बरसों तक ट्रायल नहीं, फिर जुर्म के कबूलनामे का प्रस्ताव: एक ही पटकथा को दोहराती एनआईए

एनआईए के प्रभावित करने वाले दोषसिद्धि आंकड़ों को लेकर कई आरोपियों, उनके वकीलों और यहां तक ​​कि एजेंसी से जुड़े रहे एक व्यक्ति ने द वायर से बात की और बताया कि क्यों एनआईए के इतने सारे मामले आरोपियों के कबूलनामों के साथ उन्हें दोषी मान लिए जाने के साथ ख़त्म होते हैं.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

(यह रिपोर्ट पुलित्जर सेंटर फॉर क्राइसिस रिपोर्टिंग के सहयोग से की जा रही ‘द वायर’ की ‘द फोर्स्ड गिल्ट प्रोजेक्ट’ श्रृंखला का दूसरा भाग है. पहले भाग को यहां पढ़ा जा सकता है.)

[राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) दोष सिद्धि के उच्च आंकड़ों को गर्व के साथ पेश करती है. दोष सिद्धि के इन मामलों में अभियुक्तों द्वारा दोषी याचिकाएं दायर करने का बड़ा हाथ रहा है. एनआईए के इतने सारे मामलों में दोषी याचिका दायर करने के कारणों को समझने के लिए द वायर ने अभियुक्तों, उनके वकीलों और यहां तक कि एनआईए के पूर्व अभियोजकों तक से बात की ताकि और उच्च दोष सिद्धि के चमकीले आंकड़ों के पीछे की हकीकत को समझा जा सके.

यह स्टोरी अलपुझा, बेलागवी, बेंगलुरू, कोच्चि, कोलकाता, मालदा, मुंबई, नांदेड़, नई दिल्ली और परभणी से की गई रिपोर्टिंग पर आधारित है.]

पटना (बिहार): यह 2019 की सर्दियां थीं. राकेश चौधरी, जिनकी उम्र उस समय 24 साल थी, ने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से एक छोटा-सा कर्ज लेकर बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के बेतिया गांव में मछलियों और सब्जियों का एक छोटा-सा कारोबार शुरू किया था. उनका यह कारोबार चल निकला और उनके अभिभावकों को यह यकीन हो गया कि चौधरी की अब इतनी उम्र हो गई है और वे इतने जिम्मेदार भी हो चुके हैं कि अब उनकी शादी कर दी जानी चाहिए. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो सका जो सोचा था. गौने की रस्म जिसके बाद वधू, पति के घर आती है, से महज कुछ दिन पहले चौधरी को गिरफ्तार कर लिया गया. एनआईए ने उन्हें जाली नोट के लेनदेन के एक मामले में पांचवें अभियुक्त के तौर पर नामजद कर लिया था.

मुश्किलें तब शुरू हुई जब कोलकाता के प्रेसिडेंसी सुधार गृह में जाली नोट के एक दूसरे मामले में बंद चौधरी के मामा मन्ना लाल, ने उन्हें जल्द से जल्द मिलने के लिए जेल में बुलाया. चौधरी इसके लिए तैयार हो गए. लेकिन 2019 में चौधरी के उनसे मिलकर वापस बेतिया आने के बाद एनआईए ने उन पर जाली भारतीय नोट वाले मामले में कुरियर (संदेशवाहक) के तौर पर काम करने का आरोप मढ़ दिया. लाल को जल्दी ही पटना के आदर्श केंद्रीय कारागार, बेऊर में शिफ्ट कर दिया गया. जाली भारतीय नोट मामले के तीन अन्य अभियुक्तों – शाहनवाज शेख, सलीम एसके और कमीरुज्जमन – को भी चौधरी के साथ वहीं बंद किया गया था.

चौधरी कहते हैं, ‘जेल के अंदर मैं सिर्फ अपने मामा को जानता था. और, चूंकि मैं मेरे मामा को ही मुझे इस मुसीबत में डालने के लिए जिम्मेदार मानता था, इसलिए जेल के भीतर मैं उनसे दूर रहता था. बाकी तीनों का रवैया मेरे प्रति शत्रुतापूर्ण था.’

मई 2019 (जब उन्हें गिरफ्तार किया गया था) से जनवरी, 2022 तक, यह केस वास्तविक सुनवाई के स्तर पर आने का इंतजार करता रहा. ‘उन दिनों, एस्कॉर्ट पार्टी के उपलब्ध होने पर हमें कचहरी ले जाया जाता था. वहां जज और कुछ नहीं करते थे, बस (सुनवाई की) अगली तारीख मुकर्रर कर देते थे और हमें वापस जेल भेज दिया जाता था.

उस समय चौधरी का मुकदमा लड़ रहे वासिफ खान उस सुनवाई को ‘मशीनी कवायद’ बताते हैं. उनका कहना है, ‘जज लोग शायद ही कभी सिर उठाकर यह देखते हैं कि उनके सामने किसे पेश किया गया है. कोई यह मुआयना नहीं करता कि (कि गिरफ्तार व्यक्ति) अच्छी स्थिति में है या नहीं, या उसकी कोई शिकायत या वे कोई निवेदन करना चाहते है या उनके पास उनकी तरफ से उनका केस लड़ने के लिए कोई वकील है या नहीं. कुछ भी नहीं.’

लेकिन, जनवरी 2022 में चीजें तेजी से बदलने लगीं. चौधरी और उनके साथ बनाए गए सह-अभियुक्तों को जेलर के दफ्तर में बुलाया गया, जहां तक आमतौर पर कैदियों की पहुंच नहीं होती है. यहां इन सबको कतार में जमीन पर बैठने के लिए कहा गया. चौधरी याद करते हुए कहते हैं, ‘उसके बाद तीन लोग उस कमरे में दाखिल हुए. जानता था कि ये तीनों एनआईए अधिकारी हैं –  उन्हें गिरफ्तारी के समय और कुछ मर्तबा कचहरी में देखा था. लेकिन उनमें से किसी से कभी कोई बातचीत नहीं हुई थी.’

उनके हाथों में सादे पन्नों का पुलिंदा था. चौधरी बताते हैं, उन्होंने हमसे पूछा कि क्या हम हिंदी में लिख और पढ़ सकते हैं. हमने हां में सिर हिलाया. चौधरी का दावा है कि इसके बाद उन तीन लोगों ने उन्हें उनका केस विस्तार से समझाया और उन पर लगाए गए आरोपों में संभावित सजा के बारे में उन्हें बताया.

चौधरी ने कहा, ‘उन्होंने हमें कहा कि हमें कम से कम 10 साल जेल में बितानी होगी.’ उनके साथ लाए गए सादे कागज अपने-अपने अपराध का संक्षिप्त कबूलनामा लिखने और दस्तखत करने के लिए थे.

