नई दिल्ली: वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बुधवार (7 अगस्त) को राज्यसभा को बताया कि सरकारी बैंकों ने पिछले चार वित्तीय वर्षों में 4.48 लाख करोड़ रुपये कर्ज को बट्टे खाते में डाला है.
द ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस खुलासे ने सार्वजनिक बैंकिंग प्रणाली की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक, भारतीय स्टेट बैंक, वित्त वर्ष 2022-25 तक 80,197 करोड़ रुपये बट्टे खाते में डालकर इस सूची में सबसे ऊपर है.
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया 68,557 करोड़ रुपये की राशि के साथ दूसरे स्थान पर है, उसके बाद पंजाब नेशनल बैंक 65,366 करोड़ रुपये और बैंक ऑफ बड़ौदा 55,279 करोड़ रुपये की राशि के साथ तीसरे स्थान पर है. इसी अवधि के दौरान केनरा बैंक ने 47,359 करोड़ रुपये की राशि के बट्टे खाते में डाले, जबकि इंडियन बैंक ने 29,949 करोड़ रुपये के बट्टे खाते में डाले.
कुल मिलाकर 12 बैंकों द्वारा 4.48 लाख करोड़ रुपये की राशि बट्टे खाते में डाली गई.
22 जुलाई को पंकज चौधरी ने 2015-16 से 2024-25 यानी दस वर्षों का आंकड़ा दिया था.
इससे पहले राज्यसभा में पूछे गए एक अन्य प्रश्न के लिखित उत्तर में, वित्त राज्य मंत्री ने बताया था कि मार्च 2021 से मार्च 2025 तक सरकार का सकल एनपीए 9.11% से घटकर 2.58% हो गया है.
22 जुलाई को वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने गत दस वर्षों (2015-16 से 2024-25) के एनपीए की आंकड़ा दिया था. चौधरी ने बताया था कि सरकारी बैंकों ने दस साल में 12 लाख करोड़ रुपये के क़र्ज़ को बट्टे खाते में डाल दिया है.
वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने एक लिखित जवाब में बताया था कि सार्वजनिक बैंकों ने कुल 12,08,828 करोड़ रुपये के कर्ज़ को बट्टे खाते में डाला. आंकड़ों के अनुसार, सिर्फ पिछले पांच वित्त वर्षों (वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 तक) में ही 5.82 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का कर्ज़ बट्टे खाते में डाला गया.
हालांकि, मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि ‘बट्टा खाते में डालना’ एक तकनीकी लेखा प्रक्रिया है और इसका मतलब यह नहीं होता कि उधारकर्ता का कर्ज़ माफ कर दिया गया है.
पंकज चौधरी ने कहा था:
ऐसे बट्टा खाते में डालने से उधारकर्ता की देनदारी समाप्त नहीं होती, इसलिए यह उधारकर्ता को कोई लाभ नहीं देता. उधारकर्ताओं पर कर्ज़ चुकाने की जिम्मेदारी बनी रहती है और बैंक इन खातों में रिकवरी की कार्यवाही करते रहते हैं.
सरकार का कहना है कि यह प्रक्रिया भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के दिशानिर्देशों के अनुरूप है. इसके तहत बैंक उस लोन को बट्टे खाते में डालने की तैयारी पूरी करती है, जिसके आने की संभावना खत्म हो गई होती है. ऐसे लोन को आमतौर पर चार वर्षों के बाद बैलेंस शीट से हटा दिया जाता है.
यह भी बताया गया है कि रिकवरी की प्रक्रिया ‘सिक्योरिटाइज़ेशन एंड रिकंस्ट्रक्शन ऑफ फाइनेंशियल असेट्स एंड इन्फोर्समेंट ऑफ सिक्योरिटी इंटरेस्ट एक्ट’ और दिवालिया कानून (इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्ट्सी कोड, 2016) जैसे प्रावधानों के तहत चलाई जा रही है.
हालांकि, सरकार ने बट्टे खाते में डालने के बाद हुई वसूली पर कोई अपडेटेट जानकारी नहीं दी है.
