यूजीसी के मसौदा पाठ्यक्रम को चुनौती देगा केरल, छात्रों पर ‘हिंदुत्व विचारधारा’ थोपने का आरोप

केरल सरकार ने कहा है कि वह यूजीसी के लर्निंग आउटकम्स आधारित करिकुलम फ्रेमवर्क के मसौदे का औपचारिक रूप से विरोध करेगी. सरकार का मानना है कि यूजीसी का ये मसौदा 'छात्रों पर हिंदुत्व की विचारधारा थोपने' का प्रयास है.

प्रतीकात्मक तस्वीर: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग. (फोटो: X/@UGC_India)

नई दिल्ली: केरल सरकार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के लर्निंग आउटकम्स आधारित करिकुलम फ्रेमवर्क के मसौदे का औपचारिक रूप से विरोध करेगी. सरकार का मानना है कि यूजीसी का ये मसौदा ‘छात्रों पर हिंदुत्व की विचारधारा थोपने’ का प्रयास है.

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, केरल राज्य उच्च शिक्षा परिषद की शुरुआती समीक्षा में इस मसौदे को लेकर कुछ चिंताजनक बातें सामने आई हैं.

परिषद के उपाध्यक्ष राजन गुरुक्कल ने अखबार को बताया कि परिषद अब एक विस्तृत प्रतिक्रिया तैयार करने के लिए एक विशेषज्ञ पैनल का गठन करेगी.

उन्होंने इस मसौदे में मानव विज्ञान (anthropology), वाणिज्य, राजनीति विज्ञान और शारीरिक शिक्षा जैसे विषयों के पाठ्यक्रमों की ओर इशारा किया, जो संघ परिवार के वैचारिक हितों से जुड़े प्रतीत होते हैं.

इस मसौदे को उच्च शिक्षा मंत्री आर. बिंदु ने ‘प्रतिगामी और अवैज्ञानिक’ बताते हुए राजनीति विज्ञान की पठन सूची में वीडी सावरकर की रचनाओं को शामिल करने के प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताई.

उन्होंने कॉरपोरेट प्रशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व को ‘रामराज्य’ के चश्मे से देखने के सुझाव की भी आलोचना की. अखबार के अनुसार, उन्होंने तर्क दिया कि ये सिफारिशें धर्मनिरपेक्ष और बहुलवादी मूल्यों को कमजोर करती हैं.

आलोचकों ने इस मसौदा ढांचे में शैक्षणिक और संरचनात्मक मुद्दों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है. उनका तर्क है कि प्रस्तावित पाठ्यक्रम में वैज्ञानिक दृढ़ता का अभाव है, विषय के बारे में कम गहराई से बताया गया है. इससे छात्रों पर अनुभवजन्य विषयवस्तु के बजाय वैचारिक बोझ बढ़ने का जोखिम है.

उदाहरण के लिए, धार्मिक ग्रंथों और राष्ट्रवादी विचारकों से ली गई अवधारणाओं को रसायन विज्ञान, अर्थशास्त्र और लोक नीति जैसे क्षेत्रों में शामिल किया गया है, जिससे यह आशंका बढ़ रही है कि यह फ्रेमवर्क साक्ष्य-आधारित शिक्षा को कमजोर करता है और आलोचनात्मक जांच-पड़ताल के लिए जगह कम करता है.

इसके साथ ही मसौदे में ‘भारतीय ज्ञान प्रणालियों’ (Indian Knowledge Systems) पर अत्यधिक निर्भरता की भी आलोचना की गई है, जो वैश्विक शैक्षणिक दृष्टिकोणों को दरकिनार करने और उच्च शिक्षा एवं अनुसंधान में छात्रों की प्रतिस्पर्धात्मकता को सीमित करता है.

उल्लेखनीय है कि एक ओर जहां केंद्र सरकार और यूजीसी इस मसौदे को बहु-विषयक और समग्र शिक्षा को बढ़ावा देने वाला बताकर प्रचारित कर रहे हैं, वहीं केरल ने इस ढांचे को एक विशेष तरह की विधारधारा से प्रभावित होकर इन लक्ष्यों के खंडन का आरोप लगाया है. राज्य सरकार ने उच्च शिक्षा के ‘भगवाकरण’ के ख़िलाफ़ चेतावनी दी है.

केरल का यह रुख सीधे तौर पर राज्य को केंद्र के साथ टकराव की राह पर ले जाता है, जिससे शिक्षा नीति पर नियंत्रण को लेकर संघीय विवाद और बढ़ रहा है.

उम्मीद है कि राज्य जल्द ही यूजीसी को अपनी आपत्तियों से औपचारिक रूप से अवगत कराएगा, और इस कदम का असर विरोध करने वाले अन्य राज्यों पर भी पड़ने की संभावना है.

गौरतलब है कि इससे पहले इस साल की शुरुआत में केरल विधानसभा ने 21 जनवरी को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से यूजीसी के मसौदा नियमों को वापस लेने का आग्रह किया था.

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने इस नए मसौदे को संघीय सिद्धांतों के खिलाफ बताया था. यूजीसी का नियम जो सवालों के घेरे में था, उसमें राज्यपालों को राज्यों में कुलपतियों को नियुक्त करने का प्रभावी रूप से व्यापक अधिकार दिया गया है और इसके साथ ही इस पद पर उद्योग विशेषज्ञों और सार्वजनिक क्षेत्र के लोगों की भी नियुक्ति हो सकती है. पहले इस पद पर केवल शिक्षाविदों को नियुक्ति होती थी.