दिल्ली के एक डिलीवरी कर्मचारी की कहानी, उनकी अपनी ज़बानी

जो डिलीवरी कर्मचारी आपके दरवाजे पर चंद मिनटों में सामान पहुंचाता है, वह तमाम तरह का जोखिम उठाता है. लेकिन मुनाफे में उसे कोई हिस्सेदारी नहीं मिलती. त्वरित डिलीवरी व्यवस्था शोषण का आधुनिक संस्करण है. इलेक्ट्रॉनिक वाहनों की नीति तैयार करते समय इन कर्मचारियों के मुद्दों पर विचार होना चाहिए.

(इलस्ट्रेशन: द वायर | फोटो: Zomato)

मेरा नाम जावेद है और मैं डिलीवरी वर्कर हूं. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा पेश की गई इलेक्ट्रॉनिक वाहनों (ईवी) पर केंद्रित नीति, मोटर वाहन एग्रीगेटर और डिलीवरी सेवा प्रदाता योजना (2023), का उद्देश्य शहर में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना, प्रदूषण और पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम करना था. इस नीति के तहत सरकार सब्सिडी देती है, चार्जिंग स्टेशन बनाती है और ईवी कंपनियों को सहायता प्रदान करती है. अरविंद केजरीवाल की सरकार ने सभी वाहनों को ईवी में बदलने के लिए 2030 की समय सीमा तय की थी. भाजपा सरकार अब इस नीति की समीक्षा कर रही है, और समय सीमा पर विचार कर रही है. डिलीवरी कंपनियों ने तर्क दिया है कि यह क्षेत्र पूर्ण ईवी कार्यान्वयन के लिए तैयार नहीं है और परिचालन में व्यवधान के कारण कई कंपनियां ठप हो जाएंगी.

मुझ जैसे डिलीवरी कर्मचारियों के अनुभव से आप इस क्षेत्र को समझ सकते हैं. ईवी वाहनों से डिलीवरी कंपनियों में काम करना शुरू आसान है, बस पहचान प्रमाण-पत्र और काम शुरू करने के लिए वाहन का साप्ताहिक किराया देने की क्षमता की आवश्यकता है. युलु और ज़िप इस क्षेत्र में अग्रणी रहे हैं. ईवेज़, बाज़, बाउंस जैसी कई अन्य कंपनियां भी इस क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं. क्विक-कॉमर्स डिलीवरी सेवाओं की तेज़ी से बढ़ती मांग के कारण इस क्षेत्र में तेज़ी से विकास हुआ है.

सबसे बड़ी समस्या वाहनों का लगातार बढ़ता किराया है. उदाहरण के लिए हम चालक युलु के किराये से परेशान हैं – एक राइडर की औसत कमाई 25,000 रुपये है, जिसमें से  7200 रुपये किराया चुकाना पड़ता हैं. चाहे चालक काम करे या न करे, डिलीवरी के लिये जाये या न जाये, उसे हर हफ़्ते 1600-1800 रुपये देने होते हैं. अगर राइडर किसी वजह से अपनी बाइक का किराया नहीं दे पाता है, तो ईवी कंपनी उसे प्रतिबंधित कर देती है. किराया न दे पाने के 2 दिन के अंदर गाड़ी ज़ब्त कर ली जाती है और चालक हमेशा के लिए प्रतिबंधित हो जाता है.

पिछले 2 सालों से मैं जिप्प की ईवी चलाता था. मेरी हफ़्ते की कमाई करीब 6,000 रुपये थी, जिसमें से किराया करीब 2,000 रुपये था. इसमें कुछ छिपे हुए चार्ज भी शामिल थे. जब मैंने गाड़ी किराए पर ली, तो मुझे सिर्फ़ इतना बताया गया कि 210 रुपये किराया मुझे देना होगा. जिप्प के टीम लीडर ने मुझे बताया कि आपका किराया काम पर निर्भर है – अगर आप दिन के 1,000 रुपये कमाते हैं तो कोई किराया नहीं कटेगा. हालांकि, अक्सर पेनाल्टी लगती थी जो बिना किसी स्पष्टीकरण के मेरे खाते में आ जाती थी. अगर मेरा वॉलेट नेगेटिव हो जाता तो टीएल बताता की टीडीएस कट गया है और कुछ सर्विस चार्ज लगा है. मेरे शुरू करने के 2 महीने बाद किराया 210 से 225 रुपये हो गया. मैंने फिर अपने टीएल को फोन किया तो उन्होंने कहा कि भाई किराया बढ़ गया है और टारगेट भी बढ़ गया है, किराया मुफ्त होने के लिए 1400 रुपये का काम करना पड़ेगा. इस व्यवस्था से परेशान होकर मैंने कंपनी छोड़ दी और अपनी पेट्रोल बाइक खरीद ली.

दूसरा मुद्दा वाहनों की गुणवत्ता और उनकी गति है. जिप्प की गति 30-35 किमी प्रति घंटा है और युलु की गति 20-25 किमी. इस वजह से वर्कर्स कम ऑर्डर पूरे कर पाते हैं और उनकी कमाई पेट्रोल बाइक वालों की तुलना में बहुत कम होती है.

