद दिलाया आपको? दिलाया तो बहुत अच्छा, लेकिन नहीं दिलाया तो हम याद दिला देते हैं.
‘बोल मजूरे हल्ला बोल’ का उद्घोष कर गए स्मृतिशेष कांतिमोहन ‘सोज’ (जिनके बारे में यह तय करना उनके रहते भी मुश्किल हुआ करता था और आज भी मुश्किल ही है कि उनकी पहली पहचान कवि/शायर या लेखक की है अथवा जनपक्षधर राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता की) शोषित-पीड़ित समुदायों के इस दुर्दिन में भी, देश व दुनिया के लगातार विपरीत होते जा रहे हालात को लेकर, पिछले बरस गंभीर रूप से बीमार होने तक, कुछ इसी बेलौस अंदाज में चेताते व आगाह करते आ रहे थे.
इस क्रम में उनकी कई ग़ज़लें व गीत जनआंदोलनों व जनअभियानों के साथ जुड़ गए थे तो शिक्षक, विचारक व संगठनकर्ता की पहचानें भी उनके व्यक्तित्व से सहज ही आ जुड़ी थीं.
पिछले साल 14 जुलाई को बीमारी का हाथ थामकर मौत उनके पास आई और बरबस अपने साथ ले गई तो उन्होंने अपने जीवन के 88 साल पूरे कर लिए थे. उन्हें इस दुनिया में उस दिन और रहने देकर अपना एक और जन्मदिन मना लेने देती तो उसका कुछ बिगड़ने वाला नहीं था. लेकिन उसे उन पर इतना रहम करना भी गवारा नहीं हुआ.
मौत की जिद और लाचारी
वह उनकी जयंती को ही उनकी अलविदा का दिन बनाने पर अड़ गई और अपनी जिद पूरी करके ही मानी. फिर भी उसकी लाचारी कि भरपूर जिंदगी जी लेने का यह संतोष उनसे नहीं ही छीन पाई कि: इश्क से जंग तलक जो भी किया, खूब किया, हमने कुछ भी न किया रस्म निभाने के लिए. हां, अंतिम सांस लेने से पहले वे अपना शरीर दान करके देहदान का कर्तव्य कहें या दायित्व भी निभा गए थे.
हम जानते हैं कि हमारी जिंदगियों में ऐसा बहुत कम होता है कि किसी का जन्मदिन ही उसके दुनिया से जाने का दिन भी बन जाए. अलबत्ता, अरसा पहले ऐसा पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ. बिधानचंद्र राय के साथ हुआ था, जिनका जन्मदिन अब नेशनल डॉक्टर्स डे (राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस) के रूप में मनाया जाता है. वे 01 जुलाई, 1882 को पटना में जन्मे तो मृत्यु भी 1962 में 01 जुलाई को ही उनके पास आई थी. फिर तो ‘सोज’ की ही तर्ज पर एक जुलाई का दिन, जो पहले उनकी जयंती हुआ करता था, पुण्यतिथि भी बन गया.
बहरहाल, 1936 में 14 जुलाई को यूनाइटेड प्रोविंसेज ऑफ आगरा ऐंड अवध (बाद में यूनाइटेड प्रोविंस, फिर उत्तर प्रदेश, अब उत्तराखंड) में स्थित हल्द्वानी में जन्मे कांतिमोहन शर्मा ने होश संभाला तो कांतिमोहन नाम से ही साहित्य सृजन आरंभ किया था. लेकिन आगे चलकर उन्हें इस नाम में ‘शर्मा’ (जो उनका अपने पुरखों से प्राप्त टाइटल था) की जगह ‘सोज’ को तखल्लुस के रूप में जोड़ देना बेहतर लगा.
उन्होंने रामनगर और मुरादाबाद से स्नातक तक की पढ़ाई की, फिर दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए किया और वहीं से पीएचडी की उपाधि भी हासिल की. अनंतर, उनकी दिल्ली विश्वविद्यालय के ही सत्यवती कॉलेज में नियुक्ति हो गई, जहां से 1996 में रीडर पद से सेवानिवृत्त हुए.
राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता
लेकिन यह सेवा या कि सेवानिवृत्ति कभी उनका पूरा परिचय नहीं बन पाई. इससे ऊपर वे अपनी जनपक्षधर कहें या वामपंथी सक्रियताओं के आईने में राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचाने जाते थे. कवि/शायर, लेखक व चिंतक तो खैर वे थे ही.
1958 में अपनी पहली पुस्तक ‘कुरुक्षेत्र मीमांसा’ प्रकाशित होने के बाद से वे साहित्य की ग़ज़ल, आलोचना, कहानी, उपन्यास आदि विधाओं में निरंतर सृजनरत रहे.
