सच्ची सियासत वह होती है जो इंसानी नस्ल को फूलों की सेज पर लिटाने के लिए खुद कांटों पर चलती और अल्लाह के बंदों के पेट भरने के लिए खुद अपने पेट पर पत्थर बांधकर काम करती है. लेकिन आज की सियासत इस कदर बदसूरत हो चुकी है कि वह अवाम को कांटों पर चलाकर खुद फूलों की सेज पर लेटती है और अल्लाह के करोड़ों बंदों के पेटों पर पत्थर बंधवाकर सिर्फ अपने चहेतों का पेट भरती है.
नहीं-नहीं, किसी गलतफहमी के शिकार मत होइए. ये पंक्तियां किसी उर्दू अदीब द्वारा समकालीन राजनीति की लानत-मलामत का नहीं, ‘शायर-ए-इंकलाब’ कहलाने वाले स्मृतिशेष जोश मलीहाबादी (05 दिसंबर, 1898- 22 फरवरी, 1982) द्वारा अपने अजीज दोस्त जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद उन्हें पेश किये गए ‘रूह-ए-इंसानियत के सिजदे’ की भूमिका का हिस्सा हैं.
इन पंक्तियों के बाद नेहरू को लाफानी (अनश्वर) करार देते हुए जोश ने लिखा है:
‘नेहरू की सियासत चूंकि मौजूदा सियासत के बिल्कुल बरअक्स थी, इसलिए कहा जाता है कि वे अच्छे सियासतदां नहीं थे. मैं इसकी तस्दीक करता हूं. इसलिए कि आज के अच्छे सियासतदां के लिए यह एक लाजिमी शर्त है कि उसूलों की खिदमत और इंसानियत के एतबार से वह नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हद तक बुरा आदमी हो. ऐ लाफानी जवाहरलाल नेहरू, रूह-ए-इंसानियत का सजदा कुबूल कर.’
जिंदा ताजमहल!
जोश की आत्मकथा ‘यादों की बरात’ में उनकी भावनाओं का यह ज्वार यहीं नहीं थमता. आगे वे अपने दोस्त को दुनिया का जिंदा ताजमहल बताते हुए लिखते हैं:
‘वह अपनी मोहिनी सूरत की कशिश, अलग रंग की हाजिरजवाबी, अपनी आंखों की मुरव्वत, अपने लहजे की मिठास, अपनी गुफ्तगू की मौसिकी, अपनी मुस्कुराहट के सुकून, अपने खानदान की इज्जत, अपने दिल की आसमान-सी बेइंतहा गुंजाइश, अपने मिजाज और किरदार की बेनजीर शराफत के एतबार से एक ऐसे इंसान थे, जो इस जमीन पर सदियों के बाद पैदा होते हैं और यह आवाज बुलंद कर सकते हैं कि मत सहल हमें समझो, फिरता है फलक बरसों, तब खाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं.
वह इस दुनिया के एक ऐसे जिंदा ताजमहल थे, जिसको अवध की सलोनी शाम और बनारस की खूबसूरत सुबह को मिलाकर इलाहाबाद के गंगा-जमुनी संगम पर छेनियों से तराशकर तामीर किया गया था. उनका वजूद हिंदुस्तान का गुरूर था. उनके किरदार में दूसरों के भले की सोच थी और आलम-ए-इंसानियत का ऐतबार था.’
यहां यह समझना भी जरूरी है कि जोश द्वारा मुक्तकंठ से व्यक्त की गई ये भावनाएं नेहरू से उनकी दोस्ती का इजहार भर नहीं हैं. सच यह है कि बाद के दिनों में नेहरू इस बात को लेकर उनसे बहुत नाराज़ रहने लगे थे कि आजादी के दस-ग्यारह साल हिंदुस्तान में गुजारने के बाद वे यह तोहमत लगाकर पाकिस्तान चले गए कि ‘यहां’ (यानी भारत में) उर्दू का कोई भविष्य नहीं है.
तब भारत के अधिकतर प्रगतिशील लेखकों व कवियों के साथ नेहरू ने भी उन्हें रोकने की कोशिश की थी, लेकिन वे, और तो और, हिजरत के लिए अपना यह विश्वास भी खंडित कर गए थे कि देश बंट जाने से तहजीबें नहीं बंट जाया करतीं और अविश्वास कितना भी बढ़ जाए, हैवानियत की उम्र को बहुत लंबी नहीं ही कर पाता.
जानकारों के अनुसार, नेहरू ने बहुत मनाने पर भी दिल तोड़कर पाक चले जाने के लिए जोश को कभी माफ नहीं किया और बाद में एक बार वे भारत आए तो दिल्ली में हुई भेंट के दौरान भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी पाकिस्तान यात्रा का हवाला देकर उन्हें भरपूर ताना मारा था, ‘आपने जिस उर्दू के वास्ते अपने वतन को छोड़ दिया, उसी उर्दू को पाकिस्तान में कोई मुंह नहीं लगाता. और जाइए पाकिस्तान.’
