दो गुटों में बंटे माओवादी: एक चाहता है शांति और आत्म-समर्पण, दूसरे ने कहा-आप अपने हथियार हमें सौंप दो

मओवादियों के बीच गहरे मतभेद पनप चुके हैं. अगर एक गुट हथियार डालना चाहता है, दूसरा कह रहा है कि अपने हथियार पुलिस को देने के बजाय हमें सौंप दो, नहीं तो हमारे लड़ाके आपसे छीन लेंगे.

प्रतिबंधित भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय ने एक और बयान जारी कर कहा कि वे हथियार नहीं छोड़ेंगे. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

प्रतिबंधित भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय ने एक और बयान जारी कर कहा कि वे हथियार नहीं छोड़ेंगे. हालांकि इस बार जिस ‘अभय’ ने यह बयान जारी किया वो पहले वाले ‘अभय’, यानी मल्लोजुला वेणुगोपाल उर्फ सोनू नहीं हैं, बल्कि कोई और हैं. 20 सितंबर को जारी इस प्रेस विज्ञप्ति में सोनू के बयान को उनका निजी फैसला ठहराया और आंदोलन को दृढ़ता से आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया है.

‘अभय’ और ‘सोनू’ के नामों से माओवादी लीडर मल्लोजुला वेणुगोपाल द्वारा जारी एक बयान और एक पत्र, क्रमशः 16 और 17 सितंबर को मीडिया और सोशल मीडिया में वायरल हुए थे. जिसके बाद कयास लगाए जाने लगे थे कि माओवादियों की हथियारबंद मुहिम अब थम सकती है. लेकिन तेलंगाना राज्य कमेटी के प्रवक्ता जगन द्वारा 19 सितंबर को और केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता ‘अभय’ द्वारा 20 सितंबर को जारी बयानों से साफ़ हो गया कि हथियार छोड़ने का फैसला उनके पूरे संगठन का नहीं है, बल्कि सोनू और उनके कुछ सहयोगियों का है.

हालांकि इस बात की स्पष्टता अभी भी बाकी है कि सोनू का समर्थन करने वालों की संख्या कितनी है और केंद्रीय कमेटी के कितने लीडर उनके साथ हैं.

सोनू गुट को चेतावनी – सरेंडर करो, लेकिन हथियार के साथ नहीं

‘अभय’ ने अपने बयान में साफ कहा, ‘हथियार त्यागने का मतलब उन्हें दुश्मन को सौंपना और दुश्मन के सामने सरेंडर करना है.’ उन्होंने आगे कहा कि ऐसा करना संशोधनवादी रास्ता अपनाना होगा और क्रांति के साथ विश्वासघात होगा.

इतना ही नहीं, हथियारों को लेकर ‘अभय’ ने सोनू और उनके साथियों को कड़ी चेतावनी भी दी. उसमें कहा गया, ‘सोनू और उनके साथी दुश्मन के सामने सरेंडर करना चाहते हैं तो वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं. लेकिन उन्हें पार्टी के हथियार दुश्मन को सौंपने का कोई अधिकार नहीं है. इसलिए हम डिमांड कर रहे हैं कि वो अपने हथियार पार्टी को सौंप दें. अगर वो इसके लिए राज़ी नहीं होंगे, तो पीएलजीए को हम निर्देशित करते हैं कि वह उनसे हथियार छीन ले.’

सोनू अब अभय नहीं होंगे!

‘अभय’ के इस बयान में दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के प्रवक्ता ‘विकल्प’ का हस्ताक्षर भी है जिससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि दंडकारण्य का शीर्ष नेतृत्व भी हथियार छोड़ने के पक्ष में नहीं है. बयान में यह भी कहा गया है कि उनकी पार्टी लाइन से भटक चुके सोनू को अभय के नाम से बयान जारी करने का अब कोई अधिकार नहीं है.

माओवादी आंदोलन पर नज़र रखने वाले इस टिप्पणी को इस रूप में देखते हैं कि सोनू उर्फ मल्लोजुला वेणुगोपाल से ‘अभय’ का नाम, यानी केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता का पद छीन लिया गया.

बयान में कहा कि सोनू और उनके साथी दुश्मन के सामने सरेंडर करना चाहते हैं तो वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं. (प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

इस बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि सोनू गुट और पार्टी के दूसरे धड़े के बीच गहरे मतभेद पनप चुके हैं. सोनू के विरोध में खड़े गुट के लीडर कौन हैं, यह स्पष्ट नहीं है. हालांकि ये कयास लगाए जा रहे हैं कि केंद्रीय कमेटी के वरिष्ठ नेता देवजी और दंडकारण्य के चर्चित कमांडर हिडमा इस खेमे में हो सकते हैं. तेलंगाना की राज्य कमेटी और दंडकारम्य स्पेशल ज़ोनल कमेटी उनके साथ हैं. बिहार-झारखंड और दूसरे अन्य जगहों के कैडर किस गुट के साथ हैं, इस बात का खुलासा होना बाकी है.

सोनू पर मृत महासचिव के बयान को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप

‘अभय’ ने अपने बयान में सोनू पर यह आरोप भी लगाया कि उन्होंने पार्टी के पूर्व महासचिव बसवराजू के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया. बसवाराजू बीते 21 मई को अबूझमाड़ के गुंडेकोट में सुरक्षा बलों के हमले में मारे गए थे.

