हिंदुत्व और भारतीय सिनेमा का नाज़ीकरण

मोदी युग का हिंदुत्व सिनेमा एक नया अवतार है. नाज़ी युग के सिनेमा की तरह, हिंदुत्व फ़िल्में न केवल अपनी कट्टरता को पूरी तरह से उजागर करती हैं, बल्कि उसका भौंडा प्रदर्शन भी करती हैं.

मोदी युग का हिंदुत्व सिनेमा एक नया अवतार है. (सभी फोटो साभार: सोशल मीडिया)

भारतीय लोगों का अपने लोकप्रिय सिनेमा से जितना गहरा नाता है वैसा शायद दुनिया के बहुत कम लोगों का होगा. लोकप्रिय हिंदी सिनेमा अपने विवरण और भारतीय जीवन के चित्रण में यथार्थवादी नहीं है. लेकिन ये फ़िल्में अक्सर अपने युग के प्रमुख लोकाचार को भावपूर्ण ढंग से प्रतिबिंबित करती हैं. इस अर्थ में, भारतीय सिनेमा का अंतर्पाठ अक्सर राजनीतिक और वैचारिक रूप से प्रेरित होता है.

1950 और 1960 के दशक के लोकप्रिय हिंदी सिनेमा पर नज़र डालें. ये भारत की आज़ादी के बाद के शुरुआती दशक थे, अपेक्षाकृत रूप से आदर्शवाद और उम्मीद से भरा दौर था, भारत के बहुलतावाद का उत्सव मनाया जाता था, औपनिवेशिक और सामंती अतीत की असमानताओं तथा अन्याय से लड़ने का जज़्बा था, महिलाएं अपनी बेड़ियां तोड़ना चाहती थीं, और राष्ट्र-निर्माण का दौर चल था. उस समय की प्रतिष्ठित लोकप्रिय हिंदी फ़िल्में इन आकांक्षाओं को प्रतिध्वनित करती थीं, ये फ़िल्में सौम्य समाजवाद तथा मानवतावाद से आलोकित थीं, बहुलतावाद और हिंदुओं तथा मुसलमानों के साझा जीवन की पुष्टि और उत्सव, उत्पीड़न के सामंती बंधनों को तोड़ने और मानवीय अच्छाई में गांधीवादी विश्वास का प्रतीक थीं.

बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन, महबूब ख़ान की मदर इंडिया, राज कपूर की आवारा और श्री 420, गुरुदत्त की साहिब, बीबी और गुलाम, बीआर चोपड़ा की नया दौर, वी शांताराम की दो आँखें बारह हाथ और यश चोपड़ा की धर्मपुत्र जैसी फ़िल्में इस दौर का प्रतिनिधित्व करती हैं. साहिर लुधियानवी, शैलेंद्र और कैफ़ी आज़मी जैसे प्रसिद्ध वामपंथी कवियों द्वारा लिखे गए इस दौर के गीत भी धर्मनिरपेक्षता और हिंदू-मुस्लिम एकता का आख्यान थे, जिनमें सामाजिक समानता, किसानों और मज़दूरों के अधिकारों तथा एक बहुलतावादी, मानवीय, प्रगतिशील राष्ट्र के सपनों का आह्वान किया गया था.

मोदी युग का हिंदुत्व सिनेमा एक नया अवतार है

1990 के दशक का लोकप्रिय सिनेमा व्यापक रूप से बदले हुए भारत को दर्शाता था, नव-उदारवादी, लोभी और – बाबरी मस्जिद आंदोलन के बाद – कहीं अधिक ध्रुवीकृत. किसान, मज़दूर वर्ग, दलित, आदिवासी और भारत के ग़रीब लोकप्रिय हिंदी सिनेमा से लगभग ग़ायब हो गए थे. मध्यम वर्ग की जीवनशैली और आकांक्षाएं ही सामान्य जनता की आकांक्षा का आदर्श बन गईं. और 1950 और 60 के दशक का विनम्र रहीम चाचा या कुलीन अभिजात वर्ग का मुसलमान चरित्र माफ़िया, धार्मिक कट्टरपंथी और आतंकवादी में बदल गया.

लेकिन मोदी युग का हिंदुत्व सिनेमा एक नया अवतार है. इसलिए नहीं कि ये फ़िल्में राजनैतिक हैं. जैसा कि मैंने ज़ोर देकर कहा है, पहले की फ़िल्मों में भी राजनीतिक और वैचारिक संदेश होता था. बल्कि इसलिए कि, नाज़ी युग के सिनेमा की तरह, हिंदुत्व फ़िल्में न केवल अपनी कट्टरता को पूरी तरह से उजागर करती हैं, बल्कि उसका भौंडा प्रदर्शन भी करती हैं. अब कम से कम सच्चाई पर अड़े रहने का दिखावा करने की उनकी बची-खुची झिझक भी दूर हो गई है. इसके बजाय, वे अपनी विभाजनकारी वैचारिक परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए इतिहास और समकालीन घटनाओं, दोनों को बेशर्मी से झुठलाते हैं. इन फ़िल्मों का लहजा कर्कश और स्पष्ट रूप से घृणास्पद है.

