कई बार किसी दुख को भुलाने के लिए एक ज़िंदगी बहुत छोटी पड़ जाती है.
18 फरवरी, 1983 को, गुवाहाटी से सिर्फ़ 40 किलोमीटर दूर नेल्ली में हुए नरसंहार में बंगाली मूल के कम-से-कम 2,191 मुस्लिम लोगों को मार डाला गया, जिसके परिणामस्वरूप 370 बच्चे अनाथ हो गए और 16 गांवों में उनके घर तबाह हो गए.
यह ध्यान देने वाली बात है कि इस नरसंहार की जांच के लिए बनाए गए न्यायिक आयोग की रिपोर्ट को आख़िरकार असम राज्य विधानसभा में पेश होने में 42 साल लग गए. यह अनवरत देरी यूं ही नहीं हुई: यह बड़े पैमाने पर 1983 के नरसंहार के बेरहम अपराधों की यादों को मिटाने और जवाबदेही से इनकार करने के एक सोचे-समझे राज्य प्रोजेक्ट का ज़रूरी हिस्सा है.
जब मुझे आज़ाद भारत के सबसे क्रूर लेकिन भुला दिए गए नरसंहारों में से एक की न्यायिक आयोग की रिपोर्ट देर से राज्य असेंबली में पेश होने की ख़बर मिली, तो 2008 में नरसंहार की 25वीं बरसी पर नेल्ली की मेरी यात्रा की यादें ताज़ा हो गईं. मैंने उन नोट्स को खोजा जो मैंने तब पीड़ितों के साथ हुई बातचीत के आधार पर तैयार किया था. उन नोट्स को आधार बनाकर कुछ समय बाद मैंने द हिंदू के लिए एक लेख लिखा था.
2008 में उस दुखद नरसंहार के 25 साल पूरे होने के मौके पर नेल्ली के पीड़ितों ने मुझे देश के अपने सुदूर, ग़रीब कोने में साथ बैठने के लिए बुलाया था, जहां वे उन घटनाओं के दर्द को याद कर रहे थे जो एक चौथाई सदी पहले हुई थीं.
हम सर्दियों की शुरुआती हल्की धूप में एक बड़े खुले आंगन में इकट्ठा हुए थे. देखते ही देखते एक बड़ी भीड़ जमा हो गई: चेक वाली लुंगी और दाढ़ी वाले बूढ़े आदमी आसानी से पहचाने जा सकते थे कि वे ईस्ट-बंगाली मुस्लिम मूल के लोग थे. औरतें और जवान आदमी असम के किसी भी गांव के किसी भी आदमी की तरह कपड़े पहने हुए थे. मेरा पारंपरिक तौर पर स्वागत किया गया, क्योंकि उन्होंने हमें पारंपरिक सफ़ेद असमिया गमछा दिया जिन पर ख़ूबसूरत लाल कढ़ाई थी.
फिर, उन्होंने बात शुरू की. उनकी बातों से साफ़ ज़ाहिर था कि उनके घाव अभी तक नहीं भरे थे. वे घाव कैसे भरते, जब बचे हुए लोगों के परिवारों ने अपनी इस ज़िंदगी में न्याय पाने कोई उम्मीद बहुत पहले ही छोड़ दी थी?
उनकी बातों में हड़बड़ाहट थी– जैसे उन्होंने हाल ही में उस बेरहमी का सामना किया हो, जिनकी वे गवाही दे रहे थे, न कि 25 साल पहले. उस दिन वहां कई ऐसे लोग मौजूद थे जिनके शरीर चाकू और ख़ंजर से हुए हमलों से लगी चोटों की वजह से मुड़ गए थे या टेढ़े हो गए थे. कुछ अपने कपड़े ऊपर खींचकर एक पीढ़ी पहले हुए हमलों के डरावने निशान दिखा रहे थे.
उनकी बातें सुनकर, हम सभी जो सुनने के लिए इकट्ठा हुए थे – अधिकारी, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता और दूसरे लोग – उनके दुख की गंभीरता तथा उस ज़ख़्म के अब भी हरे होने की वजह से दुखी और शर्मिंदा थे.