इसके बाद एक एनआई अधिकारी ने उनके सामने एक प्रस्ताव रखा: ‘अपना गुनाह कबूल कर लो और हम कोर्ट में तुम्हें मिलने वाली सजा को कम कराने की कोशिश करेंगे. कुल मिलाकर पांच साल की सजा पर बात बन सकती है.’

चौधरी कहते हैं, यह अभियुक्त को दिया गया कोई सौहार्दपूर्ण प्रस्ताव नहीं था. ‘यह एक छिपी हुई धमकी थी.’ चूंकि उनमें से सभी ने पहले ही तीन साल से ज्यादा समय जेल में बिता लिया था, इसलिए पांच में चार अभियुक्त यह कबूलनामा लिखने के लिए तुरंत तैयार हो गए. सिर्फ चौधरी ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया.

चौधरी कहते हैं, ‘उन्होंने मुझसे कहा कि मैं कभी भी जमानत पर बाहर नहीं निकल पाऊंगा और मैं दशकों तक जेल में सड़ता रहूंगा.’ लेकिन जैसा कि चौधरी कहते हैं, ‘मैं पहले ही एक ऐसे मामले में तीन साल जेल में रह चुका था, जिसमें मैं शामिल नहीं था. इससे ज्यादा और बुरी स्थिति और क्या हो सकती थी?’

आखिरकार जब चौधरी अपने फैसले पर डटे रहे, तो उन्हें बाकी सह-अभियुक्तों से अलग कर दिया गया. 22 जनवरी, 2022 को अन्य अभियुक्तों को हाथ से एक जैसी पंक्तियां लिखने के लिए कहा गया. कथित तौर पर इस सबके दौरान आदर्श सेंट्रल जेल के सुपरिंटेंडेंट (अधीक्षक) भी मौजूद थे. चौधरी को उनका नाम याद नहीं है. ‘उनके आवेदनों का मजमून कुछ इस तरह था: मैं, हमारे द्वारा किए गए अपराध के लिए माफी मांगता हूं. कृपया मेरी दोषी याचिका (गिल्टी प्ली) पर विचार किया जाए और दंड की मात्रा तय करते वक्त उदारता दिखाई जाए.’

गिरफ्तार होने के तीन साल बाद अभियुक्तों ने ऐसी  याचिका दायर की थी. इस समय तक उनके मामले में कोई ट्रायल नहीं हुआ था. यहां तक कि अदालत ने अभी तक उन पर आरोप तक तय नहीं किए थे- इस चरण के बाद ही वास्तविक सुनवाई शुरू होती है. एनआईए जज गुरिंदर सिंह मल्होत्रा ने तुरंत उनकी दोषी याचिकाओं को स्वीकार कर लिया. दोषी याचिका दायर करने वालों में तीन मुसलमान थे.

अपने फैसले में न्यायाधीश मल्होत्रा ने अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 229 में प्रयुक्त पद ‘कर सकता है’ पर जोर दिया. यह धारा कहती है, ‘अगर अभियुक्त दोषी याचिका देता है, तो न्यायाधीश उसकी याचिका को रिकॉर्ड करेगा और उसके बाद अपने विवेक से उसे सिद्ध दोषी करार दे सकता है.’

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

अपने इस फैसले में मल्होत्रा ने कहा, ‘कर सकता है (शब्द) का मतलब है कि भले ही आरोपी व्यक्ति अपने अपराध को स्वीकार कर रहा है, फिर भी कोर्ट को इस बात की तसल्ली कर लेनी चाहिए कि आरोपी व्यक्ति बिना किसी शंका के, दुविधारहित तरीके से और बगैर किसी लालच, धमकी या किसी वादे के बिना दोषी याचिका दे रहे हैं.’

लेकिन इसके बावजूद जज ने इस बात की कोई जांच नहीं की कि आखिर चार अभियुक्तों ने एकमत से और एक समान भाषा में लिखे आवेदनों से दोषी याचिका क्यों दी? साथ ही दोषी याचिका दायर करने में एनआई अधिकारियों की भूमिका की भी कोई जांच नहीं की गई. न ही जज ने इस बाबत कोई पूछताछ की कि आखिर अपने सह आरोपियों की ही तरह चौधरी ने भी यह रास्ता क्यों नहीं अपनाया.

एनआईए के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देने वाले चौधरी को आखिरकार 12 अप्रैल, 2023 को जमानत पर रिहा कर दिया गया.

इस केस के संबंध में द वायर के सवालों के जवाब में एनआईए के प्रवक्ता ने अभियुक्तों और एनआईए अधिकारियों के बीच जेल में हुई किसी मुलाकात की बात से स्पष्ट शब्दों में इनकार दिया. एजेंसी के प्रवक्ता का जवाब था, ‘हमारे अधिकारी कोर्ट के आदेश के बिना जेल में अभियुक्तों से नहीं मिलते हैं.

रिहाई के छह महीने के बाद पटना में चौधरी की मुलाकात इस रिपोर्टर से हुई. उन बातों को याद करते हुए चौधरी का कहना था, ‘उसे नहीं पता कि एनआईए के दबाव में नहीं आने के फैसले पर उसके भीतर कोई गर्व का भाव है या अब वह फैसला मूर्खतापूर्ण लगता है. ‘जो छोटा-मोटा कारोबार मैंने इतनी मेहनत से खड़ा किया था, वह पूरी तरह से चौपट हो गया है. मामले की सुनवाई अभी भी चल रही है. मेरी पत्नी अपने मां-बाप के पास वापस चली गई है और उसका कहना है कि वह तब तक वापस नहीं लौटेगी, जब मैं एक ठीक-ठाक घर न ले लूं और उसका ध्यान रखने लायक मेरी आमदनी न हो जाए.’

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एक हजार किलोमीटर से अधिक दूर, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा के परभणी जिले में मोहम्मद रईसुद्दीन को भी एनआईए के साथ लगभग ऐसी ही लड़ाई लड़नी पड़ी थी. जिला परिषद  (स्थानीय स्वशासन निकाय) के शिक्षक रइसुद्दीन को 7 अगस्त, 2016 को प्रतिबंधित संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया आईएसआईएस (आईएसआईएस) में कथित भूमिका के लिए गिरफ्तार किया गया था. उस समय उनकी उम्र 37 साल थी.

रईसुद्दीन महाराष्ट्र के एंटी टेररिज्म स्क्वाड (एटीएस) द्वारा गिरफ्तार किए गए चार लोगों में से एक था. एटीएस ने इसे एक काफी ‘परिष्कृत आतंकी मॉड्यूल’ करारा दिया था. इस मामले को इतना गंभीर माना गया कि जांच के दो महीनों के भीतर इसे राज्य एजेंसी के हाथों से लेकर केंद्रीय एजेंसी एनआईए के सुपुर्द कर दिया गया.