नाज़ी जर्मनी की तरह, सर्वोच्च नेता और अन्य वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों द्वारा अक्सर इन फ़िल्मों की सार्वजनिक रूप से सराहना की जाती है. हिटलर की तरह, मोदी भी सार्वजनिक रूप से इन फ़िल्मों के प्रदर्शन में शामिल होते हैं, उनके मंत्री और मुख्यमंत्री भी ऐसा ही करते हैं. वे न केवल जनता को, बल्कि (और भी ख़तरनाक रूप से) सैन्य बलों को संबोधित करके भी इनकी सराहना करते हैं. कर में कटौती करके तथा अन्य सरकारी संरक्षण के माध्यम से सार्वजनिक धन का उपयोग करके इन फ़िल्मों को संरक्षण दिया जाता है.

‘छावा’ का संदर्भ दूसरे मराठा शासक संभाजी से जुड़ता है.

छावा: एक भव्य लेकिन ऐतिहासिक रूप से संदिग्ध और भड़काऊ फ़िल्म 

छावा का अर्थ है शेर का बच्चा. इस नाम से बनी एक भव्य लेकिन ऐतिहासिक रूप से संदिग्ध और भड़काऊ फ़िल्म 2025 के वसंत में रिलीज़ हुई. फ़िल्म के शीर्षक का संदर्भ दूसरे मराठा शासक संभाजी से जुड़ता है, जो श्रद्धेय मराठा राजा शिवाजी के पुत्र थे. ऐतिहासिकता का दावा करते हुए, इसमें मुगल सम्राट औरंगज़ेब के साथ संभाजी के युद्ध को फ़िल्माया गया है, जिसमें औरंगज़ेब को एक धार्मिक कट्टरपंथी के रूप में चित्रित किया गया है जो पूरी तरह से क्रूर था. दूसरी ओर, संभाजी को हिंदू धर्म की रक्षा करने वाले एक वीर और महान योद्धा के रूप में दिखाया गया है.

इस फ़िल्म की अवधि 126 मिनट है. फ़िल्म के अंतिम 40 मिनट में संभाजी पर 40 दिनों तक की गई यातनाओं का सजीव और अनावश्यक चित्रण है. उनके नाख़ून उखाड़ दिए जाते हैं, उनकी आँखों को लोहे की छड़ों से छेद दिया जाता है, उनकी जीभ फाड़ दी जाती है, लेकिन इन सबके बावजूद संभाजी अटल और अडिग रहते हैं.

हालांकि, इतिहासकार एक बिल्कुल अलग कहानी बताते हैं. वे संभाजी को एक भ्रष्ट और अयोग्य शासक मानते हैं. दिलचस्प बात यह है कि हिंदुत्व के प्रतीक पुरुष सावरकर और गोलवरकर भी इसी आकलन से सहमत थे.

हालांकि, मुद्दा ऐतिहासिक प्रामाणिकता का नहीं है. फ़िल्म संभाजी के युद्ध को एक धार्मिक हिंदू युद्ध के रूप में और औरंगज़ेब की क्रूरता और अत्याचार को इतिहास तथा वर्तमान में भारतीय मुसलमानों के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करती है. इसके उग्र चित्रण ने सिनेमाघरों में खचाखच भरे दर्शकों को ख़ूब प्रभावित किया. सोशल मीडिया पर मुसलमानों को निशाना बनाकर की गई नफ़रत भरी प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई, और फ़िल्म स्क्रीनिंग के दौरान तथा बाद में दर्शकों द्वारा ग़ुस्से से भरे नारे लगाने के वीडियो पोस्ट किए गए.

नागपुर में एक आदमी घोड़े पर सवार होकर ‘हर हर महादेव’ और ‘जय भवानी’ का नारा लगाते हुए एक सिनेमा हॉल में घुस गया. गुजरात में, एक व्यक्ति ने बादशाह औरंगज़ेब पर हमला करने के इरादे से चाकू से सिनेमा हॉल के पर्दे को फाड़ दिया. दिल्ली में, फ़िल्म देखने के बाद हिंदुत्व संगठनों के लोगों ने मुग़ल बादशाहों के नाम वाले सड़क के संकेतों को विकृत कर दिया. एक व्यक्ति ने तो बादशाह अकबर के नाम पर बनी एक सड़क के साइन बोर्ड पर पेशाब भी कर दिया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ़िल्म की दिल खोलकर प्रशंसा की

फ़िल्म के संदिग्ध इतिहास और भड़काऊ स्वर के बावजूद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ़िल्म की दिल खोलकर प्रशंसा की और कहा कि इसने ‘धूम मचा दी है’ और यह ‘उन्नत हिंदी सिनेमा’ का एक उदाहरण है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एएनआई को बताया कि ‘इतिहास लिखने वालों ने छत्रपति संभाजी महाराज के साथ बहुत अन्याय किया, लेकिन इस फ़िल्म के माध्यम से, उनके जीवन के पराक्रम, शौर्य, चतुराई, बुद्धिमत्ता, ज्ञान के पहलू जनता के सामने आ रहे हैं.’

नागपुर के महल इलाक़े में शिवाजी की एक मूर्ति के पास लाठी-डंडों और पत्थरों से लैस हिंदुत्ववादी समूहों विहिप और बजरंग दल के समर्थकों की भीड़ जमा हो गई. उनकी मांग थी कि औरंगाबाद, जिसका नाम अब छत्रपति संभाजी नगर ज़िला है, में स्थित 17वीं सदी के औरंगज़ेब के मक़बरे को तोड़ा जाए. यह मक़बरा सम्राट की साधारण क़ब्र के ऊपर बना है. फ़िल्म से भड़की भीड़ ने नारे लगाए, औरंगज़ेब की एक तस्वीर जलाई और घास से ढके हरे कपड़े में लिपटी एक प्रतीकात्मक क़ब्र में आग लगा दी.

