दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के समाजशास्त्र विभाग का साप्ताहिक कार्यक्रम रद्द हुआ: ध्वस्त होती अकादमिक परंपराएं

पिछले 11 वर्षों से देश के लगभग हर शिक्षा संस्थान में बौद्धिक गतिविधियों पर प्रशासन का नियंत्रण सख़्त होता जा रहा है. पाठ्यक्रमों के मामले में अब विभाग आज़ाद नहीं हैं. कोई गोष्ठी आयोजित नहीं की जा सकती. मात्र ‘राष्ट्रवादी’ विषयों और वक्ताओं को अब जगह दी जाती है. विश्वविद्यालय बौद्धिक मूर्च्छा में बस सांस ले रहे हैं. उनके जीवित होने का भ्रम है.

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(फोटो साभार: फेसबुक)

दिल्ली विश्वविद्यालय में एक और अकादमिक परंपरा के ध्वस्त होने का ख़तरा है. दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के समाजशास्त्र विभाग में पिछले 6 दशकों से चले आ रही शुक्रवारी वार्ता का 31 अक्तूबर का संस्करण नहीं हो पा रहा है क्योंकि विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने विभागाध्यक्ष को आदेश दिया कि वे इसे रद्द कर दें.

वार्ता की संयोजक प्रोफेसर नंदिनी सुंदर को अध्यक्ष ने बतलाया कि उन्हें यह निर्देश अधिकारियों ने दिया है, मौखिक रूप से. नंदिनी ने आदेश लिखित मांगा और कारण भी जानना चाहा. तब कुलसचिव ने वॉट्सऐप के माध्यम से बताया कि प्रशासनिक कारणों से इसे रद्द किया गया है.

प्रशासनिक कारण बहुत अस्पष्ट पद है. आख़िर हर शुक्रवार को पिछले कई दशकों से अबाधित चलने वाली एक विभागीय गतिविधि से प्रशासन में क्या बाधा पड़ रही थी? अपने इस आदेश में प्रशासन ने इसकी व्याख्या की ज़रूरत महसूस नहीं की.

अधिकारियों ने अध्यक्ष को जो नहीं बतलाया, वह बाद में मीडिया को स्पष्ट किया. कुलपति और कुलसचिव ने कहा प्रशासन को अपेक्षा है कि ऐसे कार्यक्रमों की सूचना उन्हें मिलनी चाहिए.

‘द प्रिंट’ के मुताबिक़ कुलसचिव ने कहा कि ‘हर विश्वविद्यालय में एक प्रक्रिया का पालन करना होता है, और दिल्ली विश्वविद्यालय में विभागों को किसी कार्यक्रम के लिए प्रशासन से अनुमति लेनी होती है और पहले से इसकी जानकारी देनी होती है. लेकिन इस व्याख्यान के लिए ऐसी कोई अनुमति नहीं ली गई थी.’

यह पहले कभी नहीं कहा गया था. लेकिन प्रशासन को अतीत या परंपरा से मतलब नहीं. उनके मुताबिक़, ‘हमें नहीं पता कि पहले क्या हो रहा था, लेकिन अब नियम स्पष्ट हैं— और ये सभी विभागों पर समान रूप से लागू होते हैं. प्रशासन ने जून में संस्कृत विभाग का एक कार्यक्रम और अगस्त में राजनीति विज्ञान विभाग का एक अन्य कार्यक्रम रद्द कर दिया, क्योंकि उन्होंने पूर्व अनुमति नहीं ली थी.’

उन्होंने आगे जोड़ा, ‘हम इस नियम के बारे में सभी विभागों को कई बार लिख चुके हैं.’

यह हमारे लिए चिंता की बात होनी चाहिए कि संस्कृत और राजनीति शास्त्र विभाग में किसी ने इसके बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ भी कहना ज़रूरी नहीं समझा. विरोध करना तो दूर की बात.

नंदिनी सुंदर ने स्पष्ट किया कि यह वार्ता विभाग की नियमित अकादमिक गतिविधि का हिस्सा रही थी. प्रायः कक्षा की तरह. उनके अनुसार, ‘यह संगोष्ठी किसी भी अन्य रद्द किए गए सेमिनार की तरह नहीं है– दुर्भाग्य से पिछले एक दशक में हम इससे अभ्यस्त हो गए है. यह हमारे शिक्षण अभ्यास का हिस्सा था और स्नातक छात्रों के लिए इसमें भाग लेना अनिवार्य था. यह गंभीर चर्चा का एक मंच था जहां हमारे छात्रों ने कुछ बहुत ही प्रतिभाशाली लोगों के साथ बातचीत की, और वक्ता हमारे छात्रों की गुणवत्ता से प्रभावित हुए.’

