नई दिल्ली: प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और इंडियन वुमेन प्रेस कॉर्प्स ने द वायर और उसके पत्रकारों के खिलाफ असम पुलिस द्वारा की गई प्रतिशोधात्मक कार्रवाई पर निराशा व्यक्त की है. असम पुलिस ने दो महीने में दूसरी बार इस मीडिया संस्थान के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 लागू की है.
ज्ञात हो कि 12 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने नए राजद्रोह कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली द वायर की याचिका पर नोटिस जारी किया था और जुलाई में मोरीगांव में दर्ज एक मामले में द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन सहित उसके पत्रकारों को असम पुलिस द्वारा किसी भी ‘दंडात्मक कार्रवाई’ से सुरक्षा प्रदान की थी.
उसी दिन गुवाहाटी अपराध शाखा ने राज्य पुलिस द्वारा दर्ज एक नई एफआईआर में वरदराजन और वरिष्ठ पत्रकार करण थापर को समन जारी किया था. इस एफआईआर में ‘राजद्रोह’ का आरोप शामिल कर लिया गया था.
द वायर को इसका कोई विवरण नहीं दिया गया.
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और इंडियन वुमेन प्रेस कॉर्प्स ने अपने बयान में कहा है, ‘यह उल्लेखनीय है कि समन 12 अगस्त, 2025 को जारी किए गए थे, जबकि जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने वरदराजन और द वायर के सभी पत्रकारों को असम पुलिस द्वारा 11 जुलाई, 2025 को मोरीगांव में धारा 152 और बीएनएस के अन्य प्रावधानों के तहत दर्ज की गई एफआईआर (0181/2025) में किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान की थी.’
उन्होंने आगे कहा, ‘अब, असम पुलिस ने बिना कोई कारण बताए एक और एफआईआर दर्ज की है और वरदराजन व थापर को 22 अगस्त को गुवाहाटी में अपराध शाखा के जांच अधिकारी के सामने पेश होने को कहा है – ऐसा न करने पर गिरफ्तारी की धमकी दी है.’
यह बयान आगे कहता है, ‘गौरतलब है कि मई 2022 में सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए के तहत राजद्रोह की कार्यवाही और आपराधिक मुकदमों को स्थगित करने का आदेश दिया था. बीएनएस की धारा 152, धारा 124ए का ही नया रूप है. पिछले हफ़्ते अपनी रिट याचिका में द वायर ने भी बीएनएस की धारा 152 की वैधता को चुनौती दी है और सर्वोच्च न्यायालय ने असम सरकार व अन्य को नोटिस जारी किया है.’
इस बयान पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के अध्यक्ष गौतम लाहिड़ी, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के महासचिव नीरज ठाकुर, भारतीय महिला प्रेस कोर की अध्यक्ष सुजाता राघवन और भारतीय महिला प्रेस कोर की सचिव अदिति बहल के हस्ताक्षर हैं.
वे लिखते हैं, ‘हम पिछले हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट द्वारा द वायर और वरदराजन को दी गई राहत का स्वागत करते हैं, लेकिन उनके और करण थापर के ख़िलाफ़ एक नया मामला दर्ज होने से यह स्पष्ट हो जाता है कि धारा 152 भारत में मीडिया को निशाना बनाने का एक हथियार बन गई है.’
इसमें कहा गया है, ‘हस्ताक्षरकर्ता मीडिया संगठन द वायर के पत्रकारों के खिलाफ दर्ज इन मामलों को तुरंत वापस लेने की मांग करते हैं, साथ ही बीएनएस की कठोर धारा 152 को भी वापस लेने की मांग करते हैं, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)ए में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरा है. जैसा कि असम पुलिस की कार्रवाइयों से देखा जा सकता है, बीएनएस की धारा 152 का इस्तेमाल प्रेस को चुप कराने के लिए हथियार के तौर पर किया गया है.’