रईसुद्दीन याद करते हुए कहते हैं, एटीएस से एनआईए में मामले का स्थानांतरण ‘अजीब’ था. ‘एटीएस ने हमें उनके पास बंद सबसे खतरनाक लोगों के तौर पर पेश किया था. गिरफ्तार किए गए एक व्यक्ति के पास से विस्फोटक होने का भी दावा किया गया था. लेकिन मामले के एनआईए के हाथ में आने के साथ ही एजेंसी की इस मामले की सुनवाई में दिलचस्पी समाप्त हो गई. इसकी जगह वे दोषी याचिका देने पर हमें होने वाली सजा को कम कराने का प्रस्ताव देने लगे. छह साल तक जेल में बंद रहने के बाद चार में से दो – नासिरबिन यफाई और मोहम्मद शाहिद खान ने उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया.

बाकी दो रईसुद्दीन और इकबाल अहमद ने उनके प्रस्ताव को अस्वीकार करने के फैसले पर डटे रहे.

एनआईए ने आतंकी कार्य में चार लोगों की अलग-अलग स्तर की सहभागिता का आरोप लगाया था – यफाई पर सीधे तौर पर इराक और सीरिया में बैठे हैंडलर्स से संपर्क होने का आरोप था, तो खान पर इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोजिव डिवाइस (आइईडी) बनाने के लिए सामान की खरीद का आरोप लगाया गया था.

रईसुद्दीन पर आईएसआईएस में भर्ती होने में ‘दिलचस्पी दिखाने’ का आरोप था. एनआईए के मुताबिक रईसुद्दीन ने अरबी भाषा में आईएसआईएस के खलीफा के प्रति अपनी निष्ठा की हस्तलिखित शपथ भेजकर उक्त आतंकी समूह में भर्ती होने में अपनी ‘दिलचस्पी’ दिखाई थी.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

जब यफाई और खान दोषी याचिका देने के लिए तैयार हुए, उस समय तक यह कोई अनजाना पद नहीं रह गया था. यफाई और खान ने आखिरकार 2022 के मध्य के करीब दोषी याचिका दायर की. दोनों ने एक जैसी चार पंक्तियों की दरख्वास्त लिखी. उनके द्वारा किए गए आवेदन की एक पंक्ति थी, ‘एनआईए ने जिस अपराध का मुझे आरोपी बनाया है, मैं खुद को उसका दोषी मानता हूं.’

इस मुकाम तक इनकी पैरवी कर रहे वकील खान इशरत अली अज़हर ने खुद को इस केस से अलग कर लिया. वकील खान कहते हैं, ‘यफाई और खान ने दोषी याचिका दायर करने का फैसला लेने से पहले उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी. अगर उन्हें इसके बारे में पता होता तो वे उन्हें ऐसा करने से रोकने की कोशिश करते.

खान ने कहा, ‘मुझे जमीयत उलेमा -ए-हिंद जो कि एक एनजीओ है, के द्वारा इस मामले की पैरवी के लिए रखा गया था. चूंकि यह एनजीओ सिर्फ उन लोगों के मुकदमे लड़ता है, जो निर्दोष हैं और उन पर गलत आरोप लगाए गए हैं, इसलिए मेरा इस मामले से और आगे जुड़ा रहना मुमकिन नहीं था.’

यह पूछे जाने पर वे यफाई और खान के केस के बारे में वास्तव में क्या सोचते हैं और क्या उन्हें लगता है कि यफाई और खान अपराध में शामिल थे, वकील खान ने जवाबी प्रश्न किया, ‘क्या यह दिलचस्प नहीं है कि अंतरात्मा की आवाज सिर्फ एनआईए द्वारा आरोपित लोगों में ही उठती है और वे अपना दोष कबूल करना चाहते हैं. क्या आप देश की दूसरी एजेंसी के साथ भी इतनी निरंतरता से ऐसा होता हुए देखते हैं?

इस केस से वकील खान के अलग होने के बाद वसंत प्रभु नामक एक वकील को त्वरित तरीके से केस की बागडोर सौंपी गई. वकील खान का कहना है कि प्रभु की नियुक्ति एनआईए की सिफारिश पर की गई. उनका दावा है कि प्रभु को बस यह ‘सीमित कार्य’ सौंपा गया कि वे कोर्ट से कहें कि दो अभियुक्तों ने दोषी याचिका दायर करना स्वीकार कर लिया है. एक दिन के भीतर इस मामले में फैसला सुना दिया गया.

जज दिनेश कोठालिकर के अधीन विशेष एनआईए अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया और उन्हें गैर-कानूनी गतिविधि (निरोधक) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 18 बी, 20, 28, 39, 13 और 16 और एक्सप्लोसिव सब्सटांस एक्ट की धारा 5 तहत 7 साल की सजा दी गई. इनमें से कुछ धाराओं में आजीवन कारावास तक का प्रावधान है. लेकिन यफाई और खान जो पहले ही जेल में 6 साल से ज्यादा समय जेल में बिता चुके थे, उन्हें सात साल की सजा पूरी करने के लिए जेल में सिर्फ एक साल और पूरे करने थे. इन दोनों को 2023 में मध्य में रिहा कर दिया गया.

यफाई और खान एनआई कोर्ट द्वारा सजा दिए जाने के महज एक हफ्ते के बाद रईसुद्दीन को बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा जमानत दे दी गई. यह जमानत केस के मेरिट के आधार पर दी गई, न किसी तकनीकी कमी के कारण. बॉम्बे हाईकोर्ट ने आईएसआईएस में भर्ती होने के लिए कथित तौर पर रईसुद्दीन द्वारा लिखी गई चिट्ठी की प्रामाणिकता पर सवाल उठाया.

37 पन्नों के अपने जमानत आदेश में जस्टिस वीजी बिष्ट और जस्टिस रेवती मोहिते डेरे ने लिखा, ‘जांच एजेंसी द्वारा याची-अभियुक्त के संबंध में जमा की गई और हमारे समक्ष प्रस्तुत की गई सामग्री प्रथम दृष्टया अपीलकर्ता-अभियुक्त के उपरोक्त अपराधों में शामिल होने की ओर इशारा नहीं करती है.’

इस केस के बारे में और यह पूछे जाने पर कि आखिर दो लोगों को कैसे केस के मेरिट के आधार पर जमानत पर रिहा कर दिया गया जबकि दूसरे आरोपियों पर भी समान आरोप लगे थे और उन्होंने पहले ही दोषी याचिका दायर कर दी है और उन पर फैसला भी सुनाया जा चुका है, एनआईए के प्रवक्ता ने कहा, ‘कोर्ट ने जरूर उन्हें रिहा कर दिया है, लेकिन यह याद रखना अहम है कि उनके मुकदमों की सुनवाई अभी भी चल रही है. हाईकोर्ट, ट्रायल अदालतों को अपनी ड्यूटी निभाने से नहीं रोकते हैं (जो कि इस मामले में मुकदमे की सुनवाई पूरी करना है).’

इस केस को दर्ज किए हुए नौ साल से ज्यादा समय हो गया है. हर महीने के पहले मंगलवार को रईसुद्दीन और अहमद को परभणी से मुंबई तक की 600 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है और जमानत की शर्तों को पूरा करने के लिए एनएआई ऑफिस आकर अपनी हाजिरी देनी होती है.

