अख़बारों ने की द वायर के ख़िलाफ़ असम पुलिस की कार्रवाई की आलोचना, कहा- प्रेस की आज़ादी को ख़तरा

असम सरकार द्वारा द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और इससे जुड़े पत्रकारों के ख़िलाफ़ राजद्रोह क़ानून के इस्तेमाल को लेकर पत्रकारों ने आक्रोश जताया है. कई अख़बारों ने अपने संपादकीय में इसे प्रेस की आज़ादी पर अंकुश लगाने के लिए सत्ता का खुलेआम दुरुपयोग बताया है.

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द वायर के खिलाफ असम पुलिस द्वारा दर्ज की गई राजद्रोह की एफआईआर पर अख़बारों के संपादकीय. (साभार संबंधित: ईपेपर)

नई दिल्ली: असम सरकार द्वारा द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन, मीडिया संस्थान की संपादकीय टीम, इसके लिए लिखने वाले पत्रकारों और इसके एक कार्यक्रम के साक्षात्कारकर्ता करण थापर के खिलाफ राजद्रोह कानून के इस्तेमाल को लेकर सोशल मीडिया पर आक्रोश देखने को मिला है.

कई लोगों ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए सत्ता का खुलेआम दुरुपयोग बताया है. कई अंग्रेजी अखबारों के संपादकीय लेखों में इस पर स्पष्ट रूप से चिंता जताई गई है.

इंडियन एक्सप्रेस ने ‘अनावश्यक बल प्रयोग करने वाली सरकार’ शीर्षक से एक संपादकीय में लिखा है, ‘हिमंता बिस्वा शर्मा सरकार द्वारा पत्रकारों के खिलाफ राजद्रोह कानून लागू करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटता है और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करता है.’

इस संपादकीय में बताया गया है कि कैसे इस तरह की कार्रवाइयों से प्रेस की स्वतंत्रता, उचित प्रक्रिया और नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के अधिकार को खतरा है.

संपादकीय में घटनाओं का क्रमवार विवरण देते हुए बताया गया है कि कैसे द वायर और सिद्धार्थ वरदराजन को किसी कार्रवाई से राहत देने वाले सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद संस्थान और संपादक को दूसरा समन मिला.

इसमें कहा गया है, ‘असम पुलिस ने पत्रकार और द वायर के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन को ऑनलाइन पोर्टल द्वारा प्रकाशित ऑपरेशन सिंदूर पर एक लेख को लेकर राजद्रोह के एक मामले में तलब किया है. इस लेख में इंडोनेशिया में भारत के सैन्य अताशे द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना के विमानों और सैन्य रणनीति पर टिप्पणियां की गई थीं और इसकी व्यापक रूप से रिपोर्टिंग हुई थी. अब यह ‘भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाला’ कृत्य होने के कारण पुलिस केस डायरी का हिस्सा है. 12 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने असम पुलिस को वरदराजन के खिलाफ कोई भी ‘दंडात्मक कार्रवाई’ न करने का निर्देश दिया था. हालांकि, अदालत के आदेश की अवहेलना करते हुए पुलिस ने एक अलग जिले में दूसरी एफआईआर दर्ज की.’

अखबार ने कहा है कि किसी खबर के लिए राजद्रोह के प्रावधानों का इस्तेमाल और पत्रकारों के खिलाफ सरकारी मशीनरी का चुनिंदा और अनुचित इस्तेमाल ‘उचित प्रक्रिया के उल्लंघन और मौलिक अधिकारों के हनन पर गंभीर सवाल खड़े करता है.’

अखबार के संपादकीय में 1962 के केदारनाथ सिंह मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला दिया गया है, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि सरकार की आलोचना, चाहे कितनी भी कठोर क्यों न हो, राजद्रोह नहीं है जब तक कि वह सीधे तौर पर हिंसा न भड़काए या सार्वजनिक अव्यवस्था को बढ़ावा न दे.

इस संपादकीय में महत्वपूर्ण रूप से इस बात पर गौर किया गया है कि कैसे सरकार ने राजद्रोह कानून को रद्द किए जाने से पहले 2022 में इसे निरस्त करने का अवसर मांगा था. हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने निष्पक्षता की आशा व्यक्त की थी.

राजद्रोह कानून का केवल नाम बदला

संपादकीय कहता है, ‘2023 में जब नई न्याय संहिताएं लाई गईं, तो राजद्रोह कानून के केवल नाम में बदलाव के साथ इसे बरकरार रखा गया. नाम ‘राजद्रोह’ से बदलकर ‘देशद्रोह’ कर दिया गया, लेकिन कानून का निराशाजनक दुरुपयोग जारी है.’

संपादकीय में मई 2020 में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के उस बयान का हवाला दिया गया है, जिसमें उन्होंने रिपब्लिक टीवी के एंकर अर्नब गोस्वामी को राहत देते हुए कहा था कि किसी पत्रकार के खिलाफ अनेकों शिकायतें होना और उससे निपटने के लिए उसे कई राज्यों में दर्ज एफआईआर से निपटने देने का उसकी आज़ादी पर ख़राब असर होगा. इससे नागरिकों की जानने की स्वतंत्रता और समाज को जागरूक करने का पत्रकारों का अधिकार प्रभावी रूप से खत्म हो जाएगा.’

