नई दिल्ली: एक संसदीय समिति ने पाया है कि निजी उच्च शिक्षण संस्थानों (एचईआई) में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों की संख्या ‘बेहद कम’ है, और उसने निजी संस्थानों सहित सभी शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण कोटा लागू करने की सिफारिश की है.
ये सिफारिशें शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 370वीं रिपोर्ट का हिस्सा हैं, जिसे बुधवार (20 अगस्त) को संसद में पेश किया गया.
इस द्विदलीय समिति के अध्यक्ष कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह हैं.
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि उच्च शिक्षा विभाग द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, निजी उच्च शिक्षा संस्थानों में लगभग 40% छात्र ओबीसी, 14.9% छात्र एससी और 5% छात्र एसटी हैं, जबकि विश्वविद्यालयों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़े बताते हैं कि ‘इन संस्थानों में प्रवेश पाने वाले ओबीसी छात्रों की संख्या काफी कम है, जबकि उपर्युक्त विश्वविद्यालयों में एससी और एसटी छात्रों की संख्या बेहद कम है.’
इसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि 2024-25 के दौरान बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस के कुल 5,137 छात्रों में से लगभग 514 छात्र ओबीसी (लगभग 10%), 29 छात्र एससी (लगभग 0.5%) और चार छात्र एसटी (लगभग 0.08%) थे, हालांकि इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि कुछ छात्रों ने अपनी श्रेणी घोषित नहीं की है.
इसी तरह ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में कुल 3,181 छात्रों में से 28 एससी और 29 एसटी थे (प्रत्येक 1% से भी कम). वहीं शिव नादर विश्वविद्यालय में कुल 3,359 छात्रों में से 48 अनुसूचित जाति और 29 अनुसूचित जनजाति के थे, जो क्रमशः 1.5% और लगभग 0.5% है.
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘अतः समिति उच्च शिक्षा विभाग को निजी सहित सभी शैक्षणिक संस्थानों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और (अन्य पिछड़ा वर्ग) की जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण कोटा लागू करने की सिफारिश करती है.’
इसमें कहा गया है, ‘इसके अलावा, विभाग को यूजीसी, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति आयोग जैसे केंद्रीय निरीक्षण/निगरानी निकाय के माध्यम से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(5) के कार्यान्वयन की निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ये संस्थान प्रवेश संबंधी आंकड़ों की वार्षिक रिपोर्ट दें.’
ज्ञात हो कि अनुच्छेद 15 धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है. उप-धारा 5 में कहा गया है कि राज्य सामाजिक या शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदायों – या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों – के लिए शैक्षणिक संस्थानों, जिनमें निजी तौर पर संचालित संस्थान भी शामिल हैं, ‘चाहे वे राज्य द्वारा सहायता प्राप्त हों या गैर-सहायता प्राप्त.’
समिति ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि केंद्र और राज्य सरकारें निजी शैक्षणिक संस्थानों और उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए सीटें बढ़ाने, बुनियादी ढांचे का निर्माण करने और आरक्षण लागू करते हुए शिक्षकों की नियुक्ति के लिए समर्पित धनराशि आवंटित करें.
यह देखते हुए कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी शिक्षा की खराब स्थिति के कारण हाशिए पर पड़े समुदायों के छात्रों को प्रवेश परीक्षाओं में प्रतिस्पर्धा करने या पाठ्यक्रम में बने रहने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, समिति ने सिफारिश की है कि उच्च शिक्षा विभाग ऐसे ब्रिजिंग मॉडल का अध्ययन करे, जिसमें पाठ्यक्रम और प्रवेश परीक्षाओं के लिए मुफ्त कोचिंग सहित अन्य चीजें शामिल हों, जिन्हें निजी उच्च शिक्षा संस्थान अनुच्छेद 15(5) के प्रभावी कार्यान्वयन में सहायता के लिए अपना सकते हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘इसी तरह, विभाग छात्रवृत्ति भी प्रदान कर सकता है जो निजी उच्च शिक्षा संस्थानों में कोटा के माध्यम से प्रवेश लेने वाले छात्रों के छात्रावासों में रहने के खर्च का भार वहन कर सके.’
समिति ने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को देखते हुए सख्त भेदभाव-विरोधी नीतियों को लागू किया जाना चाहिए और छात्रों व शिक्षकों के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए.
रिपोर्ट में कहा, ‘समिति का मानना है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 46 राज्य को अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और समाज के अन्य कमज़ोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने का निर्देश देता है और अनुच्छेद 15(5) इस संवैधानिक जनादेश को प्राप्त करने के लिए एक उपकरण के रूप में कार्य करता है.’
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘इसलिए, समिति अनुशंसा करती है कि अनुच्छेद 15(5) के कार्यान्वयन को अनुच्छेद 46 में निहित राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों के साथ जोड़ा जाना चाहिए ताकि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के समग्र उत्थान को बढ़ावा दिया जा सके.’
