नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार (12 नवंबर) को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिग्री विवाद मामले पर सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाएं तय समय सीमा के बाद दाखिल की गई हैं.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने दिल्ली यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया कि वो देर से याचिकाएं दाखिल करने पर अपनी आपत्ति दाखिल करें.
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की खंडपीठ ने विश्वविद्यालय को याचिकाओं पर आपत्ति दर्ज करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है. अब मामले की अगली सुनवाई 16 जनवरी 2026 को होगी.
पीठ को बताया गया कि एकल न्यायाधीश के अगस्त के आदेश को चुनौती देने वाली अपीलें दायर करने में देरी हुई है.
मालूम हो कि याचिका दायर करने वालों में आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह, आरटीआई कार्यकर्ता नीरज शर्मा और वकील मोहम्मद इरशाद शामिल हैं.
इन याचिकाकर्ताओं ने एकल पीठ के आदेश को चुनौती दी है, जिसमें जस्टिस सचिन दत्ता की बेंच ने 25 सितंबर को केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश के खिलाफ दिल्ली यूनिवर्सिटी की ओर से दायर याचिका मंजूर करते हुए केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश को निरस्त कर दिया था.
ज्ञात हो कि केंद्रीय सूचना आयोग ने दिल्ली विश्वविद्यालय के सूचना अधिकारी मीनाक्षी सहाय पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था और आयोग ने डिग्री से संबंधित जानकारी देने का भी आदेश दिया थे.
केंद्रीय सूचना आयोग के इसी फैसले के खिलाफ दिल्ली विश्वविद्यालय ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था. एकल पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान दिल्ली यूनिवर्सिटी ने कहा था कि उसे अदालत को डिग्री दिखाने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसे जनता के सामने प्रदर्शित नहीं किया जा सकता.
दिल्ली यूनिवर्सिटी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि एक वैसे छात्र की डिग्री मांगी जा रही है जो आज देश का प्रधानमंत्री है. उन्होंने कहा था कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है. यूनिवर्सिटी हर साल का रजिस्टर मेंटेंन करती है.
वहीं, सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि सूचना के अधिकार के तहत किसी छात्र को डिग्री देना निजी कार्य नहीं बल्कि एक सार्वजनिक कार्य है.
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील शादान फरासत ने कहा था कि सूचना के अधिकार कानून के तहत दिल्ली यूनिवर्सिटी एक सार्वजनिक प्राधिकार है. ऐसे में सूचना मांगनेवाले की नीयत के आधार पर किसी की डिग्री की सूचना देने से इनकार नहीं किया जा सकता है.
दिल्ली विश्वविद्यालय ने इसे निजी जानकारी बताते हुए साझा करने से इनकार कर दिया था. विश्वविद्यालय के मुताबिक इससे कोई सार्वजनिक हित नहीं पूरा होता है.
सुनवाई के दौरान एकल पीठ के न्यायाधीश ने कहा था कि किसी भी सार्वजनिक पद पर आसीन होने या आधिकारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के लिए शैक्षिक योग्यताएं किसी भी वैधानिक आवश्यकता की प्रकृति की नहीं हैं.
न्यायाधीश ने यह भी कहा था कि अगर किसी विशिष्ट सार्वजनिक पद के लिए शैक्षणिक योग्यता एक जरूरी मानक होती, तो स्थिति अलग हो सकती थी.
अदालत ने सीआईसी के दृष्टिकोण को ‘पूरी तरह से गलत’ बताया था.
गौरतलब है कि उच्च न्यायालय ने सीआईसी के उस आदेश को भी रद्द कर दिया था जिसमें सीबीएसई को पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के कक्षा 10 और 12 के रिकॉर्ड की प्रतियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था.
मालूम हो कि पीएम मोदी के डिग्री संबंधी याचिका 2017 में दायर की गई थी और सुनवाई की पहली तारीख को आदेश पर रोक लगा दी गई थी. कुमार ने 2016 में एक आवेदन दायर कर प्रधानमंत्री मोदी सहित 1978 में बीए प्रोग्राम में शामिल होने वाले सभी छात्रों के परिणाम मांगे थे. तब सीआईसी ने डीयू को जानकारी का खुलासा करने का आदेश दिया था, जिसमें कहा गया था कि किसी छात्र (वर्तमान/पूर्व) की शिक्षा से संबंधित मामले सार्वजनिक किया जा सकता है.
मार्च 2023 में गुजरात उच्च न्यायालय ने सीआईसी के 2016 के एक अन्य निर्देश को रद्द कर दिया था, जिसमें उसे दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को मोदी की शैक्षणिक योग्यता का विवरण उपलब्ध कराने के लिए कहा गया था.
