नई दिल्ली: देश में इस बात को लेकर विवाद जारी है कि चाहे कितनी भी अच्छी मंशा क्यों न हो, स्कूलों को धार्मिक शिक्षा का केंद्र नहीं बनाया जाना चाहिए, लेकिन ‘भारत का आदर्श राज्य’ गुजरात कक्षा 9 से 12 की भाषा की पाठ्यपुस्तकों में भगवद् गीता को अनिवार्य रूप से शामिल करने के लिए पूरी तरह तैयार है.
गुजरात सरकार का मानना है कि गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है; यह नैतिक जीवन जीने की एक मार्गदर्शिका है. स्कूली पाठ्यक्रम में भगवद् गीता को शामिल करने से छात्रों में नैतिकता और नैतिक मूल्य बढ़ेंगे.
वाइब्स ऑफ इंडिया के अनुसार, यह निर्णय राज्य द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के कार्यान्वयन का एक हिस्सा है.
गुजरात में कक्षा 9 से 12 तक की गुजराती, हिंदी, अंग्रेज़ी और उर्दू की भाषा की पाठ्यपुस्तकों में भगवद्गीता के मूल्य-आधारित अध्याय जोड़े जा रहे है. पिछले शैक्षणिक वर्ष में कक्षा 6-8 के लिए भगवद्गीता पर एक पूरक पाठ्यपुस्तक शुरू की गई थी.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 शिक्षा में आधुनिक और प्राचीन भारतीय संस्कृति, परंपराओं और ज्ञान प्रणालियों को शामिल करने पर जोर देती है.
यह ध्यान देने योग्य है कि भगवद्गीता भारत की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली आध्यात्मिक और धार्मिक पुस्तक है. यह दुनिया की सबसे अधिक मान्यता प्राप्त और सर्वाधिक अनुवाद की गई हिंदू पुस्तक भी है. 17वीं शताब्दी में दारा शिकोह ने इसका फ़ारसी में अनुवाद किया और लगभग सौ साल बाद वॉरेन हेस्टिंग्स ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद करवाया.
इस प्राचीन ग्रंथ के सांस्कृतिक मूल्य और महत्व की सराहना तो की जा सकती है, लेकिन गुजरात सरकार द्वारा इसे कक्षा 6 से 12 तक के सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल करने के फैसले ने लोगों को चौंका दिया है. कुछ लोग इस कदम को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के हिंदुत्व के व्यापक राजनीतिक अभियान से जोड़कर देखते हैं.
लेकिन यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि जब भाजपा शासित गुजरात सरकार ने स्कूलों में भगवद् गीता की शिक्षा को शामिल करने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पेश किया था, तो इस प्रस्ताव का उनके दोनों वर्तमान मुख्य प्रतिद्वंद्वियों- कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) ने समर्थन किया था, जिसके बाद प्रस्ताव को सर्वसम्मति से मंजूरी मिल गई थी.
