रोहिंग्या मुसलमान जिन्हें भारतीय सत्ता ने समुद्र में फेंक दिया..

इस बरस भारत सरकार ने देश में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों को जबरन देश से बाहर करने के लिये उन्हें समुद्र में फेंक दिया. इस अमानवीय कृत्य की कथा कुछ बचे रह गये रोहिंग्या मुसलमानों ने हर्ष मंदर को सुनायी. पढ़िए इस त्रासदी की आपबीती...

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'मोदी सरकार की योजना हमारे रोहिंग्या लोगों को समुद्र में फेंकने की थी. उन्हें लगा था कि वे तैरकर किनारे पहुंचने से पहले ही मर जाएंगे या म्यांमार की सेना द्वारा मार दिए जाएंगे. पर उपरवाले को कुछ और मंज़ूर था.' (इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

यह 6 मई, 2025 की बात है.

उस रात पाकिस्तान स्थित आतंकी ढांचों पर मिसाइल हमला करके उन्हें ध्वस्त करने के लिए वायुसेना के विमान को भेजा जाना था. यह हमला 22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में 26 पर्यटकों की आतंकवादी हत्या के जवाब में किया जाना था. ठीक उसी रात राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में, पुलिस ने 40 से ज़्यादा रोहिंग्या शरणार्थियों को उठा लिया, जिनमें बूढ़े लोग, बीमार महिलाएं तथा पुरुष भी शामिल थे. उनके परिवारों को बताया गया कि उनके बायोमेट्रिक्स की जांच की जा रही है और वे जल्द ही लौट आएंगे.

लेकिन वे ग़ायब हो गए. तीन दिनों तक उनका कुछ पता नहीं चला. उनके परिवार उनकी सकुशल वापसी को लेकर चिंतित थे. कोई भी अधिकारी उनके सवालों का जवाब नहीं दे रहा था. फिर तीन दिन बाद, उनके प्रियजनों का फोन आया. परेशान परिवार एक जगह इकट्ठा हुए. उन्होंने जो कहानी सुनाई, वह उनकी कल्पना से परे था.

उन्हें पहले भारतीय वायु सेना के विमान से अंडमान द्वीप समूह ले जाया गया, फिर उन्हें एक नौसैनिक नाव में लाद दिया गया. जैसा कि उनमें से एक ने फोन पर भेजे गए एक रिकॉर्डेड मैसेज में बताया, ‘उन्होंने हमारे हाथ बांध दिए, हमारे हाथों से ख़ून बहने लगा और हमें सिर ऊपर-नीचे नहीं करने दिया… फिर उन्होंने हमें समुद्र में फेंक दिया, हममें से हर एक को एक लाइफ जैकेट दी गई, जिससे हम तैरकर समुद्र तट पर पहुंचे…’ समुद्र तट पर पहुंचकर जब उन्हें पता चला कि वे म्यांमार में हैं, तो वे डर गए. यह वही ज़मीन थी जहां से रोहिंग्या वर्षों पहले नरसंहार से बचने के लिए भागे थे.

दो वरिष्ठ मानवाधिकार वकील प्रशांत भूषण और कॉलिन गोंज़ाल्विस एक हफ़्ते बाद, 16 मई को, सर्वोच्च न्यायालय के सामने पेश हुए और निर्वासित रोहिंग्याओं की तत्काल वापसी, भविष्य में निर्वासन पर रोक और भारी मुआवज़ा देने की मांग की.

लेकिन भारत की सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा और वे अविचलित रहे. जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह ने याचिका में किए गए दावों को ‘काल्पनिक’, ‘ख़ूबसूरती से गढ़ी गई कहानी’ बताया, जिसमें ‘अस्पष्ट, टालमटोल करने वाले और व्यापक बयानों के समर्थन में कोई सामग्री नहीं है’.

जस्टिस कांत ने फटकार लगाते हुए कहा, ‘जब देश मुश्किल दौर से गुज़र रहा है, तब आप ऐसे काल्पनिक विचार सामने लाते हैं.’ उन्होंने हताश याचिकाकर्ताओं को कोई भी राहत देने से इनकार कर दिया.

हालांकि, इसके बाद आर्टिकल 14 और बीबीसी हिंदी ने उस चौंकाने वाली सच्चाई की पुष्टि की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ‘काल्पनिक’ और ‘ख़ूबसूरती से गढ़ी गई’ बताया था. म्यांमार में मानवाधिकारों की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत थॉमस एंड्रयूज़ ने निर्वासन को ‘अनुचित और अस्वीकार्य कृत्य’ बताया.

उन्होंने कहा, ‘मैं इस बात से बहुत चिंतित हूं कि यह उन लोगों के जीवन और सुरक्षा की घोर उपेक्षा प्रतीत होती है जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकता है. इस तरह की क्रूर कार्रवाई से मानवीय गरिमा को ठेस पहुंचती है और नॉन-रिफ़ाउलमेंट के सिद्धांत का गंभीर उल्लंघन होता है, जो अंतर्राष्ट्रीय क़ानून का एक मूलभूत सिद्धांत है जो राज्यों द्वारा व्यक्तियों को ऐसे क्षेत्र में वापस भेजने से रोकता है जहां उनके जीवन या स्वतंत्रता को ख़तरा हो.’

लेकिन म्यांमार में फंसे शरणार्थियों और भारत में उनके प्रियजनों के लिए, कुछ भी नहीं बदला.

