हमारे उजाले कब तक कुछ मुट्ठियों में कैद रहेंगे?

कोई तो बताए कि इस तरह अंधेरों को घना करते फिरने को अभिशप्त समाज अपने आम लोगों की दीपावली शुभ होने को लेकर आश्वस्त क्योंकर हो सकता है? खासकर तब, जब उसका सुखासीन हिस्सा अपने सुख व समृद्धि के लिए दूसरों के सारे सुख-चैन छीन लेने में कतई कोई बुराई नहीं देख रहा. इसके चलते गैरबराबरी और उसके जाए उत्पीड़न व शोषण हमारे आकांक्षा व प्रतीक्षा के द्वंद्वों का खात्मा ही नहीं होने दे रहे‌.

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(प्रतीकात्मक फोटो साभार: PxHere/Public Domain)

हो चित्त जहां भय-शून्य, माथ हो उन्नत/हो ज्ञान जहां पर मुक्त, खुला यह जग हो/घर की दीवारें बनें न कोई कारा/हो जहां सत्य ही स्रोत सभी शब्दों का/हो लगन ठीक से ही सब कुछ करने की/हों नहीं रूढ़ियां रचतीं कोई मरुथल/पाए न सूखने इस विवेक की धारा/हो सदा विचारों, कर्मों की गति फलती/बातें हों सारी सोची और विचारी/हे पिता! मुक्त वह स्वर्ग रचाओ हममें/बस उसी स्वर्ग में जागे देश हमारा.

विविधताओं से भरे इस विशाल देश के हम निवासी, यकीनन, उस उजास का, दीपावली से जिसके सच्चे प्रतिनिधित्व की अपेक्षा की जाती है, सच्चा अभिषेक तभी कर सकते हैं, जब गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा की गई इस प्रार्थना के सुर में अपने सुर मिलाएं. साथ ही, देश को ‘उस’ स्वर्ग में जगाने के प्रयत्नों के प्रति स्वयं को समर्पित कर परस्पर स्नेह के दीप जलाएं और उनके उजाले बांटें.

लेकिन अफसोस कि हमारे बीच के कितने ही स्वनामधन्यों ने इसकी सर्वथा उल्टी दिशा पकड़ ली है और ‘आप आप ही चरे’ की राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की काव्य पंक्ति को सार्थक करते हुए सारे उजालों को अलग-अलग अपनी-अपनी मुट्ठियों में कैद करने और उनकी कैद की उम्र लंबी करने लगे हैं. उनका वश चले तो खुद को छोड़ किसी और को इन उजालों की झलक भी न लगने दें.

कोढ़ में खाज यह कि देश की सत्ता भी इन स्वनामधन्यों के ही शुभ की चिंता में मगन है. तभी तो पिछले तेरह साल में देश में अरबपतियों की संख्या छ: गुनी बढ़ गई है और उनकी कुल सम्पत्ति देश के सकल घरेलू उत्पाद के आधे के बराबर हो चली है.

‘क्या-क्या खाएं!’ बनाम ‘क्या खाएं?’

दूसरी ओर देश को विश्वगुरु बनाने की लगातार बघारी जा रही शेखियों के बीच देशवासियों की प्रति व्यक्ति औसत आय दुनिया की प्रति व्यक्ति औसत आय की एक तिहाई भी नहीं है. इस औसत की गणना में अरबपतियों की आय शामिल न की जाए तो यह और नीचे आकर आम देशवासियों की बदहाली की ऐसी कहानी सुनाने लग जाता है. इसका लब्बोलुआब कुल मिलाकर यह है कि जहां कुछ लोगों की थाली में इतने व्यंजन हैं कि वे समझ नहीं पा रहे कि उनमें से क्या-क्या खाएं, वहीं ज्यादातर लोगों की थालियां पूरी तरह खाली हैं और उनकी समस्या है कि वे खाएं तो क्या खाएं या कब तक सरकारी राशन के मोहताज बने रहें?

इस जले पर नमक यह कि 2017 में जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बनाकर व्यापारियों व उपभोक्ताओं दोनों का कचूमर निकाल लेने वाली नरेंद्र मोदी सरकार अब उसमें थोड़ी कमी का भ्रम रचकर उनसे ‘बचत उत्सव’ मनाने और अपनी दीपावली शुभ कर लेने को कह रही है.

