सफाई कर्मचारी अभियान ने भारत में मैनुअल स्कैवेंजिंग ख़त्म करने के लिए मुहिम शुरू की

सफाई कर्मचारी अभियान ने भारत में सूखे शौचालयों और मैला ढोने की प्रथा को ख़त्म करने का संकल्प लेते हुए 1 सितंबर को मुहिम शुरू की है. संगठन ने आरोप लगाया गया कि संसद में मोदी सरकार के दावों के बावजूद कि यह प्रथा अब ख़त्म हो चुकी है, कई महिला सफ़ाई कर्मचारी अब भी इस काम को करने के लिए मजबूर हैं.

(प्रतीकात्मक फोटो: अर्पिता सिंह और मयंक चावला)

नई दिल्ली: सफाई कर्मचारी अभियान (एसकेए) ने मैला ढोने की प्रथा और सूखे शौचालयों को खत्म करने के लिए एक साल तक चलने वाले ‘INDIA @80’ मुहिम की शुरुआत की है. संगठन ने आरोप लगाया गया कि संसद में मोदी सरकार के दावों के बावजूद कि यह प्रथा अब खत्म हो चुकी है, कई महिला सफ़ाई कर्मचारी अभी भी इस काम को करने के लिए मजबूर हैं.

यह अभियान मंगलवार, 1 सितंबर को दिल्ली में शुरू किया गया. इस मौके पर महिला सफाईकर्मी मौजूद थीं. उनके साथ गैर-सरकारी संगठन के बोर्ड की सदस्य नारायणम्मा और सरोज देवी, जस्टिस मदन लोकुर, जस्टिस सुधांशु धूलिया, जस्टिस अंजना प्रकाश और कई अन्य प्रमुख नागरिक भी उपस्थित थे.

कार्यक्रम में अर्थशास्त्री डॉ. जयति घोष, अतुल सूद, रितिका खेरा और नवशरण, सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर, आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज, निखिल डे और अमृता झोरी, एमकेएसएस के शंकर, लेखिका गीता हरिहरन और प्रबीर पुरकायस्थ, नारीवादी कार्यकर्ता सुनीता धर, प्रोफेसर नंदिनी सुंदर, अभिनेता लोकेश जैन और इंदु प्रकाश भी मौजूद थे.

अभियान की शुरुआत के मौके पर जारी एक बयान में एसकेए के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन ने कहा, ‘जब भारत सरकार संसद में यह दावा कर रही है कि देश में मैला ढोने की प्रथा नहीं है, तब मैला ढोने के काम में लगी महिलाएं राष्ट्रीय राजधानी आईं और बहादुरी से इस झूठ का पर्दाफ़ाश किया. उन्होंने कहा कि मैला ढोने और सूखे शौचालयों की प्रथा अभी भी मौजूद है. उन्होंने सवाल किया, ‘सरकार कैसे कह सकती है कि मैला ढोने की प्रथा नहीं है, जबकि हम अभी भी रोज़ाना सूखे शौचालयों को साफ़ करने के लिए मजबूर हैं? हमें इस छुआछूत और गुलामी से कब आज़ादी मिलेगी?’

एसकेए के सदस्यों ने भारत में सूखे शौचालयों और मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने का संकल्प लिया. उन्होंने मांग की कि सरकार इसे खत्म करने के लिए युद्धस्तर पर राष्ट्रीय प्राथमिकता के साथ काम करे.

इस दौरान भारत के अलग-अलग हिस्सों से आईं सफाईकर्मियों – जिनमें उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश और बिहार से आई महिलाएं भी शामिल थीं – ने अपनी मुश्किलों और संघर्षों को साझा किया. उन्होंने सरकार से मांग की कि उन्हें इस अमानवीय प्रथा से मुक्त कराया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को उन परिस्थितियों का सामना न करना पड़े, जिनसे वे खुद गुजर रही हैं.

सफाई कर्मचारी आंदोलन की बोर्ड सदस्य नारायणम्मा ने बताया कि जब उन्हें इस प्रथा से मुक्ति मिली, तब वह 600 सीटों वाले सूखे शौचालयों की सफाई करती थीं. इसके बाद से उन्होंने अपना जीवन इस प्रथा को खत्म करने के लिए समर्पित कर दिया है.

दीप्ति सुकुमार ने कहा कि बार-बार बनाए गए कानूनों, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और नीतियों के बावजूद यह प्रथा खत्म नहीं हो रही है. उन्होंने कहा कि इसकी जड़ें जाति, पितृसत्ता, छुआछूत और गुलामी में गहराई से जुड़ी हुई हैं.

वहीं, कानूनविद उषा रामनाथन ने मांग की कि सरकार इसे छुआछूत के कृत्य के रूप में देखे. जस्टिस सुधांशु धूलिया ने यह जानकर हैरानी जताई कि भारत के 40 से अधिक जिलों में अब भी मैला ढोने की प्रथा जारी है.

इस बीच, जस्टिस मदन लोकुर ने कहा कि एसकेए और समुदाय के लोग मैला ढोने की प्रथा खत्म करने के लिए लगातार कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. उन्होंने कहा कि संगठन ने इस प्रथा को खत्म करने के लिए बार-बार सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, लेकिन अभी तक कुछ आगे नहीं बढ़ा है. उन्होंने कहा, ‘संसद को झूठ बताया जा रहा है.’

एसकेए के विल्सन ने कहा कि 80 साल बाद भी अगर उन्हें यह साबित करने के लिए दिल्ली आना पड़ रहा है कि मैला ढोने की प्रथा मौजूद है और वे इसका ‘जीता-जागता सबूत’ हैं, तो यह सरकार की जातिवादी मानसिकता को दिखाता है.

उन्होंने कहा कि उन्होंने यह लड़ाई 16 साल की उम्र में शुरू की थी और अब वह 60 साल के हो चुके हैं, लेकिन सूखे शौचालयों में मैला ढोने की प्रथा अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. उन्होंने यह भी कहा कि अदालतें इस मामले में पर्याप्त कदम नहीं उठा रही हैं.

जुलाई में जारी एक रिपोर्ट में एसकेए ने बताया था कि जनवरी 2026 से देशभर में 101 लोगों की मौत हो चुकी है. ये मौतें सीवर और सेप्टिक टैंकों की मैन्युअल सफाई के दौरान हुईं. संगठन ने कहा था कि 2025 में पूरे साल के दौरान ऐसी 121 मौतें दर्ज की गई थीं. यानी स्थिति और खराब होती जा रही है.

एसकेए ने कहा था कि 2013 से अब तक देशभर में 1,726 से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं. संगठन के मुताबिक, सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान औसतन हर 45 घंटे में एक मौत की खबर सामने आती है.

मालूम हो कि देश में पहली बार 1993 में मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया था. इसके बाद 2013 में कानून बनाकर इस पर पूरी तरह से बैन लगाया गया. हालांकि आज भी समाज में मैला ढोने की प्रथा मौजूद है.

मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट 2013 के तहत किसी भी व्यक्ति को सीवर में भेजना पूरी तरह से प्रतिबंधित है. अगर किसी विषम परिस्थिति में सफाईकर्मी को सीवर के अंदर भेजा जाता है तो इसके लिए 27 तरह के नियमों का पालन करना होता है. हालांकि इन नियमों के लगातार उल्लंघन के चलते आए दिन सीवर सफाई के दौरान श्रमिकों की जान जाती है.