ऐसी ही एक कहानी अजय की है, जिसने युलु बाइक किराए पर ली और पिछले एक साल से ब्लिंकइट के साथ काम कर रहा था. वाहन की धीमी गति के कारण वह अक्सर ग्राहक के पास देरी से पहुंचता, ग्राहक कई बार उसकी शिकायत करते और ख़राब रेटिंग भी देते. आखिर में ब्लिंकइट ने ग्राहक के साथ दुर्व्यवहार का झूठा आरोप लगाते हुए उसकी आईडी समाप्त कर दी है. अब अजय ज़ेप्टो में काम करता है.

ईवी के क्षेत्र में चार्जिंग की सुविधा सबसे ज़रूरी है. बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर के बावजूद, बैटरी बदलने में बहुत परेशानी होती है.दिन में 2-3 बार बैटरी बदलनी पड़ती है, और अक्सर बैटरी स्टेशन पर अधिक राइडर और कम बैटरी होती हैं, जिससे बैटरी बदलने के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ता है. ऐसे में राइडर का आर्डर अक्सर छूट जाता है, और आपका मुनाफा खतरे में आ जाता है.

प्रेम कुमार जिप्प की ईवी चलाते थे रैपिडो में. उन्होंने बताया कि ज़्यादातर बैटरियां पूरी तरह चार्ज नहीं होती थीं, और उन्हें बार-बार बैटरी बदलनी पड़ती थी. बैटरी स्टेशन भी बहुत दूर थे, तो कई बार स्कूटर को धक्का देकर स्टेशन तक ले जाना पड़ता था.

ईवी की खराब गुणवत्ता के चलते लगातार इसकी मरम्मत करवानी पड़ती है. ज्यादातर कंपनियों में मरम्मत का पूरा खर्च राइडर को ही उठाना पड़ता है. ईवी कंपनी से कोई मदद नहीं मिलती. गाजियाबाद के दीपक का एक्सीडेंट हुआ, तो पैर में बहुत चोट आई और बाइक पूरी तरह टूट गई. इलाज के बाद दीपक ने अस्पताल का बिल जब कंपनी को भेजा तो उन्होंने क्लेम ख़ारिज कर दिया क्यूंकि उस दिन दीपक ने एक्सीडेंट के बाद सबूत के तौर पर अपनी सेल्फी नहीं ली थी.

उल्टा जिप्प ने 13,000 रुपये का जुर्माना लगा दिया ईवी की मरम्मत के लिए. चोट लगने के बाद काम न कर पाने के कारण दीपक यह जुरमाना भर नहीं पाया, तो कंपनी ने पैसे निकलवाने के लिए उसके परिवार वालों को फ़ोन लगाना शुरू किया. अब वह डिलीवरी का काम छोड़ के कारखाने में काम करता है.

ईवी वॉलेट में न्यूनतम बैलेंस रखना होता है, जिसके न होने पर गाड़ी सड़क पर बंद हो जाती है और राइडर को पैसे जुगाड़ के भरने पड़ते हैं. राइडर एक दिन की भी छुट्टी नहीं ले सकते और उन्हें पूरे सप्ताह काम करते रहना चाहिए, भले ही वे बीमार हों या दुर्घटना का शिकार हों. वे आराम करने या अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए रुक नहीं सकते क्योंकि उन पर प्रतिदिन किराया देने का दबाव होता है.

राइडर रेंट की व्यवस्था में ही फंसे रह जाते हैं, और छोटी सी गलती या दुर्घटना भी उन्हें कर्ज़े में दाल देती है. डिलीवरी कंपनी उन्हें रेंट-मुफ्त रहने के लालच से 13-14 घंटे काम करवाती हैं. थर्ड-पार्टी वेंडर्स भारत की गिग इकोनॉमी का इंजन बनते जा रहे हैं—लेकिन समाधान के तौर पर नहीं, बल्कि प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी से बचने के रूप में.

जिस तरह फैक्ट्रियां उत्पादन को छोटे वेंडर्स को आउटसोर्स कर देती हैं, आज डिलीवरी कंपनी भी अपने काम को बिचौलियों के हवाले कर देती हैं. जब ब्लिंकिट के डार्क स्टोर्स पर राइडर्स की कमी होती है, तो रैपिडो का फ्लीट कवर करता है 24/7 सेवा सुनिश्चित करते हुए. टाटा का बिग बास्केट भी यही तरीका अपनाता है. श्रम कानूनों से बचने के लिए कंपनियां सबकॉन्ट्रैक्टिंग के पीछे छुप जाती हैं.

कर्मचारी हर जोखिम उठाते हैं—मरम्मत, बैटरी स्वैप, दुर्घटना का नुकसान—लेकिन प्लेटफॉर्म्स के मुनाफे में कोई हिस्सेदारी नहीं मिलती. चार्जिंग स्टेशन अभी भी कम हैं, ई-स्कूटर्स कमजोर, मरम्मत केंद्र दूर-दराज़, लेकिन डिलीवरी के टारगेट लगातार बढ़ते जा रहे हैं. यह कोई नवाचार नहीं, बल्कि शोषण का आधुनिक संस्करण है. डिलीवरी कर्मचारियों के लिए ईवी नीति तैयार करते समय इन सभी मुद्दों पर विचार किया जाना चाहिए.