इसके बाद अफ़वाहें फैलीं कि उनकी क़ब्र को अपवित्र किया गया है. ग़ुस्साई भीड़ इकट्ठा हो गई और पुलिस पर पथराव किया, पुलिस और निजी वाहनों में तोड़फोड़ और आगजनी की. उन्होंने कई घरों और एक क्लिनिक को भी तहस-नहस कर दिया. चार लोगों के घायल होने की ख़बर आई थी.

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने फ़िल्म को हिंसा के लिए ज़िम्मेदार ठहराया, जिसकी उन्होंने पहले प्रशंसा की थी

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राज्य विधानसभा को संबोधित करते हुए उस फ़िल्म को हिंसा के लिए ज़िम्मेदार ठहराया, जिसकी उन्होंने पहले प्रशंसा की थी. उन्होंने कहा कि फ़िल्म देखने के बाद लोगों की भावनाएं भड़क उठीं और उन्होंने औरंगज़ेब के ख़िलाफ़ अपना ग़ुस्सा निकाला. उन्होंने औरंगज़ेब की क़ब्र को हटाने की मांग का सैद्धांतिक रूप से विरोध नहीं किया, लेकिन कहा कि यह क़ानूनी तरीक़े से किया जाना चाहिए. उन्होंने बताया कि संघर्ष में तीन पुलिस उपायुक्तों सहित 33 पुलिसकर्मी घायल हुए और एक वरिष्ठ अधिकारी पर कुल्हाड़ी से हमला किया गया.

कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने संसद में हिंसा के लिए मुख्यमंत्री को ज़िम्मेदार ठहराया. उन्होंने हिंसा से कई दिन पहले फ़िल्म के ज़रिए 300 साल पुराने इतिहास को हथियार बनाने और ‘विभाजन, ध्यान भटकाने तथा अशांति फैलाने’ की उनकी कोशिश की निंदा की. उन्होंने कहा कि शांति, सद्भाव और क़ानून-व्यवस्था बनाए रखना मुख्यमंत्री का संवैधानिक कर्तव्य है. ‘लेकिन वह अपने राजधर्म, यानी शासक के कर्तव्यों, का पालन करने में विफल रहे हैं.’

नरेंद्र मोदी के शासन में फल-फूल रहा हिंदुत्व सिनेमा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन में फल-फूल रहे हिंदुत्व सिनेमा जगत की यह अकेली फ़िल्म नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप सीधे तौर पर सांप्रदायिक हिंसा, सांप्रदायिक रूप से प्रेरित चाकूबाज़ी, हत्या, बलात्कार और आगज़नी हुई है.

एक और प्रमुख हिंदुत्व फ़िल्म, जिसने छावा की तरह, तबाही और बर्बादी का निशान छोड़ा, वह थी कश्मीर फ़ाइल्स. 2022 में रिलीज़ होने वाली यह फ़िल्म 1990 के दशक में मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडित हिंदुओं की हत्याओं और जातीय नरसंहार के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को सही करने का दावा करती है. फ़िल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित होने का दावा करती है. लेकिन जैसा कि न्यू यॉर्कर ने लिखा है, यह सच है कि 1989 में शुरू हुई इस घटना ने हजारों हिंदुओं को मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी से क्रूरतापूर्वक बेदख़ल कर दिया गया था.

‘द कश्मीर फाइल्स’ घाटी की पूरी मुस्लिम आबादी को ‘ख़ून के प्यासे समुदाय के रूप में ग़लत तरीक़े से चित्रित करती है.

‘सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कम-से-कम दो सौ हिंदू मारे गए, लेकिन फ़िल्म में यह संख्या बढ़ाकर चार हज़ार कर दी गई है. सशस्त्र चरमपंथी इसके लिए ज़िम्मेदार थे, लेकिन… फ़िल्म इस त्रासदी को अंजाम देने का झूठा आरोप कई अन्य लोगों पर भी लगाती है…: (इनमें) विश्वविद्यालय के वामपंथी प्रोफेसर (और) कांग्रेस शामिल हैं.’ फ़िल्म में घाटी की पूरी मुस्लिम आबादी को ‘ख़ून के प्यासे समुदाय के रूप में भी ग़लत तरीक़े से चित्रित किया गया है, जिसने अल्पसंख्यक पंडितों के साथ बलात्कार और हत्या करने और उन्हें घाटी छोड़ने पर मजबूर करने वाले उग्रवादियों का पूरे दिल से समर्थन किया.’

कश्मीर फ़ाइल्स हिंदुओं के पक्ष में खड़े कश्मीरी पंडितों के बारे में है: अरुंधति रॉय

उपन्यासकार और जन बुद्धिजीवी अरुंधति रॉय कहती हैं, ‘यह फ़िल्म अंततः कश्मीरी पंडितों के बारे में नहीं है, बल्कि भारत में हिंदुओं के पक्ष में खड़े कश्मीरी पंडितों के बारे में है, और सभी मुसलमान दुष्ट क़साई हैं जो क़त्लेआम और हत्या करते हैं. जबकि, सच्चाई यह है कि कश्मीरी पंडित आज भी कश्मीर में रह रहे हैं, अपने मुस्लिम दोस्तों और पड़ोसियों के साथ रिश्ते बनाए हुए हैं. और उनके आंकड़े बताते हैं कि 30 सालों में 619 लोग मारे गए. लेकिन फ़िल्म में ऐसा लगता है जैसे पूरी आबादी या तो क़त्ल कर दी गई या उसे भगा दिया गया.’

