नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (22 अगस्त) को द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन, सलाहकार संपादक करण थापर और सभी कर्मचारियों को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 के तहत गुवाहाटी अपराध शाखा द्वारा दर्ज की गई एक एफआईआर में किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण प्रदान किया.
बीते तीन महीनों में असम पुलिस द्वारा इस न्यूज़ संस्थान के खिलाफ राजद्रोह कानून के तहत दर्ज किया गया दूसरा ऐसा मामला है.
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने फाउंडेशन फॉर इंडिपेंडेंट जर्नलिज्म (द वायर के स्वामित्व वाली गैर-लाभकारी संस्था) का प्रतिनिधित्व करने वाली वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन द्वारा लंबित रिट याचिका में एक आवेदन पर सुनवाई के बाद यह संरक्षण आदेश पारित किया.
रामकृष्णन ने अदालत को बताया कि जिस दिन (12 अगस्त, 2025) उसने एक अन्य एफआईआर में द वायर के संपादकों को सुरक्षा प्रदान की थी, उसी दिन असम पुलिस ने 9 मई, 2025 की एक पुरानी/निष्क्रिय एफआईआर को उठाकर उसके संपादकों को पूछताछ के लिए तलब किया. उन्होंने कहा कि हालांकि द वायर के संपादक पुलिस को पूरा सहयोग देने को तैयार हैं, लेकिन उन्हें गिरफ्तारी का डर है.
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को आदेश दिया कि, ‘याचिकाकर्ता संख्या 2 और सलाहकार संपादक सहित याचिकाकर्ता फाउंडेशन के सदस्यों के खिलाफ एफआईआर संख्या 3/2025 के तहत कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी, जिसे भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 152 के तहत दर्ज किया गया है, बशर्ते वे चल रही जांच में शामिल हों और पूरी तरह से सहयोग करें.’
मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर के लिए तय की.
जब असम पुलिस ने दूसरी एफआईआर में वरदराजन और थापर को ‘समन’ जारी किया, तो उन्हें एफआईआर की एक प्रति, उसकी तारीख़ या उसकी विषय-वस्तु का सार भी नहीं दिया गया. रामकृष्णन ने अदालत को बताया कि 20 अगस्त को गुवाहाटी में क्राइम ब्रांच के सामने पेश होने के लिए बुलाए जाने से दो दिन पहले द वायर को एफआईआर की एक प्रति मिल पाई.
रामकृष्णन द्वारा द वायर के संपादकों को परेशान करने और अदालत के आदेशों के उल्लंघन करते हुए सिलसिलेवार एफआईआर दर्ज किए जाने की आशंका जताए जाने पर पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि वह स्थिति पर करीब से नजर रख रही है और उम्मीद करती है कि सभी लोग कानून का पालन करेंगे. संभवतः उनका इशारा असम पुलिस की ओर था.
ज्ञात हो कि सत्यपाल मलिक (जम्मू-कश्मीर और मेघालय के पूर्व राज्यपाल, जिनका इस महीने की शुरुआत में निधन हो गया), नजम सेठी (पाकिस्तानी पत्रकार और पाकिस्तान में पंजाब के पूर्व कार्यवाहक मुख्यमंत्री) और आशुतोष भारद्वाज (द वायर हिंदी के संपादक) एफआईआर में नामजद अन्य लोगों में शामिल हैं.
गौरतलब है कि 11 जुलाई, 2025 को मोरीगांव में द वायर और वरदराजन के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर 28 जून, 2025 को द वायर में प्रकाशित एक खबर (IAF Lost Fighter Jets to Pak Because of Political Leadership’s Constraints’: Indian Defence Attache) पर भाजपा के एक पदाधिकारी द्वारा दर्ज की गई शिकायत से संबंधित है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि अपराध शाखा की एफआईआर किस लेख या वीडियो से संबंधित है.
ज्ञात हो कि 12 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने नए राजद्रोह कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली द वायर की याचिका पर नोटिस जारी किया था और जुलाई में मोरीगांव में दर्ज एक मामले में द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन सहित उसके पत्रकारों को असम पुलिस द्वारा किसी भी ‘दंडात्मक कार्रवाई’ से सुरक्षा प्रदान की थी.
मीडिया संस्थाओं, पत्रकारों और विपक्षी नेताओं ने इन एफआईआर को पत्रकारिता को पूरी तरह से अपराधीकरण करने के प्रयासों का एक उदाहरण बताया है – सवाल पूछना, विविध विचारों को प्रोत्साहित करना, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर जनता को सूचित करना और स्वस्थ चर्चा और बहस का माहौल बनाना.
इसी बीच गुरुवार (21 अगस्त) को असम पुलिस ने दिल्ली के पत्रकार अभिसार शर्मा के खिलाफ भी बीएनएस की धारा 152 सहित कई धाराओं के तहत एक एफआईआर दर्ज की.
गुवाहाटी निवासी आलोक बरुआ ने एक वीडियो को लेकर शिकायत दर्ज कराई है जिसमें शर्मा गौहाटी हाईकोर्ट के न्यायाधीश संजय कुमार मेधी की असम सरकार द्वारा आदिवासी भूमि को एक निजी कंपनी को हस्तांतरित करने पर की गई तीखी टिप्पणी का हवाला देते हैं और मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा की आलोचना करते हुए उन पर अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए सांप्रदायिक नफरत और हिंसा का सहारा लेने का आरोप लगाते हैं.
