नई दिल्ली: गुजरात के कुछ कॉलेजों में अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) पर काम करने वाले असिस्टेंट प्रोफेसरों को बेहद कम वेतन मिलने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी जताई है. अदालत ने राज्य सरकार को वेतनमान को दुरुस्त करने का निर्देश दिया है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ समारोहों में ‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः’ का पाठ करना ही काफी नहीं है, बल्कि इस भावना को शिक्षकों के साथ व्यवहार में भी दिखना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणियां गुजरात के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्त असिस्टेंट प्रोफेसरों के वेतन से जुड़े मामले में की. यह मामला जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुना.
अदालत ने कहा कि शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन न देना न केवल ज्ञान के महत्व को कम करता है, बल्कि उन लोगों का भी अपमान है जो देश की बौद्धिक पूंजी को बनाने का जिम्मा उठाते हैं.
बेंच ने कहा, ‘यह चिंताजनक है कि असिस्टेंट प्रोफेसरों को केवल 30,000 रुपये मासिक वेतन मिल रहा है. अब समय आ गया है कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर ध्यान दे और उनके काम के अनुसार वेतनमान तय करे.’
अदालत ने ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत पर जोर देते हुए हाई कोर्ट के उस आदेश को दोहराया, जिसमें कॉन्ट्रैक्ट असिस्टेंट प्रोफेसरों को कम से कम नियमित वेतनमान देने का निर्देश दिया गया था.
गौरतलब है कि कॉन्ट्रैक्ट असिस्टेंट प्रोफेसरों का वेतन 2012 से अब तक 30,000 रुपये प्रतिमाह ही बना हुआ है. वहीं एड-हॉक पदों पर वेतन 2012 में 34,000 रुपये था, जो 2025 में बढ़कर 1,16,000 रुपये हो गया. नियमित नियुक्त प्रोफेसरों को 2012 में 40,412 रुपये मिलते थे, अब 2025 में 1,36,952 रुपये मासिक वेतन दिया जा रहा है.
अपने फैसले में अदालत ने कहा कि शिक्षाविद, लेक्चरर और प्रोफेसर किसी भी राष्ट्र की बौद्धिक रीढ़ होते हैं, क्योंकि वही नई पीढ़ी की सोच को आकार देते हैं.
कोर्ट ने कहा कि उनका काम सिर्फ पढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि छात्रों में आलोचनात्मक सोच को विकसित करना और सामाजिक मूल्यों को स्थापित करना भी शामिल है. अदालत ने कहा कि समाज में उनके योगदान का महत्व तो बड़ा है, लेकिन उसे अक्सर उचित मान्यता नहीं मिलती.
