नई दिल्ली: केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने भारत सरकार पर इज़रायल के विवादास्पद दक्षिणपंथी वित्त मंत्री बेज़ेलेल स्मोट्रिच को ऐसे समय में आमंत्रित करने और मेज़बानी करने के लिए निशाना साधा है, जब गाज़ा में नरसंहार हो रहा है.
मोदी सरकार को पिछले दो वर्षों में फ़िलिस्तीनी मुद्दे के प्रति अपने ढुलमुल और आधे-अधूरे समर्थन के लिए टिप्पणीकारों और इंडिया ब्लॉक के विपक्षी दलों से आलोचना झेलनी पड़ी है.
लेकिन इस बार भारत की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए देश के एकमात्र वामपंथी मुख्यमंत्री विजयन ने अब तक की सबसे कड़ी औपचारिक प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने एक्स पर लिखा है:
केंद्र सरकार द्वारा इज़रायली वित्त मंत्री बेज़लेल स्मोट्रिच, जो एक अति-दक्षिणपंथी कट्टरपंथी और इज़रायल के क्रूर कब्जे और विस्तारवादी एजेंडे के मुख्य सूत्रधार हैं, की मेज़बानी करने के फैसले की कड़ी निंदा करता हूं. ऐसे समय में जब गाजा में नरसंहार हो रहा है, नेतन्याहू शासन के प्रतिनिधियों के साथ समझौते करना फ़िलिस्तीन के साथ भारत की ऐतिहासिक एकजुटता के साथ विश्वासघात से कम नहीं है. फ़िलिस्तीन के लिए न्यायपूर्ण और स्थायी शांति का मार्ग अभी भी अधूरा है, ऐसे में इज़रायल के साथ सैन्य, सुरक्षा और आर्थिक संबंध बनाए रखना निंदनीय है.
अति-दक्षिणपंथी स्मोट्रिच की भारत यात्रा ऐसे समय में हुई है, जब उनके अतिवादी विचारों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी आलोचना हो रही है.
अपने कठोर बयानों के कारण उन्हें कई पश्चिमी सरकारों और यूरोपीय संघ से प्रतिबंधों और निंदा का सामना करना पड़ा है, और जून में ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड और नॉर्वे ने फिलिस्तीनियों के खिलाफ हिंसा भड़काने और मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए उन पर और इज़रायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्वीर पर प्रतिबंध लगा दिए थे.
जुलाई में स्लोवेनिया ने उन दोनों को वॉन्टेड व्यक्ति घोषित कर दिया. नीदरलैंड ने भी प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया, यह कहते हुए कि गाज़ा पर उनके बयान जातिय संहार (एथनिक क्लींज़िंग) का समर्थन करते हैं.
फिर भी स्मोट्रिच तीन दिवसीय यात्रा पर भारत आए थे, जिसके दौरान उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ द्विपक्षीय निवेश समझौते पर हस्ताक्षर किए.
भारत ने पिछले तीन सालों में कम से कम चार बार गाज़ा में युद्धविराम के आह्वान वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्तावों के पक्ष में मतदान से परहेज किया है. आखिरी बार जून में – उससे छह महीने पहले उसने इसी तरह के एक प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था.
फिलिस्तीन के प्रति भारत एकजुटता में ढिलाई और कमजोरी अन्य क्षेत्रों में भी दिखाई दे रही है, विशेष रूप से फिलिस्तीनियों के लिए विरोध प्रदर्शन की अनुमति देने के मामले में.