रईसुद्दीन कहते हैं, ‘हमारी माली हालत को ध्यान में रखते हुए एनआईए कोर्ट, एनआईए अधिकारियों के समक्ष होने वाली हमारी हाजिरी वाले दिन ही हमारे मुकदमे की सुनवाई के लिए तैयार हो गया है. लेकिन, इसका मतलब यही है कि हर महीने एक या अधिक से अधिक दो गवाहों से पूछताछ की जा सकती है.’ अभी तक अभियोजन पक्ष के 40 में से 14 गवाहों से ही पूछताछ की जा सकी है. इस रफ्तार से इस केस की सुनवाई और दो या तीन साल तक होती रहेगी.

तब तक, रईसुद्दीन जिसे इस केस में अपने बरी होने का विश्वास है, अपने शिक्षक की नौकरी में फिर से वापस नहीं जा सकते हैं. आतंकी आरोपों का सामना कर रहे सरकारी कर्मचारी होने के नाते वह फिलहाल निलंबित हैं. अपने परिवार को चलाने के लिए इधर-उधर का काम करने वाले अहमद को स्थायी रोजगार मिलने में दिक्क्त हो रही है और वह समुदाय द्वारा दिए जा रहे चंदे से अपना गुजारा कर रहा है.

अहमद का कहना कि एनआईए अभी भी उसे दोषी याचिका दायर करने के प्रस्ताव से फुसलाती रहती है. ‘वे कहते हैं कि रईसुद्दीन के पास सरकारी नौकरी का सहारा है. उसके सभी भाई-बहन शिक्षित हैं और उनके पास अच्छी नौकरियां हैं. इसलिए वह यह लड़ाई लड़ सकने का खर्च उठा सकता है. वे मुझसे पूछते हैं, लेकिन तुम क्यों यह लड़ाई लड़ रहे हो?’

लेकिन रईसुद्दीन की ही तरह अहमद के लिए भी यह लड़ाई सिर्फ रोजी-रोटी की नहीं है. वह पूछता है, ‘मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे हैं. अगर मैं उनकी (एनआईए की) मांग मान लेता हूं, तो मैं अपने बच्चों का सामना कैसे कर पाऊंगा?’

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चौधरी, रईसुद्दीन और अहमद के मामले अकेले नहीं हैं. पिछले एक साल में द वायर ने एनआईए के आंकड़े की जांच की है, आठ राज्यों के 17 जिलों की यात्रा की है और एजेंसी द्वारा आरोपित व्यक्तियों, उनके वकीलों और कई एनआईए अधिकारियों से बातचीत की है. इस रिसर्च से यह सामने आया है कि जुर्म के कबूलनामे नियोजित हैं और सावधानी से तैयार किए गए इस पैटर्न को रचने वाली यह एजेंसी यानी एनआईए है.

द वायर ने जिन लोगों से बात की और जिन लोगों ने कबूलनामे देने का फैसला किया है, उनमें से ज्यादातर ने दावा किया कि उनके मामलों में सालों से कोई प्रगति नहीं हुई है. कुछ मामलों में यह समय एक दशक के करीब का हो चुका है. इनके अनुसार एनआईए अधिकारियों ने उनसे संपर्क किया और उन्हें संभावित सजा के बारे में बताते हुए अपना प्रस्ताव दिया, जबकि सजा का निर्धारण सिर्फ जज ही कर सकते हैं.

आरोपी के इस प्रस्ताव पर राजी हो जाने की सूरत में एनआईए ने उन्हें दोषी याचिका तैयार करने में मदद की. आरोपियों द्वारा अचानक दोषी याचिका दायर करने पर उनके वकीलों के केस से खुद को हटा लेने की स्थिति में एनआईए ने उन्हें नया वकील दिलाने में मदद की. हालांकि इस पूरी प्रक्रिया को एनआईए ने परदे के पीछे से अंजाम दिया, ताकि आरोपियों द्वारा लिया गया फैसला स्वतंत्र तरीके से लिया गया दिखाई दे.

इस सीरीज के लिए द वायर ने 2009 में एनआईए के गठन के समय के मामलों से लेकर सितंबर, 2025 के अंत तक के मामलों का अध्ययन किया. पिछले 15 वर्षों में एनआईए ने 633 मामले दर्ज किए. सितंबर, 2025 के अंत तक एजेंसी ने 133 मामलों में आंशिक या पूर्ण तरीके से सुनवाई पूरी कर ली है. यह 15 वर्षों में दर्ज किए गए कुल मामलों का सिर्फ पांचवां भाग है.

इन मामलों में एनआईए ने केवल 79 मामलों में पूर्ण सुनवाई की प्रक्रिया का पालन किया- यानी गवाहों से पूछताछ और कोर्ट में सबूत पेश करना. इन में कुछ मामलों में सजा हुई, जबकि कुछ में आरोपियों को रिहा कर दिया गया.

चूंकि आतंकी मामलों में आमतौर पर कई आरोपी शामिल होते हैं, इसलिए इनमें से कुछ मामलों में सुनवाई अभी सिर्फ आंशिक तौर पर ही पूरी हुई है, क्योंकि कुछ आरोपियों पर मुकदमा अभी भी चल रहा है. बाकी 54 मामलों में बचावकर्ताओं ने कबूलनामों का रास्ता अपनाया. इसका मतलब है कि एनआईए ने प्रत्येक पांच में से दो मामलों में दोषी याचिकाओं के सहारे दोषसिद्धि हासिल की.

एनआईए के इस पैटर्न का अंदाजा कैद व्यक्तियों और उनके वकीलों, दोनों को लग चुका है. दिल्ली के मानवाधिकार वकील अकरम खान कहते हैं कि केस दर्ज किए जाने के बाद शुरू के चार से पांच साल ‘वेट एंड वॉच’ (इंतजार) का समय होता है.

एनआईए के मामलों को देखने के अपने लगभग 10 वर्षों के अनुभव के आधार पर खान कहते हैं, ‘इस दौरान मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं होती.’ उनका दावा है, ‘इस बिंदु पर एनआईए की रणनीति बदल जाती है. मुकदमा पर सुनवाई शुरू होने का इंतजार करते हुए जेल में चार से पांच साल बिता चुके आरोपियों को दोषी याचिका देने का प्रस्ताव दिया जाता है. यह प्रस्ताव एक तरह से सिर्फ मुस्लिम समुदाय के आरोपियों को ही दिया जाता है.’

द वायर ने आरोपियों द्वारा दोषी याचिका दिए जाने वाले कई मामलों की समीक्षा की और इसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि खान की बात सबूतों की कसौटी पर खरी उतरती है. आरोपियों द्वारा दोषी याचिका दिए जाने के 54 में से 49 मामलों में- बचावकर्ताओं का संबंध मुस्लिम समुदाय से था.

