अनुत्तरित लोग: आदिवासी स्वर में गूंजती पृथ्वी की कविता

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कानजी पटेल के संपादन में हिंदी और अंग्रेज़ी अनुवाद में भारतीय समकालीन आदिवासी कविता संचयन ‘अनुत्तरित लोग’ में 141 भाषाओं के 382 कवियों की 700 कविताएं अपने मूल में हिंदी अनुवाद के साथ शामिल हैं. इस तरह यह भारत की आदिवासी कविता का सबसे वृहद संकलन है.

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भारत की आदिवासी कविता का इतना बड़ा संकलन इससे पहले कभी नहीं हुआ. (साभार: सेतु प्रकाशन)

1997 में जब आज़ादी के पचास साल पूरे हुए तो उस अवसर पर मैंने एक लेख टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा था जिसकी एक स्थापना यह भी थी कि उन पचास वर्षों में साहित्य संसार के बारे में अधिक और पृथ्वी के बारे में कम हो गया. पृथ्वी प्राकृतिक परिघटना है और संसार मनुष्य ने रचा है. पृथ्वी पृथ्वी ही बनी रहती, जैसे कि वह सभी अन्य प्राणियों, पशु-पक्षियों के लिए आज भी है, अगर उसे मनुष्य ने भाषा से संसार में न बदला होता. उसी भाषा में धीरे-धीरे पृथ्वी की उपस्थिति, उससे सरोकार कम हो गए.

गुजराती कवि कानजी पटेल ने इधर एक अद्भुत काम किया है. उनके संपादन में हिंदी और अंग्रेज़ी अनुवाद में भारतीय समकालीन आदिवासी कविता का संचयन ‘अनुत्तरित लोग’ शीर्षक से सेतु प्रकाशन से आया है. रज़ा फाउंडेशन ने वित्तीय सहायता दी है. इस अद्वितीय संचयन में 141 भाषाओं के 382 कवियों की 700 कविताएं अपने मूल में हिंदी अनुवाद के साथ शामिल की गई हैं.

भारत की आदिवासी कविता का इतना बड़ा संकलन इससे पहले कभी नहीं हुआ. एक स्तर पर यह संकलन संसार की नहीं, पृथ्वी की कविता का संग्रह है. आदिवासी आज भी पृथ्वी के नजदीक, उससे निरंतर संवाद में रहते हैं हालांकि संसार उन्हें वहां से बेदख़ल करने की हर चंद कोशिश करता रहता है. इस कोशिश का जो आदिवासी प्रतिरोध है वह भी इस कविता का एक ज़रूरी पक्ष है.

इस कविता पृथ्वी में सुषमा, विपुलता, वैभव, लालित्य, उसकी प्रकृति की अदम्यता और अक्षय सौंदर्य का, आदिवासी जिजीविषा के साथ, अन्याय और भेदभाव के प्रतिरोधक स्वर भी मुखर है. आदिम निश्छलता और ऐतिहासिक प्रतिरोध दोनों इस कविता के वितान को विपुल बनाते हैं. ऐसा लगता है कि यों तो सदियों से पृथ्वी अपनी कविता धन-धान्य, वनस्पति-वृक्षराजि-फूलों-पत्तियों, नदियों-निर्झरों, समुद्रों-जलप्रतापों, हिम शिखरों और पर्वत-पहाड़ियों की भाषा में लिखती-मिटाती रही है. अगर वह संसार की भाषा में कविता लिखती तो जो कविता होती वही, मानो आदिवासियों ने, संसार की भाषाओं में लिखी हैं.

संसार भले पृथ्वी को भूलता जा रहा है, पृथ्वी संसार का ध्यान रखती है. दिलचस्प यह है कि भारत का प्रायः कोई अंचल नहीं है जिसमें कोई न कोई आदिवासी समुदाय न रहता हो. प्रायः हर समुदाय नाचने-गाने के अलावा कविता भी लिखता है. शायद यह कहना अधिक सही होगा कि लिखता कम, कविता को नाचता-गाता अधिक है. उनके यहां कविता इस गहरे अर्थ में भी कला है कि वह अनिवार्यतः नृत्य-संगीत से जुड़ी है.

इस संचयन में ऐसी बहुत सारी भाषाएं हैं जिनके, कम से कम मैंने, पहले कभी नाम नहीं सुना था.

उनकी सूची बहुत लंबी है. कुछ उदाहरण भर: अंत्रुजी, बेडा, भान्तु, भिलौरी, चोलानायका, दिमासा, देहवाली, गोजरी, हक्की पिक्की, हुनफुल-तांगखुल, खोरठा, कोकबोरोक, कोड़ा, मालवेत्तुआ, पुरगी, थाडो, टिवा, तोतो, येराकुला. इतनी सारी बोलियों से हिंदी में अनुवाद करना-कराना एक अभियान से कम न रहा होगा.

