नई दिल्ली: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा वन भूमि को पट्टे पर देने से जुड़े नियमों और शर्तों में बदलाव किए जाने के कुछ दिनों बाद कांग्रेस ने बुधवार (7 जनवरी) को आरोप लगाया कि 2023 में वन (संरक्षण) अधिनियम में किए गए संशोधनों ने वन प्रबंधन के निजीकरण का रास्ता खोल दिया है.
कांग्रेस महासचिव और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एक्स पर इन हालिया बदलावों की निंदा करते हुए कहा कि यह कदम निजी संस्थाओं को वन भूमि पट्टे पर देने को आसान बनाएगा और इससे भारत के वन प्रबंधन पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा.
जयराम रमेश ने कहा, ‘अगस्त 2023 में मोदी सरकार ने संसद के माध्यम से वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 में संशोधनों को बुलडोज़र की तरह पारित कर दिया था. इस कानून का नाम बदलकर वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 करने के अलावा इन संशोधनों ने देश में वनों के शासन के लिए कानूनी ढांचे में दूरगामी बदलाव किए.’
उन्होंने आगे कहा कि उसी समय यह इंगित किया गया था कि इन संशोधनों ने वन प्रबंधन के निजीकरण के लिए दरवाज़ा खोल दिया है.
उन्होंने जोड़ा, ‘अब ठीक वैसा ही हो रहा है – ठीक वैसा ही हुआ है – जैसा कि केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 2 जनवरी, 2026 को जारी सर्कुलर से पता चलता है. यह तो बस शुरुआत है.’
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, मंत्रालय द्वारा जारी सर्कुलर के अनुसार, 2023 में वन (संरक्षण) अधिनियम में किए गए संशोधन सलाहकार समिति की सिफारिशों और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के आधार पर किए गए थे. इन नए संशोधनों का उद्देश्य प्राकृतिक पुनर्जनन में सहायता करना है, जिसमें वनीकरण और पौधारोपण शामिल है, और यह राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों तथा सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं के बीच आपसी सहमति से तय उद्देश्यों के लिए होगा.
सर्कुलर में राज्य सरकारों को यह अधिकार दिया गया है कि वे ऐसे पौधारोपण के उपयोग और उससे होने वाले राजस्व के बंटवारे के लिए मामले-दर-मामले के आधार पर उपयुक्त ढांचा तैयार करें.
सर्कुलर में कहा गया है, ‘स्वीकृत कार्य योजना/प्रबंधन योजना के प्रावधानों के अनुसार तथा राज्य वन विभाग की निगरानी में की गई ऐसी गतिविधियों को वानिकी गतिविधियां माना जाएगा और इसलिए इनके लिए प्रतिपूरक वनीकरण (कम्पेन्सेटरी अफॉरेस्टेशन) तथा शुद्ध वर्तमान मूल्य (नेट प्रेज़ेंट वैल्यू) के भुगतान की आवश्यकता लागू नहीं होगी.’
आगे कहा गया है, ‘बशर्ते कि वनीकरण/पौधारोपण को राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) के अनुसार अनुमति दी जाए, जिसे कार्य योजना के प्रावधानों के अनुरूप तैयार किया गया हो और सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत किया गया हो. इसमें क्षेत्रफल, प्रस्तावित प्रजातियां, प्रस्तावित गतिविधियां, उपयोग के लिए उपलब्ध सतत कटाई (सिल्वीकल्चरली उपलब्ध सस्टेनेबल हार्वेस्ट) आदि का विवरण स्पष्ट रूप से दिया जाएगा.’
बता दें कि केंद्र सरकार द्वारा किए गए वन संरक्षण कानून के नियमों बदलाव का व्यापक तौर पर आदिवासी समुदायों ने विरोध किया था. इन्हें वापस लेने की मांग की थी.
जून 2022 में केंद्र सरकार द्वारा जंगलों को काटने के संबंध में नए नियम अधिसूचित किए गए थे, जो निजी डेवलपर्स को बिना वनवासियों की सहमति लिए जंगल काटने की अनुमति देते हैं. यह एक ऐसा बदलाव है, जो वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करता है.
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) ने बीते 28 जून 2022 को 2003 में लाए गए वन संरक्षण अधिनियम की जगह वन संरक्षण अधिनियम 2022 को अधिसूचित किया था.
नए नियमों के तहत जंगल काटने से पहले अनुसूचित जनजातियों और अन्य वनवासी समुदायों से सहमति प्राप्त करने की जिम्मेदारी अब राज्य सरकार की होगी, जो कि पहले केंद्र सरकार के लिए अनिवार्य थी.
पुराने नियमों के तहत वन भूमि को निजी परियोजनाओं के लिए सौंपे जाने की मंजूरी देने से पहले केंद्र सरकार को वनवासी समुदायों की सहमति को सत्यापित करने की जरूरत होती थी.