अब से कोई सैंतालीस साल पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘लोकलहर’ नाम से अपना हिंदी मुखपत्र निकालना आरंभ किया तो वे उसके संस्थापक संपादकों में शामिल थे. इसी तरह वे दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ, जनवादी लेखक संघ, जनवादी विचार मंच और जन नाट्य मंच के भी संस्थापक सदस्य थे. अरसे तक वे जनवादी लेखक संघ की केंद्रीय पत्रिका ‘नया पथ’ के संपादन से भी जुड़े रहे.
1982 में प्रकाशित उनकी ‘प्रेमचंद और अछूत समस्या’ नामक पुस्तक 2010 में संशोधन-परिवर्धन के बाद ‘प्रेमचंद और दलित विमर्श’ के नाम से पुनर्प्रकाशित हुई.
‘क़दम मिला के चलो’ (गीत और नज़्में : 1982), ‘गुनाहे सुख़न’ (उर्दू ग़ज़ल संग्रह : 1990), ‘रात गए’ (गीत-ग़ज़ल : 2002), ‘दूसरा पहलू’ (कहानी संग्रह), ‘बेअंत का अंत’ (कहानी संग्रह : 2010), ‘पर कथा है शेष’ (उपन्यास : 2010), ‘ज्योति कलश छलके : आज़ादी से पहले के फ़िल्मी गीत और गीतकार’ (2015) आदि कृतियां भी उनके खाते में हैं.
उनके साहित्य सृजन के सोच व सरोकारों का दायरा कितना विस्तृत और विविधताओं से भरा हुआ था इसे इस बात से समझ सकते हैं कि एक ओर वे अपने समय के सबसे लोकप्रिय साप्ताहिक ‘धर्मयुग’ में खेलों के बारे में विशेषज्ञता से परिपूर्ण टिप्पणियां लिखते थे तो दूसरी ओर राजनीतिक-वैचारिक लेखन में भी पूरी सिद्धहस्तता से दखल देते थे.
गजल थी पहला प्यार
लेकिन कविकर्म कहें या शायरी, उनका पहला प्यार थी और ग़ज़ल उनकी जिंदगी. इस बारे में वे स्वयं लिख गए हैं कि ‘ग़ज़ल में मेरी जान बसती है और उससे जुदा होने का मैं तसव्वुर भी नहीं कर सकता. इसलिए कई बार मैं गजलगोई एक गुनाह की तरह छुप-छुप कर भी करता रहा हूं. हास्य-व्यंग्य की तरफ मेरा रुझान शुरू से ही रहा है और मौका मिलते ही मैं उसमें भी हाथ आजमाता रहा हूं.’
उनके ग़ज़ल-संग्रह ‘गुनाहे सुख़न’ को 1990 में उर्दू अकादमी, दिल्ली से पुरस्कृत किया गया और उनके शायरी को पचास साल देने के बाद ‘ग़ज़ल की सुरंगें’ नाम से उनकी ग़ज़लों का नया संग्रह आया तो उन्होंने उसकी भूमिका में ‘गुनाहे सुखन’ का यह कहकर जिक्र किया कि उनकी पहली ग़ज़ल उर्दू दैनिक ‘तेज’ में 1956 में छपी थी और उनकी ज़िद थी कि उनकी ग़ज़लें पहले उर्दू ज़बान में ही छपनी चाहिए. हालांकि तब उन्हें उर्दू लिपि क़तई नहीं आती थी.
इस ज़िद का नतीजा यह हुआ कि 1982 में उनके कुछ दोस्तों ने उनकी इधर-उधर छपी हुई रचनाओं को खोज निकाला और उन्हें ‘क़दम मिला के चलो’ शीर्षक से हिंदी में प्रकाशित करने का फ़ैसला किया तो उन्होंने उसमें अपनी एक भी ग़ज़ल शामिल नहीं होने दी. फिर एक दोस्त से अपनी ग़ज़लों को उर्दू लिपि में लिखवाया और 1990 में उसे ‘गुनाहे-सुख़न’ के उनवान से छपवाया.
इसी भूमिका में आगे उन्होंने लिखा है:
शायरी के अलावा सियासत में भी मेरा दख़ल रहा है और अक्सर शायरी को पीछे धकेलकर सियासत ने मुझे धर दबोचा है और मैं देखता ही रह गया हूं. लेकिन अक्सर और बेश्तर मैंने इन दोनों में तआवुन बनाए रखा है….मेरी शायराना ज़िंदगी में 1947 के भारत-विभाजन,1984 के सिख-विरोधी दंगों, 1992 में बाबरी मस्जिद मिस्मार करने और 1996 में लम्बे पार्टी-जीवन के आकस्मिक अंत का ख़ास मुक़ाम रहा है और 2002 के बाद गुजरात-हत्याकांड भी इनमें शामिल हो गया…..मेरी शायरी पर इन हादसात का साया हर जगह मौजूद है.