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मैं तीन युवकों से मिला, जिनके परिवार म्यांमार के जंगलों में छिपे हुए हैं और सैन्य जुंटा तथा प्रतिरोध बलों के आपसी ख़ूनी युद्ध के बीच फंसे हुए हैं. जहां उनकी ज़िंदगी ख़तरे में है और आपराधिक गिरोहों के कारण ये ख़तरा और भी बढ़ गया हैं.

वे मुझे अपनी कहानी बताने के लिए उत्सुक थे. वे चाहते थे कि दुनिया को पता चले. मैं उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित था. मैंने उनसे कहा कि मैं उनकी पहचान उजागर नहीं करूंगा क्योंकि वे पहले से ही ख़तरों को झेल रहे हैं.

जिस युवक की कहानी मैं यहां सुना रहा हूं, उसने जवाब दिया, ‘आप मुझे क्यों बचाना चाहते हो? मैं तो पहले ही मर चुका हूं. दुनिया में जिनसे मैं प्यार करता हूं, वे सब मुझसे बिछड़ गए हैं. उनके ज़िंदा वापस लौटने की संभावना बहुत कम लगती है. तो फिर मैं क्यों ज़िंदा रहूं? दुनिया को मेरा नाम बताइए.’

मैं अब भी उसका नाम नहीं बता सकता. आगे मैं जो लिख रहा हूं वो उसी की कहानी है जो उसने मुझे सुनाई:

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भारत की तरह, मेरे म्यांमार में भी, विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग एक साथ मिलजुलकर रहते थे – मुस्लिम, ईसाई, हिंदू और बौद्ध. यह एक ख़ूबसूरत और शांत जगह थी.

लेकिन एक समय ऐसा आया जब बौद्ध उग्रवादियों ने रोहिंग्या मुसलमानों, ईसाइयों और बौद्धों पर हमला कर दिया. उन्होंने सबसे पहले जमात मस्जिद पर हमला किया था. मुसमलानों ने भी जवाबी हमला किया. फिर बौद्ध सेना ने हमारे घरों और धर्मस्थलों को जलाना शुरू किया, हमें मारना शुरू किया. इतने सालों बाद मुझे अब भी वह घटना याद है कि किस तरह उन्होंने एक बच्चे को उसकी मां की गोद से छीन लिया और बांस के तीर से उसकी हत्या कर दी. मैंने ये अपनी आंखों से देखा था.

मैं तब 7 साल का था. अब मैं 24 साल का हूं. ये लगभग 2007 की बात होगी. मेरे पिता एक बड़े किसान थे. हमारे पास बहुत सारी ज़मीनें, अनानास के बाग़ और सब्ज़ियों के खेत थे. वह अपनी उपज बांग्लादेश और भारत में बेचते थे.

मेरे माता-पिता हमें अपने गांव के मदरसे में क़ुरान पढ़ने के लिए भेजते थे. यदि सब सही रहा होता तो मैं भारत की तरह अपने गांव के सरकारी स्कूल, जहां सभी समुदायों के बच्चे एक साथ पढ़ते हैं, में किसी ग्रामीण लड़के की तरह पढ़ाई करता रहता.

लेकिन अचानक यह सब छिन गया. सेना ने हमारे नागरिकता के दस्तावेज़ छीन लिए और आदेश दिया कि हम नागरिक नहीं हैं इसीलिए हम अब स्कूल में नहीं पढ़ सकते. बौद्ध उग्रवादियों ने हमारे घर जला दिए. सेना ने हमारे खेत और बाग़ान ज़ब्त कर लिए. उन्होंने कहा कि हम यहां के नागरिक नहीं हैं इसीलिए हमें संपत्ति रखने का कोई अधिकार नहीं है.

आख़िरकार एक दिन मामला तब बिगड़ गया जब उग्रवादियों ने मेरी दादी को मार डाला. मेरे पिता को डर था कि अगला निशाना हम सब होंगे. इसलिए, आधी रात को हम चुपके से भाग निकले – मेरे दादा, मेरे माता-पिता और हम तीन छोटे भाई. हम पहाड़ियों पर चढ़ते रहे, दिन में छिपते रहे, रातों में पैदल चलते रहे, और आख़िरकार हम बांग्लादेश में प्रवेश कर गए.

हमारे गृह राज्य रखाइन की लंबी सीमा बांग्लादेश से मिलती है. बांग्लादेशी सेना और पुलिस ने हमें सीमा पर नहीं रोका. फिर भी यह एक ख़तरनाक रास्ता था, क्योंकि म्यांमार की सेना हमारे परिवार जैसे हज़ारों रोहिंग्याओं से बदला लेने के लिए सीमा पार मिसाइलें दाग़ सकती थी. वे बांग्लादेश सरकार को चेतावनी दे रहे थे कि हमें शरण न दें.

हम कॉक्स बाज़ार पहुंच गए, जहां दुनिया में सबसे ज़्यादा रोहिंग्या शरणार्थी एक विशाल शिविर में रह रहे हैं. हम वहां दो महीने तक एक प्लास्टिक के तंबू के नीचे रहे. लेकिन राहत शिविर के हालात बहुत ख़राब थे. मानसून में बाढ़ आई और उफनती नदी के पानी ने शरणार्थी शिविर को डुबो दिया. कई लोग बीमार पड़ गए और मर गए.