एक बार फिर, फ़िल्म अपने संभावित हिंदू दर्शकों को फ़र्ज़ी इतिहास बताती है उनके भीतर नफ़रत और ग़ुस्सा भड़काती है. लेकिन एक बार फिर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ़िल्म के बारे में बिल्कुल अलग राय रखी. उन्होंने इसे ‘सच’ क़रार दिया और सिफ़ारिश की कि ‘हर किसी को इसे देखना चाहिए’. सिर्फ़ उन्होंने ही नहीं, पूरे भाजपा नेतृत्व ने इस फ़िल्म का ज़ोरदार समर्थन किया.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने फ़िल्म देखने के लिए पुलिसकर्मियों को आधे दिन की छुट्टी दी. भाजपा नेताओं ने मुफ़्त टिकट बांटे. यह साल की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फ़िल्मों में से एक बन गई. सिनेमाघरों में, स्क्रीनिंग के दौरान और उसके बाद मुस्लिम विरोधी नारेबाज़ी आम बात थी. सोशल मीडिया पर नफ़रत और ग़ुस्से का कोई तड़का नहीं लगा. द न्यू यॉर्कर ने एक भाजपा नेता का हवाला दिया है, जिसने ‘‘देशद्रोहियों’ को गोली मारने का आह्वान किया’, और अपने ट्विटर फ़ॉलोअर्स से फ़िल्म देखने की अपील की, ‘ताकि कल कोई बंगाल फ़ाइल्स, केरल फ़ाइल्स, दिल्ली फ़ाइल्स न हो.’

द कश्मीर फ़ाइल्स में एक दृश्य है जिसमें एक हिंदू महिला को उग्रवादी नंगा करके आरे से ज़िंदा चीर रहे हैं, जबकि उसके मुस्लिम पड़ोसी देखते रहते हैं मगर कोई उसकी मदद के लिए नहीं आता. मध्य प्रदेश के खरगोन ज़िले में, फ़िल्म रिलीज़ होने के बाद रामनवमी के जुलूस में, स्थानीय शिवसेना ने एक पुतला और साइकिल का पहिया का इस्तेमाल करके उस भयावह दृश्य को एक झांकी के रूप में प्रस्तुत किया. साउंड ट्रैक के तौर पर एक महिला के रोने की आवाज़ का इस्तेमाल किया गया. झांकी में एक व्यथित चेहरे का एक बड़ा-सा चित्र भी दिखाया गया था, अनुपम खेर के चेहरे का, जिन्होंने फ़िल्म में महिला के ससुर का किरदार निभाया था. झांकी के बैनर पर मोटे अक्षरों में चेतावनी लिखी थी, ‘हिंदुओं जागो, कहीं ऐसा न हो कि भारत के दूसरे राज्य कश्मीर बन जाएं.’

इस झांकी के साथ जुलूस शहर की मुख्य मस्जिद के बाहर खड़ा था, नफ़रत भरे गाने और नारे लगा रहा था और युवक जोश में नाच रहे थे. पत्थरबाज़ी हुई और जल्द ही शहर के कई इलाक़े सांप्रदायिक हिंसा की आग में जल उठे. संपत्तियों को आग लगा दी गई और तोड़फोड़ की गई, और जल्द ही ज़िला अस्पताल चाकू और लाठियों से घायल पुरुषों और महिलाओं से भर गया. अगली सुबह, पूरी तरह से ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से, राज्य प्रशासन ने सज़ा के तौर पर कई मुसलमानों के घरों को ढहा दिया.

ज़िले के प्रशासन की देखरेख का ज़िम्मा संभालने वाले मंत्री कमल पटेल ने एक इंटरव्यू में कहा, ‘द कश्मीर फ़ाइल्स में जो दिखाया गया, वही खरगोन में हुआ.’ उन्होंने दावा किया कि हिंसा शहर के मुसलमानों की साज़िश थी. उन्होंने अपने हिंदू पड़ोसियों को लूटा, उन्हें घायल किया और उनका बलात्कार किया. उन्होंने यह स्वीकार नहीं किया कि हिंसा की चिंगारी रामनवमी जुलूस के उकसावे से भड़की थी, न ही यह कि मुसलमानों को कोई बड़ा नुक़सान हुआ था.

इसी तरह, मुसलमानों को हुए नुक़सान की परवाह किए बिना, बजरंग दल के कार्यकर्ता महेश मुछाल, जिनके संजय नगर स्थित घर में आग लगा दी गई थी, ने पत्रकारों से कहा कि खरगोन में हिंदू अभी भी ग़ुस्से से उबल रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया, ‘द कश्मीर फ़ाइल्स की तरह, वे [मुसलमान] खरगोन फ़ाइल्स बनाने पर तुले हैं.’

हिंदुत्व सिनेमा में भाजपा-आरएसएस के प्रमुख विषय और रूपक बार-बार दोहराए जाते हैं

मोदी युग के हिंदुत्व सिनेमा में भाजपा-आरएसएस के प्रमुख विषय और रूपक बार-बार दोहराए जाते हैं. इस शैली की फ़िल्मों का एक मुख्य उद्देश्य इतिहास को झुठलाना है, मध्यकालीन भारत के मुस्लिम शासकों को समान रूप से क्रूर और कट्टर बताना, हिंदुओं पर अत्याचार करने वाला, हिंदू राजाओं को हराने तथा उनका सफ़ाया करने वाला, हिंदू मंदिरों को तोड़ने वाला, हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार करने और उन्हें इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मजबूर करने के एक मात्र उद्देश्य से प्रेरित आक्रमणकारी के रूप में प्रस्तुत करना है. दूसरी ओर, हिंदू शासकों को हमेशा वीर और महान, हिंदू महिलाओं को पतिव्रता और विनम्र तथा बर्बरतापूर्वक सताए गए हिंदू लोगों को क्रूर, अंधराष्ट्रवादी आक्रमणकारी के ख़िलाफ़ अपने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए समर्पित दिखाया गया है.

