शास्त्रीय संगीत के बारे में आम धारणा यह है कि वह अभिजात संगीत है; संपन्न वर्ग के मनोरंजन का माध्यम और पुरुषप्रधान है. उसका व्यापक जनजीवन से कोई संबंध नहीं रहा. उसकी जटिलता, परिष्कार, सूक्ष्मता आदि उसके बुनियादी आभिजात्य का साक्ष्य हैं. शास्त्रीय संगीत में स्त्रियों की उपस्थिति बहुत कम है.
पंरपरा में जाएं तो विद्या और कलाओं की देवी सरस्वती वीणावादिनी है: ऋग्वेद में कई रचनाएं ऋषिकाओं की हैं. बौद्धिक और दार्शनिक जगत् में स्त्रियों की उपस्थिति है- वे शास्त्रार्थ तक में भाग लेती थीं. बड़े देवता अपनी संगिनी के साथ ही देखे-पूजे जाते थे- विष्णु, शिव, राम, कृष्ण आदि. महाकाव्यों में कई सशक्त स्त्री चरित्र हैं स्त्री के साथ अन्याय करने पर ब्रह्मा और इंद्र जैसे देवता दंडित हुए हैं. नृत्य के जो भी चित्रण काव्य, स्थापत्य, मंदिरों आदि में मिलता है वह अधिकतर स्त्रियों का ही है. लेकिन संगीत में स्त्रियों की उपस्थिति का साक्ष्य विरल है.
आधुनिक शास्त्रीय संगीत, जिसे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत कहा जाता है, 400-500 वर्षों से अधिक पुराना नहीं है. उसमें जल्दी ही स्त्रियों की शिरकत होने लगी. अलबत्ता, शास्त्रीय से कहीं अधिक लोकसंगीत में स्त्रियों की उपस्थिति और सक्रियता बहुत पहले से अधिक और सशक्त रही है. बल्कि कई प्रकारों में जैसे सोहर, बिरहा, गारी, चैनी आदि में उनका एकाधिपत्य सा रहा है.
यह भी याद करना चाहिए कि हमारे शास्त्रीय संगीत की संरचना में स्त्री-तत्व का सुंदर समावेश है. राग के अलावा रागिनियां हैं. मूच्छर्नाएं, श्रुतियां, तानें, बंदिशें, ठुमरी सभी स्त्रीलिंग हैं. कई रागों के नाम स्त्रीलिंग हैं: बागेश्वरी, घनाश्री, सोहनी, सावनी, हंसध्वनि, नीलाम्बरी, तोड़ी आदि.
मिनिएचर कला में जो रागमाला का चित्रण है वह मुख्यतः स्त्री-केंद्रित है. ख़याल गायकी में स्त्री की उपस्थिति प्रबल और व्यापक है. इन बंदिशों में स्त्रियों का प्रेम, विरह, प्रतीक्षा, लाचारी, ललक आदि मनोभाव विस्तार और विपुलता से व्यक्त हुए हैं. यह एक अर्थ में रीति काव्य से मिलता-जुलता है जिसमें कवयित्रियां तो कम हैं लेकिन कविता में स्त्री की केंद्रीयता है, अपनी विविध-विपुल-सघन-उत्कट ऐन्द्रियता में.
लगता है कि अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दियों में शास्त्रीय संगीत और लोकसंगीत के बीच संवाद-सहकार सशक्त और प्रभावशील हुआ-यह मुख्यतः स्त्रियों की पहल पर ही हो पाया. अनेक लोकप्रकार जैसे ठुमरी-चैती-कजरी-झूला-होरी आदि का शास्त्रीयता में लोकप्रवेश स्त्रियों द्वारा ही किया गया. यह शास्त्रीयता का सीमा-विस्तार भी था: उसके कठोर वैभव में कुछ लालित्य का अंतःप्रवेश.
यह याद करना चाहिए कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का विकास, संरक्षण और विस्तार, आजकल सत्ताधारियों द्वारा बहुनिंदित और पाठ्य पुस्तकों से बलात् निष्कासित, मुग़ल और ‘मुसलमान’ काल में ही हुआ. इसी दौरान उसमें सबसे अधिक वाद्ययंत्र जैसे सितार, सरोद, तबला, इसराज, सुरबहार, सुरमंडल आदि शास्त्रीय संगीत में आए. शास्त्रीयता में स्त्रियों के प्रवेश और सक्रियता को प्रोत्साहन और संरक्षण समाज के अभिजात वर्ग से ही मिला.
शास्त्रीय संगीत को अभिजात क़रार देकर उसे ख़ारिज करने वाले यह भूल जाते हैं कि अधिकांश शास्त्रीय संगीतकार कमज़ोर आर्थिक पृष्ठभूमि और सामाजिक विपन्नता से आते रहे हैं. शास्त्रीय संगीत की साधना कर वे अपना सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण और उन्नयन करते रहे हैं. स्त्री संगीतकार भी इनमें शामिल हैं और अक्सर यही संगीतकार शास्त्रीयता में अनेक बारीकियों, जटिलताओं और सूक्ष्मताओं के लिए ज़िम्मेदार रहे हैं.