मेरे साथ आए राज्य सरकार के सीनियर अधिकारियों ने मुझे इशारों में उस दौरे के लिए मना किया था, और इतने पुराने दर्दनाक हादसे के ज़ख़्मों को फिर से कुरेदने की समझदारी पर सवाल उठाया था. उन्होंने मुझे यक़ीन दिलाया कि लोग बहुत पहले ही आगे बढ़ चुके हैं. तो फिर, नेल्ली के दौरे का क्या मक़सद रहा होगा? इससे तो बस वे यादें ताज़ा हो जाएंगी जो बहुत पहले दब चुकी थीं. यही सलाह राज्य में डेवलपमेंट ऑर्गनाइज़ेशन में काम करने वाले कई अन्य दोस्तों ने भी दी थी. उन्होंने कहा कि इस दौरे से ऐसे मुद्दे उठेंगे जिन पर इस इलाक़े में बहुत ज़ोरदार बहस होती है.
लेकिन ये पीड़ित लोग अपने इरादे पर अड़े रहे – वे चाहते थे कि उनकी बात सुनी जाए. मेरे लिए उन्हें मना करना नामुमकिन था. मुझे इस बात पर लंबे समय से यक़ीन है कि हममें से बाक़ी लोगों को नरसंहार के बाद ‘आगे बढ़ने’ का अधिकार तभी है जब बचे हुए लोग ठीक हो जाएं और आगे बढ़ सकें.
हज़ारा ख़ातून, जिनके चेहरे पर 1983 में हुए एक ख़ंजर के हमले के निशान थे, जिसमें वे बच गई थीं, हमारे सामने ज़मीन पर बैठी थीं और अपनी ख़ाली गोद की ओर इशारा कर रही थीं. उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, ‘मैं यहां अपने बच्चे को गोद में लिए हुए थी. उन्होंने उसे बीच से दो टुकड़ों में काट दिया.’
एक और महिला, अलेकजान बीबी, थोड़ी बेचैन थीं. उनके शरीर पर 25 साल पहले हुए हमलों के घाव साफ़ दिख रहे थे, और हम सबने देखा कि उन्होंने अपना मानसिक संतुलन खो दिया था. इस हत्याकांड में उनके परिवार के ग्यारह सदस्यों को मार दिया गया था. उन्होंने हमें दिखाया कि कैसे भीड़ ने उन पर हमला किया था, कैसे उन्होंने ख़ुद को छिपाया था, कैसे उन्हें खोजा गया, उन पर हमला किया गया और उन्हें घायल कर दिया गया. कैसे वे शरीर और आत्मा से जख़्मी और टूटी हुई होने के बावजूद ज़िंदगी जीने के लिए बच गईं.
‘दुनिया में मेरा कोई नहीं है,’ उन्होंने धीरे से कहा.
लगभग तीस साल के मोहम्मद मोनोरुद्दीन हमारे सामने बैठते ही फूट-फूटकर रोने लगे. उस दिन को याद करते हुए उन्होंने कहा, ‘मेरे भाई, बहनें सब मारे गए, टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए.’
‘मैं तब सात साल का था. मैंने अपने सामने अपने माता-पिता की हत्या होते देखा. मैंने एक और औरत को मारते और उसके बच्चे को उसके हाथों से छीनकर आग में फेंकते देखा. मैं पूरे दिन डर के मारे रोता रहा. शाम को सीआरपीएफ [सेंट्रल रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स] आई और मुझे बचाया. बाद में हमें पता चला कि हमारा घर जल गया था. कुछ भी नहीं बचा था. हमारा सारा सामान और चावल का भंडार आग में जल गया. मेरे बड़े भाई ने मुझे पाला-पोसा, जो नागांव में थे. लेकिन मैं बहुत अकेला महसूस करता हूं.’
कई और लोगों ने अपने गहरे अकेलेपन के बारे में बताया. नून नाहर बेगम 10 साल की थीं, और जब हत्याएं होनी शुरू हुईं, तो उन्होंने भागने की कोशिश की, लेकिन हमलावरों ने उन्हें पकड़ लिया और बुरी तरह घायल कर दिया. उन्हें दो महीने तक हॉस्पिटल में भर्ती रहना पड़ा. उनकी मां और चार भाई-बहनों की हत्या कर दी गई.
