गढ़चिरौली में ‘सिमटता माओवाद, बढ़ती जाती माइनिंग’ के शीर्षक से द वायर हिंदी की ख़बर के प्रकाशित होने के ठीक अगले दिन, यानी 22 जुलाई को, अख़बारों के पहले पन्ने पर लॉयड कंपनी ने एक पूरे पन्ने का विज्ञापन दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की मुस्कराती हुई तस्वीरों के साथ प्रकाशित यह विज्ञापन गढ़चिरौली जिले में लॉयड कंपनी की बड़ी परियोजनाओं का फडणवीस के हाथों उद्घाटन का उल्लेख करता था.

इस विज्ञापन का संदेश साफ था – गढ़चिरौली ज़िले को भारत के स्टील सिटी में बदलना है. लेकिन किस कीमत पर? आख़िर इसे कौन चुका रहा है?
हमने अपनी पिछली ख़बर में माओवादियों के बाद उभरते दंडकारण्य के बदलते चेहरे को गढ़चिरौली के माध्यम से दिखाया था. जैसे-जैसे माओवादी आंदोलन सिमटता जा रहा है, आदिवासी इलाकों में माइनिंग कंपनियां आ रही हैं. यह क़िस्त इस प्रक्रिया के पर्यावरण और सामाजिक जीवन पर पड़ते प्रभाव की पड़ताल करती है.
पर्यावरण को हो रहा है भारी नुकसान
स्थानीय आदिवासी कार्यकर्ता लालसू सोमा नोगोटी बताते हैं कि खदान के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और पहाड़ों में खनन से पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है. खनन से निकलने वाले गंदे लाल पानी और गंदी धूल से हवा और पानी बुरी तरह प्रदूषित हो रहे हैं.
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री फडणवीस ने बीते 22 जुलाई को गढ़चिरौली में ‘हरित महाराष्ट्र, समृद्ध महाराष्ट्र’ अभियान के तहत 1 करोड़ पेड़ लगाने की मुहिम की शुरुआत की. इस मौके पर उन्होंने कहा कि पूरे महाराष्ट्र में इस वर्ष 11 करोड़ वृक्षों का रोपण होगा, और अगले वर्ष 25 करोड़ पौधे लगाएंगे. उन्होंने यह भी दावा किया कि 2014 से 2021 तक 50 करोड़ पेड़ लगाए गए थे.
मुख्यमंत्री के दावे पर सवाल उठाते हुए लालसू नोगोटी ने कहा कि यह लोगों को गुमराह करने का एक हथकंडा है, ताकि वे पेड़ों की कटाई का विरोध न करें.

उन्होंने कहा, ‘यहां के जंगलों और पहाड़ों को उजाड़कर पेड़ लगाने का उनका दावा करना हास्यस्पद है. सरकार चाहे कितने भी पेड़ लगा ले प्राकृतिक जंगलों की भरपाई कभी नहीं कर पाएगी. प्राकृतिक जंगलों में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे और वनस्पतियां होती हैं, कई तरह के जीव-जंतु रहते हैं, जिन पर निर्भर होकर वहां के आदिवासी समुदाय जी रहे हैं. तेंदुपत्ता, बांस और अन्य वनोपज यहां के आदिवासियों की आय का मुख्य स्रोत हैं. क्या इन पेड़ों से इसकी भरपाई हो पाएगी?’
लालसू ने कहा, ‘चार-पांच सौ साल पुराने बड़े-बड़े पेड़ों को काटकर शहरी प्रजाति के पेड़ों को लगाना यहां के लोगों के साथ मजाक के अलावा कुछ नहीं है.’
लालसू बताते हैं कि खनन की वजह से आदिवासियों की आजीविका बुरी तरह से प्रभावित हो रही है. उनके खेत खदान से निकलने वाली मिट्टी से पटकर बेकार हो रहे हैं. उसमें अब फसल मुश्किल से उगती है.