हालांकि, एनआईए अपने कामकाज में किसी सांप्रदायिक पूर्वाग्रह को खारिज करती है. एनआईए के प्रवक्ता ने द वायर से कहा, ‘हम आरोपी व्यक्तियों को समुदाय के चश्मे से नहीं देखते हैं.’

उन्होंने कहा, ‘हम उनकी व्यक्तिगत भूमिकाओं की जांच करते हैं और कोर्ट के सामने सबूत रखते हैं. दोषी याचिका देने का फैसला पूरी तरह से आरोपियों का होता है और इस पर फैसला पूरी तरह से कोर्ट के विवेकाधीन है. हमारा इसके ऊपर कोई नियंत्रण नहीं है, न ही हम यह समझा सकते हैं कि किसी खास समुदाय के लोग यह रास्ता क्यों चुनते हैं.’

जिन लोगों ने दोषी याचिका दी, उन पर या तो आतंकी गतिविधियों में कथित भूमिका या फिर जाली भारतीय नोट का काम करने का आरोप था. इनमें आतंकी मामले खासतौर पर गंभीर प्रकृति के थे और ज्यादातर मामले में आरोपियों पर यूएपीए की वे धाराएं लगाई गई थीं, जिनमें आजीवन कारावास तक हो सकती है.

लेकिन एक बार आरोपी व्यक्तियों द्वारा कबूलनामे देने के बाद एनआईए ने अधिकतम या ज्यादा से ज्यादा सजा दिए जाने का दबाव नहीं डाला और अदालतों द्वारा भी अमूमन पांच से आठ साल तक की सजा दी गई.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

एनआईए के अस्तित्व के शुरूआती वर्षों में दोषी याचिकाएं सिर्फ उत्तरी राज्यों में उपयोग में लाई जाती दिखाई देती हैं, लेकिन धीरे-धीरे देश के दूसरे हिस्सों से भी ये आने लगीं. दिल्ली की अदालतों में वकालत करने वाले वकीलों का कहना है कि जब वे एनआईए का कोई केस लेते हैं, तो उन्हें इस बात की पर्याप्त समझ होती है कि किस मुकाम पर एनआईए आरोपियों से संपर्क करेगी और उनके साथ ‘एक डील पर पहुंचेगी.’

वकील सारिम नावेद कहते हैं, ‘यह इतना सामान्य हो चुका है कि जब हम इन मुकदमों को लड़ने के लिए तैयार होते हैं, तब हम इस बात को अपने मुवक्किलों को कानूनी सलाह के तौर पर भी बताते हैं कि केस कई सालों तक घिसटता रहेगा और एनआईए दोषी याचिका के एवज में रिहाई का प्रलोभन देगी.’

कुछ मामलों में वकील अपने मुवक्किलों का विश्वास जीतने में कामयाब रहे हैं और अंत तक मुकदमा लड़ा है, लेकिन कुछ मामलों में आरोपी व्यक्ति उनकी बात मान लेते हैं.

द वायर ने जिन वकीलों से बात की, उनका यह भी कहना है कि यह सिर्फ जांच एजेंसी की भूमिका ही सवालों के घेरे में नहीं है, बल्कि इन मामलों में कोर्ट के काम करने के तरीके की भी जांच होनी चाहिए.

द वायर ने चार साल तक एनआईए के मुकदमों में स्पेशल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर के तौर पर काम करने वाले एस. अब्दुल खादर कुंजू से बात की. कुंजू यूएपीए मामलों में सुनवाई जल्दी शुरू नहीं होने को एक ‘परेशान करने वाला चलन’ बताते हैं.

यूएपीए कानून में पुलिस को सिर्फ अपनी जांच पूरी करने और चार्जशीट दायर करने के लिए 180 दिनों का समय दिया गया है. चार्जशीट दायर करने के बाद भी कोर्ट वर्षों तक मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं करते और इतने महत्वपूर्ण पहलू को उच्चतर न्यायालय भी नजरअंदाज कर देते हैं.

कुंजू कहते हैं कि यह इस तथ्य के बावजूद है कि एनआईए अधिनियम की धारा 19 के तहत विशेष न्यायालयों को सभी कार्य दिवसों पर प्रतिदिन के हिसाब से सुनवाई करने का आदेश दिया गया है. कुंजू का मानना है कि अदालतों ने अब दोषी याचिकाओं को एक ‘शाॅर्टकट’ के तौर पर स्वीकार कर लिया है, जबकि सीआरपीसी (अपराध प्रक्रिया संहिता) में यह साफ तौर पर कहा गया है कि दोषी याचिकाओं पर फैसला लेते वक्त जजों को अपने विवेकाधिकार से काम लेना चाहिए.

उनकी किताब कमेंटरीज ऑन अनलॉफुल एक्टिविटीज – प्रिवेंशन-एक्ट, 1967, द नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी एक्ट, 2008, एंड अदर अलाइड एक्ट्स एनआईए और विशेष अदालतों की कार्यप्रणाली को प्रकाश में लाने वाली चंद गहन शोध परक किताबों में से एक है.

इस विकल्प को अपनाना हमेशा आरोपियों के पक्ष में नहीं रहा है, जिन्हें यह उम्मीद थी कि ऐसा करने से वे जल्दी जेल से छूट जाएंगे या कानूनी लड़ाई लड़कर रिहाई पाने की तुलना में उन्हें ज्यादा जल्दी रिहाई मिल जाएगी.

2019 में एक मामले में एनआईए ने छह कश्मीरियों – सज्जाद अहमद खान, बिलाल अहमद मीर, मुजफ्फर अहमद भट, इशफाक अहमद भट, मेहराजुद्दीन चोपन और तनवीर अहमद गनी को गिरफ्तार किया और उन पर ‘भारत में कई आतंकी वारदातों को अंजाम देने वाले प्रतिबंधित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्म्द (जेइएम) का बेहद कट्टरपंथी जमीनी कार्यकर्ता होने का आरोप लगाया.’ जेल में तीन साल से ज्यादा समय बिताने और मुकदमे में कोई ठोस प्रगति नहीं होने के बाद उन्होंने दोषी याचिकाएं दायर की थी.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

तब तक दोषी याचिकाएं देना, एक प्रचलित तरीका बन गया था और उन्होंने देखा था कि कई लोगों ने यह याचिका दी है और उन्हें बदले में कम मियाद की सजा मिली है. उनमें से एक आरोपी ने कहा, ‘हमें इसकी सलाह दी गई… और हम भी तैयार हो गए.’ लेकिन उनकी उम्मीदों के उलट विशेष अदालत के जज ने उनमें से पांच, सभी पहली बार के अपराधी, को उम्रकैद की सजा सुनाई, उनमें से एक को पांच साल की कठोर कारावास की सजा दी गई.