फ़ैज़ थे आदर्श
वे मीर, ग़ालिब, अकबर इलाहाबादी, जिगर को अपना महबूब शायर, जबकि फ़ैज़ को आदर्श मानते थे और फैज की तरह साक़ी, मयख़ाना, गुल, बुलबुल,शम्आ, परवाना, क़फ़स, बाग़बां, मक़्तल, डारो-रसन आदि उर्दू शायरी के पारंपरिक प्रतीकों को अपने दौर की ज़रूरतों के हिसाब से इस्तेमाल किया करते थे.
स्वाभाविक रूप से उनकी बहुत-सी ग़ज़लें अपनी समझ व सराहना के लिए उर्दू ग़ज़ल की रवायत से परिचय की मांग करती हैं. इसके बगैर उन्हें ठीक से नहीं समझा जा सकता. जानकारों के अनुसार मिर्जा ग़ालिब के एक शे’र से संवाद करता उनका यह शे’र इस बात का उदाहरण है:
लौहे-जहां पे हर्फ़े-मुकर्रर ही हम सही
अपना वजूद फिर भी मिटाया न जाएगा.
इसी तरह दक्षिण अफ़्रीका में इंक़लाबी शायर बेंजामिन मोलोइस को फांसी पर लटकाए जाने के ख़िलाफ़ 1986 में उनके द्वारा रची गई ग़ज़ल के कुछ शे’र भी बहुत काबिल-ए-गौर हैं:
इस तरह तुझसे गुरेज़ां हर बशर हो जाएगा,
जंग में ख़ल्क़त इधर और तू उधर हो जाएगा.
वाए-नादानी ये किसको दार पर लटका दिया,
वो तो ऐसा शख़्स था मरकर अमर हो जाएगा.
000
ऐ जफ़ाजू तेरी पामाली का दिन नज़दीक है,
उसका क्या तारीख़ में वो जलवागर हो जाएगा
देख तेरी लंतरानी हो चली है बेअसर,
लामुहाला उसका जादू कारगर हो जाएगा.
जैसा कि पहले बता आए हैं, जन आंदोलनों से जुड़े गीत भी उन्होंने कुछ कम नहीं लिखे और उनमें से कई इतने मकबूल हुए कि नारों और आंदोलन गीतों के तौर पर इस्तेमाल किए जाने लगे. उनके संग्रह ‘क़दम मिलाके चलो’ में शामिल ‘बोल मजूरे हल्ला बोल’ इसकी एक बड़ी मिसाल है:
बोल मजूरे हल्ला बोल
कांप रही सरमाएदारी खुलके रहेगी इसकी पोल
बोल मजूरे हल्ला बोल!
गोदामों में माल भरा है, नोट भरे हैं बोरों में
बेहोशों को होश नहीं है नशा चढ़ा है ज़ोरों में
इसका दामन उसने फाड़ा उसका गिरेबां इसके हाथ
कफ़नखसोटों का झगड़ा है होड़ लगी है चोरों में
ऐसे में तू हांक लगा दे, ला मेरी मेहनत का मोल!
बोल मजूरे हल्ला बोल!
पर राह निकल ही आएगी!
और अंत में ‘इसका दामन उसने फ़ाड़ा उसका गिरेबां इसके हाथ’ के हालात और कठिन समय की तमाम नाउम्मीदियों के बीच उम्मीदें जगाने वाला उनका यह गीत :
ये शाम है ग़म की शाम सही
ये शाम भी ढल ही जाएगी.
माना चहुं ओर अन्धेरा है
नभ में मेघों का डेरा है
हां, कोसों दूर सवेरा है
पर धूप निकल ही आएगी.
ये शाम है ग़म की शाम सही
ये शाम भी ढल ही जाएगी.
चलने से तू माज़ूर सही
हां, जिस्म थकन से चूर सही
मंज़िल भी सदियों दूर सही
पर राह निकल ही आएगी.
ये शाम है ग़म की शाम सही
ये शाम भी ढल ही जाएगी.
आंखों में सपन सजाए रख
हां, अपनी अगन जगाए रख
मंज़िल की लगन लगाए रख
मंज़िल है तो मिल ही जाएगी.
ये शाम है ग़म की शाम सही
ये शाम भी ढल ही जाएगी.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
