‘जब याद आए तो तारों के पड़ोस में, किसी भी तारे को ढूंढकर मुझे देख लेना…’

स्मृति शेष: विनोद कुमार शुक्ल के यहां विचार से मनुष्यता नहीं बनती, मनुष्यता से विचार उपजता है. भाषा व्याकरण का पालन नहीं करती- उनकी रचना उनकी कल्पना का व्याकरण है.

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(स्क्रीनग्रैब साभार: चार फूल हैं और दुनिया है/अचल मिश्रा)

विनोद कुमार शुक्ल हमसे विदा हो गए– उनके ही एक शब्द का उपयोग करें तो लगभग विदा. वे ऐसे लेखक और मित्र रहे हैं कि कभी पूरी तरह से विदा नहीं होंगे. याद किया जा सकता है कि उनका पहला कविता संग्रह ‘लगभग जयहिन्द’ 1970 में ‘पहचान’ सीरीज में एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुआ था. उससे पहले उनकी कुछ कविताएं मुक्तिबोध ने दिल्ली श्रीकान्त वर्मा को भेजी थी जो 1960 के दशक की शुरुआत में ‘कृति’ में प्रकाशित हुई थीं.

एक अधसदी से ज़्यादा अवधि में विनोद साहित्य में सक्रिय रहे: उन्होंने कविताएं, कहानियां, उपन्यास और बच्चों-तरुणों के लिए साहित्य रचा. उन्होंने ऐसा कोई नाटकीय दावा कभी किया नहीं पर उनका जीवन साहित्य के लिए ही बना रहा: दोनों में जो जैविक ही दूरी होती है वह कम से कमतर लगातार होती गई. साहित्य ही उनका केंद्रीय जीवन बनता गया. वे अपने घर-परिवार की चिंता और देखभाल बराबर करते रहे पर उनका जीवन धीरे-धीरे साहित्य पर एकाग्र होता गया. यह एक ढंग से अपने मनुष्य, मनुष्यतर होने की लंबी कोशिश थी.

विनोद जैविक रूप से तो मनुष्य थे ही पर उन्हें असली मनुष्य, ईमानदार और सच्चा, दूसरों का संग-साथी, पीर पराई समझने वाला मनुष्य उनके साहित्य ने ही बनाया. उनके साहित्य ने ही उनकी मनुष्यता सत्यापित की और पोसी मानों कि साहित्य ही उनकी मनुष्यता का असली लक्ष्य था. शुरू में वे अपने लिखने के प्रति बेहद निःस्पृह थे, लगभग उदासीन थे. ‘लगभग जयहिन्द’ की कविताएं मैंने रायपुर कलेक्टर से अनुरोध कर उनके एक राजस्व अधिकारी के हाथों अंबिकापुर मंगवायी थीं क्योंकि विनोद जी वादा कर कविताएं नहीं भेज रहे थे.

यही नहीं पुस्तिका का शीर्षक मैंने तय किया और उनसे कभी सहमति नहीं आई. जब पुस्तिका की पच्चीस प्रतियां उन्हें भेजी गईं तो उनमें से तेईस उनके पास तीन-चार साल बाद तक सुरक्षित थीं क्योंकि उन्होंने किसी को दी ही नहीं थीं. उनका जीवन में पहला सार्वजनिक कवितापाठ मध्य प्रदेश कला परिषद् के ‘उत्सव’ के अंतर्गत ‘कविता की सुबह’ में शायद 1974 में हुआ.

अज्ञेय के बाद विनोद ही एक ऐसे लेखक हैं जिन्होंने कविता और उपन्यास दोनों में श्रेष्ठता हासिल की. दोनों में उनके ध्यान-अन्वेषण और सर्जनात्मकता के केंद्र में रहा साधारण जीवन रोज़मर्रापन, उनकी निपट-सहज मानवीयता, उनके संघर्ष और विडंबनाएं, अंतर्विरोध और बेचैनियां और उन सबसे निकली-रिसती उदात्त महिमा, अदम्य गरिमा. मनुष्य होने की झीनी पर अनिवार्य आभा.