आदिवासी कविता में जो ताज़गी-टटकापन अनिवार्यतः रहते हैं अनुवाद में लाना कठिन है. इसकी ईमानदार कोशिश अलबत्ता कवियों ने ज़रूर की है- कुछ आदिवासियों ने स्वयं अपनी कविताओं के हिंदी अनुवाद किए हैं. कुछ शीर्षक देखें तो इसका अंदाज़ कर सकते हैं कि कितनी तरह के विषय इन कविताओं में हैं: ‘स्याही की चाहत’, ‘एक ख्वाब देखा था’, ‘मेरी ज़मीन के लिए और तुम्हारे लिए’, ‘वे जो अनुत्तरित रहे’, ‘कब तक बचा जा सकता है’, ‘कितना पड़ेगा सहना’, ‘मेरा गोर सोने जैसा है’, ‘शिकार एक जीवनसंग्राम है’, ‘अतीत की बात नहीं करते’, ‘वाल्‍मिकी की बेटियां’, ‘दाड़की पर जाते आदिवासी बच्‍चे’, ‘तुम एक नदी हो’, ‘अगर तुम कभी आते’, ‘आग का बीज’, ‘वह कलम अब नहीं है’, ‘इलाज कर रहे आंसुओं की खोज’, ‘पेड़ का तना ही तेरा तीर्थ है’, ‘जैसा तैसा मकान तो मकान’, ‘हम बीज हैं, जंगली’, ‘बेटे का एक सवाल’, ‘मैं ज़रा देर से आऊँगा’, ‘वह स्वयं एक कविता है’, ‘मुमल याद रखना’, ‘लिखूँ या न लिखूँ’, ‘मरते हुए पहाड़’, ‘यहां अंधेरा है बेशुमार’, ‘ईश्वर की मौत निश्चित है’, ‘पहाड़ियों से एक प्रेमपत्र’ और ‘हम आये हैं’.

इन शीर्षकों से यह भी संकेत मिलता है कि आदिवासी कविता अपनी चिंताओं और उत्सुकताओं में समवर्ती नागर कविता से बहुत कुछ साझा करती है. यह भी कि आदिवासी जीवन के साथ जो अन्याय और अत्याचार, उसका जो शोषण हो रहा है उसका सजग बोध इन कवियों में है.

कुछ कविताओं के उद्धरण चुने हैं हालांकि वे संचयन की विपुलता से न्याय नहीं करते. जौनसारी के नारायण सिंह चौहान स्वानुवाद में कहते हैं:

किसी गीत की धुन आयी थी पहाड़ी के उस पार से,
न जाने कहां खो गई,
लड़की बारात लेकर जा रही थी इस पार से,
न जाने कहां खो गई
लड़कियां मेहमानों का जवाब गीत से दे रही थीं,
न जाने कहां खो गईं . . . .
पनचक्की से पिसे आटे को औरत चूल्हे पर सेकती थी,
न जाने कहां खो गई

मोटी-बोध के कवि ईशान मारवेल की नदी को संबोधित कविता का अंश है:

किसे ख़बर तुम्हारा अन्य जीवन भी हो
किसे ख़बर तुम जीवित रहो या मृत
किसे ख़बर तुम जलहीन और ख़ाली हो जाओ
एक दिन यह कौन बतायेगा सिवाय किसी दिवंगत के

आदि भाषा से कवयित्री आईनाम इरिंग की कविता का एक अंश:

जब शहर मुझे यहां से ले जायेगा
मैं शहर से जंगल की बातें करूंगी
कहते हैं कि शहर बहुत बोलता है
और किसी की सुनता ही नहीं.

कोकबारोक भाषा की कवयित्री चंद्रकान्ता मरासिंग अपनी एक कविता में कहती हैं:

पत्थर चुप था क्योंकि
दर्द उसका अकेला नहीं था
आज एक टूटे दिलवाला आदमी आया
अपनी स्नेहिता के साथ
पत्थर पर सपने और आंसू छिड़कते हुए
और चला गया ऊपर की धारा में खेते हुए
वे गहरे जंगल में अपना घर बसायेंगे
पानी बहता है, बिछी पत्तियां कांपती हैं
वीर हचकुराई अपनी बांस का बेड़ा खींचता है
नीचे एक बालुई लघुद्वीप पर बाज़ार है.
हैरान होकर, अब कौन जवाब देगा,
पत्थर जंगल में बोलता है
धनुष और तीर हाथ में.

मिसिंग भाषा के कवि त्रिरंजन टेड का यह कवितांश:

जब जंगल था
तब सुबह की चोंच पर
पृथ्वी की मुस्कान खुशी से गिरती थी
जब जंगल था
तब सुबह के कण्ठ पर
ज़िन्दगी का मुस्कराता चेहरा टपकता था.
तब, नदियां खुशियों और सपनों के घर तोड़ती
अहंकार से भरी मदमस्त नहीं थीं

ताशी चोपेल लेप्चा भाषा के कवि हैं. उनका कहना है:

हमारी आत्माएं हमेशा असाध्य थीं
यही बात जो वे कहते हैं
इसीलिए उन्हें दबाया गया
और ईमान के संरक्षकों को शपथ-बन्धन बनाया गया

गोजरी भाषा की कवयित्री नबीला अहमद की कविता ‘मुझे याद करना’ का अंश है:

जब गर्मियां लौट आयें
कुएं सूख जायें
पानी लाने के फेरे लगें बारी बारी
मुझे याद करना
जब अमावस्या आये,
आटे की लोइयां बनें, जौ की जगह गेहूं की रोटी बनें
मुझे याद करना
अब ईद आये
मुझे याद करना

रेखा खराड़ी ‘आसमान बरसे और टापरी रोये’ की शुरूआत यों करती हैं:

आसमान जब बरसता है
तो टापरा रोता है
टापरे में एक चारपाई है
जब टापरा टपकता है तो
हम चारपाई यहां-वहां खिसकाते हैं
ताकि हम भीग न जायें
चारपाई भीगी हुई है
कुछ भी सूखा नहीं है
एक गोदड़ी है जो दादी के कपड़ों से बनी है
जो गीली है…

आगे उनकी एक पंक्ति है कि ‘सिर्फ़ यही बता सकती हूं फ़िलहाल/अभी अंधेरा है’. यह कहा जा सकता है कि हमारे आदिवासी कविबंधु फ़िलहाल जो बता रहे हैं वह उन्हें ध्यान के उजाले में लाने और हमारे अंतःकरण का आयतन बढ़ाने के लिए काफ़ी है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)