काश, वह देख पाती कि इस तरह उनकी दीपावली तो खैर क्या शुभ होगी, बचे-खुचे उजालों की छीना-झपटी के बीच नाना प्रकार के भयों, असुरक्षाओं व अविश्वासों से जन्मी परपीड़कताएं उनके एक हिस्से को बुरी तरह असामाजिक बनाए दे रही हैं. तिस पर सत्ता प्रतिष्ठान है कि इन परपीड़कताओं के खात्मे में लगने के बजाय खुद उनका लाभ उठाने के लिए एक तबके को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने और भिड़ाने में मगन है.

इसके जाए विभाजनों और भयों ने उसे यह ‘सुविधा’ भी उपलब्ध करा दी है कि वह किसी भी तरह के जनाक्रोश की आशंका से मुक्त रहकर एक समुदाय का उत्पीड़न कर दूसरे को ‘खुश’ करता रहे.

इससे फैलती सामाजिक संवादहीनता व संवेदनहीनता ने लोगों के दिलो-दिमाग में इतने असली-नकली भय भर दिए हैं कि उनको आसमान में उड़ती चीजें भी अंदेशों से भर दे रही हैं और डर के मारे वे इंसानियत और न्याय तक की हत्या पर आमादा हो जा रहे हैं. पिछले दिनों रायबरेली जिले में कुछ ऐसे ही डरे हुए लोगों ने अपनी पत्नी व बच्चों से मिलने जा रहे दलित हरिओम वाल्मीकि को ड्रोन उड़ाने वाला चोर समझकर पकड़ा, उसकी कुछ भी सुने बगैर उसे पीट-पीटकर मार डाला और उसके परिजनों की दीपावली अंधेरी कर दी. दूसरी ओर ऐसे भी दलित हैं जो चीफ जस्टिस और आईपीएस अफसर होने के बावजूद सुरक्षित और आश्वस्त अनुभव नहीं कर पा रहे.

भय, भूख और नफ़रत

कोई तो बताए कि इस तरह अंधेरों को घना करते फिरने को अभिशप्त समाज अपने आम लोगों की दीपावली शुभ होने को लेकर आश्वस्त क्योंकर हो सकता है? खासकर तब, जब उसका सुखासीन हिस्सा अपने सुख व समृद्धि के लिए दूसरों के सारे सुख-चैन छीन लेने में कतई कोई बुराई नहीं देख रहा. इसके चलते गैरबराबरी और उसके जाए उत्पीड़न व शोषण हमारे आकांक्षा व प्रतीक्षा के द्वंद्वों का खात्मा ही नहीं होने दे रहे‌.

सत्ताधीशों ने तो खुद को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के इस कथन तक का विलोम ही बना डाला है कि ‘जब तक मैं जिंदा हूं, मानवता पर देशभक्ति को हावी नहीं होने दूंगा’. जहां गुरुदेव को संकुचित राष्ट्रवाद कतई स्वीकार नहीं था, वर्तमान सत्ताधीशों को अपने तथाकथित राष्ट्रवाद को और संकुचित करते जाना छोड़कर कुछ रास ही नहीं आता. आता तो वे आंखें मूंदकर ऐसे कौतुक क्यों रचते रहते कि एक ओर अयोध्या में ‘दिव्य व भव्य’ सरकारी दीपावली हर साल दीपों की संख्या बढ़ाकर गिनीज बुक के अपने रिकार्ड नए करती रहे, दूसरी ओर रुपया गिरावट के नए-नए रिकार्ड बनाता रहे और भूख, महंगाई व बेरोजगारी के नंगे नाच अनेक लोगों को दीपावली को बुराई पर अच्छाई की जीत या सुख-समृद्धि का पर्व बताने से भी रोकने लग जाएं.
तिस पर अब वह स्थिति न्यू इंडिया का ऐसा न्यू नार्मल बन गई है, जिसमें सारे विरोध व असहमतियां खतरनाक अंदेशों के हवाले हो गई हैं, साथ ही नफरत को सद्भाव की छाती पर सवार कराकर उसका स्थायी भाव बना दिया गया है.