घृणास्पद उद्देश्यों के लिए इतिहास का यह दुर्भावनापूर्ण सांप्रदायिक मिथकीकरण छावा में विशेष रूप से प्रभावशाली ढंग से किया गया था. लेकिन इस दृष्टिकोण के सामान्यीकरण की एक चिंताजनक मिसाल संजय लीला भंसाली द्वारा बनाई गई एक फ़िल्म है. भंसाली अपने भव्य, अतिरंजित ऐतिहासिक मेलोड्रामा के लिए प्रसिद्ध हैं, लेकिन वैचारिक रूप से वे निश्चित रूप से हिंदुत्व के अखाड़े से नहीं हैं.

उन्होंने पद्मावत में एक ऐसी ख़ूबसूरत राजकुमारी की कहानी गढ़ी है जिसके राज्य पर दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने हमला किया और उसे हरा दिया, लेकिन राजकुमारी उसके हाथों में पड़ने के बजाय महल की कई अन्य महिलाओं के साथ आत्मदाह कर लेती है. भंसाली ने खिलजी को एक असभ्य, व्यभिचारी और क्रूर राजा के रूप में चित्रित किया है. यह चित्रण सतीश चंद्र और इरफ़ान हबीब जैसे प्रमुख इतिहासकारों द्वारा दिए विविरण के विपरीत है, जिसमें उन्होंने उसे एक प्रबुद्ध शासक के रूप में प्रस्तुत किया है. जो जैसी भूमि नीति बनाता है और जिस तरह हिंदू प्रजा के साथ व्यवहार करता है वह उसके समय से आगे की बात है.

मुस्लिम शासकों को हिंसक आक्रमणकारियों के रूप में चित्रित करना

भारत में मुस्लिम शासकों को हिंसक आक्रमणकारियों के रूप में चित्रित करने का यही ढोंग, जिनका प्रतिरोध वीर हिंदू राजाओं और सेनापतियों ने किया, तानाजी जैसी कई अन्य फ़िल्मों में भी दोहराया गया है. झांसी की रानी, रानी लक्ष्मी बाई ने 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश औपनिवेशिक सेना का वीरतापूर्वक मुक़ाबला किया था. यह तथ्य कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध 1857 का युद्ध अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र के नेतृत्व में छोटी-छोटी रियासतों के कई हिंदू और मुस्लिम शासकों द्वारा संयुक्त रूप से लड़ा गया था, इतिहासकारों के लिए हिंदू-मुस्लिम एकता का सशक्त प्रमाण है. लेकिन ‘मणिकर्णिका: द क़्वीन ऑफ़ झांसी’ नाम से 2019 में रानी लक्ष्मी बाई की जीवनी पर बनी कटु और सांप्रदायिक रंगत वाली फ़िल्म में यह अध्याय पूरी तरह से छिपा लिया जाता है.

हिंदुत्व सिनेमा के कुछ और आम विषय हैं: समकालीन मुस्लिम नागरिकों पर अपनी मातृभूमि के प्रति विश्वासघात, लव जिहाद जैसी भयावह साजिशों में उनकी भागीदारी तथा आतंकवाद के प्रति उनकी सहानुभूति के आरोप. कश्मीर फ़ाइल्स के अलावा, हिंदुत्व-थीम वाली इन फ़िल्मों में सबसे सफल द केरल स्टोरी है. इस फ़िल्म में केरल की एक बुर्काधारी युवती की कहानी है, जिसका मूल नाम शालिनी उन्नीकृष्णन है, जिसका मुस्लिम प्रेमी इस्लाम धर्म अपनाने के लिए उसका ब्रेनवॉश करता है. अब फ़ातिमा बी बनकर उसे आईएसआईएस में शामिल होने के लिए भेज दिया जाता है.

फ़िल्म के ट्रेलर में दावा किया गया था कि यह फ़िल्म उन 32,000 से ज़्यादा महिलाओं की सच्ची कहानी है, जिनका यही हश्र हुआ था. लेकिन जब फ़िल्म निर्माता इस दावे के समर्थन में कोई सबूत सुप्रीम कोर्ट में पेश नहीं कर पाए, तो कोर्ट ने फ़िल्म निर्माताओं को यह दावा वापस लेने और यह डिस्क्लेमर जोड़ने का निर्देश दिया कि यह एक काल्पनिक कहानी है. लेकिन फ़िल्म के टेलर ने अपना काम कर दिया था.

‘द केरल स्टोरी’ ने  मुस्लिम पड़ोसियों के बारे हिंदुओं की धारणा में  परिवर्तन  किया

देश भर में अपने मुस्लिम पड़ोसियों के बारे हिंदुओं की धारणा में जो परिवर्तन आया उसकी भरपाई करने में इस डिस्क्लेमर से कोई ख़ास मदद नहीं मिली. दर्शकों को यह विश्वास दिलाया गया कि पहले मुस्लिम युवक हिंदू और ईसाई लड़कियों को शादी के जाल में फंसाकर उनका धर्म परिवर्तन कराते हैं. इसके बाद, कट्टरपंथी मुस्लिम मौलवी उन्हें अफ़ग़ानिस्तान, यमन और सीरिया जैसे देशों में इस्लाम की लड़ाई में आतंकवादी के रूप में लड़ने के लिए भेज देते हैं.