उन्होंने मलमपाड़ी गांव का उदाहरण दिया. सुरजागढ़ पहाड़ी से बहकर उस गांव में एक छोटा-सा झरना आता है, लोग पहले वहां का पानी पीते थे, नहाते थे और मछली, केकड़े आदि पकड़ा करते थे. अब खदान से निकलने वाले प्रदूषित लाल पानी की वजह से उस झरने के मछली, केकड़े, मेंढक, सांप आदि गायब हो चुके हैं.
उन्होंने कहा कि जंगल के कई सारे कंद-मूल और वनस्पतियां भी लुप्त हो रहे हैं.
पोट्टेगांव के आदिवासी विकास परिषद के कार्यकर्ता विनोद मंडावी भी सहमत हैं कि खनन से जीवन प्रभावित हो रहा है. वे बताते हैं, ‘आस्टी, आलापल्ली और सुरजागढ़ हाईवे को माइनिंग कंपनियों ने पूरी तरह कब्जा कर रखा है. प्रतिदिन ढेरों ट्रक उस हाईवे से गुजरते हैं. स्कूली बच्चों को सड़क पार करना मुश्किल हो जाता है.’
सुरजागढ़ पहाड़ का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
स्थानीय आदिवासी सुरजागढ़ में खदान खोलने को लेकर शुरू से नाराज़ हैं. यहां चार पर्वत श्रृंखलाएं हैं. इन पहाड़ों को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है. यह क्षेत्र आदिवासियों और अन्य समुदायों का पूजा स्थल भी है. यहां हर जनवरी में बड़े पैमाने पर आदिवासी इकट्ठा होते हैं और पारंपारिक अनुष्ठान करते हैं.
इस इलाके में अधिकतर माड़िया जनजाति के लोग रहते हैं, जिन्हें सरकार ने विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) में वर्गीकृत किया है.
लालसू, जो खुद भी माड़िया समुदाय से हैं, ने बताया, ‘उस पहाड़ी में जो देवता निवास करते हैं उन्हें यहां के माड़िया आदिवासी ‘ओग्दाल पेन’ कहते हैं. लेकिन अब बाहरी लोग उसका नाम ‘ठाकुर देव’ बना दिया है.

सुरजागढ़ पहाड़ी के आसपास कुल 75 गांव हैं, जिसे सुरजागढ़ पट्टी कहा जाता है. इस पहाड़ी का असली आदिवासी नाम ‘ओग्दालगढ़’ था. जिस तरह बाकी इलाकों में आदिवासियों के चिन्हों, जगहों, नदियों आदि का नाम बदला जा रहा है, वैसे ही इसका नाम भी बदल दिया गया है.
विनोद मंडावी यह सवाल भी उठाते हैं, ‘जब देश के अन्य धार्मिक स्थानों पर पूजा स्थल अधिनियम लागू होता है तो आदिवासियों के पूजा स्थलों पर यह क्यों लागू नहीं होता? देश के अन्य हिस्सों में भी कई जगहों पर देखा गया है कि आदिवासियों के पूजा स्थलों पर धड़ल्ले से माइनिंग का काम किया जा रहा है.’
साल 2019 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले के बैलाडीला क्षेत्र में नंदराज पहाड़ में खनन किए जाने का बड़े पैमाने पर आदिवासियों ने विरोध किया था. आदिवासियों की मान्यता है कि इस पहाड़ी में उनके इष्ट देवता विराजमान हैं. ओड़िशा के कोरापुट जिले में सिजीमाली पहाड़ में आदिवासी अपने पूजा स्थल को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. नियमगिरी पहाड़ का भी यही किस्सा है.
अंग्रेजों के खिलाफ़ बगावत का इतिहास
सुरजागढ़ अंग्रेजों के खिलाफ़ बगावत करने वाले अहेरी के आदिवासी जमींदार बाबूराव शेडमाके का शरण स्थल भी था, ऐसा बताया जाता है. इस पहाड़ पर सुरजागढ़ क़िला है. माना जाता है कि इसे बाबूराव शेडमाके ने बनवाया था. 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासियों के विद्रोह का नेतृत्व बाबूराव शेडमाके ने किया था. उन्होंने अपनी सेना को ब्रिटिश सेना से सुरक्षित रखने और छिपने के लिए किले का इस्तेमाल किया था.
लालसू बताते हैं कि सुरजागढ़ पहाड़ों में आज भी अंग्रेजों के साथ हुए संघर्ष की कई निशानियां है – तलवार, भाले, खंजर, ढाल. आदिवासी उन्हें भी पूजते हैं.
आदिवासी युवतियों और महिलाओं का यौन शोषण
स्थानीय लोग बताते हैं कि खदान खुलने के बाद इस इलाके की आदिवासियों युवतियों के साथ यौन शोषण की घटनाएं बढ़ रही हैं. खदानों में काम करने के लिए बड़े पैमाने पर बाहर से लोग आते हैं. यहां की महिलाएं उनके घरों में बर्तन, झाडू-पोंछा जैसे काम करने के लिए जाती हैं, और उनका यौन शोषण होता है.
उन्होंने बताया कि बांडे गांव की एक 8-9वीं क्लास में पढ़ने वाली आदिवासी लड़की को हेडरी गांव में एक दंपत्ति ने अपने बच्चे का ख्याल रखने के लिए रखा था. उस लड़की का कंपनी के किसी व्यक्ति ने यौन शोषण किया, वह गर्भवती हो गई. बाद में उस लड़की के परिजनों को कुछ पैसे देकर मामले को रफा-दफा करा दिया गया. लड़की का गर्भपात करा दिया गया.
उन्होंने ये भी बताया कि धीरे-धीरे इलाके में वेश्यावृत्ति भी पनपने लगी है. आदिवासी महिलाओं को वेश्यावृत्ति की ओर धकेला जा रहा है, जो यहां के समाज में कभी नहीं रही.
खदान से रोजागर के दावे कितना सच?
स्थानीय लोगों का कहना है कि सुरजागढ़ खदान के जरिए इलाके में स्थानीय लोगों को रोजगार देने के दावे भी झूठे साबित हो रहे हैं.
मोहगांव के ग्रामसभा के अध्यक्ष देवसाय आतला कहते हैं, ‘हम आदिवासी जंगल-पहाड़ों से जुड़े हुए लोग हैं. रोजगार देने के बहाने हमारे जंगलों को उजाड़कर खदान खोला जा रहा है. लेकिन कुछ छोटे-मोटे कामों को छोड़कर स्थानीय आदिवासियों को कोई खास रोजगार नहीं मिल रहा है.’
उन्होंने कहा, ‘लॉयड कंपनी ने कहा था कि माइनिंग शुरू होने के बाद हर परिवार से एक व्यक्ति को नियुक्त किया जाएगा. लेकिन जो काम दिया वह सिक्योरिटी गार्ड जैसी छिटपुट नौकरियां ही हैं.’
लालसू नोगोटी कहते हैं, ‘रोजगार के नाम पर यहां के लोगों को सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिल रही है. उन्हें सड़कों पर मवेशी या पालतू जानवरों को भगाने का काम दिया जा रहा है ताकि ट्रकों में माल ढुलाई का काम बाधित न हो. लौह अस्यस्क ले जाने के रास्ते में पड़ने वाले प्रत्येक गांव में तीन-चार लोगों को तैनात किया गया है.’
विनोद ने कहा, ‘इन गार्डों को महीने में 8,000-9,000 रुपये वेतन दिया जाता है. यानी प्रतिदिन 200-300 रुपये, जो श्रम कानूनों का खुला उल्लंघन है.’
लालसू कहते हैं, ‘यहां के आदिवासी कम पढ़े-लिखे हैं. बड़े पदों के लिए बाहर से लोगों को लाया जाता है. यहां स्थानीय लोगों को रसोई, चाय बांटने या साफ-सफाई, टॉयलेट सफाई जैसे छोटे-मोटे कामों में रखा जाता है. ये कैसे रोजगार हुआ?’
उन्होंने सवाल किया, ‘ऐसे काम दे भी रहे हैं तो कितने लोगों को मिल रहा है? जंगल से बच्चे से लेकर बूढ़ों तक सबको कोई न कोई रोजगार मिलता है. लोग तेंदुपत्ता इकट्टा करते थे, बांस कटाई करते थे. वनोपज इकट्टा करते थे. कोई खेत जोतता है, तो कोई जंगल से लकड़ियां या अन्य चीज़ इकट्ठा करके लाता है, तो कोई फसलों की रखवाली करता है, तो कोई मवेशियों को चराने जाता है. खदान परिवार में कितने लोगों को काम देगा? अगर एक व्यक्ति को कोई छोटा-मोटा काम दे भी देगा, बाकी लोग क्या करेंगे और क्या खाएंगे?’

