असम सीएम ने ग़ैर-मुस्लिमों के ख़िलाफ़ फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल्स के केस हटाने के निर्देश का खंडन किया

असम सरकार ने पिछले हफ्ते सीएए का हवाला देते हुए ज़िला अधिकारियों और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल्स के सदस्यों से अनुरोध किया था कि वे 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले राज्य में प्रवेश करने वाले ग़ैर-मुस्लिम समुदायों के ख़िलाफ़ मामले वापस लें. अब सीएम हिमंता बिस्वा शर्मा ने कहा कि उन्हें इस संबंध में कोई विशेष निर्णय लेने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि सीएए निर्दिष्ट समुदायों को पहले से ही सुरक्षा देता है.

हिमंता बिस्वा शर्मा. (फोटो साभार: X/@himantabiswa)

नई दिल्ली: पिछले हफ्ते असम सरकार नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) का हवाला देते हुए जिला अधिकारियों और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल्स (एफटी अथवा विदेशी न्यायाधिकरण) के सदस्यों से अनुरोध किया था कि वे 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले राज्य में प्रवेश करने वाले छह समुदायों – हिंदू, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी – के सदस्यों के खिलाफ मामले वापस लें.

अब मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने ऐसे फैसले से इनकार करते हुए गुरुवार को मीडिया में आई इन ख़बरों का खंडन किया.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, गुरुवार देर रात राज्य मंत्रिमंडल की बैठक के बाद पत्रकारों को संबोधित करते हुए इस बारे में पूछे जाने पर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने कहा कि राज्य मंत्रिमंडल को इस संबंध में कोई विशेष निर्णय लेने की ‘कोई आवश्यकता नहीं’ है क्योंकि सीएए के तहत निर्दिष्ट समुदायों को पहले से ही सुरक्षा प्रदान की गई है.

उन्होंने कहा, ‘राज्य सरकार ने सीएए में पहले से मौजूद निर्देशों के अलावा कोई और निर्देश जारी नहीं किया है. सीएए स्वयं उन लोगों को सुरक्षा प्रदान करता है जो 2014 से पहले भारत में प्रवेश कर चुके हैं. यही कानून है. किसी विशेष कैबिनेट निर्णय की आवश्यकता नहीं है. हमने कोच राजबोंगशी और गोरखा लोगों के लिए दो कैबिनेट निर्णय लिए हैं, और उनके खिलाफ मुकदमे वापस ले लिए गए हैं. इसके अलावा, 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए लोगों को सीएए स्वयं सुरक्षा प्रदान करता है. राज्य सरकार को इस पर कोई नया निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं है.’

उल्लेखनीय है कि राज्य के गृह एवं राजनीतिक विभाग ने 17 जुलाई को एक बैठक की और सीएए के संदर्भ में विदेशी न्यायाधिकरण से संबंधित मुद्दों और मामलों को वापस लेने पर चर्चा की थी. यह बैठक असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा के निर्देश के बाद आयोजित की गई थी.

मालूम हो कि सीएए का उद्देश्य बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान से आए छह अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों (मुसलमानों को छोड़कर) के शरणार्थियों को नागरिकता का प्रदान करना है, बशर्ते कि वे छह साल तक भारत में रहे हों और 31 दिसंबर, 2014 तक देश में प्रवेश कर चुके हों.

इस कानून को दिसंबर 2019 में संसद द्वारा पारित किया गया था. केंद्र सरकार ने मार्च 2024 में अधिनियम के तहत नियमों को अधिसूचित किया.

ज्ञात हो कि असम में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल्स अर्ध-न्यायिक निकाय हैं जो वंश और 1971 की कट-ऑफ तिथि के आधार पर नागरिकता के मामलों पर निर्णय लेते हैं. वे मुख्य रूप से 1971 से पहले असम या भारत में अपने परिवार के निवास को स्थापित करने के लिए व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों पर निर्भर करते हैं.

छात्र संगठन ने विरोध प्रदर्शन किया

इस बीच, ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) ने शुक्रवार को विरोध प्रदर्शन किया और दावा किया है कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार असम समझौते को कमजोर करने की कोशिश कर रही है, जिसमें धर्म की परवाह किए बिना असम में नागरिकता प्राप्त करने के लिए 1971 की समय सीमा निर्धारित की गई है.

छात्र संगठन ने शुक्रवार को जिला मुख्यालयों पर राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन किया और अवैध हिंदू प्रवासियों के खिलाफ नागरिकता संबंधी सभी मामले वापस लेने के असम सरकार के कथित निर्देश का कड़ा विरोध किया.

गुवाहाटी में आसू  की कामरूप महानगर जिला इकाई के सदस्य स्वाहिद न्यास के सामने एकत्र हुए, जहां उन्होंने कथित निर्देश की प्रतियां जलाईं और सरकार विरोधी नारे लगाए.

मीडिया को संबोधित करते हुए आसू अध्यक्ष उत्पल शर्मा ने कहा, ‘असम सरकार ने सभी उपायुक्तों और पुलिस अधीक्षकों को बांग्लादेश से अवैध हिंदू प्रवासियों के खिलाफ नागरिकता से संबंधित मामले वापस लेने के निर्देश जारी किए हैं. ये निर्देश अस्वीकार्य हैं.’

उन्होंने कहा, ‘आसू इस कदम का कड़ा विरोध करता है. विरोध स्वरूप हमने सभी जिला मुख्यालयों पर निर्देश की प्रतियां जलाईं. हम सीएए के खिलाफ अपना रुख दोहराते हैं और मांग करते हैं कि सरकार इस फैसले को वापस ले, जो विदेशी न्यायाधिकरणों में अवैध हिंदू बांग्लादेशियों की प्रभावी रूप से रक्षा करता है.’

उत्पल शर्मा ने असम समझौते के पूर्ण कार्यान्वयन की आसू की लगातार मांग को भी दोहराया.

उन्होंने कहा, ‘केवल वे लोग जो 24 मार्च, 1971 से पहले असम में आए थे – चाहे उनका धर्म कुछ भी हो – भारतीय नागरिकता के पात्र हैं. उसके बाद आए किसी भी व्यक्ति, चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम, की पहचान की जानी चाहिए और उसे निष्कासित किया जाना चाहिए. हमारा हमेशा से यही रुख रहा है.’