बयान में कहा गया, ‘7 मई को बसवाराजू ने जो बयान दिया था उसमें हथियार छोड़ने के मुद्दे पर पार्टी के कोर ग्रुप में चर्चा करने का जिक्र था. लेकिन जल्द ही बसवाराजू ने उस गलती को चिह्नित कर, उसे वापस लेकर, पार्टी, पीएलजीए और तमाम क्रांतिकारी खेमे को आह्वान दिया था कि ऑपरेशन कगार का प्रतिरोध किया जाए.’

आगे कहा गया, ‘इस सचाई को कॉमरेड सोनू ने जानबूझकर तोड़-मरोड़कर पेश किया जो उनकी कुटिल चाल है और निंदनीय भी है.’

हालांकि, इस ताजा बयान में भी बसवाराजू के स्थान पर नए महासचिव नियुक्ति को लेकर कोई जिक्र नहीं है. लेकिन सितंबर के दूसरे सप्ताह में ख़बर आई थी कि तिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी को नया महासचिव बनाया गया है. इसके अलावा दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के सचिव का पद कमांडर हिड़मा को मिला है. लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई.

क्रांतिकारी जनता से अपीलके नाम से सोनू का माफीनामा

15 अगस्त के डेटलाइन के साथ मीडिया को 16/17 सितंबर को मिली अभय की प्रेस विज्ञप्ति के अलावा, सोनू के द्वारा जारी आत्मालोचनात्मक चिट्ठी ने भी सबको आश्चर्य में डाल दिया था, क्योंकि उसमें पार्टी की कई कथित गंभीर गलतियों का जिक्र था.

‘अभय’ के नए बयान में उस चिट्ठी का जिक्र करते हुए कहा गया, ‘अगर ऐसी गलतियां हो रही हैं तो सोनू को पोलितब्यूरो जैसी बड़ी कमेटी के सदस्य होने के नाते पार्टी में रहते हुए उन्हें सुधारने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी.’

इस बयान ने आगे कहा कि अगर देश की बदली हुई परिस्थितियों में दीर्घकालीन जनयुद्ध, हथियारबंद संघर्ष का रास्ता नहीं जमेगा तो सोनू तो वैकल्पिक लाइन पेश करनी चाहिए थी और पार्टी के भीतर अंदरूनी बहस (टू लाइन स्ट्रगल) चलानी चाहिए थी.

सोनू पर लगाया भारत का प्रचंड बनने का आरोप

‘अभय’ के बयान में कहा गया कि सोनू के द्वारा अस्थायी तौर पर हथियारबंद संघर्ष त्यागने की पेशकश एक धोखा है. यह नेपाल में प्रचंड द्वारा अपनाया गया नया संशोधनवादी रास्ता है.

गौरतलब है कि नेपाल में दस साल तक चले ‘जनयुद्ध’ के बाद 2006 में नेपाल की माओवादी पार्टी ने एक समग्र शांति समझौते के तहत सशस्त्र संघर्ष को त्यागकर संसदीय रास्ता अपनाया था. उस दरमियान प्रचंड के नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी ने अपने सारे हथियार यूएन की देखरेख में सीलबंद कंटेनर में डाल दिए थे. हालांकि, इस बदलाव को भारत के माओवादियों के अलावा दुनिया के कई अन्य गुटों ने भी राजनीतिक पतन करार दिया था.

सोनू द्वारा दिए गए बयान में बदली हुई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का हवाला देते हुए अस्थायी हथियारबंद संघर्ष छोडने की बात कही गई थी. इसका खंडन करते हुए ‘अभय’ ने कहा कि वर्तमान आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां हथियारबंद संघर्ष की मांग कर रही हैं.

पार्टी को फिर से लगा बड़ा झटका

एक तरफ माओवादियों के अंदरूनी संघर्ष पर मीडिया में बहस चल रही है, तो दूसरी ओर सरकार अपने नक्सल-विरोधी अभियानों को और तेज करने की बात कह रही है. ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सरकार 31 मार्च 2026 तक माओवादी आंदोलन को खत्म करने की अपनी घोषणा के मुताबिक, उसी रणनीति के तहत काम कर रही है.

इस बीच, 22 सितंबर को अबूझमाड़ के जंगलों में पुलिस ने दो शीर्ष माओवादी नेताओं को कथित मुठभेड़ में मारने का दावा किया. किसी एक मुठभेड़ में एक साथ केंद्रीय कमेटी के दो लीडरों का मारा जाना बड़ा झटका माना जा रहा है. उनकी पहचान कोसा दादा उर्फ ​​कडारी सत्यनारायण रेड्डी (67) और राजू दादा उर्फ ​​काटा रामचंद्र रेड्डी (63) के रूप में हुई है. वे दोनों तेलंगाना के अविभाजित करीमनगर ज़िले से थे.

ये दोनों लीडर अलग-अलग समय में दण्डकारण्य की स्पेशल जोनल कमेटी के सचिव भी रहे. राजू उर्फ रामचंद्र रेड्डी पहले दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी का प्रवक्ता रहे. हाल फिलहाल तक वे ‘विकल्प’ के नाम से प्रेस-विज्ञप्तियां जारी करते रहे. लेकिन 20 सितंबर 2025 को, यानी उनकी मृत्यु से दो दिन पहले जारी बयान में जिस ‘विकल्प’ का हस्ताक्षर है, यह उन्हीं का था, या नहीं इसकी पुष्टि होना मुश्किल है. हालांकि माओवादी आंदोलन के जानकारों का कहना है वह ‘विकल्प’ कोई और भी हो सकता है.