फिर मेरे माता-पिता ने फ़ैसला किया कि हम भारत आ जाएंगे. हमने भारत, उसकी इंसानियत और उसकी मानवता के बारे में बहुत अच्छी कहानियां सुनी थीं.

हम कितने ग़लत थे!

नावों से उतरते रोहिंग्या शरणार्थी. (फाइल फोटो: Flickr/Prachatai, CC BY-NC-ND 2.0 DEED)

मुझे याद नहीं कि हम कहां से भारत में दाख़िल हुए. मैं बहुत छोटा बच्चा था. शायद सिलीगुड़ी, शायद त्रिपुरा. मुझे बस यही याद है कि मेरे दादा और माता-पिता रात के अंधेरे में सीमा पार करने के लिए गर्दन तक नदी के पानी में पैदल चल रहे थे. मेरे पिता ने मुझे अपने कंधों पर उठा रखा था.

भारतीय सीमा पर तैनात भारतीय सैनिकों ने हमें नहीं रोका. उन्होंने हमसे पूछा कि हम किस देश से हैं. मेरे पिता ने बताया कि हम म्यांमार से आए रोहिंग्या हैं जो नरसंहार से बचकर आए हैं. उन्होंने सैनिकों को पैसे दिए. अगर हम बांग्लादेशी होते, तो वे हमें रोक लेते. लेकिन यह सुनकर कि हम शरणार्थी हैं, सैनिकों ने हमसे पैसे ज़रूर लिए, लेकिन फिर हमारी मदद भी की. इसीलिए मैं आज भी कहता हूं, भारतीय अच्छे लोग होते हैं.

हमारी तरह और भी रोहिंग्या थे जो भागकर आए थे. हमारा एक बड़ा समूह था. हम पहले ट्रेन से दिल्ली गए, और फिर अजनबियों से भरे इस बड़े शहर में रहते हुए हमारे समूह के बुज़ुर्गों ने इस बात की चर्चा की कि आगे क्या क़दम उठाए जाएं. उनमें से कुछ लोग अटक-अटककर हिंदी बोल रहे थे. हमें पता चला कि कई रोहिंग्याओं ने जम्मू में शरण ली है, और हमारे बुज़ुर्गों ने तय किया कि हमें वहीं जाना चाहिए.

हम जम्मू के एक बड़े कैंप में पहुंचे और वहां एक टेंट में फिर से ज़िंदगी शुरू की. कैंप के रहने वालों ने संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएचसीआर) में शरणार्थी कार्ड के लिए आवेदन करने में हमारी मदद की. हमें कार्ड तो मिल गया, लेकिन पता चला कि शरणार्थी कार्ड मिलने के बावजूद हमें भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला कोई अधिकार नहीं मिलेगा.

पिछली कांग्रेस सरकार ने कुछ रोहिंग्याओं को दीर्घकालिक वीज़ा दिए थे. लेकिन हमें यह वीज़ा नहीं मिला. शायद ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मेरे माता-पिता हिंदी नहीं जानते थे और भारतीय अधिकारियों से बातचीत नहीं कर सकते थे. मोदी राज में दीर्घकालिक वीज़ा पूरी तरह से बंद कर दिया गया है.

सरकार को ज़्यादा दयालु होना चाहिए. मेरे माता-पिता ने अधिकारियों को समझाने की कोशिश की कि हम भारतीय नागरिक नहीं बनना चाहते. हम आज भी इस उम्मीद में जी रहे हैं कि वह दिन आएगा जब म्यांमार में शांति बहाल होगी और हम अपने घर लौट सकेंगे. म्यांमार ही वह जगह है जहां हमारा दिल अब भी बसता है.

हम जम्मू के कैंप में लगभग सात महीने रहे. संयुक्त राष्ट्र ने कुछ महीनों तक कैंप में खाने का राशन मुहैया कराया, फिर उसे बंद कर दिया गया. जम्मू कैंप इंसानों के रहने लायक़ नहीं था. यह लगभग कॉक्स बाज़ार जितना ही बुरा था. हमने संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों से सलाह ली, जिन्होंने हमें दिल्ली जाने की सलाह दी.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

इसलिए हमारा परिवार ट्रेन पकड़कर वापस दिल्ली आ गया. दिल्ली में हम मदनपुर खादर के रोहिंग्या कैंप में चले गए. यहां का जीवन किसी स्लम से भी बदतर है. इतने सालों में रोज़मर्रा की ज़िंदगी बहुत मुश्किल रही है. कई परिवार कूड़ा बीनकर गुज़ारा करते हैं. मैंने बहुत कम उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था. कभी-कभी मैं किसी लेबर चौक पर खड़ा होता था और मुझे निर्माण कार्य के लिए ले जाया जाता था. कभी-कभी, मुझे किसी होटल में हाउसकीपिंग का अस्थायी काम मिल जाता था. 2020 से मैं टाइल बिछाने का काम करता रहा हूं. काम नियमित नहीं था, लेकिन जब मुझे काम मिलता था तो मैं प्रतिदिन 400 रुपये कमा लेता था.