उन्होंने कहा, ‘आज हम जहां खड़े हैं, वहीं उन्हें मार डाला गया,’ और आगे कहा, ‘पिछले 25 सालों से मुझे मन की शांति नहीं मिली है. मुझे अपनी शांति के लिए न्याय चाहिए. न्याय ज़रूरी है क्योंकि यह बहुत भयानक जुर्म था. मुझे अकेलापन महसूस होता है और अपने परिवार की याद आती है…’
बबलू अहमद, जो आज दर्जी का काम करते हैं, दो साल के थे जब उन्होंने इस हत्याकांड में अपने माता-पिता को खो दिया था. उन्हें उनके दादा-दादी ने पाला-पोसा, जबकि उनकी बहनों की परवरिश एसओएस चिल्ड्रन्स विलेज में हुई.
और इस तरह अपनी रवानी के साथ कहानियां बहती रहीं, जैसे दुख का गंदा पानी– जिस पर लंबे समय से ध्यान नहीं दिया गया और जिसे नकारा गया– टूटे हुए बांध से बह रहा हो.
1983 में नेल्ली में हुए नरसंहार, जिसे भुला दिया गया, ने असम और बाक़ी भारत में जातीय संहार और नरसंहारों में सरकार की खुली मिलीभगत का ख़ूनी सिलसिला शुरू कर दिया. इसके बाद 1984 में दिल्ली, 1989 में भागलपुर, 1993 में मुंबई में भी सरकार की मदद से ऐसे ही नरसंहार हुए, जो 2002 में गुजरात में अपने चरम पर पहुंच गए.
सरकार ने नेल्ली में मारे गए लोगों के परिवार को हर मौत के लिए सिर्फ़ 5,000 रुपये का मुआवज़ा दिया. अगर इसकी तुलना सिख नरसंहार के बाद 1984 में दिए गए 7 से 10 लाख रुपये प्रति व्यक्ति मुआवज़े से की जाए, तो यह राशि मज़ाक़ लगती है. सिख नरसंहार में दी गई राशि भी उस रक़म के मुक़ाबले में बहुत कम थी जो किसी मानवीय लोकतांत्रिक सरकार को नरसंहार की तबाही झेलने वालों को मुआवज़े के तौर पर देने के लिए मजबूर महसूस करना चाहिए.
नेल्ली में हुए नरसंहार के सिलसिले में 688 क्रिमिनल केस दर्ज किए गए थे और इनमें से 310 केस में चार्जशीट दाख़िल की गई थी. बाक़ी 378 केस ‘सबूत की कमी’ के पुलिस के दावों की वजह से बंद कर दिए गए थे. लेकिन असम समझौते के तहत असम गण परिषद सरकार ने सभी 310 चार्जशीट वाले केस भी बंद कर दिए थे.
इसलिए, इस भयानक नरसंहार के लिए एक भी व्यक्ति को ट्रायल का सामना नहीं करना पड़ा. आज़ादी के बाद किसी भी सांप्रदायिक नरसंहार की घटना में आपराधिक न्याय की नाकामियों का यह सबसे बुरा रिकॉर्ड है.
दूसरे बड़े सांप्रदायिक नरसंहारों– दिल्ली, भागलपुर, मुंबई, गुजरात, कंधमाल और मुज़फ़्फ़रनगर – और जाति नरसंहारों – किल्वेनमनी, दिहुली, करमचेडू, त्सुंडुरु और खैरलिंजी – में जान गंवाने वालों को इंसाफ़ दिलाने का रिकॉर्ड भी बहुत ख़राब रहा है.
साफ़ है कि सरकार कुछ लोगों की ज़िंदगी को दूसरों के मुक़ाबले कम क़ीमती मानती है. लेकिन नफ़रत से हुए नरसंहारों के लिए शर्मनाक सज़ा से बचने की इस शर्मनाक लिस्ट में भी, नेल्ली सबसे ऊपर है.
मैं दोहराता हूं: आज़ाद भारत के सबसे भयानक सांप्रदायिक नरसंहारों में से एक के लिए एक भी इंसान को सज़ा नहीं मिली, या उस पर मुक़दमा भी नहीं चला.
आज फिर से नेल्ली नरसंहार के पीड़ितों के आंसू और चीख़ें याद करते हुए, मैं सोचता हूं कि वह दिन कब आएगा जब हमारा ग़ुस्सा और हमारी हमदर्दी हमारी पुलिस और कोर्ट को इन सभी सामूहिक दुखद घटनाओं के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए मजबूर करेगी?
असल में, हमें कब एहसास होगा कि हम सिर्फ़ एक साथ खड़े होकर– और सहयोग करके– ही सुरक्षित रह सकते हैं?
(हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हैं.)
(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की‘कोलिका’नामक संस्था से जुड़े हैं.)