यह संपादकीय इस पंक्ति के साथ समाप्त होता है कि जहां सुप्रीम कोर्ट नए राजद्रोह कानून को चुनौती देने वाली सुनवाई कर रहा है, ‘असम सरकार को अदालत की चेतावनी पर तुरंत ध्यान देना चाहिए.’

प्रेस को दबाने का एक स्पष्ट प्रयास

कोलकाता के द टेलीग्राफ ने अपने संपादकीय में बताया कि असम पुलिस द्वारा द वायर के संपादकों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 का इस्तेमाल, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजद्रोह कानून को रद्द करने के बावजूद, प्रेस को दबाने का एक स्पष्ट प्रयास है.

इस संपादकीय की शुरुआत इस मामले के विवरण के साथ होती है, जिसमें कहा गया है, ‘एक ऐसा देश जहां पत्रकारों द्वारा की जाने वाली आलोचना या रिपोर्टिंग के लिए राजद्रोह जैसे कानूनों के तहत आरोप लगाए जाते हैं, वहां प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा होती हैं.’

संपादकीय में द वायर के खिलाफ दूसरे समन को ‘पत्रकारों, लेखकों, असहमति जताने वालों और कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ क़ानून को हथियार बनाने का एक उत्कृष्ट उदाहरण बताते हुए कहा गया है कि आज के भारत में यह आम बात हो गई है.’ आगे संपादकीय में कहा गया है कि इस समन ने यह भी दिखाया कि कैसे पहले वाले केस में अदालत द्वारा दिए गए आदेश को नजरअंदाज कर दिया गया.

इसमें कहा गया है, ‘पत्रकार, जिन्हें ज़रूरत पड़ने पर सरकारी कार्रवाई या नीतियों की आलोचना करने की आज़ादी होनी चाहिए, किसी भी मतभेद को दबाने की चाहत रखने वाली सरकारों का पसंदीदा निशाना बन गए हैं.’

टेलीग्राफ ने कहा कि ‘सभी पत्रकारों को अपनी बात कहने का अधिकार है और सर्वोच्च न्यायालय के लिए यह ज़रूरी है कि वह उन्हें हमेशा सुरक्षा प्रदान करे.’ लेकिन इसके साथ यह भी जोड़ा कि एक स्वतंत्र देश और लोकतंत्र में अदालत की सुरक्षा ज़रूरी होना ‘दुखद’ है.

देशद्रोह की पुनरावृत्ति: प्रेस की आज़ादी पर कुठाराघात

द हिंदू के संपादकीय का शीर्षक ​Sedition redux: On trampling on press freedom (‘देशद्रोह की पुनरावृत्ति: प्रेस की आज़ादी पर कुठाराघात’) था, जो अपने आप में इस बात का प्रतीक है कि किस तरह देश में पत्रकारिता और प्रेस की आज़ादी निशाने पर है.

अखबार कहता है, ‘प्रकाशनों के खिलाफ बेतुके मामले दर्ज करना और उचित जांच या ठोस सबूतों की जांच के बिना पत्रकारों को तलब करना, उन राज्यों में पुलिस की कार्यप्रणाली का हिस्सा बन गया है जहां ऐसे नेता राज कर रहे हैं जो बदला लेने की भावना से ही काम करते हैं और रत्ती भर आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते.’

इन मामलों का ब्यौरा देते हुए संपादकीय में यह भी बताया गया है कि कैसे द वायर ने इस मामले में कुछ अन्य ऐसे पहलुओं की तरफ इशारा किया है जो खासे चिंताजनक हैं, जैसे- ‘समन में एफआईआर की तारीख, कथित अपराध का कोई विवरण न होना या समन के साथ एफआईआर की प्रति न दिया जाना- ये सभी समन से जुड़ी बीएनएसएस धाराओं के अनुसार अनिवार्य हैं. इसके अलावा, एफआईआर को गुप्त रखना और समन के कारणों का उल्लेख न करना पुलिस की धमकी का संकेत देता है.’

संपादकीय में लिखा गया है कि धारा 152 के आलोचकों ने सही ही आशंका जताई थी कि यह औपनिवेशिक काल के राजद्रोह कानून का नया रूप है, जिसके मामलों की सुनवाई न्यायालय ने 2022 में रद्द कर दी थी.

इसमें आगे कहा गया है कि ‘सरकारी नैरेटिव पर सवाल उठाने वाले पत्रकारों’ के ख़िलाफ़ इस क़ानून का इस्तेमाल प्रेस की आज़़ादी पर नकारात्मक प्रभाव डालता है.

अखबार ने लिखा है कि अदालत के आदेश के बावजूद असम पुलिस की अवज्ञाकारी कार्रवाई से पता चलता है कि ‘मज़बूत न्यायिक निगरानी और स्पष्ट दिशानिर्देशों के बिना धारा 152 असहमति के ख़िलाफ़ हथियार के तौर पर इस्तेमाल होती रहेगी.’

इसमें आगे कहा गया है कि अब यह दायित्व न्यायालय पर है कि वह राजद्रोह कानूनों की असंवैधानिकता को देखे, चाहे वे पहले के रूप में हों या नए रूप में, ‘जिनका लोकतांत्रिक समाज में कोई स्थान नहीं है.’