हिंदुत्व-थीम वाली इन फ़िल्मों में सबसे सफल द केरल स्टोरी’ है.

फ़िल्म में गढ़े गए झूठे आख्यानों और फ़र्ज़ी ख़बरों पर आधारित इन पूर्वाग्रहों को भाजपा नेताओं ने सुनियोजित तरीक़े से और हवा दी. प्रधानमंत्री ने एक बार फिर फ़िल्म की सराहना की. भोपाल की सांसद और आतंकवाद की आरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने फ़िल्म की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘फ़िल्म द केरल स्टोरी में दिखाया गया घिनौना षड्यंत्र वास्तविकता को दर्शाता है.’ वह एक किशोरी को यह फ़िल्म दिखाने ले गईं ताकि उसे अपने मुस्लिम प्रेमी से शादी न करने के लिए मना सकें. (संयोग से, उनकी यह कोशिश नाकाम रही और किशोरी अंततः अपने प्रेमी के साथ भाग गई).

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने फ़िल्म को मनोरंजन कर से मुक्त करने के अपने फ़ैसले के बारे में बताया, ‘हम मध्य प्रदेश में धर्मांतरण के ख़िलाफ़ पहले ही क़ानून बना चुके हैं. चूँकि यह फ़िल्म जागरूकता पैदा करती है, इसलिए सभी को यह फ़िल्म देखनी चाहिए. माता-पिता, बच्चों और बेटियों को इसे देखना चाहिए. इसीलिए मध्य प्रदेश सरकार फ़िल्म द केरल स्टोरी को कर-मुक्त कर रही है.’

हिंदुत्ववादी सत्ता प्रतिष्ठान के आख्यान का समर्थन करने के लिए हाल के इतिहास को फिर से लिखने वाली अन्य फ़िल्मों में एक्सीडेंट ऑर कॉन्सपिरेसी: गोधरा और द साबरमती रिपोर्ट शामिल हैं. 2002 में हुए सांप्रदायिक नरसंहार को सही ठहराने के लिए मोदी अपने मुख्यमंत्री काल से ही ज़ोरदार तरीक़े से जो दावा पेश करते रहे हैं, ये दोनों ही फ़िल्में उस दावे का समर्थन करती हैं.

मुसलमानों के ख़िलाफ़ दूसरे पूर्वाग्रहों और षड्यंत्र के सिद्धांतों को बढ़ावा देती फिल्में

यह दावा था कि 27 फ़रवरी 2002 को गोधरा में ट्रेन में आग लगाना, जिसमें 58 हिंदू मारे गए थे, मुस्लिम आतंकवादी संगठनों द्वारा रची गई एक भयावह साज़िश थी; सीमा पार के संगठनों और सरकार ने जिसमें मदद की थी. आर्टिकल 370 और रज़ाकार: द साइलेंट जेनोसाइड ऑफ़ हैदराबाद में भी हिंदुत्व समर्थित संशोधनवादी इतिहास को प्रस्तुत किया गया है.

हमारे बारह जैसी कुछ फ़िल्में मुसलमानों के ख़िलाफ़ दूसरे पूर्वाग्रहों और षड्यंत्र के सिद्धांतों को बढ़ावा देती हैं. फ़िल्म के मुस्लिम नायक की दो पत्नियां हैं और वो उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा बच्चे पैदा करने के लिए मजबूर करता है, चाहे उन्हें अपनी जान जोखिम में ही क्यों न डालनी पड़े. इस फ़िल्म के मूल में ‘जनसंख्या जिहाद’ का षड्यंत्र सिद्धांत छिपा है, जिसे हिंदुत्व समर्थक अक्सर प्रचारित करते हैं, जिसमें दावा किया जाता है कि मुसलमान जानबूझकर अधिक बच्चे पैदा करते हैं, जिसका राजनीतिक उद्देश्य यह है कि एक दिन मुसलमानों की संख्या अपने हिंदू हमवतन लोगों से ज़्यादा हो जाए.

उन्हें इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि यह दावा इस सबूत का खंडन करता है कि आय और शिक्षा के स्तर के हिसाब से हिंदुओं और मुसलमानों का प्रजनन व्यवहार समान है, और यह कि हाल के वर्षों में भारत के किसी भी अन्य समुदाय की तुलना में मुस्लिम समुदाय के प्रजनन स्तर में तेज़ गिरावट देखी गई है.

हिंदुत्व फ़िल्में अपने नायकों की जीवनी पर आधारित फ़िल्में भी बनाती हैं, जैसे स्वतंत्र वीर सावरकर नाम की फ़िल्म. सावरकर हिंदू महासभा के संस्थापक थे, पहले नेता जिन्होंने यह प्रस्ताव रखा कि हिंदू और मुसलमान अलग-अलग राष्ट्र हैं; उन्होंने यहूदियों के ख़िलाफ़ हिटलर के नरसंहार का समर्थन किया; गांधीजी की मृत्यु के बाद उन्हें हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के आरोप में गिरफ़्तार किए गए; और भारतीय संविधान का विरोध किया तथा प्राचीन हिंदू विधि ग्रंथ मनुस्मृति या मनु के नियमों की प्रशंसा की, जो जाति और लिंग भेदभाव की वकालत करता है. पीएम नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री की एक बेहद चर्चित बायोपिक है, जिसमें उनकी साधारण पृष्ठभूमि, आरएसएस के प्रति उनकी निस्वार्थ सेवा, 2002 के सांप्रदायिक नरसंहार पर उनके सफल नियंत्रण और बारह वर्षों तक गुजरात के नेता के रूप में उनके द्वारा किए गए अभूतपूर्व विकास को दर्शाया गया है.