यह कोई विशेष कार्यक्रम नहीं था जिसके लिए आप अलग से कुछ तामझाम करें. इस वार्ता के माध्यम से विद्यार्थियों को अलग-अलग क्षेत्रों ने काम कर रहे लेखकों, शोधार्थियों के काम से परिचय का मौक़ा मिलता था. इसके चलते विभाग पर कोई वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ता था. इसके लिए अलग से किसी विशेष स्थान की भी आवश्यकता नहीं होती थी.

फिर हर शुक्रवार को होने वाली हर चर्चा के लिए विश्वविद्यालय के अधिकारियों को क्यों सूचित किया जाना चाहिए और क्यों उनकी अनुमति की आवश्यकता हो?

प्रोफेसर सुंदर ने पूर्व अनुमति के तर्क के संदर्भ में लिखा,

‘1. पिछले 60 वर्षों से पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं रही है.
2. इसमें संदेह है कि विज्ञान, वाणिज्य और अन्य सामाजिक विज्ञान विभाग भी अपनी नियमित सेमिनार शृंखला में प्रत्येक वक्ता के लिए पूर्व अनुमति लेते हैं या नहीं. यह कोई विशेष कार्यक्रम नहीं था.
3. दुनिया के किसी भी अन्य विश्वविद्यालय में क्या प्रत्येक ‘कोलोकीयम श्रृंखला’ के सत्र के लिए संस्था के अध्यक्ष या कुलपति से अनुमति ली जाती है? नियमित सेमिनार शृंखला आयोजित करना तो हर अच्छे विभाग की सामान्य शैक्षणिक गतिविधि होती है.
4. हमारी ‘कोलोकीयम शृंखला’ में पहली प्राथमिकता सदैव विभाग के शिक्षकों को दी जाती है ताकि वे अपने चल रहे शोध कार्य को प्रस्तुत कर सकें — विश्वविद्यालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या उसके लिए भी पूर्व अनुमति आवश्यक है, क्योंकि वे भी इस शृंखला के वक्ता होते हैं.’

अगर आप समाजशास्त्र विभाग की वेबसाइट पर जाएं तो इस शृंखला की नियमितता का पता चल जाता है. यह अन्य विभागीय शैक्षणिक कार्यक्रमों की श्रेणी में ही रहा है:

‘समाजशास्त्रीय अनुसंधान कोलोकीयम (Sociological Research Colloquium – SRC) विभाग की एक महत्त्वपूर्ण शैक्षणिक परंपरा है, जिसमें भारत और विदेश के अन्य विश्वविद्यालयों से विद्वान नियमित रूप से भाग लेते हैं. विभाग के शोध छात्र और शिक्षक दोनों को अपने शोध कार्य ‘एस आर सी’ में प्रस्तुत करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जिसकी बैठकें प्रत्येक कार्यदिवस वाले शुक्रवार की दोपहर को शैक्षणिक सत्र के दौरान होती हैं. इसमें सभी को उपस्थित होने के लिए आमंत्रित किया जाता है. ‘

प्रशासन के इस आदेश के बाद प्रोफेसर सुंदर ने इस वार्ता-क्रम के संयोजक पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. उन्होंने लिखा कि वे इस्तीफ़ा इसलिए दे रही हैं कि वे अब आश्वस्त नहीं हैं कि आगे इस प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा और आख़िरी मिनट पर चर्चा रद्द नहीं कर दी जाएगी. जिन अध्येताओं को उन्होंने आगामी शुक्रवारों के लिए आमंत्रित किया था, उन्हें इसकी खबर भी उन्होंने दी और उनसे कहा कि वे इसके लिए स्वतंत्र हैं कि आगे विभाग के आमंत्रण को वे स्वीकार करें.

प्रोफेसर सुंदर के इस निर्णय को समझा जा सकता है. आख़िरकार विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने न तो विभाग की और न उनकी प्रतिष्ठा का कोई ख़याल किया. उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि आमंत्रित वक्ता पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा.

इस बार की वक्ता डॉक्टर नमिता वाही थीं. वे सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च में काम करती हैं. पिछले सालों में संघीय सरकार ने इस संस्थान पर इतने हमले किए हैं कि इसका जीवित रहना ही चमत्कार है. तो क्या उनका कार्यक्रम इसलिए रद्द किया गया कि वे इस संस्थान से जुड़ी हैं? वे ‘भूमि, संपत्ति और लोकतांत्रिक अधिकार’ विषय पर बात करने वाली थीं. क्या इस विषय के कारण इसे मना कर दिया गया? या वक्ता का नाम आपत्तिजनक था? इस मनाही के कारण उन पर जो अतिरिक्त ध्यान चला गया है, वह निश्चय ही उनके लिए असुविधाजनक है.

प्रशासन का कहना है कि विषय और वक्ता से मतलब नहीं. उसकी अनुमति नहीं ली गई थी. अनुमति के संदर्भ में प्रोफेसर सुंदर के प्रश्नों का उत्तर देने की सभ्यता की अपेक्षा भोलापन ही है.

