गढ़चिरौली खदान आगज़नी केस: सुरेंद्र गाडलिंग की ज़मानत याचिका की सुनवाई से अलग हुए जस्टिस सुंदरेश

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सुंदरेश ने मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील सुरेंद्र गाडलिंग की ज़मानत याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है. यह याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने से संबंधित है, जिसमें महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में दिसंबर 2016 में हुई आगजनी के सिलसिले में गाडलिंग को ज़मानत देने से इनकार कर दिया था.

सुरेंद्र गाडलिंग. (फोटो साभार: सोशल मीडिया फेसबुक)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एमएम सुंदरेश ने मंगलवार (26 अगस्त) को 2016 के सुरजागढ़ आगजनी मामले में आरोपी वकील सुरेंद्र गाडलिंग की ज़मानत याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला आज (26 अगस्त) जस्टिस सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध था. यह याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने से संबंधित है जिसमें महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में दिसंबर 2016 में हुई आगजनी की घटना के सिलसिले में गाडलिंग को ज़मानत पर रिहा करने से इनकार कर दिया गया था.

मालूम हो कि प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सशस्त्र कैडरों ने 27 दिसंबर, 2016 को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले की एटापल्ली तहसील में सुरजागढ़ खदान से लौह अयस्क ले जाने में शामिल 80 से अधिक वाहनों में कथित तौर पर आग लगा दी थी. एटापल्ली पुलिस स्टेशन में इस संबंध में केस दर्ज किया गया था.

गाडलिंग पर माओवादी गतिविधियों में संलिप्त होने का आरोप है.

गाडलिंग पर भारतीय दंड संहिता की धारा 307, 341, 342, 435, 323, 504, 506, 143, 147, 148, 149 और 120(बी), भारतीय शस्त्र अधिनियम, 1959 की धारा 5 और 28, महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम, 1951 की धारा 135 और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 की धारा 16, 18, 20 और 23 के तहत मामला दर्ज किया गया है.

समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, 8 अगस्त को वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने अपने मुवक्किल गाडलिंग की 6.5 साल की कैद का हवाला देते हुए मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के समक्ष इस मामले की शीघ्र सुनवाई का अनुरोध किया था.

ग्रोवर ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट में ज़मानत याचिका 11 बार स्थगित की जा चुकी है.’

ज्ञात हो कि 27 मार्च को जस्टिस सुंदरेश और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने मामले में गाडलिंग और कार्यकर्ता ज्योति जगताप की ज़मानत पर सुनवाई स्थगित कर दी थी.

अदालत ने कार्यकर्ता महेश राउत को दी गई ज़मानत को चुनौती देने वाली राष्ट्रीय जांच एजेंसी की याचिका को भी स्थगित कर दिया.

राउत को बॉम्बे हाईकोर्ट ने ज़मानत दे दी थी, लेकिन एनआईए द्वारा सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती देने के लिए फैसले पर रोक लगाने की मांग के बाद आदेश पर रोक लगा दी गई थी.

गाडलिंग पर माओवादियों को सहायता प्रदान करने और मामले में फरार लोगों सहित विभिन्न सह-आरोपियों के साथ कथित रूप से साजिश रचने का आरोप लगाया गया था. उन पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) और आईपीसी के विभिन्न प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था और अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि गाडलिंग ने भूमिगत माओवादी विद्रोहियों को सरकारी गतिविधियों और कुछ क्षेत्रों के मानचित्रों के बारे में गुप्त जानकारी प्रदान की थी.

कथित तौर पर उन्होंने माओवादियों से सुरजागढ़ खदानों के संचालन का विरोध करने को कहा और कई स्थानीय लोगों को आंदोलन में शामिल होने के लिए उकसाया.

गाडलिंग 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित एल्गार परिषद सम्मेलन में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों से संबंधित एल्गार परिषद मामले में भी शामिल है. पुलिस ने दावा किया कि भाषणों ने अगले दिन पुणे जिले के कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा भड़का दी.

मालूम हो कि एल्गार परिषद मामला पुणे में 31 दिसंबर 2017 को आयोजित गोष्ठी में कथित भड़काऊ भाषण से जुड़ा है. पुलिस का दावा है कि इस भाषण की वजह से अगले दिन शहर के बाहरी इलाके में स्थित भीमा-कोरेगांव युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई और इस संगोष्ठी का आयोजन करने वालों का संबंध कथित माओवादियों से था.

एनआईए ने 16 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है, जिनमें मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील और शिक्षाविद शामिल हैं. इन सभी पर प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) संगठन का हिस्सा होने का आरोप है. पुणे पुलिस ने यह भी दावा किया था कि आरोपियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘राजीव गांधी की तरह हत्या’ करने की योजना बनाई थी.