दो बार हमारे प्लास्टिक और फूस के घर जल गए, और हर बार हमने उन्हें फिर से बनाया. हमें यक़ीन है कि किसी तरह की दुर्घटना के कारण आग नहीं लगा था. पहली बार, 2016 में, कुछ आरएसएस के लोग कैंप में आए और हमें धमकाया कि अगर हम ज़मीन ख़ाली करके अपने देश नहीं लौटे तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. उनके साथ कुछ अधिकारी भी थे.

हमने उनसे विनती की, अपनी हताशा बताई और उनसे कहा कि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है. जिस दिन वे लोग आए थे उसके दो दिन बाद ही पहली बार आग लगी, जिसमें कैंप जलकर तबाह हो गया.

2018 में दिल्ली के कालिंदी कुंज में स्थित रोहिंग्या बस्ती में लगी आग के बाद वहां बिखरी राख और अवशेष. (फाइल फोटो: मोअज़्ज़म अली)

मदनपुर खादर पुलिस स्टेशन के थाना प्रभारी ने टेंट लगाने में हमारी मदद की. हमने धीरे-धीरे अपने स्लम वाले घरों को फिर से बनाया. जो पहले से ज़्यादा कमज़ोर हो गए थे, क्योंकि ठीक से बनाने के लिए हमारे पास पैसे नहीं थे. और फिर कुछ साल बाद, 2020 में, एक बार फिर आग लग गई. और हमें एक और घर फिर से बनाना पड़ा, जो और भी कमज़ोर था.

यूएनएचसीआर के कर्मचारियों ने हमें झुग्गी बस्ती से निकलकर एक कमरा किराए पर लेने की सलाह दी. हमारे लिए किराया देना मुश्किल था, लेकिन हम इस बात पर सहमत थे कि पक्के कमरे में रहना ज़्यादा सुरक्षित होगा. लेकिन पुलिस आ गई और मकान मालिक को गुमराह कर दिया, इसलिए उसने हमें कमरा ख़ाली करने को कहा और हम फिर से झुग्गी बस्ती में आ गए.

जैसे-जैसे साल बीतते गए, मेरी मां की दिमाग़ी हालत ख़राब होती गई. मेरे बड़े भाई मौलाना बन गए. मेरे पिता को शुगर की बीमारी हो गई और कई दिनों तक उन्हें काम करने में भी तकलीफ़ होती थी. मेरे भाई झुग्गी बस्ती के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर कुछ हज़ार रुपये कमाते थे. इस तरह ज़िंदगी चलती रही.

मेरी मां ने ज़िद की कि मैं शादी कर लूं. उन्होंने कहा कि घर और बुज़ुर्गों की देखभाल के लिए कोई तो होगा. 2020 में मेरे माता-पिता ने मेरी शादी कर दी. लड़की हमारे समुदाय से नहीं थी. वह बेसहारा थी. दुनिया में उसका कोई नहीं था. मुझे नहीं पता कि वह कहां से आई थी. वह घर-घर जाकर खाना और मदद मांगती थी. मेरे माता-पिता को उस पर तरस आ गया और उन्होंने तय किया कि मुझे उससे शादी कर लेनी चाहिए. उन्होंने मेरी इजाज़त नहीं ली. निकाह से पहले मैं उससे मिला भी नहीं था.

लेकिन मैं उसके साथ ख़ुश हूं.

मैंने और भी ज़्यादा मेहनत करनी शुरू कर दी, रात के 9 बजे तक ओवरटाइम करने लगा. मेरी पत्नी गर्भवती हुई, लेकिन पहला बच्चा उसके पेट में ही मर गया. अब मृत बच्चे को उसके पेट से कैसे बाहर निकाला जाए. हमें सरकारी अस्पताल में बिस्तर नहीं मिल पाता. वे आधार कार्ड मांगते हैं, जो हमारे पास है नहीं. लेकिन मैंने थोड़े पैसे बचाए थे. इन पैसों से मैं उसे मालवीय नगर के एक निजी अस्पताल ले जा सका, जिससे उसकी जान बच गई. उन्होंने उसके शरीर से मृत बच्चे को निकालने के लिए मुझसे 5,500 रुपये लिए.

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नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद राज्य प्रशासन हम रोहिंग्या लोगों के प्रति और भी ज़्यादा आक्रामक हो गया. 2020 की एक शाम जब मैं काम से लौट रहा था, अचानक कुछ पुलिसवालों ने मुझे पकड़ लिया और कालिंदी कुंज पुलिस स्टेशन ले गए. जब मैं पुलिस स्टेशन पर इंतज़ार कर रहा था, तो वे मेरे माता-पिता, मेरी पत्नी, मेरे भाई को भी ले आए और हम सभी को एक वैन में ठूंस दिया.

हम डर गए और पूछा, ‘आप हमें कहां ले जा रहे हैं?’ कुछ पुलिसवालों ने हमें ताना मारा और कहा कि हम तुम्हें तुम्हारे देश वापस भेज रहे हैं. लेकिन कुछ ने कहा, चिंता मत करो, हम तुम्हें वसंत विहार स्थित यूएनएचसीआर कार्यालय ले जा रहे हैं. लेकिन जब वे हमें ले जा रहे थे, मुझे अंदाज़ा हो गया कि हम वसंत विहार नहीं जा रहे हैं.