कई हिंदुत्ववादी फ़िल्में राजनीतिक विपक्ष, खासकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, का अपमान करने के लिए बनाई गईं.

इसके समानांतर, कई हिंदुत्ववादी फ़िल्में राजनीतिक विपक्ष, खासकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, का अपमान करने के लिए बनाई गईं. इनमें से प्रमुख है द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर, जिसमें वैश्विकत स्तर पर प्रशंसित कांग्रेसी प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को कमज़ोर और अनाड़ी बताया गया है. बस्तर: द नक्सल स्टोरी और जेएनयू: जहांगीर नेशनल यूनिवर्सिटी जैसी फ़िल्मों में वामपंथी शिक्षाविदों तथा कार्यकर्ताओं को धूर्त और बेईमान दिखाया गया है, और कश्मीर फ़ाइल्स जैसी फ़िल्मों में भी.

मोदी सरकार के राज में हिंदुत्व पर आधारित फ़िल्मों की बाढ़

मोदी सरकार के राज में हिंदुत्व पर आधारित फ़िल्मों (जिनका सौंदर्य मानक आमतौर पर न्यूनतम होता है) की बाढ़ का क्या कारण है? निखिल आडवाणी ने न्यू यॉर्कर को बताया कि कश्मीर फ़ाइल्स की बॉक्स-ऑफ़िस सफलता के बाद, फ़िल्म निर्माताओं ने स्वाभाविक रूप से सोचा होगा कि क्या लोग इसी तरह की फ़िल्म देखना चाहेंगे. उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, ‘अब जब यह चल निकला है, तो आइए हम सब मिलकर इस तरह का राष्ट्रवादी, कट्टर देशभक्ति वाला सिनेमा बनाएं.’

लेकिन हक़िक़त यह है कि उदार कर छूट और सरकार व पार्टी दोनों के वरिष्ठ नेतृत्व द्वारा बेबाक प्रचार सहित बेलौस और अत्यधिक सरकारी संरक्षण के बावजूद, इनमें से बहुत कम फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर मुनाफ़ा कमा पाई हैं. छावा, कश्मीर फ़ाइल्स, केरल स्टोरी और आर्टिकल 370 कुछ ही ऐसी फ़िल्में हैं जो पैसा कमा पाईं.

हमें यह समझना होगा कि ये फ़िल्में मुख्य रूप से वित्तीय लाभ के लिए नहीं बनाई जाती हैं. बल्कि इसलिए बनाई जाती हैं क्योंकि ये हिंदुत्व की वैचारिक परियोजना के शक्तिशाली तत्व हैं, क्योंकि ये इसके वैश्विक-दृष्टिकोण, राजनीतिक दावों, पूर्वाग्रहों तथा नैतिकता को लाखों दिलों, दिमागों और घरों तक पहुंचाने में मदद करती हैं.

ऐसा करने के लिए हिंदुत्व नेताओं ने हिटलर और नाजी जर्मनी की कार्यपद्धति से बहुत कुछ सीखा है. हालांकि उस समय सिनेमा एक नई तकनीक और संचार माध्यम था मगर हिटलर और उसके प्रचार मंत्री जोसेफ़ गोएबल्स ने नाजी विश्वदृष्टि, पूर्वाग्रहों और उसकी सामाजिक व राजनीतिक परियोजना को लोकप्रिय बनाने के एक माध्यम के रूप में इसकी अपार क्षमता को समझा. इस माध्यम के प्रति दोनों बहुत आकर्षित थे. अफ़वाह थी कि गोएबल्स हर दिन एक फ़िल्म देखने की कोशिश करता था. आधिकारिक रात्रिभोजों में हिटलर की पसंदीदा साथी लोकप्रिय जर्मन अभिनेत्रियां होती थीं.

नाजी काल में निर्मित फ़िल्मों का छठा हिस्सा प्रचार फ़िल्में थीं. सत्ता हासिल करने के तुरंत बाद नाजी पार्टी का एक प्रारंभिक नीतिगत निर्णय एक फ़िल्म विभाग स्थापित करना था. उन्होंने जर्मन लोगों की भावनाओं और विश्वासों को प्रभावित करने में फ़िल्म की शक्ति को महसूस किया.

नाजी सरकार व विचारधारा की आलोचना करने वाली अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्मों तथा किसी भी तरह की लोकतांत्रिक सामग्री को सेंसर किया गया था. गोएबल्स ने यहूदी या नाजी-विरोधी फ़िल्मों को भी ब्लॉक कर दिया. गोएबल्स ने आलोचकों को नकारात्मक समीक्षा लिखने से भी प्रतिबंधित कर दिया.

प्रचार का सबसे प्रभावी माध्यम चलचित्र है

नाज़ी नेतृत्व का मानना था कि जनता मानसिक रूप से निष्क्रिय होती है और किताबें उनके विश्वासों को प्रभावित करने में कम प्रभावी होती हैं. उनके एक विचारक ने चलचित्र की बेहतर संभावनाओं के बारे में लिखा था. ‘मैं कह सकता हूँ कि बहुत कम समय में, एक ही झटके में, लोग किसी ऐसी चीज़ का चित्रात्मक प्रस्तुतीकरण समझ जाएंगे जिसे समझने के लिए उन्हें पढ़ने में लंबा और श्रमसाध्य प्रयास करना होगा.’ नाज़ी प्रचारक हंस ट्रॉब ने फ़िल्म को ‘प्रचार का एक दुर्जेय साधन’ बताया. उन्होंने कहा कि प्रचारात्मक प्रभाव प्राप्त करने के लिए हमेशा ‘एक ऐसी ‘भाषा’ की आवश्यकता होती है जो एक सरल कथा के साथ एक यादगार और भावुक कथानक का निर्माण करे.’

