नई दिल्ली: असम पुलिस द्वारा द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदजन और सलाहकार संपादक करण थापर को तलब करने के लिए इस्तेमाल की गई एफआईआर को कई दिनों की कोशिशों के बाद आखिरकार बुधवार (20 अगस्त) को असम पुलिस की वेबसाइट से प्राप्त कर लिया गया है.
द वायर को 9 मई, 2025 को दर्ज असम पुलिस की एफआईआर संख्या 3/2025, पीएस क्राइम ब्रांच, गुवाहाटी की एक प्रति मिली है, जिसमें सिद्धार्थ वरदराजन और करण थापर के साथ कई अन्य महत्वपूर्ण लोगों के नाम भी शामिल है.
इस एफआईआर में नामजद लोगों में जम्मू-कश्मीर और मेघालय के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक भी शामिल हैं, जिनका इस महीने की शुरुआत में निधन हो गया था. इसके साथ ही पत्रकार और पाकिस्तान में पंजाब के पूर्व कार्यवाहक मुख्यमंत्री नजम सेठी और द वायर हिंदी के संपादक आशुतोष भारद्वाज भी इस एफआईआर में नामजद हैं.
इसके अलावा एफआईआर में पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद द वायर द्वारा प्रकाशित 12 लेखों के पूर्ण या आंशिक शीर्षकों को सूचीबद्ध किया गया है, जिनमें निम्नलिखित लेखक या साक्षात्कार विषय (एफआईआर में नामित नहीं) शामिल हैं: द ट्रिब्यून के पूर्व संपादक हरीश खरे, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के वरिष्ठ फेलो मनोज जोशी, पूर्व खुफिया ब्यूरो अधिकारी अविनाश मोहनाने, रॉ के पूर्व प्रमुख एएस दुलत, कर्नल (सेवानिवृत्त) अजय शुक्ला, सीमा सुरक्षा बल के पूर्व एडीजी एसके सूद, वरिष्ठ पत्रकार आनंद सहाय, शिक्षाविद् रोहित कुमार, रक्षा मामलों के वरिष्ठ पत्रकार राहुल बेदी, शोधकर्ता निर्मण्य चौहान और पूर्व भारतीय सेना अधिकारी अली अहमद.
इस संबंध में जब सिद्धार्थ वरदराजन और करण थापर को ‘समन’ किया गया, तो उन्हें एफआईआर की प्रति, उसकी तारीख या उसके विषय-वस्तु तक की कोई जानकारी नहीं दी गई. उक्त एफआईआर पाने के लिए जांच अधिकारी (आईओ) से आवेदन करने पर उन्होंने गुवाहाटी में द वायर के प्रतिनिधि को निर्देश दिया कि वह या तो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) कोर्ट से इसकी प्रति प्राप्त करें या फिर डिप्टी कमिश्नर से इसकी मांग करें.
इस मामले में द वायर और करण थापर द्वारा डिप्टी कमिश्नर को एक ईमेल पहले ही भेजा जा चुका था. चूंकि स्पीड पोस्ट सेवाओं में देशव्यापी व्यवधान है, उनके सर्वर ठप हैं और सेवाएं अत्यधिक विलंबित हैं, सिद्धार्थ वरदराजन और करण थापर ने सुनिश्चित किया कि इस समन का उनका जवाब वॉट्सऐप पर आईओ को भेजा जाए, ईमेल द्वारा पुलिस उपायुक्त को भेजा जाए, और जवाब की एक प्रति एक स्थानीय वकील के माध्यम से सौंपी जाए.
द वायर ने 16 अगस्त (शनिवार), 18 अगस्त (सोमवार) और 19 अगस्त (मंगलवार) को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत से एफआईआर हासिल करने की कोशिश की गई, लेकिन सभी प्रयास असफल रहे. आखिरकार, 20 अगस्त को दोपहर के आसपास असम पुलिस की वेबसाइट पर वायर को एफआईआर की एक प्रति उपलब्ध हुई.
इस मामले को लेकर पत्रकारों, जनवादी लोगों और समाचार पत्रों के संपादकीय सहित, अन्य संगठनों ने एफआईआर के दर्ज होने और पत्रकारों को परेशान करने के लिए समन जारी करने के तरीके और एफआईआर का खुलासा न करने की व्यापक आलोचना की है.
ज्ञात हो कि 14 अगस्त, 2025 की शाम को क्राइम ब्रांच, पानबाजार, गुवाहाटी से वरदराजन को पहली बार समन की एक प्रति मिली थी, जिसके बाद से द वायर ने एफआईआर की एक प्रति प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए हैं:
- 14 अगस्त की पूरी शाम और उसके बाद हर दिन असम पुलिस की वेबसाइट चेक की गई.