किसी मोड़ पर उन्होंने वैन रोकी और स्थानीय लोगों से पूछा, ‘बंगालियों को कहां बंद किया जाता है?’ और इस तरह हम इंद्रलोक स्थित डिटेंशन सेंटर पहुंच गए. डिटेंशन सेंटर की सुरक्षा नगालैंड पुलिस करती है. वे अच्छे लोग हैं. हमारे पूरे परिवार को कैंप में धकेल दिया गया और हमें एक बैरक में बंद कर दिया गया. वहां लगभग 60 और लोग थे, सभी हमारी तरह रोहिंग्या थे. औरतों और आदमियों को अलग कर दिया गया था.

दर बदर भटक रहे रोहिंग्या शरणार्थी. (फाइल फोटो: अंकित राज/द वायर हिंदी)

मेरी पत्नी मां बनने वाली थी, उसका तीसरा महीना था, और मैं उसके लिए बहुत चिंतित था. फिर हम सब खाने के लिए लाइन में लग गए. खाना बहुत ही घटिया था, ज़हर जैसा. आपको पता है पंक्चर टायरों की मरम्मत करने वाले सोल्यूशन से जैसी गंध आती है, वह कैसी होती है? खाने से भी ठीक वैसी ही गंध आती थी. आज पांच साल बाद भी मुझे कभी उस खाने का स्वाद महसूस होता है और उबकाई आ जाती है.

खाने के बाद शाम की नमाज़ का समय हो गया था. हम सब नमाज़ पढ़ने के लिए इकट्ठा हुए, लेकिन अचानक मैं बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ा. जब होश आया, तो पाया कि मैं अस्पताल में हूं. करीब चार दिन बाद, मुझे वापस कैंप भेज दिया गया. वही खाना खाने के बाद मेरी हालत और बिगड़ती गई. मैं अक्सर खाना खाते ही बेहोश हो जाता था.

मेरी गर्भवती पत्नी को उबले अंडे खाने की बहुत इच्छा हो रही थी. मैंने उससे कहा- हमें ऐसी जगह बंद कर दिया गया है जहां से हमें दिन का उजाला तक दिखाई नहीं देता. मैं तुम्हारे लिए अंडे कैसे लाऊं? लेकिन वहां एक दयालु महिला गार्ड थी. वह उसे अंडे लाकर देती थी. बेशक, हमारे पास उसे देने के लिए पैसे नहीं थे, लेकिन वह दयालु थी.

नगा गार्ड भी अच्छे लोग थे. लेकिन गृह मंत्रालय के कर्मचारी बहुत बुरे थे. वे बदतमीज़ी से पेश आते थे और हमें गालियां देते रहते थे. वे ज़्यादातर हरियाणवी थे, इसलिए हमें उनकी गालियों का मतलब समझ नहीं आता था.

एक दिन मेरी पत्नी भी बाथरूम में बेहोश हो गई. मैं उसे उठाकर बाहर ले गया और हमें फिर से अस्पताल भेज दिया गया. उन्होंने ज़ंजीर लगाकर उसे बिस्तर से और मुझे कुर्सी से बांध दिया. डॉक्टर ने कहा कि वह गर्भवती है, कम-से-कम उसे ज़ंजीरों से तो आज़ाद कर दो, लेकिन अधिकारी नहीं माने.

यूएनएचसीआर के अधिकारियों द्वारा की गई विनती के बाद गृह मंत्रालय के अधिकारी आख़िरकार मेरी पत्नी और मुझे रिहा करने पर राज़ी हो गए ताकि वह सुरक्षित रूप से अपने बच्चे को जन्म दे सके. लेकिन हमने डिटेंशन सेंटर छोड़ने से इनकार कर दिया, हमने कहा कि वे मेरे माता-पिता को भी रिहा करेंगे तभी हम जाएंगे.

अधिकारियों ने हमें समझाया; उन्होंने कहा कि अगर हम डिटेंशन सेंटर नहीं छोड़ेंगे तो हमारा बच्चा मर जाएगा, लेकिन हम अड़े रहे. आख़िरकार, अधिकारियों ने नरमी दिखाई और पूरे परिवार को रिहा कर दिया गया. तब तक हम चार महीने जेल में बिता चुके थे.

कुछ महीनों बाद हमारे बच्चे का जन्म हुआ. हम अस्पताल का ख़र्च नहीं उठा सकते थे, इसलिए उसने हमारे स्लम वाले घर में ही बच्चे को जन्म दिया. लेकिन उसके बाद अधिकारी मेरे माता-पिता को लेने वापस आए और उन्हें वापस डिटेंशन सेंटर में ले गए. मेरे माता-पिता बहुत बीमार थे. मेरी मां ने बोलना बंद कर दिया था; वह बस ऐसे ही हाथ पकड़े रहती थीं.

मैंने आवेदन पर आवेदन लिखे – मेरे पास दो बोरी अर्ज़ियां भरी हैं, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ. उन्होंने हमें उनसे मिलने भी नहीं दिया. उन्हें तीन साल हिरासत में रखा, 2023 तक. रिहाई के बाद, मुझे आइसक्रीम बेचने का काम मिला. जो भी बिक्री होती थी उसका 15% कमीशन के रूप में मिलता था. जब मेरे माता-पिता डिटेंशन सेंटर से बाहर आए, तो मैंने अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उनके इलाज पर ख़र्च कर दिया.

आख़िरकार, छह महीने पहले मेरे बड़े भाई की शादी हुई. मेरी पत्नी ने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया.

दो साल बीत गए, और फिर मई 2025 आ गया. कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद का ग़ुस्सा था. हमारी ज़िंदगी हमेशा के बदल जाने वाली थी.

6 मई की रात. जब विमान पाकिस्तान पहुंचे, पुलिस हमारे घर आई. मेरे पिता, मेरे भाई और उसकी पत्नी, मेरे अविवाहित छोटे भाई और हमारे आस-पड़ोस के कई अन्य लोगों को हिरासत में ले लिया. वे घबरा गए, लेकिन अधिकारियों ने कहा, ‘चिंता मत करो, सिर्फ़ तुम्हारे बायोमेट्रिक्स रिकॉर्ड करने के लिए हम तुम्हें डिटेंशन सेंटर ले जा रहे हैं.’

लेकिन वे पहले ही सबके बायोमेट्रिक्स ले चुके थे. ‘नहीं, कुछ ग़लतियां रह गई हैं’. हालांकि, हर व्यक्ति के बायोमेट्रिक्स में ग़लतियां कैसे हो सकती हैं?

मैं अपनी पत्नी के साथ अस्पताल में था, जिसका एक और गर्भपात हो गया था. वह मुश्किल से चल पा रही थी. मैंने एक दिन पहले ही अपने भाई को फोन किया था, और उससे कहा था कि वह मेरी मां को अस्पताल पहुंचा दे ताकि वह हमारे तीन छोटे बच्चों की देखभाल कर सके.

एक महिला पुलिसकर्मी ने फोन करके पूछा कि मैं, मेरी मां और पत्नी कहां हैं. मैंने बताया कि हम अस्पताल में हैं. उसने मुझसे पता पूछा. एक घंटे बाद पुलिस की एक टीम अस्पताल पहुंची. पुलिसकर्मियों ने डॉक्टर को बुलाया और उसे कड़ी फटकार लगाई. ‘इन घुसपैठियों का इलाज करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? क्या तुम्हें पता नहीं कि ये बांग्लादेशी और पाकिस्तानी हैं? इन्हें तुरंत छुट्टी दे दो.’

डॉक्टर ने उदास होकर काग़ज़ों पर हस्ताक्षर किया और हमें छुट्टी दे दी. फिर पुलिस मेरी मां, पत्नी और बच्चों को घसीटकर एक वैन में ले गई. उन्होंने मुझे भी खींचकर वैन में बिठाया और मेरी पिटाई की.

बीते कुछ समय से रोहिंग्या शरणार्थियों के देश में रहने का खासा विरोध हो रहा है. (फोटो: मोअज़्ज़म अली)

पुलिस स्टेशन पर पुलिस अधिकारियों ने कुछ देर तक बातचीत की, फिर हमारे छोटे बच्चों की वजह से उन्होंने मुझे और मेरी पत्नी को जाने देने का फ़ैसला किया. लेकिन उन्होंने मेरी मां को बुरी तरह से घसीटकर वैन में वापस डाल दिया और वैन चली गई. उनके साथ वे थाने में मौजूद दूसरे रोहिंग्या लोगों को भी ले गए, जिनमें बच्चे भी शामिल थे.

जब मैंने देखा कि मेरी मां और बच्चों को जानवरों की तरह घसीटा जा रहा है, तो मैं यह बर्दाश्त नहीं कर सका. मेरी सांस लगभग रुक-सी गई. फिर मैंने बेचैन होकर अपने भाई को फोन किया. उसने बताया कि वे हमारे बायोमेट्रिक्स की जांच नहीं कर रहे हैं. उन्होंने वैन में सवार सभी लोगों के फोन छीन लिए थे. लेकिन मेरे भाई ने अपना फोन अपने शरीर में ऐसी जगह छिपा लिया था कि वे उसे ढूंढ नहीं पा रहे थे.

उसने कहा मुझे लगता है कि वे हमें म्यांमार वापस भेज रहे हैं. उसने मुझसे कहा कि मैं तुरंत यूएनएचसीआर के अधिकारियों और उन मानवाधिकार वकीलों को फोन करूं जिन्होंने पहले उनकी मदद की थी.

‘उन्हें तुरंत आने के लिए कहो, वरना हमें डिपोर्ट कर दिया जाएगा.’ मैंने उनकी बात मान ली और सबसे संपर्क किया. जब मैंने यूएनएचसीआर के अधिकारियों से संपर्क किया तो उन्होंने मुझसे कहा है कि जो कुछ हो रहा है मैं उसमें सहयोग करूं और दख़ल न दूं. उनकी बात सुनकर मैं हैरान रह गया. फिर उन्होंने मेरे फोन का जवाब देना बंद कर दिया. कोई वकील भी उनकी मदद के लिए नहीं आया.

इसके बाद मेरे भाई ने मुझे एक निराशाजनक रिकॉर्डिंग भेजी कि उन्हें ग़ाज़ियाबाद स्थित हिंडन हवाई अड्डे ले जाया जा रहा है, जो भारतीय वायुसेना का अड्डा है. पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग बसों में ठूंसा गया था. क़ाफ़िले में दो पुलिस जीप आगे और दो पीछे थी.

यह आख़िरी बार था जब मुझे उनकी कोई ख़बर मिली.

तीन दिनों तक हम बेसब्री से उनकी ख़बर का इंतज़ार करते रहे, लेकिन सन्नाटा पसरा रहा. कोई फोन नहीं लगा, कोई ख़बर नहीं मिली.