लालसू ने बताया कि कंपनी दावा कर रही है कि आदिवासी बच्चों को खदान में रोजगार देने के लिए पढ़ाई के लिए विदेशों में भेजेगी. कंपनी 12वीं पास करने के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए ऑस्ट्रेलिया भेजने का प्रचार करते हुए विज्ञापन भी दे रही है. लेकिन शर्त यह है कि बच्चों को अच्छी अंग्रेजी आनी चाहिए. यहां आदिवासी बच्चे जो सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं, जिन्हें मराठी सीखने में ही पापड़ बेलने पड़ते हैं (क्योंकि स्कूली पढ़ाई उनकी मातृभाषा गोंडी में नहीं, बल्कि मराठी मीडियम में होती है), उन्हें अंग्रेजी कहां से आएगी?
लालसू ने बताया कि उनके रिश्तेदार की एक बेटी ने ऑस्ट्रेलिया जाने के लिए आवेदन दिया था. जब उनका टेस्ट हुआ, वह अंग्रेजी में फेल हो गई.
विनोद मंडावी बताते हैं कि लॉयड कंपनी ने इलाके के लोगों से कहा था कि अगर वे ट्रक ले लेते हैं तो ट्रांसपोर्ट का काम दिया जाएगा. लेकिन ट्रक खरीदने के लिए आदिवासियों के पास पैसा कहां से होगा?
उन्होंने कहा, ‘इलाके के कुछ लोगों ने अपनी जमीनें, सोना-चांदी, सब बेचकर ट्रक खरीदे. लेकिन उनकी भी स्थिति बहुत खराब है. माल (लौह अयस्क) भरवाने के लिए लंबी लाइनें लगी रहती हैं, उनको ट्रक का ईएमआई भरना भी मुश्किल हो रहा है.’
द वायर हिंदी ने इस पूरे मसले पर, भूमि अधिग्रहण, रोजगार से लेकर आदिवासियों के सरोकारों पर लॉयड कंपनी के अधिकारियों और ज़िला प्रशासन से संपर्क करने की कोशिश की, उन्हें विस्तृत सवाल मेल किए लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं आया है.