उनके यहां उपन्यास की कथाभाषा में कविता जैसी गर्माहट और बिंबमयता है तो कविता में एक तरह की कथात्मकता का तत्व शामिल है. उनकी भाषा में, फिर वह कविता हो गया उपन्यास, कोई जातीय स्मृति नहीं है, अतीत की कोई अंतर्ध्‍वनि सुनाई नहीं देती: वे आश्चर्यजनक रूप से हमें पूरी तरह से घेरे हुए वर्तमान के चितेरे हैं. फिर भी, वे हर कुछ को, इस आक्रांत करने वाले वर्तमान को, सचाई और उसकी तहों को थोड़ा टेढ़ी नज़र से देखते हैं.

ऐसा कहा गया है कि वे अपनी रचना में कुछ तिलिस्म सा रचते हैं. यह तिलिस्म साधारण जीवन और रोज़मर्रा हमारे आसपास जो घटता उसी से उत्तेजित तिलिस्म है. उसमें कई बार यथार्थ को इतना सघन किया गया है कि वह अतियथार्थ तक पहुंच पाता है. दीवार में रहने वाली खिड़की  का बिंब और एक हाथी पर चढ़कर समय पर स्कूल पहुंचने वाला अध्यापक जिस यथार्थ के हिस्से हैं उसमें अतिशयता अभाव के बग़ल में है.

यह यथार्थ बीहड़ और विचित्र तो है पर उसमें नाटकीय आक्रांति नहीं है. वह मंद-मंद चुपचाप घटता रहता है- विनोद उसे दर्ज करते हैं और उससे जो सच प्रगट होता है वह भी शांत दिपता है: वह जुगनू सच है जो अलक्षित भी जाता है.

इतिहास, जाति स्मृति और विचारधारा से लगभग दूर रहना विनोद की रणनीति या विवशता नहीं, नैतिकता थी. उन्हें किसी विराट् सत्य का प्रतिपादन या खोज नहीं करना था. वे अपने जुगनू सच दूर रहकर, चुप रहकर, साहित्य-जगत की झंझटों और विवादों से अलग रहकर पा सकते हैं ऐसा उनका विश्वास था.

‘विनोद की कविता और कथा दोनों के केंद्र में अनायक है- उनके यहां एक सरकारी क्लर्क, एक स्कूली मास्टर, मंगलू, सोनसी जैसे अनायक चरित्र हैं और वह अपना काव्य-यथार्थ और कथा-यथार्थ ऐसी अनायकता से ही बुनते- रचते हैं.’ (स्क्रीनग्रैब साभार: चार फूल हैं और दुनिया है/अचल मिश्रा)

वे न तो विचार-बोझिल थे, न ही उनके साहित्य में ऐसी बोझिलता है- उनके यहां तो ‘वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर विचार की तरह’ की स्थिति है जो उनके पहले पुस्तकाकार कविता संग्रह का नाम था- हिंदी में किसी पुस्तक का अब सबसे लंबा नाम.

उनके यहां विचार से मनुष्यता नहीं बनती, मनुष्यता से विचार उपजता है. भाषा व्याकरण का पालन नहीं करती- उनकी रचना उनकी कल्पना का व्याकरण है. इसलिए पारंपरिक व्याकरण से विचलन उन्होंने शुरू से ही करना शुरू कर दिया था. उनके साहित्य में संवेदना व्याप्त है कि ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’. एक तरह से विनोद मानते रहे कि जिजीविषा अपने आप में पवित्र है और उसे कहीं और से सत्यापन की दरकार नहीं. उसके लिए कहीं भी कुछ भी ‘अतिरिक्त नहीं’ था कि आप उसको नज़रअंदाज़ कर दें.

