नई दिल्ली: भारतीय निर्वाचन आयोग ने मंगलवार (30 सितंबर) को विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी है. इसके तहत बिहार में कुल 7.42 करोड़ मतदाता हैं.
उल्लेखनीय है कि बिहार में तीन महीने तक चले एसआईआर प्रक्रिया के बाद राज्य की मतदाता सूची में लगभग 6% की कमी आई है, जिसमें लगभग 47 लाख नाम हटाए गए हैं.
इस संबंध में चुनाव आयोग ने मंगलवार को एक बयान में कहा कि 24 जून को एसआईआर की घोषणा के समय राज्य में 7.89 करोड़ मतदाता थे, लेकिन तीन महीने के संशोधन के बाद राज्य में मतदाताओं की अंतिम संख्या अब 7.42 करोड़ रह गई है – जो 5.95% की कमी है. इसका मतलब है कि 24 जून तक मतदाता सूची में शामिल 47 लाख मतदाता मंगलवार को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं.
1 अगस्त को प्रकाशित मसौदा सूची में 7.24 करोड़ मतदाता थे
मालूम हो कि 1 अगस्त को प्रकाशित मसौदा सूची में 7.24 करोड़ मतदाता थे, जिनमें से 65 लाख मतदाता सूची से बाहर रह गए थे. 3.66 लाख अयोग्य मतदाताओं को मसौदा सूची से हटा दिया गया और 21.53 लाख योग्य मतदाताओं को फॉर्म 6 के माध्यम से जोड़ा गया.
चुनाव आयोग ने पहले कहा था कि जिन मतदाताओं के नाम मसौदा सूची में नहीं हैं, वे फॉर्म 6 के माध्यम से दावे और आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं.
ज्ञात हो कि 24 जून को एसआईआर की घोषणा करते हुए चुनाव आयोग ने कहा था कि यह प्रक्रिया कई कारणों से आवश्यक हो गई थी, जिनमें मतदाता सूची में ‘विदेशी अवैध प्रवासियों’ का शामिल होना भी एक वजह थी.
हालांकि, मंगलवार को चुनाव आयोग के बयान में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं था कि कितने विदेशी अवैध प्रवासी पाए गए.
इस संबंध में चुनाव आयोग ने 24 जून को अपने बयान में कहा था, ‘तेज़ी से हो रहे शहरीकरण, लगातार हो रहे प्रवास, युवा नागरिकों का मतदान के योग्य होना, मौतों की सूचना न देना और विदेशी अवैध प्रवासियों के नाम शामिल होने जैसे कई कारणों से गहन पुनरीक्षण आवश्यक हो गया है ताकि मतदाता सूची की शुद्धता और त्रुटि-रहित तैयारी सुनिश्चित की जा सके.’
मालूम हो कि पहली सूची में हटाए गए 65 लाख मतदाताओं में से 22 लाख मतदाता मृत घोषित कर दिए गए थे, जबकि 36 लाख स्थायी रूप से स्थानांतरित या लापता बताए गए थे. वहीं, इस सूची में सात लाख मतदाताओं के नाम कई जगहों पर दोहराए गए थे.
1 सितंबर तक दावे और आपत्तियां प्रस्तुत की गईं
उल्लेखनीय है कि एसआईआर की शुरुआत 25 जून को गणना प्रपत्र भरने के चरण के साथ हुई थी, जिसके बाद 1 अगस्त को मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित की गई थी. इसके बाद 1 सितंबर तक दावे और आपत्तियां प्रस्तुत करने का दौर चला.
मंगलवार को चुनाव आयोग के बयान में यह भी कहा गया है कि पात्र मतदाता चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि से दस दिन पहले तक मतदाता सूची में शामिल होने के लिए आवेदन कर सकते हैं.
बयान में कहा गया है, ‘अगर कोई पात्र व्यक्ति अभी भी मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करना चाहता है, तो वह चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख से दस दिन पहले तक आवेदन जमा कर सकता है.’
इससे पहले इस महीने की शुरुआत में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया था कि अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन के बाद भी दावे और आपत्तियां स्वीकार की जाएंगी.
ज्ञात हो कि सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती दी गई है, जिस पर शीर्ष अदालत सुनवाई कर रही है.
इस प्रक्रिया की आलोचना इस बात को लेकर हो रही है कि यह मतदाता सूची में संशोधन की आड़ में नागरिकता साबित करने की कोशिश और पिछले दरवाजे से एनआरसी लागू करने की एक प्रक्रिया है.
अदालत 7 अक्टूबर को अंतिम दलीलें सुनेगी
सुप्रीम कोर्ट एसआईआर को चुनौती देने वाले मामले में 7 अक्टूबर को अंतिम दलीलें सुनेगा. पिछली सुनवाई में अदालत ने कहा था कि मतदाता सूची के प्रकाशन के बावजूद अगर कोई अवैधता है, तो अदालत अभी भी हस्तक्षेप कर सकती है.
लाइव लॉ के अनुसार, जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था, ‘इससे (सूची के अंतिम प्रकाशन से) हमें क्या फर्क पड़ेगा? अगर हम संतुष्ट हैं कि कुछ अवैधता है, तो हम (अभी भी) हस्तक्षेप कर सकते हैं.’
गौरतलब है कि चुनाव आयोग द्वारा सूचीबद्ध 11 दस्तावेज़ों के कारण मतदाताओं के बहिष्कार को लेकर चिंताएं जताई गई थीं, जिनमें आधार, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड जैसे आसानी से उपलब्ध दस्तावेज़ शामिल नहीं थे.
इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने 8 सितंबर को चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि वह बिहार में मतदाता सूची के एसआईआर के दौरान पहचान के लिए पहले से मान्य 11 दस्तावेज़ों के साथ आधार को 12वें दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार करे.
इसके बाद चुनाव आयोग ने प्रक्रिया शुरू होने के कुल 77 दिनों के बाद 9 सितंबर को बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को निर्देश जारी किए कि 24 जून के आदेश में सूचीबद्ध 11 दस्तावेज़ों के साथ आधार को भी 12वें दस्तावेज़ के रूप में शामिल किया जाए.
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करते हुए चुनाव आयोग ने आगे कहा था कि आधार कार्ड को पहचान के प्रमाण के रूप में स्वीकार और उपयोग किया जाना है, न कि नागरिकता के प्रमाण के रूप में.
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