‘हमने यह सोचाा था कि कोर्ट हमारी सजा की मात्रा तय करते वक्त हमारे द्वारा दिखाई गई स्वेच्छा पर विचार करेगी.’ एक बार दोषी याचिका दे देने के बाद पीछे लौटना मुमकिन नहीं था क्योंकि उन्हें दी गई सजा की प्रकृति सीआरपीसी की धारा 375 के तहत आती है, जिसमें यह साफ कहा गया है कि ‘कि अगर कोई आरोपी दोषी याचिका देता है और उसे उस दोषी याचिका के आधार पर सजा दी जाती है, तो फिर सजा की मात्रा और वैधानिकता के अलावा कोई और अपील नहीं की जा सकेगी.’

इसके ठीक बाद उम्र कैद प्राप्त पांचों दोषियों ने दिल्ली हाईकोर्ट में सजा की मात्रा के खिलाफ अपील की. 20 मई, 2024 को हाईकोर्ट ने पहले उपलब्ध मौके पर अपने ‘अपराध’ की ‘सच्चे मन’ से की गई स्वीकारोक्ति को ध्यान में रखते हुए उन्हें मिली सजा को घटाकर 10 साल कर दिया. वे अभी इस सजा को पूरी कर रहे हैं.

इस मामले में बचावकर्ताओं को, जो सभी कश्मीरी हैं, उनके घरों से 1000 किलोमीटर दूर दिल्ली के जेल में बंद किया गया है. हालांकि, हाल के वर्षों में एनआईए का काफी विस्तार हुआ है और जम्मू और गुवाहाटी में इसके दो क्षेत्रीय ऑफिस और देशभर में 21 ब्रांच ऑफिस हैं, ज्यादातर मामले एजेंसी के नई दिल्ली स्थित मुख्यालय से ही देखे जाते हैं. इसका यह अर्थ है कि दूसरे राज्यों के आरोपियों को, भाषाई अवरोधों का भी सामना करने के बावजूद अक्सर दिल्ली की तिहाड़ जेल में रखा जाता है.

मामलों में लंबी देरी और प्ली बारगेन की रणनीति न सिर्फ आरोपियों को प्रभावित करती है, बल्कि उनके परिवारों के लिए भी मुश्किलें पैदा करती हैं. कई बचावकर्ता हाशिये के समुदायों से आते हैं और उनके जेल में होने से परिवारों में कोई कमाने वाला नहीं रह जाता है. इन परिवारों को सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है, खासकर आतंकी आरोपों वाले मामलों में. यह बहिष्कार और भेदभाव का कारण बनता है.

यह स्थिति किसी आरोपी को दोषी याचिका दायर करने के लिए राजी करने की कोशिश को सफल बनाने के लिहाज से बेहद मुफीद है. ये हालात उनके परिवारों को भी यह विकल्प चुनने के लिए प्रेरित करते हैं.

एक कश्मीरी बचावकर्ता के परिवार ने द वायर के साथ इंटरव्यू के दौरान कहा कि उन्होंने उसे कबूलनामे के लिए आवेदन करने में सक्रिय भूमिका निभाई. पिता का कहना था, ‘अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद कश्मीर में स्थिति बेहद तनावपूर्ण रही है. इन हालात में आतंकी कानूनों के तहत आरोपी बेटे से इतनी दूर मिलने जाना हमारे लिए और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया. इसलिए जब एनआईए ने मेरे बेटे से कबूलनामा दायर करने के लिए संपर्क किया तो मैंने उसे इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए कहा.’

कई लोगों के लिए दोषी याचिका वाले प्रस्ताव को स्वीकार करने का दबाव का कारण सिर्फ यह नहीं होता है कि वे व्यक्तिगत तौर पर थक चुके होते हैं, बल्कि अपने परिवारों को कष्टों को कम करने की जरूरत भी उन्हें इस ओर धकेलती है. भले ही इसके लिए उन्हें उन आरोपों का दोष स्वीकार करना पड़े जो वे अन्यथा स्वीकार नहीं करते.

एनआईए के अभियोजन में दोषी याचिका इस तरह से एक नियम जैसा हो चुका है कि कई दफा परिवार वाले भी एनआईए से ऐसा करने के लिए कहते हैं. 7 अगस्त, 2023 को पटना के एनआईए की विशेष अदालत के बाहर द वायर की मुलाकात सैफुद्दीन अहमद से हुई.

उनके 25 वर्षीय बेटे मरगूब अहमद दानिश को एजेंसी द्वारा अगस्त, 2022 में पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन गजवा-ए-हिंद से संबंधित एक मामले में गिरफ्तार किया गया था. एनआईए के मुताबिक दानिश ने एक वॉट्सऐप ग्रुप बनाया था और अपने इलाके के कई मुस्लिम लोगों को इससे जोड़ा था. एजेंसी ने उसे विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के मकसद से मासूम युवाओं का कट्टरपंथीकरण करने का आरोप लगाया था.

इस सिलसिले में विभिन्न जगहों पर छापे मारे गए और दानिश को इस केस के प्राथमिक आरोपी के तौर पर दिखाया गया. यह सब करते हुए एनआईए ने एक अहम पहलू की ओर ध्यान नहीं दिया और वह था दानिश का मानसिक स्वास्थ्य और उसकी बौद्धिक क्षमता. इस रिपोर्टर की दानिश से कोर्ट के बाहर एक छोटी मुलाकात हुई. वह इस बात से आक्रोशित था कि उसे और अन्य कई आरोपियों को पटना जेल से कोर्ट लेकर आने-जाने वाली एसकाॅर्ट पुलिस उसे टॉयलेट का उपयोग नहीं करने दे रही थी. खुद पर नियंत्रण रखने में असफल उसने अपने कपड़े गंदे कर लिए.

उसके पिता का कहना है कि अपनी गिरफ्तारी के समय दानिश साइकियाट्रिक (मानसिक रोग संबंधी) दवाइयों का काफी मात्रा में सेवन कर रहा था. उसके वकील वासिफ खान ने कोर्ट के सामने अपनी दलीलों में इस तथ्य की ओर कई बार ध्यान दिलाया था. जिस दिन द वायर की अहमद से मुलाकात हुई, उस दिन वह दानिश के मेडिकल कागजात लेकर कोर्ट जा रहे थे. इसमें दानिश का आईक्यू असेसमेंट पेपर्स भी थे, जो ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस- एम्स, पटना में किया गया था.

रिपोर्ट के मुताबिक दानिश की बौद्विक क्षमता 70 से 75 अंकों के बीच है और डॉक्टरों के आकलन के मुताबिक ‘निश्चित तौर पर काफी कम’ है. मानकीकृत टेस्ट से पता चलता है कि इतने कम आईक्यू वाला व्यक्ति को मेडिकल शब्दावली में ‘मंदबुद्धि वाला’ कहा जाता है.

एक दशक से ज्यादा समय से दुबई में मजदूर के तौर पर काम करने वाले अहमद को इस केस को संभालने के लिए अपनी नौकरी छोड़कर वापस भारत आना पड़ा. अहमद ने द वायर को बताया कि वे एनआईए से दानिश से दोषी याचिका दिलवाने का अनुरोध कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘मैं जानता हूं कि यह एक बच्चे के साथ जो अपने साथ हो रही चीजों को भी शायद ही समझ सकता है, ऐसा करना सही नहीं है. लेकिन पिता होने के नाते मैं भी चाहता हूं कि मेरा बच्चा सुरक्षित वापस घर आ जाए.’