विश्वविद्यालयों के लिए आवश्यक है हर स्तर पर स्वायत्तता. सांस्थानिक स्वायत्तता का मतलब है राजकीय दख़लंदाज़ी का न होना. विभागों और अध्यापकों की बौद्धिक स्वायत्तता में विश्वविद्यालय प्रशासन का हस्तक्षेप भी अवांछनीय है. पाठ्यक्रम से लेकर शैक्षणिक गतिविधियों तक के मामलों विभाग स्वतंत्र होने चाहिए. दुनिया के सारे श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में यही तरीक़ा रहा है. बल्कि उनकी श्रेष्ठता का कारण ही यह है. अमेरिका में अब यह दख़लंदाज़ी शुरू हुई है और वहां के श्रेष्ठ अध्यापक अब दूसरे संस्थानों का रुख़ कर रहे हैं.

उच्च शिक्षा संस्थानों में औपचारिक प्रक्रियाओं के साथ साथ बहुत कुछ अनौपचारिक होता है. चाय की दुकान पर किसी और विभाग के सहकर्मी के साथ घंटों बातचीत, शहर से गुजर रहे किसी लेखक या विदेशी के साथ तुरत-फुरत आयोजित चर्चा: यह सब टाइम टेबल के बाहर की गतिविधियां हैं. इन सबसे ही कोई विश्वविद्यालय अपनी शक्ल लेता है.

जब कोई अध्यापक बाहर के अध्येताओं को बुलाता है और वे उसका आमंत्रण स्वीकार करते हैं तो यह उसकी और विभाग या संस्थान की साख का भी एक सबूत है. कई बार कॉफ़ी हाउस में अध्यापक से बातचीत कक्षा से अधिक रोचक होती है. ये सब विश्वविद्यालय की अकादमिक संस्कृति का निर्माण करती हैं. अगर हम इन अनौपचारिकताओं को इजाज़त नहीं देंगे तो विश्वविद्यालय विश्वविद्यालय नहीं रहेगा. आख़िर विद्यार्थी अध्यापकों से मात्र कक्षा में नहीं मिलते. कई बार हमारी कक्षाओं में दूसरे विभागों के विद्यार्थी आते हैं. क्या इन सब पर रोक लगा देनी चाहिए?

लेकिन ये बातें इस मामले में प्रासंगिक नहीं क्योंकि यह तो एक नियमित, पूर्व घोषित अकादमिक कार्यक्रम का हिसा था.

पिछले 11 वर्षों से देश के लगभग हर शिक्षा संस्थान में बौद्धिक गतिविधियों पर प्रशासन का नियंत्रण सख़्त होता जा रहा है. पाठ्यक्रमों के मामले में अब विभाग आज़ाद नहीं हैं. कोई गोष्ठी आयोजित नहीं की जा सकती. मात्र ‘राष्ट्रवादी’ विषयों और वक्ताओं को अब जगह दी जाती है. अनेक अध्येता और विषय अवांछित घोषित किए जा चुके हैं. विश्वविद्यालय बौद्धिक मूर्च्छा में बस सांस ले रहे हैं. उनके जीवित होने का भ्रम है.

समाजशास्त्र विभाग की इस वार्ता शृंखला में प्रशासन की यह दख़लंदाज़ी इसी संदर्भ में समझी जा सकती है.

प्रोफेसर नंदिनी सुंदर ने इस्तीफ़ा देकर अपना रुख़ ज़ाहिर कर दिया है. बाक़ी अध्यापक क्या करेंगे? हम उम्मीद करें कि विभाग इस मामले में अपना विरोध ज़ाहिर करेगा. यह उसकी शैक्षणिक स्वायत्तता में अवांछित हस्क्षेप है. क्या वह उसकी रक्षा में कुछ बोलेगा? छात्र क्या करेंगे? क्या वे यह समझते हैं कि इस प्रकार की हफ़्तावर नियमित बौद्धिक गतिविधि में बाहर के अध्येताओं को बुलाने में कितनी मेहनत लगती है? इसके लिए कितने फ़ोन और कितने पत्र लिखने पड़ते हैं. इस श्रम को कौन देखता है? यह संयोजक की इच्छा पूर्ति का साधन नहीं है. यह सब विद्यार्थियों की बौद्धिक समृद्धि के लिए किया जाता है. क्या वे समझ पाएंगे कि यह उनके जानने और ज्ञान के अधिकार पर सीधा हमला है?

यह उम्मीद करना बेकार है कि विश्वविद्यालय का शिक्षक संघ इसका विरोध करेगा. उसकी आंखों के सामने शैक्षणिक और बौद्धिक स्वायत्तता की धारावाहिक हत्या होती रही है. वह चुप रहा है. लेकिन सही काम कभी भी किया जा सकता है. वह इस क्षण प्रशासन के इस हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ अपना विरोध ज़ाहिर करके साबित कर सकता है कि वह बौद्धिक समुदाय का प्रतिनिधि है. या ये सारी उम्मीदें बस उम्मीदें ही हैं?

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)