- जांच अधिकारी, अपराध शाखा पानबाजार को उनके बताए गए मोबाइल नंबर पर वॉट्सऐप संदेश भेजकर 15 अगस्त को भेजी गई एफआईआर की प्रति मांगी गई;
- 16 अगस्त को स्पीड पोस्ट भेजा गया (15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के कारण अवकाश था). भारतीय डाक विभाग में देशव्यापी देरी के कारण यह सेवा बाधित रही;
- असम के एक स्थानीय वकील द्वारा 16 अगस्त और 18 अगस्त को स्थानीय मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) न्यायालय से एफआईआर की प्रति प्राप्त करने की कोशिश की गई, जो प्रयास असफल रहा.
- हालांकि, द वायर ने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया, लेकिन विभिन्न संवाददाताओं द्वारा जांच अधिकारी से एफआईआर की प्रति प्राप्त करने के प्रयासों की सूचना मिली है, जिन्होंने कहा कि केवल डीसीपी ही इसे दे सकते हैं.
- 17 अगस्त (रविवार) की रात असम प्रेस के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा प्रयास किए गए- एनई नाउ के संपादक मानस डेका को फोन पर बताया गया कि केवल डीसीपी ही एफआईआर दे सकते हैं.
- क्रॉसकरंट और डेली टाइम के पत्रकार बार-बार प्रयास करने के बावजूद जांच अधिकारी से संपर्क नहीं कर पाए. एक राष्ट्रीय समाचार एजेंसी ने डीसीपी क्राइम से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन संपर्क नहीं हो सका.
- 18 अगस्त की मध्यरात्रि को द वायर द्वारा डीसीपी को एक ईमेल भेजा गया;
- 19 अगस्त को द वायर के स्थानीय गुवाहाटी वकील ने जांच अधिकारी, सौमरज्योति रे से मुलाकात की और ईमेल, वॉट्सऐप और स्पीड पोस्ट पर पहले भेजे गए जवाब की एक प्रति रिकॉर्ड पर रखी और एफआईआर की एक प्रति मांगी.
- उन्हें सीजेएम कोर्ट कामरूप (मेट्रो) गुवाहाटी में आवेदन करने के लिए कहा गया.
- जांच अधिकारी से मिलने के बाद सीजेएम कोर्ट कामरूप (मेट्रो) गुवाहाटी से एफआईआर की प्रति प्राप्त करने के लिए एक बार फिर कोशिश की गई.
- द वायर के स्थानीय वकील ने 19 अगस्त को सीजेएम कोर्ट में एफआईआर प्रति के लिए आवेदन किया.
- विभिन्न प्रेस संगठनों ने इस कृत्य और एफआईआर को सार्वजनिक न करने के अस्पष्ट तरीके की कड़ी निंदा की.
- 19 अगस्त की दोपहर – द वायर द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में एक आवेदन दायर किया गया, जिसमें अपराध शाखा द्वारा समन जारी करने और एफआईआर न देने की बात न्यायालय के संज्ञान में लाई गई. असम पुलिस के वकील को ये आवेदन भेजा गया.
- द वायर की ओर से असम पुलिस की वेबसाइट पर गहन खोज करने पर कुछ परिणाम मिले. एफआईआर संख्या 3/2025 की प्रविष्टि से पता चला कि यह 9 मई, 2025 को दर्ज की गई थी, लेकिन इसकी सामग्री को डाउनलोड करना असंभव था.
- 20 अगस्त, सुबह 11:30 से दोपहर 12 बजे तक: जब 9 मई को दर्ज की गई एफआईआर की प्रविष्टि की प्रति प्रिंट करने का एक और प्रयास किया गया, तो एफआईआर की सामग्री सामने आई और एफआईआर डाउनलोड की गई. असम पुलिस की वेबसाइट पर अब लिंक के माध्यम से एफआईआर उपलब्ध है.
पूरी एफआईआर नीचे पढ़ सकते हैं.
इस बीच, मीडिया निगरानी संस्थाओं, पत्रकारों और विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह एफआईआर पत्रकारिता को पूरी तरह से अपराध घोषित करने के प्रयासों का एक उदाहरण है – सवाल पूछना, विविध विचारों को प्रोत्साहित करना, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर जनता को सूचना देना और स्वस्थ चर्चा और वाद-विवाद का माहौल बनाना. उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रेस का देश और समाज के लिए महत्वपूर्ण समय में अहम मुद्दों को उठाने का गौरवशाली इतिहास (रिकॉर्ड) रहा है, चाहे वह 1975 में आपातकाल का समय हो या देश के आर्थिक या अन्य संकटों का दौर.
आज भी हमारा मानना है कि इस विरासत को कायम रखना न केवल हमारा अधिकार है, बल्कि भारत में स्वतंत्र प्रेस के सभी सदस्यों का कर्तव्य और ज़िम्मेदारी भी है. जो लोकतंत्र जीवंत प्रेस की अनुमति नहीं देता, वह केवल नाम का ही लोकतंत्र है.
पूरी एफआईआर:
