उत्तराखंड में ग़ैर-मुस्लिम शैक्षणिक संस्थानों को अल्पसंख्यक का दर्जा देने के लिए क़ानून का प्रस्ताव

उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान विधेयक, 2025 को राज्य मंत्रिमंडल ने आगामी विधानसभा सत्र में पेश करने के लिए मंज़ूरी दी है. इस प्रस्तावित क़ानून के तहत सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी समुदाय भी अल्पसंख्यक मान्यता प्राप्त संस्थान स्थापित करने और चलाने के पात्र होंगे.

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी. (फोटो साभार: X/@pushkardhami)

नई दिल्ली: उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान विधेयक, 2025 को राज्य मंत्रिमंडल ने रविवार को आगामी मानसून विधानसभा सत्र में पेश करने के लिए मंज़ूरी दे दी, जो मंगलवार को ग्रीष्मकालीन राजधानी चमोली ज़िले के गैरसैंण में आयोजित होगा. इस विधेयक का उद्देश्य राज्य के गैर-मुस्लिम शैक्षणिक संस्थानों को भी अल्पसंख्यक का दर्जा प्रदान करना है.

ज्ञात हो कि अब तक शैक्षणिक संस्थानों को अल्पसंख्यक का दर्जा केवल मुस्लिम समुदाय तक ही सीमित था. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल द्वारा पारित इस प्रस्तावित कानून के तहत सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी समुदाय भी अल्पसंख्यक मान्यता प्राप्त संस्थान स्थापित करने और चलाने के पात्र होंगे.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों ने बताया कि यह कानून शिक्षा में गुणवत्ता के मानक सुनिश्चित करते हुए ऐसा दर्जा प्रदान करने के लिए एक पारदर्शी और आधुनिक प्रक्रिया तैयार करने के लिए बनाया गया है.

इस विधेयक में उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के गठन का प्रावधान है, जो आवेदनों पर कार्रवाई करने और मान्यता प्रदान करने के लिए नोडल निकाय के रूप में कार्य करेगा. यह प्राधिकरण उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा बोर्ड द्वारा निर्धारित मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करने और छात्रों के मूल्यांकन में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए संस्थानों की निगरानी के लिए भी ज़िम्मेदार होगा.

राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर अखबार को बताया, ‘एक बार यह लागू होने के बाद उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन जाएगा जो ऐसा कानून लाएगा, जो न केवल अल्पसंख्यक का दर्जा प्रदान करेगा बल्कि अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षणिक उत्कृष्टता, जवाबदेही और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट प्रावधान भी करेगा.’

नए ढांचे के तहत मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन या पारसी समुदायों द्वारा स्थापित सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए मान्यता अनिवार्य होगी. संस्थानों को सोसाइटी अधिनियम, ट्रस्ट अधिनियम या कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत होना आवश्यक होगा और उनकी संपत्तियां और बैंक खाते संस्थान के नाम पर ही होने चाहिए.

इसके साथ ही मंत्रिमंडल के प्रस्ताव में विशेष रूप से उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016 और उत्तराखंड गैर-सरकारी अरबी एवं फ़ारसी मदरसा मान्यता नियम, 2019 को निरस्त करने का प्रावधान है.

गौरतलब है कि ये दोनों अधिनियम 1 जुलाई, 2026 से अमान्य माने जाएंगे, जिसका अर्थ है कि राज्य में मदरसों के लिए कोई अलग शिक्षा बोर्ड या मान्यता नियम प्रभावी नहीं रहेंगे. वर्तमान में उत्तराखंड मदरसा बोर्ड 452 पंजीकृत मदरसों का संचालन करता है.

अधिकारियों के अनुसार, यह कानून उस प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करेगा जिसमें अब तक एकरूपता का अभाव था और इसे एक ही जवाबदेह प्राधिकरण के अधीन लाएगा. यह कानून अल्पसंख्यक संस्थानों की स्वायत्तता की रक्षा करने का प्रयास तो करता है, लेकिन सरकार के पास उनके कामकाज की निगरानी करने और आवश्यकता पड़ने पर निर्देश जारी करने का अधिकार बना रहेगा.

अधिकारी ने आगे कहा, ‘यह विधेयक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित करता है. शिक्षा में पारदर्शिता और गुणवत्ता पर ज़ोर दिया जाएगा, लेकिन अल्पसंख्यक समुदायों के संस्थागत अधिकारों का उल्लंघन किए बिना.’

अधिकारियों ने आगे कहा कि इस विधेयक से न केवल मान्यता प्रक्रिया को मज़बूती मिलेगी, बल्कि अल्पसंख्यक-संचालित संस्थानों में शिक्षा की समग्र गुणवत्ता में भी सुधार होगा, जिससे छात्रों और संबंधित समुदायों, दोनों को लाभ होगा.

सरकार का दावा है कि यह नया कानून समाज के सभी वर्गों को बेहतर अवसर प्रदान करेगा, लेकिन विपक्ष ने इसकी कड़ी आलोचना की है. कांग्रेस की राज्य इकाई के प्रवक्ता आशीष नौटियाल ने इस कदम को राजनीति से प्रेरित बताया.

नौटियाल ने कहा, ‘राज्य में चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, ऐसे में यह स्पष्ट रूप से भाजपा का एक चुनावी हथकंडा है.’ उन्होंने आगे कहा, ‘यह भाजपा की कार्यप्रणाली की विशेषता है; वे तब तक चैन से नहीं बैठते जब तक हिंदू-मुस्लिम तनाव न भड़का दें.’

हालांकि, उत्तराखंड मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष मुफ़्ती शमून कासमी ने कहा, ‘बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी और वे मुख्यधारा में शामिल होंगे. कांग्रेस लंबे समय से तुष्टिकरण की राजनीति करती रही है, लेकिन यह नया बदलाव बेहतर स्कूली शिक्षा सुनिश्चित करता है. मुख्यमंत्री का यह समावेशी कदम सभी वर्गों के बच्चों के कल्याण को सुनिश्चित करेगा.’