ऐसे में कौन कह सकता है कि दीपावली पर धूम-धड़ाके के बीच अपनी पूजा से प्रसन्न धन की देवी उन 80 करोड़ देशवासियों की ओर किस निगाह से देखेगी, जो अपनी भूख मिटाने के लिए सरकार के दिए उस राशन पर निर्भर हैं, जिसे ‘मुफ्त’ कहा जाता है. हालांकि मुफ्त वह है नहीं, क्योंकि प्रकारांतर से उसका बोझ भी वे ही उठाते हैं.

यह देवी अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों के आईने में देश में भुखमरी की स्थिति को देखेगी, साथ ही डालर के मुकाबले रुपए की रिकार्ड तोड़ गिरावट को, तो इन हालात से पीड़ित लोगों को ‘शुभ दीपावली’ कहते हुए क्या उसके होंठ कांपने नहीं लगेंगे?

क्या वह उस सरकार के नक्शे-कदम पर चल पाएगी, जो आम लोगों के जीवन-मरण से जुड़े किसी मुद्दे को लेकर किसी भी आधार या मंच पर घिरने लगती है तो उसका नोटिस लेने या कारण दूर करने के बजाय उसे देश का अपमान या उसके खिलाफ साजिश वगैरह बताने लग जाती या फिर हिंदू-मुसलमान और पाकिस्तान करने लग जाती है.

कैसा गणराज्य?

इतना ही नहीं, वह चाहती है कि देशवासी भूल जाएं कि देश के संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि हम भारत के लोग भारत को समता व बंधुत्व पर आधारित सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी गणराज्य बनाएंगे. क्योंकि उनको यह बात याद रहेगी तो पूछने लगेंगे कि यह कैसा समाजवादी गणराज्य है, जिसकी सत्ता देशवासियों के बड़े प्रतिशत के भूख व कुपोषण के पंजे में जकड़े होने को लेकर दुःखी होने के बजाय किसी सूचकांक में उसकी चर्चा को देश का अपमान बताने लग जाती है?

दुष्यंत कुमार ने कभी इन्हीं हालात को लेकर पूछा था: मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं? मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं. आज वे होते तो इस बात को और जोर देकर कहते, क्योंकि देखते कि ज्यादातर देशवासियों की जिन्दगियां उन्हें ‘जो छिपाने की थी, वह बात बताकर’ सजा दे रही हैं- धनकुबेरों द्वारा वैभव के उस प्रदर्शन को आदरणीय बनाकर, जो एक समय गहरी लज्जा का विषय हुआ करता था. धनकुबेरों का इस तरह अपने सारे लज्जाबोध को फलांग जाना, इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि उनके हिस्से आई सत्ता प्रायोजित जगर-मगर ने उनकी आंखों को इतना चाैंधिया डाला है कि वे अंधेरे में देखने को कौन कहे, अपने चारों ओर फैले उजाले के आर-पार भी नहीं देख पा रहीं.

लेकिन वे यह भ्रम न ही पालें तो ठीक कि अंधेरे में रहने को अभिशप्त देशवासियों की हालत भी उनकी जैसी ही है और वे भी अपने अंधेरों के पार कुछ नहीं देख पा रहे. क्योंकि ये देशवासी सब कुछ देख रहे हैं. न सिर्फ यह कि धनकुबेर किधर देख रहे हैं, बल्कि उन सत्ताधीशों की नजरें भी, जो धनकुबेरों की ही तरफ देख और एक कवि के शब्द उधार लेकर कहें तो बहुत संभल-संभल कर उनके लिए हितकारी अनुकूलित सत्य या झूठ बोल रहे हैं‌.

देशवासी जानते हैं कि उनका देश सच्ची दीपावली उस दिन ही मना पाएगा, जब किसी को भी संभल-संभलकर या अटक-अटक कर बोलने की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि तभी धनकुबेरों की तिजोरियों में कैद आम लोगों के उजालों की मुक्ति संभव हो पाएगी. अन्यथा तो आम लोग अस्पतालों में अपनों की मौत के बाद एम्बुलेंस तक के लिए तरसते और उनके रहनुमा लकदक लग्जरी वाहनों के काफिले में दनदनाते हुए उनके पास से गुजरते रहेंगे-उन्हें वर्चुअली हैप्पी दीवाली कहते हुए!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)