इसके कुछ ही अरसे बाद नेहरू का निधन हो गया तो विह्वल जोश उनकी लाफानी शख्सियत से अपने सारे गिले-शिकवे भूल गए थे.
भूल भी कैसे नहीं जाते? अदीबों के साथ नेहरू का रिश्ता था ही कुछ ऐसा.
दून घाटी में
इस सिलसिले में रामचंद्र गुहा ने कई साल पहले अपने एक लेख में उनके द्वारा इलाहाबाद में निराला के संदर्भ में सुनाए गए चीन यात्रा के एक किस्से का जिक्र किया था, जो एक महान राजा और उसके दो बेटों से जुड़ा हुआ है. इस राजा के दो बेटों में एक चतुर-सुजान व विद्वान तो दूसरा मूर्ख था. वक्त के साथ दोनों बड़े हुए तो राजा ने अपने मूर्ख बेटे को ही राजा बनाने की घोषणा कर दी, क्योंकि उसके अनुसार वह किसी और काम के लायक था ही नहीं. हां, उसने कहा कि उसका दूसरा चतुर व विद्वान बेटा कवि बनेगा, क्योंकि वह महान कार्य करने के लिए बना हुआ है.
गुहा के अनुसार, यह किस्सा सुनाकर नेहरू ने अपने गले से फूलों की माला उतारी और श्रद्धाभाव से अपने सामने श्रोताओं में बैठे महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के कदमों में डाल दी थी.
1957 में नेहरू ने एक सप्ताह की छुट्टी लेकर दून घाटी में विश्राम करने का कार्यक्रम बनाया तो गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ ने अप्रैल महीने के ‘नया खून’ में ‘दून घाटी में नेहरू’ शीर्षक टिप्पणी में यह लिखकर उसका स्वागत किया था कि जो लोग जिम्मेदारी के काम पर हैं, उन्हें आराम भी एक कर्तव्य होना चाहिए. उनके ही शब्दों में ‘अगर हम चाहते हैं कि पंडित नेहरू दीर्घकाल तक हमारे बीच रहें तो उनके लिए विश्राम का नियम बना देना अनुचित न होगा.’
साथ ही, उन्होंने उम्मीद जताई थी कि प्रकृति से संपर्क और उसके उत्फुल्ल सौंदर्य से साक्षात्कार नेहरू को निस्संदेह, ताजा बना देगा और उनकी रूह में नई ताकत फूंक देगा. इतना ही नहीं, उन्होंने नेहरू के कुछ ‘उत्साही पुजारियों’ की इस बात के लिए कड़ी आलोचना भी की थी कि उन्होंने दून घाटी में भी उनको नहीं छोड़ा और उन्हें कष्ट देने का पूरा सामान तैयार कर लिया.
दरअसल, इन ‘पुजारियों’ ने नेहरू की छुट्टी के दौरान ही मसूरी में डेवलपमेंट कमिश्नरों का सम्मेलन आयोजित कर उसमें उनके भाषण का कार्यक्रम रख दिया था, मुक्तिबोध के अनुसार जिसका मतलब यह था कि ‘नेहरू को शांति का पूरा एक हफ्ता भी नहीं मिलेगा. वे गुरुवार को दून घाटी गए तो उन्तीस तारीख को मसूरी पहुंचकर एक भाषण देंगे.’
मुक्तिबोध का सवाल था कि क्या इस कार्यक्रम की बहुत आवश्यकता थी?
इसी टिप्पणी में एक और जगह उन्होंने लिखा है:
‘एक बार एक बीस साला नौजवान ने मुझसे पूछा कि नेहरू जी रात में क्या सोचते-सोचते हो जाते होंगे? तीसरे विश्वयुद्ध के दृश्य, लोहा और इस्पात के विशाल नए कारखाने का धुआं, नए उठते हुए शहरों की मीनारें, पृथ्वी पर लहराते कई देशों को जोड़ते अथाह नीले समुद्र, कूटनीतिक चर्चाओं में उठाए गए तर्क और दलीलें, आदि आदि के बिम्ब देखते हुए उनकी आंख लग जाती होगी. शायद हां, शायद नहीं. किंतु यह नामुमकिन है कि नेहरू का आदर्शवादी मन हम लोगों की भावुक दिलचस्पी का विषय न हो.