फिर, 9 मई को, हमें म्यांमार के कुछ मछुआरों का फोन आया. हम सब इकट्ठा हो गए. मैंने अपने भाई से बात की और उनसे उनकी कहानी जानी.

हिंडन में उन सभी को वायुसेना के एक विमान में ठूंस दिया गया. उनके हाथों में हथकड़ियां और पैरों में बेड़ियां लगा दी गईं और उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई. वे हिंदू हैं या मुसलमान इसकी पुष्टि करने के लिए उनकी पतलून नीचे करवाई गई. उनमें से कई ईसाई रोहिंग्या थे, लेकिन सैनिकों ने उन्हें और भी ज़्यादा पीटा, उन्हें इस बात की शिकायत थी कि उन्होंने हिंदू धर्म अपनाने के बजाय ईसाई धर्म क्यों अपनाया.

विमान में वर्दीधारी लोगों ने उन्हें बंदूक़ों के कुंदों से पीटा और ताना मारते हुए कहा, ‘पहलगाम में हुए आतंकी हमलों के लिए तुम ज़िम्मेदार हो. तुम हमारे देश पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे हो.’

कष्ट भरी यात्रा के बाद विमान अंडमान द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर में उतरा. फिर उन्हें एक वैन में ठूंसकर एक बंदरगाह ले जाया गया, जहां उन्होंने एक नौसैनिक जहाज़ देखा. जहाज़ के अंदर, फिर से ज़ंजीरें, हथकड़ियां और आंखों पर पट्टी. वे डरे हुए थे. सैन्य वर्दी पहने अधिकारियों ने उनसे कहा, ‘तुम भारत में नहीं रह सकते. हम तुम्हें म्यांमार या इंडोनेशिया ले जा सकते हैं. तुम कहां जाना चाहोगे?’

उन्होंने निश्चित रूप से इंडोनेशिया को चुना; म्यांमार का मतलब होगा उस स्थिति में वापस लौटना जहां वे नागरिक नहीं होंगे और जेल जाने या मारे जाने की संभावना अधिक होगी. आंखों पर पट्टियां बांध दी गईं और ज़ंजीरों में जकड़ दिया गया. उन्हें अपने साथ लेकर जहाज़ रवाना हो गया. मेरे भाई ने बताया कि उनकी कलाइयों पर इतनी कसकर रस्सियां बांधी गई थीं कि उनमें से कई की कलाइयों से ख़ून बहने लगा. नौसैनिकों ने उन्हें सिर नीचे करके बैठने का आदेश दिया. अगर वे सिर उठाते, तो उन्हें बुरी तरह पीटा जाता.

नाविक उन्हें ताना मारते रहे, ‘तुम वही लोग हो जिन्होंने पहलगाम में हमारे लोगों को मारा था. तुम सब आतंकवादी हो.’ उन्होंने उनका मज़ाक़ उड़ाया, ‘अगर हम तुम्हें समुद्र में फेंक भी दें, तो भी तुम्हारे लिए बोलने वाला कोई नहीं होगा, क्योंकि तुम लोग ऐसे लोग हो जिनका कोई राष्ट्र नहीं है.’

कुछ घंटों बाद आंखों पर से पट्टियां और ज़ंजीरें खोल दी गईं. उन्हें लाइफ जैकेट पहना दिया गया, और एक-एक करके उन्हें जहाज़ से समुद्र में फेंक दिया गया. मुझसे बात करने वाले युवक ने दर्द भरी आवाज़ में बताया, ‘उन्हें इस तरह फेंका गया, जैसे वे कूड़ेदान में पड़ा कचरा हों.’

तटरेखा दिखाई दे रही थी. नौसैनिक जहाज़ के रवाना होते ही वे तेज़ी से तैरकर किनारे पर पहुंच गए. कुछ लोग बहुत कमज़ोर थे और तैर नहीं सकते थे, लेकिन बाक़ियों ने उनकी मदद की. कुल मिलाकर 40 लोग तटरेखा पार करके सूखी ज़मीन पर पहुंच गए. पहले तो उन्हें लगा कि वे इंडोनेशिया में हैं. लेकिन जब उन्होंने सड़क पर लगे साइन देखे, तो उन्हें एहसास हुआ कि वे म्यांमार में हैं. उनके अंदर दहशत समा गई. मानो मौत का वारंट जारी हो गया हो.

उनके पास खाना-पानी नहीं था. कुछ घंटों बाद उन्हें दूर एक नाव दिखाई दी. उन्हें डर लगा कि ये सैनिक हो सकते हैं. उन्होंने तुरंत सोचा, और उन्हें ऐसा लगा कि अगर वे सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दें, तो उनके बचने की संभावना थोड़ी बेहतर होगी. फिर उन्होंने अपने कपड़े लहराए और नाव को आवाज़ दी. जब नाव किनारे पर लगी, तो उन्हें बड़ी राहत मिली, क्योंकि वह एक मछली पकड़ने वाली नाव थी.

उन्होंने अपनी कहानी मछुआरों को सुनाई, जो सहानुभूति रखने वाले दयालु लोग थे. मछुआरों ने उन लोगों को पानी और खाना दिया, और उन्हें अपने मोबाइल फोन इस्तेमाल करने दिए.

9 मई की सुबह, मछुआरों के फोन से ही उन्होंने हमें फोन किया और हमें उनकी हैरान कर देने वाली और ख़ौफ़नाक कहानी पता चली.