अनेक स्त्री संगीतकार समाज के तथाकथित निचले तबकों से आईं पर उनकी सांगीतिक उपलब्धियों ने उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाई. यह दुतरफ़ा सशक्तिकरण है: संगीत ने स्त्रियों को और स्त्रियों ने संगीत को सशक्त किया.
संगीत के क्षेत्र में, बीसवीं शताब्दी की एक बड़ी परिघटना, फ़िल्मी संगीत का उदय और अपार व्याप्ति है. इस संगीत में तो स्त्रियों की भागीदारी शुरू से ही सशक्त रही है. अकेली एक फ़िल्मी गायिका लता मंगेशकर ने कई हज़ार गाने गाए हैं: मनुष्यता के समूचे इतिहास में, कहीं और कभी, किसी और ने इतने नहीं गाए होंगे. वे दशकों फ़िल्म संगीत के शिखर पर रहीं.
शास्त्रीय नृत्य में स्त्रियां प्रमुख रूप से बीसवीं शताब्दी में ही आईं. उनकी बढ़ती उपस्थिति और शिरकत का परिणाम है कई नृत्य शैलियों में अभूतपूर्व परिवर्तन हुए: कथक एक पुरुषप्रधान नृत्य से अब लगभग स्त्रीप्रधान नृत्य हो गया है; ओड़िसा से भी पुरुष नर्तक ग़ायब से हैं.
साथ-साथ अनेक अन्य विधाओं में जैसे रंगमंच, सिनेमा, ललित कलाओं में, हिंदी साहित्य में स्त्रियों की बहुत सशक्त और प्रभावशाली उपस्थिति और सक्रियता है.
लेखा-जोखा
कई बार ऐसे सार्वजनिक अवसर आते हैं जब आपसे उम्मीद की जाती है कि आप अपने समय और संस्कृति का कुछ लेखा-जोखा, संक्षेप में, प्रस्तुत करेंगे. आप कोशिश करते हैं और दुहराव से बचना भी चाहते हैं पर सफलता नहीं मिलती: जब सार्वजनिक जीवन में लगातार अनेक अवांछित प्रवृत्तियों का दुहराव विकराल रूप धारण कर चुका हो तो उसके बारे में कुछ कहना कुछ न कुछ को दुहराना ही होता है.
ऐसा अवसर आया जब जयपुर के पिंक सिटी प्रेस क्लब ने एक सांस्कृतिक समारोह किया और उसके अंतर्गत समापन वक्तव्य के लिए बुलाया. हमारे प्रेस की संस्कृति में दिलचस्पी आम तौर पर इतना घट गई है कि यह सर्वथा अप्रत्याशित आयोजन था. नहीं पता कि हिंदी अंचल के किसी और प्रेस क्लब ने कभी ऐसा कोई आयोजन किया हो; वह भी अपने ही सीमित साधनों से.
आज जो स्थिति है उसकी एक बड़ी विडंबना यह है कि उसमें अधिकता और अभाव का एक साथ हैं. दिखाऊ तौर पर, सतही ढंग से संस्कृति, इतिहास, परंपरा और धर्म की अधिकता है. लेकिन, गहरे में, संस्कृति सत्वहीन, इतिहास तथ्य-साक्ष्यहीन, परंपरा स्मृतिहीन और धर्म अध्यात्महीन हैं, कर दिए गए हैं. सभी कुछ भयानक स्तर पर, उबाऊ ढंग से, चौबीस घंटे दृश्य है और सभी बेहद अनुष्ठानपरक हो गए हैं.
निजी और सार्वजनिक के बीच जो भेद या दूरी थी वह ध्वस्त हो चुकी है. निजी को सार्वजनिक करने की होड़ सी मची है. ऐसे कई आठों पहर दृश्यमानों के बारे में संदेह होता है कि उनका कोई निजी जीवन है ही नहीं!
कई तरह की संस्कृतियां इस समय सक्रिय हैं झूठ-घृणा-हिंसा-अत्याचार की आक्रामक संस्कृति. हर दिन ‘दूसरे’ बनाने, सांप्रदायिक दूसरे, धार्मिक दूसरे, भाषिक दूसरे, जातिगत दूसरे, वैचारिक दूसरे गढ़ने और फिर उन्हें अपमानित करने, दूसरे दर्ज़े के नागरिक जताने की संस्कृति. सभी लोग लगातार बात कर रहे हैं, फिर भी कोई संवाद नहीं हो रहा है: संवादहीनता की संस्कृति जो न संवाद करती है, न उसे ज़रूरी मानती है.
शिष्टाचार, भद्रता, सौजन्य से दूर जाती संस्कृति. गाली-गलौज, झगड़े-झांसे, लांछन की संस्कृति. राजनीति और मीडिया द्वारा संस्कृति के कुछ सर्जनात्मक रूपों जैसे साहित्य ओर कलाओं की उपेक्षा और अवहेलना की संस्कृति. सारी संस्कृति को तमाशे में बदल कर निरी शोभापरक बनाने की संस्कृति.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