इसीलिए , हम चाहते हैं, चंद रोज़ ही क्यों न सही, नेहरू को नियमपूर्वक उसी तरह विश्राम कर लेना चाहिए, जिस प्रकार ठंडी लड़ाई के हजार ठंडे लेकिन चमकते हुए अंगारों के बावजूद अमेरिकी प्रेसीडेंट आइज़नहावर तथा अन्य यूरोपीय नेता गण समय पाकर विश्राम, मनोरंजन और खेलकूद में समय बिताते हैं.’
मुक्तिबोध ने चिंता जताई थी कि जबरदस्ती विश्राम, यानी बेकारी और स्वेच्छापूर्वक निरंतर विश्राम, यानी आलस्य के इस क्लासिकल देश यानी भारत में आवश्यक विश्राम का महत्व शायद समझा ही नहीं गया है.
अरमान भी तकसीम करो
यहां फिराक गोरखपुरी व सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ वगैरह से नेहरू के आत्मीय रिश्तों के साथ साहिर लुधियानवी व कैफ़ी आज़मी द्वारा उनको श्रद्धांजलि स्वरूप रची गई नज़्मों के जिक्र के बगैर बात अधूरी रह जाएगी.
साहिर ने एक लंबी नज्म में उनका बख्शा हुआ सिह-रंग-ए-अलम (तिरंगा), उनके ख़्वाबों की ख़ुशी और रूह का ग़म ले कर चले-चलने का आह्वान करते हुए लिखा था कि नेहरू के जिस्म की मौत उन्हें मार नहीं पाएगी, क्योंकि जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती है:
वो जो हर दीन से मुन्किर था हर इक धर्म से दूर
फिर भी हर दीन हर इक धर्म का गमख्वार रहा
सारी कौमों के गुनाहों का कड़ा बोझ लिए
उम्र भर सूरत-ए-ईसा जो सर-ए-दार रहा
जिसने इंसानों की तकसीम के सदमे झेले
फिर भी इंसां की उखुव्वत का परस्तार रहा
जिसकी नजरों में था इक आलमी तहजीब का ख्वाब
जिसका हर सांस नए अहद का मे’मार रहा
जिसने जरदार-ए-मईशत को गवारा न किया
जिसको आईन-ए-मुसावात पे इसरार रहा
उसके फरमानों की एलानों की ताजीम करो
राख तकसीम की अरमान भी तकसीम करो
मौत और जीस्त के संगम पे परेशान क्यूं हो
उसका बख्शा हुआ सिह-रंग-ए-अलम ले के चलो.
जो तुम्हें जादा-ए-मंज़िल का पता देता है
अपनी पेशानी पर वो नक़्श-ए-क़दम ले के चलो
दामन-ए-वक़्त पे अब ख़ून के छींटे न पड़ें
एक मरकज़ की तरफ़ दैर-ओ-हरम ले के चलो
हम मिटा डालेंगे सरमाया-ओ-मेहनत का तज़ाद
ये अक़ीदा ये इरादा ये क़सम ले के चलो
वो जो हमराज़ रहा हाज़िर-ओ-मुस्तक़बिल का
उसके ख़्वाबों की ख़ुशी रूह का ग़म ले के चलो
जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती है
जिस्म मिट जाने से इंसान नहीं मर जाते.
सहरा में चश्मा
इसी तरह बकौल कैफ़ी आज़मी:
मैंने तन्हा कभी उसको देखा नहीं
फिर भी जब उस को देखा वो तन्हा मिला
जैसे सहरा में चश्मा कहीं
या समुंदर में मीनार-ए-नूर
या कोई फ़िक्र-ए-औहाम में
फ़िक्र सदियों अकेली-अकेली रही
ज़ेहन सदियों अकेला-अकेला मिला
और अकेला-अकेला भटकता रहा
हर नए हर पुराने ज़माने में वो
बे-ज़बां तीरगी में कभी
और कभी चीख़ती धूप में
चांदनी में कभी ख़्वाब की
उस की तक़दीर थी इक मुसलसल तलाश
ख़ुद को ढूंढा किया हर फ़साने में वो
बोझ से अपने उस की कमर झुक गई
क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा
ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो
ज़िंदगी का हो कोई जिहाद
वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद
सबसे पहले वो सूली पे चढ़ता रहा
जिन तक़ाज़ों ने उस को दिया था जनम
उन की आग़ोश में फिर समाया न वो
ख़ून में वेद गूंजे हुए
और जबीं पर फ़रोज़ां अज़ां
और सीने पे रक़्सां सलीब
बेझिझक सबके काबू में आता गया
और किसी के भी क़ाबू में आया न वो!
(इस आलेख की तैयारी में ‘उद्भावना’ पत्रिका के जवाहरलाल नेहरू विशेषांक (जनवरी-मार्च, 2024) में प्रकाशित सामग्री से बहुत मदद मिली है, जिसके लिए लेखक उनका आभारी है.)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