प्रचार का सबसे प्रभावी माध्यम चलचित्र है. ‘इसके लिए निरंतर सतर्कता की आवश्यकता होती है; यह समय, स्थान और क्रिया के परिवर्तन से संबंधित आश्चर्यों से भरा होता है; इसमें भावनाओं को तीव्र या मद्धम करने के लिए लय की अकल्पनीय अनविति होती है.’ गोएबल्स का मानना था कि प्रभावी प्रचार के लिए सिनेमा को मनोरंजक और आकर्षक होना चाहिए.

नाज़ी फ़िल्में न केवल कट्टर यहूदी-विरोधी थीं. उन्होंने विचारधारा के अन्य पहलुओं को भी बढ़ावा दिया. उदाहरण के लिए, हिटलर ने स्वयं ऐसी फ़िल्मों को बढ़ावा दिया जिनमें विकलांग लोगों को सरकारी ख़जाने पर बोझ बताया गया तथा उनकी जबरन नसबंदी का समर्थन किया गया.

लोकप्रिय सिनेमा के माध्यम से प्रचार का प्रभाव बड़े थिएटरों को राज्य द्वारा दिए गए समर्थन से और भी बढ़ गया. नाज़ी विचारकों का मानना था कि दर्शक अधिक संख्या में एक साथ फ़िल्में देखेंगे तो उनकी व्यक्तिगत आलोचनात्मक क्षमताएं कमज़ोर हो जाएंगी. वे फ़िल्मों को ग्रामीण इलाक़ों में भी ले गए, और यहाँ तक कि गाँव की सराय में भी उनके शो आयोजित किए. सिनेमा सरकार के लिए इतने महत्वपूर्ण थे कि 1944 में जब विश्व युद्ध के प्रभाव में स्कूल और नाट्यशालाएं बंद हो गईं, तब भी युद्ध के अंत तक केवल सिनेमाघर ही चलते रहे, कभी-कभी तो विमान-रोधी इकाइयों द्वारा भी उनकी सुरक्षा की जाती थी.

नाज़ी जर्मनी की हार के बाद से बीते कई दशकों में, तकनीक, पहुंच और सिनेमा की दिलों-दिमाग पर असर डालने की शक्ति, सभी कई गुना बढ़ गई है. इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि लोकतांत्रिक आवरण ओढ़े हुए भी, मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने अपनी वैचारिक विश्वदृष्टि को फैलाने के लिए सिनेमा का इस्तेमाल किया है, जिसमें भारतीय मुसलमानों और उनसे असहमति रखने वाले वाम-उदारवादी लोगों का दानवीकरण भी शामिल है.

भाजपा हिंदुत्व की विचारधारा से प्रेरित है, और वरिष्ठ हिंदुत्व विचारक एडॉल्फ़ हिटलर तथा यहूदियों के प्रति उसकी नीतियों के प्रशंसक थे. हिंदुत्व सिनेमा को बढ़ावा देने में, भाजपा-आरएसएस ने हिटलर के जर्मनी जैसी ही एक प्लेलिस्ट अपनाई, हालांकि इसे आधुनिक समय और लोकतंत्र के दिखावे के लिए अनुकूल बनाया गया था.

नाज़ी सिनेमा और यहूदी

नाज़ी सिनेमा ने यहूदियों के साथ जो किया, उसी तरह हमने देखा है कि कैसे वैचारिक रूप से प्रेरित हिंदुत्व फ़िल्में इतिहास और समकालीन घटनाओं को तोड़-मरोड़कर मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह और कभी-कभी हिंसक नफ़रत को बढ़ावा देती हैं. ये फ़िल्में राजनीतिक विपक्ष, वामपंथियों, राजनीतिक और नागरिक कार्यकर्ताओं तथा शिक्षाविदों को नीचा दिखाती हैं, यहाँ तक कि उन्हें शैतान भी बनाती हैं.

ये सभी फ़िल्में सीधे और स्पष्ट रूप से मुसलमानों को निशाना बनाकर धार्मिक हिंसा का कारण नहीं बनतीं. लेकिन इनमें से हर एक फ़िल्म मध्यमार्गी और वामपंथी राजनीति, मीडिया, शिक्षा जगत और नागरिक कार्रवाई के प्रति अविश्वास को बढ़ावा देती है और लाखों दिलों और दिमागों में मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह तथा नफ़रत को और पुख़्ता करती है, जिन्हें ‘अन्य’ माना जाता है और जिन्हें भीतरी तौर पर एक हिंसक और विश्वासघाती दुश्मन माना जाता है.

इन तरीक़ों से, हिंदुत्व सिनेमा स्वतंत्र भारत राष्ट्र की सभ्यतागत और संवैधानिक आत्मा को नष्ट करने की हिंदुत्व परियोजना का केंद्र है.

(शोध सहयोग के लिए ओमैर ख़ेन का आभार.)

(लेखक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.)

(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों कीकोलिकानामक संस्था से जुड़े हैं.)