बार काउंसिल अपने अध्यक्ष का कार्यकाल दो साल से आगे नहीं बढ़ा सकता: सुप्रीम कोर्ट

बार काउंसिल ऑफ इंडिया अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के दो साल के कार्यकाल को बढ़ाकर पांच साल करने के फैसले को ख़ारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मिश्रा केवल प्रोटेम (अस्थायी) अध्यक्ष हैं और उनकी स्थिति की तुलना लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित पदाधिकारी से नहीं की जा सकती. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बार काउंसिलों के पास क़ानून के छात्रों के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है.

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (2 सितंबर) को कहा कि कोई भी प्रस्ताव बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष के लिए कानून में तय दो साल के कार्यकाल को बदल नहीं सकता. अदालत ने अप्रैल 2025 में बार काउंसिल की ओर से अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा को पांच साल का कार्यकाल देने के लिए पारित प्रस्ताव को खारिज कर दिया.

अदालत का यह आदेश बार काउंसिल के कामकाज और मिश्रा का कार्यकाल बढ़ाने के फैसले की वैधता पर सवाल उठाने वाली दो जनहित याचिकाओं (पीआईएल) के बाद आया है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया कि क्या 20 लाख से अधिक वकीलों को विनियमित करने, कानूनी शिक्षा का संचालन करने, ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन कराने, अनुशासनात्मक मामलों में अधिकार रखने और कानूनी पेशे की स्वतंत्रता की रक्षा करने वाली एक वैधानिक संस्था एक ही व्यक्ति के हाथों में नियामक शक्तियों को लंबे समय तक केंद्रित रहने की अनुमति दे सकती है, खासकर तब जब लगातार कार्यकाल लगभग बिना किसी चुनौती के मिलते रहें.

याचिकाकर्ताओं ने सम्मान समारोहों और सेमिनारों पर किए जाने वाले भारी खर्च का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने आरोप लगाया कि बार काउंसिल ने विभिन्न राज्यों में लॉ कॉलेज खोलने के लिए अपने फंड का दुरुपयोग किया और संस्था के खर्च की जांच की मांग की.

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि मिश्रा का कार्यकाल 2027 से आगे नहीं बढ़ सकता, क्योंकि वह केवल प्रो टेम (अस्थायी) अध्यक्ष हैं और लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित पदाधिकारी नहीं हैं.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जब तक नई परिषद का गठन नहीं हो जाता, तब तक मिश्रा बार काउंसिल के रोजमर्रा के कामकाज में शामिल रह सकते हैं, लेकिन उनकी स्थिति को लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित अध्यक्ष के समान नहीं माना जा सकता.

लाइव लॉ के मुताबिक, जस्टिस बागची ने कहा, ‘आम तौर पर हम रोजमर्रा का कामकाज प्रोटेम अध्यक्ष के जिम्मे छोड़ते हैं. लेकिन जब भी कोई नीतिगत फैसला लिया जाता है, तब अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल जैसे स्थायी सदस्यों को इसमें शामिल करना जरूरी है.’

पीठ ने कहा कि हाल में राज्य बार काउंसिल के चुनाव संपन्न होने के बाद अब नई बार काउंसिल का गठन जल्द होने वाला है. नए निर्वाचित राज्य बार काउंसिल सदस्यों से परामर्श के बाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों द्वारा महिला सदस्यों के सहयोजन की प्रक्रिया दो सप्ताह के भीतर पूरी कर ली जाएगी. इसके बाद राज्य बार काउंसिल की पूरी संरचना की अधिसूचना जारी की जाएगी.

इसके एक सप्ताह बाद राज्य बार काउंसिल बार काउंसिल ऑफ इंडिया के लिए अपने प्रतिनिधि का चुनाव करेंगी. इसके बाद नए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चयन किया जा सकेगा. तब तक वकीलों की नियामक संस्था प्रो टेम व्यवस्था के तहत काम करेगी और नीतिगत फैसले नहीं लेगी.

मिश्रा के बढ़ाए गए कार्यकाल को चुनौती देने वाली ये याचिकाएं नालसार विवाद के बाद दायर की गई थीं. मामला यह था कि मिश्रा ने छात्रों द्वारा सीजेआई सूर्यकांत को उनके दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किए जाने पर आपत्ति जताने के बाद उनके बार में नामांकन से रोकने का निर्देश दिया था. बाद में उनकी इस टिप्पणी को लेकर व्यापक आक्रोश और आलोचना के बाद मिश्रा ने माफी मांग ली थी.

‘नामांकन रद्द करने वाले निर्देश कानूनन गलत’

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया और राज्य बार काउंसिलों के पास कानून के छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है. बार काउंसिलों को कानून के छात्रों पर अनुशासनात्मक नियंत्रण तभी मिलता है, जब वे वकील के रूप में नामांकित हो जाते हैं.

अदालत ने स्पष्ट किया कि छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार केवल उनके संबंधित संस्थान या उस संस्था के नियमों या उपनियमों के तहत निर्धारित प्राधिकरण के पास होता है.

इसी आधार पर अदालत ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष की ओर से 2026 में नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद से ग्रेजुएट होने वाले छात्रों के नामांकन पर रोक लगाने और सीजेआई के खिलाफ छात्रों के अभियान को लेकर छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ जांच की मांग करने वाले निर्देश कानूनन गलत थे.