विनोद की कविता और कथा दोनों के केंद्र में अनायक है- वे एक तरह से, बिना इसकी घोषणा या दावा किए अपने समय के नायकों को अपने साहित्य में कोई जगह नहीं दी- उनके यहां एक सरकारी क्लर्क, एक स्कूली मास्टर, मंगलू, सोनसी जैसे अनायक चरित्र हैं और वह अपना काव्य-यथार्थ और कथा-यथार्थ ऐसी अनायकता से ही बुनते- रचते हैं. अनायक कर्म ही मनुष्यता, उसकी स्थिति और नियति, उसकी मुश्किलों, सुख-दुखों को व्यक्त-विन्यस्‍त करता है.

निर्जन प्रदेश के एकांत में रहते दंपति को कविता में लाते हुए वे कहते हैं:

छोटी सी गृहस्‍थी के कर्मकाण्ड का ब्रह्मांड
जैसे झाड़ू लगने से
रात का बचा हुआ अँधेरा दूर होता
और कालिख लगे बर्तनों को माँजने में
सूर्य मँजते हुए उदित होता.

विनोद का काव्यकौशल इसमें था कि वे निपट स्थानीय को कॉस्मिक से, झाड़ू को निशांत से बर्तन, मांजने को सूर्य सूर्योदय से, मंगलू को मंगल ग्रह से जोड़ सकते थे. वे साधारण की आंच और आभा के, साधारणजन की गरिमा और गरमाहट के, जिजीविषा के ब्‍यौरों और विपुलता के अप्रतिम कि़स्सागो थे. उनके यहां मानो यह सब कुछ पड़ोस में था:

मैं ईश्वर को ढूंढता हूं
तो वह पड़ोस में मिलता है.
एक पड़ोसी की तरह
मैं उसे पुकारता हूं
वह सुन लेता है
नहीं सुनता तो लगता है
कि अभी घर पर नहीं.

इस पर ध्यान शायद कम गया है कि विनोद का एक महत्वपूर्ण अभिप्राय पड़ोस रहा है. वे लगातार पड़ोस में रहते हैं- ‘कितनी गेंदें पड़ोस में खो चुकीं/ गेंद ढूंढने हम/ किसी के भी घर घुस जाते/ घरों में जाना और खो जाना/ हमने गेंद से सीखा’; ‘पड़ोस को मानता हूं/ इसलिए घर को’; ‘चंद्रमा पड़ोसी की तरह/ खिड़की के बाहर मुझे दिखा’; ‘पहले भी यह संसार/ आस-पास पड़ोस से याद रहा’; ‘अपने घर का पता पूछने/ पड़ोस के दरवाजे़ को खटखटाता हूं.

पड़ोस में जो भीषण और डरावना घटना रहता है उससे विनोद अनजान नहीं थे. वह नोट करते हैं कि ‘छत्तीसगढ़ी में वह झूठ बोल रहा है/ कि अब अच्छे दिन आएंगे’ या की ‘मैं यह भी कह देना चाहता हूं/ कि अपन लोगों को/एक दूसरे का साथ देना चाहिये’ या कि ‘किसी मुसलमान के हाथों मरूं/ तो मुझे हिन्दू न समझना मुसलमान समझना अगर हिंदू हाथों मरूं/ तो मुझे मुसलमान न समझना/ हिन्दू समझना’.

विनोद अपना भौतिक शरीर छोड़ चुके हैं. उनकी कविता का यह अंश याद आता है:

बच्चों से मैंने कहावत की तरह कहा
कि जब याद आए तो तारों के पड़ोस में
किसी भी तारे को ढूंढकर मुझे देख लेना
और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उस तारे को बता देना
कि मैं पृथ्वी के पड़ोस को नहीं छोड़ा है.

पड़ोस की इच्छा को
मैं तारे के बीच सुरक्षित रख देता हूं
जैसे अपने रहने को.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)