सितंबर, 2025 में उसकी लंबी कैद और उसके खराब होते मानसिक स्वास्थ्य का हवाला देते हुए दानिश के वकील वासिफ खान ने एक दोषी याचिका दायर की. उसके आवेदन की पंक्तियां हैं, ‘अपनी मानसिक स्थिति के कारण अपने कार्यों की संगीनता और उसके नतीजों को समझ पाने की उसकी क्षमता सीमित है. इसलिए उसका कृत्य उसकी अपरिवक्वता और किसी के द्वारा बहकाए जाने को दिखाता है कि न आपराधिक मंशे को.’ इसमें कोर्ट से दानिश की अपराध स्वीकृति को स्वीकार करते हुए उसके प्रति ‘सुधारात्मक और मानवीय दृष्टिकोण’ अपनाने की विनती की गई है.

लेकिन, 10 अक्टूबर को दानिश ने अचानक अपनी दोषी याचिका वापस ले ली. यह याचिका वापस लेने का कोई कारण कोर्ट को नहीं बताया गया. वकील वासिफ खान ने बताया, ‘इस मामले की सुनवाई तेज हो गई है और 19 गवाहों से पूछताछ हो चुकी है. 45 गवाहों से पूछताछ करने के पहले के फैसले के विपरीत अब एनआईए ने सिर्फ 22 लोगों की सूची रखी है. हम यह उम्मीद कर रहे हैं कि अगले दो महीने में यह सुनवाई पूरी हो जाएगी.’

हालांकि उन्होंने इस बात पर कोई टिप्पणी नहीं की कि पहले दोषी याचिका दायर करने और फिर उसे वापस ले लेने के पीछे क्या वजह थी.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

पिछले कुछ वर्षों में केरल में भी एनआईए ने सफलतापूर्वक दोषी याचिका मॉडल को सफलतापूर्वक अपनाया है. यहां तक कि बेहद कुख्यात आईएसआईएस मामले में भी, जिसके आधार पर प्रोपगेंडा फिल्म केरला स्टोरी बनाई गई, एनआईए कुछ आरोपियों के खिलाफ दोष सिद्धि उनके द्वारा दोषी याचिका दायर करने के बाद ही हासिल कर सकी.

कोच्चि के मानवाधिकार वकील तुषार निर्मल एनआईए को ‘दोष सिद्धियों की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट’ करार देते हैं. निर्मल कहते हैं, ‘एनआईए के अपराध आंकड़ों को भारत में अपराधों का वास्तविक आंकड़ा नहीं माना जा सकता है; इसी तरह से एनआईए द्वारा हासिल बेहद उच्च दोष सिद्धि आंकड़ा इस तथाकथित प्रीमियम एजेंसी द्वारा किए गए वास्तविक कार्य को नहीं दिखाता है.’

कोच्चि में निर्मल के दफ्तर में काफी भीड़ रहती है. एक अच्छी प्रैक्टिस वाले वकील से कोई भी यह उम्मीद करेगा. लेकिन उनके मुवक्किल जिनमें से ज्यादातर राजनीतिक विचारों के कारण गिरफ्तार किए गए लोग हैं, उनके लिए रिसर्चर और असिस्टेंट वकील के तौर भी काम करते हैं. जब यह रिपोर्टर अप्रैल, 2025 में उनसे मिलीं, तब यूएपीए आरोपों का सामना कर रहे लॉ के छात्र एलन शुएब भी उनके ऑफिस में थे. 2019 में एनआईए ने शुएब को कथित माओवादी संबंधों के कारण गिरफ्तार किया था. उसने 10 महीने जेल में बिताए, जिनमें से कुछ दिन एकांत कारावास थे.

शुएब कुछ दिन वियुर हाई सेक्योरिटी प्रिजन में एकांत कारावास में थे. रिहाई के बाद शुएब ने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर दी और तब से वह निर्मल को यूएपीए मामलों में असिस्ट कर रहे हैं.

अपनी स्थापना के कुछ वर्षों के ही भीतर एजेंसी ने अपनी एक यूनिट कोच्चि में भी खोली. इससे पहले मामलों को एनआईए के हैदराबाद के ऑफिस से देखा जाता था. लेकिन राज्य में मामलों की संख्या बढ़ने से कई नए अधिकारियों को नियुक्त किया गया और कोच्चि में एक नया ऑफिस खोला गया.

एनआईए की केरल इकाई ने विभिन्न प्रकार के मामलों पर काम किया है. आईएसआईएस वाले मामले सबसे आम हैं. इनके साथ ही साथ एजेंसी बराबर संख्या में, अगर ज्यादा नहीं, कथित माओवादियों के खिलाफ मामले भी देख रही है.

अपनी पड़ताल में द वायर ने पाया कि दोषी याचिका का रास्ता सबसे ज्यादा आतंकी मामलों में मुस्लिम आरोपियों वाले मामले में और जाली नोट मामलों के आरोपियों के लिए अपनाया जाता है. माओवादी मामलों में आरोपित एक भी व्यक्ति ने अभी तक दोषी याचिका दायर नहीं की है – न ही केरल में और न ही देश में कहीं और.

हालांकि इसका कोई आसान जवाब नहीं हो सकता है, लेकिन निर्मल एक अनुमान लगाते हैं. वे कहते हैं कि कम से कम केरल में एनआईए माओवाद के किसी आरोपी के पास दोषी याचिका के प्रस्ताव के साथ नहीं जाती है. निर्मल कहते हैं, ‘यह या तो गृह विभाग द्वारा लिया गया अलिखित निर्णय हो सकता है या फिर इसके पीछे सोचा समझा राजनीतिक कारण हो सकता है.’

उनका तर्क है कि चूंकि माओवादी समुदाय स्तर पर काफी नजदीकी तरीके से जुड़कर काम करते हैं, उनकी एक बनी-बनाई बुनियाद है और वे एक राजनीतिक विश्वास के साथ काम करते हैं, इसलिए शायद दोषी याचिकाएं उनके लिए संभाव्य विकल्प नहीं होता है.

मुंबई में कैदियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता एक दूसरा सवाल पूछते हैं. यूएपीए के तहत मुकदमे का सामना कर रहे इस सामाजिक कार्यकर्ता का सवाल है कि अगर राजनीतिक विश्वास कथित माओवादियों को दोषी याचिकाएं देने से रोकने वाला एकमात्र कारण होता तो क्या कश्मीर और पूर्वोत्तर के राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर भी यही तर्क नहीं लागू होना चाहिए?