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इसके बाद हमने कुछ वरिष्ठ वकीलों से संपर्क किया जो हमारी मदद कर रहे थे, और उन्होंने हमारे लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की.

जब हमारे परिवार वालों को एहसास हुआ कि वे म्यांमार में हैं, तो उन्हें म्यांमार की सेना द्वारा पकड़े जाने का डर सताने लगा. लेकिन यह किसी चमत्कार जैसा था कि जिस जगह भारतीय नौसेना ने उन्हें समुद्र में फेंका था उसके पास की ज़मीन उन प्रतिरोध बलों के नियंत्रण में थी जो सैन्य जुंटा से लड़ रहे थे. ये बल आंग सान सू की के प्रति वफ़ादार थे.

2021 में सेना द्वारा आंग सान सू की की गिरफ़्तारी के बाद, उनकी पार्टी ने देर से ही सही, रोहिंग्या लोगों के म्यांमार की नागरिकता के अधिकार को मान्यता दी और उनके साथ हो रही हिंसा को नरसंहार माना.

9 मई को फोन पर हमारे परिवार के लोगों से बातचीत हुई, उसके बाद कई हफ़्तों तक उनसे हमारा कोई संपर्क नहीं हुआ. हम उनकी चिंता में घुले जा रहे थे. हम साथ बैठकर रोते थे. हमारे जैसे नौजवान भी इस चिंता में कुछ समय के लिए छिप गए थे कि हमें भी उठा लिया जाएगा. हमने अमेरिका में शरण लेने वाले कुछ रोहिंग्या लोगों को बार-बार फोन किया, जिनके बारे में हमें जानकारी थी कि म्यांमार के प्रतिरोध बलों के साथ उनके संपर्क हैं. आख़िरकार उनकी मदद से 20 जुलाई को हमने अपने परिवार वालों से वीडियो कॉल पर बात की.

हमने उस दिन वीडियो कॉल पर उन सभी को ज़िंदा देखा. हम राहत और ख़ुशी से भर गए. यह भी चमत्कार जैसा था. वे म्यांमार के तनिनथारी क्षेत्र में थे जो थाईलैंड की सीमा से लगा है. फिर सितंबर के अंत में हमारी उनसे एक और बार बात हुई.

उन्होंने बताया कि उन्हें पहाड़ों के बीच एक लकड़ी के शेड में आश्रय दिया गया है. उनकी सुरक्षा प्रतिरोध बल, बा हतू सेना के 20 सैनिक कर रहे थे. हमने प्रतिरोध बल के कमांडेंट से भी बात की.

उन्होंने हमसे कहा, ‘यह सच है कि हम अलग-अलग धर्मों के हैं. लेकिन मानवता की ख़ातिर, हम आपके लोगों की रक्षा कर रहे हैं. हालांकि, हमारे पास बहुत कम संसाधन है. हमारे पास जो थोड़ा-बहुत पैसा बचा है, उससे हम उन्हें खाना खिलाते हैं और ख़ुद भी खाते हैं. हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि जब तक वे सुरक्षित स्थान पर नहीं पहुंच जाते, हम उनकी सुरक्षा करते रहेंगे.’

दिल्ली में रोहिंग्या लोगों की एक बस्ती. (फाइल फोटो: हिना फातिमा/द वायर)

म्यांमार में हमारे लोगों से जब बात हुई तो बात करते हुए वे लोग रोने लगे. उन्होंने कहा, ‘हर दिन एक साल जैसा लगता है. हमारे पास ज़िंदा रहने और अपने परिवारों से मिलने का एकमात्र मौक़ा तभी है जब हम सीमा पार करके थाईलैंड पहुंचें. लेकिन जो तस्कर सीमा पार कराते हैं, उन्हें प्रति व्यक्ति एक लाख भारतीय रुपये चाहिए. यह हमारे लिए असंभव है.’

उन्होंने बताया कि सैन्य जुंटा ने उनका ठिकाना ढूंढ लिया था और उन्हें पकड़ने की कोशिश की थी. इन चार महीनों में उन्हें चार बार अपना ठिकाना बदलना पड़ा. और ख़तरा सिर्फ़ सेना से ही नहीं था. मानव तस्करों के माफ़िया भी हैं जो उन्हें पकड़कर दूसरे देशों में ग़ुलामी के लिए बेचना चाहते हैं.

कई बार उन्हें सुरक्षित जगह पहुंचने के लिए सुबह 3 बजे तैरना पड़ा. उन्हें नहीं पता कि कब तक उन्हें ऐसे ही बार-बार भागना पड़ेगा.

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मोदी सरकार की योजना हमारे लोगों को समुद्र में फेंकने की थी. उन्हें लगा था कि वे तैरकर किनारे पहुंचने से पहले ही मर जाएंगे या म्यांमार की सेना द्वारा मार दिए जाएंगे, और किसी को पता भी नहीं चलेगा. लेकिन ईश्वर ने उन्हें बचाने का फ़ैसला किया.

फिर भी हम हर दिन उम्मीद के साथ जीते हैं. हमें नहीं पता कि हम अपने प्रियजनों को कभी ज़िंदा देख पाएंगे भी या नहीं. या हम भी एक दिन समुद्र में फेंक दिए जाएंगे.

(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की‘कोलिका’नामक संस्था से जुड़े हैं.)