द वायर के शोध हमें यह भी दिखाते हैं कि कई मामलों में कश्मीरी स्त्री-पुरुषों और मणिपुर और असम के कुछ आरोपियों ने हाल के सालों में दोषी याचिका का विकल्प चुना है. कश्मीर के अलगाववादी नेता यासिन मलिक, इसके एक उदाहरण हैं. 2022 में मलिक ने आपराधिक साजिश और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोपों पर दोषी याचिका दायर की और उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई.

जब एनआईए से इस विरोधाभास को समझाने के लिए कहा गया, तो एनआईए ने इस पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. एनआईए के प्रवक्ता ने द वायर से कहा, ‘जैसा कि मैंने पहले भी कहा है दोषी याचिका देने या न देने का फैसला आरोपियों का होता है और हम इस तरह का कोई आंकड़ा नहीं रखते.

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हालांकि, आाम तौर पर ऐसा देखा गया है कि विशेष अदालतें एनआईए की योजना के अनुसार काम करती हैं, लेकिन कुछ मामलों में अदालतों ने धारा के खिलाफ जाने का काम किया है और दोषी याचिकाओं को खारिज कर दिया है.

2017 में पांच लोगों – मोहम्मद अकरम, मोहम्मद इलियास, मोहम्मद सादिक, मोहम्मद मुज्जमिल और मोहम्मद इरफान- ने दोषी याचिकाएं दायर करके प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का हिस्सा होने की बात कबूली थी. लेकिन एनआईए अदालत ने यह कहते हुए इस आवेदन को खारिज कर दिया कि ऐसा लगता है कि यह उनके द्वारा स्वतंत्र तरीके से लिया गया फैसला नहीं लगता.

यह महाराष्ट्र में ऐसा आवेदन किए जाने और उसे अस्वीकार किए जाने का पहला मामला था. आतंकी मुकदमों का लंबा अनुभव रखने वाले वरिष्ठ वकील नित्या रामकृष्ण कहती हैं, ‘कोर्ट ने बिल्कुल सही बिंदु चिह्नित किया. अगर यह याचिका स्वतंत्र इच्छा से नहीं दी गई है, तो आखिर किसी दबाव में कोई विचाराधीन कैदी दोष कबूल करने का रास्ता चुनता है? लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि बहुत कम अदालतें यह सवाल पूछ रही हैं.’

आखिरकार, 2021 में मुंबई के एनआईए कोर्ट ने अकरम, सादिक, मुज्जमिल को दोषी करार दिया और उन्हें 10 साल के कारावास की सजा सुनाई. इलियास और इरफान को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया. वे उस समय तक 9 वर्ष जेल में बिता चुके थे.

हालांकि, यह मुंबई के एनआईए कोर्ट के लिए नई बात थी, लेकिन अकरम पहले ही बेंगलुरू में एनआईए द्वारा चलाए जा रहे एक मुकदमे में पहले ही सफलतापूर्व दोषी याचिका दे चुका था, जिसमें उसने लश्कर-ए-तैयबा का ‘सदस्य’ होने की बात स्वीकार की थी. 2015 में कोर्ट ने अकरम साहित 13 लोगों द्वारा दायर दोषी याचिकाओं को स्वीकार कर लिया था और उन्हें 5 साल की सजा दी थी.

इसी तरह से जब मैसूरु कोर्ट ब्लास्ट केस में कुछ आरोपियों ने अगस्त, 2016 में दोषी याचिका दी थी तो बेंगलुरू की एनआईए कोर्ट ने यह कहते हुए उनके आवेदन को रद्द कर दिया था कि आरोपी व्यक्तियों ने ‘गंभीर अपराध’ किया है जिससे कई लोग जख्मी हो गए, इसलिए उनके प्रति कोई उदारता नहीं दिखाई जा सकती और उन्हें इस मामले में दोषी याचिका देने का मौका नहीं दिया जा सकता है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

2018 के बोधगया सीरियल बम विस्फोट मामले में 10 दिसंबर, 2021 को ट्रायल कोर्ट के समक्ष दोषी याचिका दायर की. आवेदनकर्ताओं- पैगम्बर शेख, अहमद अली और नूर आलम मोमिन ने कहा कि उन्होंने दोषी याचिका देने का विचार किया है ताकि वे ‘एक स्वस्थ जीवन जी सकें और मुख्य धारा के समाज में लौट सकें.’ अपने अपराधों को लेकर दोषी याचिका देने के अलावा आरोपियों ने मानवीय आधार पर उनके प्रति दया दिखाए जाने की भी विनती की थी.

यह आवेदन दोपहर से पहले दिया गया और दोपहर बाद कोर्ट ने अपनी सजा सुनाई जिसमें इन्हें उम्रकैद की सजा दी गई. इस मामले में आरोपी ने दोषी याचिका दायर की लेकिन शायद उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि आईपीसी की धारा 121 के तहत लगाए गए आरोपों में अनिवार्य तौर पर आजीवन कारावास की सजा मिलती है.

इसके ठीक बाद उन्होंने इस सजा के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर की.

हाईकोर्ट ने दोषी याचिका की स्वैच्छिक प्रकृति और ट्रायल कोर्ट की पूरी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए और पूरी प्रक्रिया को ‘न्याय का हरण’ बताया. राजीवन रंजन प्रसाद और शैलेंद्र सिंह की खंडपीठ ने आवेदन की प्रकृति दोषी याचिका से ज्यादा दया याचिका जैसी थी.

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया और उसके पास फिर से सुनवाई के लिए भेज दिया, ‘ट्रायल कोर्ट को आरोपियों को अपने फैसले पर पुनिर्विचार करने और अपने वकीलों से सलाह मशविरा करने के लिए और अपने अपराध को स्वीकार करने के नतीजों को समझने के लिए पर्याप्त समय देना चाहिए था. लेकिन ऐसा नहीं किया गया. यह पूरी प्रक्रिया एक दिन में – सुबह और दोपहरर के दो सत्रों में पूरी कर दी गई.’

जून, 2025 में इन तीनों ने एक बार फिर दोषी याचिका दायर की. इस बार उन्हें अपने फैसले पर विचार करने के लिए और कोर्ट को यह बताने के लिए कि यह आवेदन उन्होंने स्वैच्छा से किया है, एक दिन का समय दिया गया. इसके बाद उन्हें आठ साल की सजा सुनाई गई.

दोषी याचिकाओं पर एनआईए की जरूरत से ज्यादा निर्भरता ने दोषसिद्धि की दर को बढ़ाने में मदद की है, लेकिन आंकड़ों की इस चमक के पीछे लंबी कैद, अप्रत्यक्ष धमकियों और दोषी याचिकाओं की सौदेबाजी की अनेक कहानियां खो जाती हैं. अपनी सफलता की ओट में एजेंसी ने अपने डेढ़ दशक के अस्तित्व में न्यायिक निरीक्षण को भी दरकिनार कर दिया है और आरोपी व्यक्तियों के दोष को सिद्ध करने की कोशिश तक करना इसने गवारा नहीं किया है.

(सारंगा उगलमुगले के इनपुट के साथ.)

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