नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 8 जनवरी, 2025 को लखनऊ में ‘प्रारंभिक उत्तर भारत और इसके सिक्के’ पुस्तक के विमोचन के मंच से जो कहा, वह कोई साधारण सांस्कृतिक टिप्पणी नहीं थी. उन्होंने कहा कि ‘भारतवर्ष’ में आज का भारत ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान और बांग्लादेश भी शामिल हैं और यही ‘वृहत्तर भारत’ है. यह बयान न तो अकेला है और न ही आकस्मिक.
यह उस वैचारिक धारा का हिस्सा है, जिसे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) दशकों से ‘अखंड भारत’ के नाम पर आगे बढ़ाते रहे हैं – एक ऐसी अवधारणा, जो न केवल स्वतंत्र और संप्रभु पड़ोसी देशों को भारत का अंग मानती है, बल्कि उस कथित भू-राजनीतिक इकाई को एक हिंदू राष्ट्र के रूप में परिभाषित करती है.
‘भारतवर्ष’ में वर्तमान का भारत भी है, पाकिस्तान भी है, बांग्लादेश भी है,
यही वृहत्तर भारत है, यही भारतीयों का देश है… pic.twitter.com/DTKsc86Nev
— Yogi Adityanath (@myogiadityanath) January 8, 2026
योगी आदित्यनाथ के बयान के कुछ ही दिनों बाद, 11 जनवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के तहत आयोजित ‘शौर्य यात्रा’ का नेतृत्व किया. इस यात्रा का दृश्यात्मक और प्रतीकात्मक संसार उसी राजनीति का प्रतीक है, जिसके बारे में पार्टी आधिकारिक रूप से बहुत कुछ कहकर भी नहीं कहती.
मंदिर की ओर जाने वाली सड़क पर ‘त्रिशूल’, ‘ॐ’ और ‘डमरू’ की आकृतियों वाली लाइटें, फूलों से बने शिवलिंग, और बड़े-बड़े बैनरों पर लिखे नारे-‘अखंड सोमनाथ, अखंड भारत’ लगाए गए थे. प्रधानमंत्री की मौजूदगी में हुए ड्रोन शो में भी त्रिशूल के साथ यही आकृति (अखंड सोमनाथ, अखंड भारत) उकेरी गई.

देखा जाए तो इन प्रतीकों के प्रदर्शन के बाद यह महज़ एक धार्मिक आयोजन नहीं रह गया था. यह उस विचार का सार्वजनिक प्रदर्शन माना जाएगा, जिसमें धार्मिक प्रतीकों, राष्ट्रवाद और इतिहास की पुनर्व्याख्या को एक साथ पिरोया जा रहा है. साथ ही, अखंड भारत की विचारधारा को सार्वजनिक रूप से प्रोन्नत किया जा रहा है.
‘अखंड भारत एक राजनीतिक नारा है’
आदित्यनाथ के बयान को लेकर चर्चित इतिहासकार डॉ. रुचिका शर्मा सीएम योगी के दावे को सिरे से खारिज करती हैं. उनके मुताबिक योगी आदित्यनाथ का बयान न केवल तथ्यहीन है, बल्कि इतिहास के विरुद्ध भी है.
द वायर हिंदी से बातचीत में वह कहती हैं कि पूरे उपमहाद्वीप के लिए सबसे पहला नाम ‘भारत’ नहीं, बल्कि ‘हिंद’ था. महाभारत के जिस श्लोक – ‘दुर्लभं भारते जन्म’ – का हवाला योगी आदित्यनाथ देते हैं, उसका अर्थ आधुनिक अर्थों में ‘भारत भूमि’ से नहीं जुड़ता. रुचिका शर्मा बताती हैं कि महाभारत में ‘भरत’ एक जनजाति थी, और यह श्लोक ‘भरत जनजाति में जन्म लेना कठिन है’ की ओर संकेत करता है. इसका पूरे उपमहाद्वीप या किसी एकीकृत राष्ट्र से कोई संबंध नहीं है.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (नई दिल्ली) के ‘सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज’ में मध्यकालीन इतिहास के प्रोफेसर रहे हरबंस मुखिया भी कहते हैं कि ‘इसका धरती से कोई लेना-देना नहीं है.’
रुचिका के मुताबिक, इतिहास के उपलब्ध स्रोतों में यह दावा कहीं नहीं मिलता कि अरबों के आगमन से पहले भारतीय उपमहाद्वीप को एक इकाई के रूप में देखा जाता था.
वह बताती हैं कि ‘भारतवर्ष’ शब्द का उल्लेख खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख में मिलता है. यह अभिलेख ओडिशा के कलिंग क्षेत्र के राजा खारवेल द्वारा बनवाया गया था और इसमें कहा गया है कि खारवेल ने ‘भारतवर्ष के खिलाफ’ युद्ध किया था. अगर वह भारतवर्ष से युद्ध कर रहा है, तो साफ है कि भारतवर्ष उस समय पूरे उपमहाद्वीप का पर्याय नहीं था और न ही यह खारवेल के कलिंग का हिस्सा था. तो साफ है कि भारतवर्ष उस समय पूरे उपमहाद्वीप का पर्याय नहीं था, बल्कि संभवतः गंगा के मैदानी क्षेत्र तक सीमित था.
शर्मा आगे बताती हैं कि पूरे उपमहाद्वीप को एक भौगोलिक इकाई के रूप में सबसे पहले अरबों ने पहचाना, जिन्होंने इसे ‘हिंद’ कहा और इसकी सीमा हिंदूकुश से लेकर हिंद महासागर और बंगाल तक मानी. इससे पहले ‘जंबूद्वीप’ जैसे नाम भी मिलते हैं, लेकिन वे भी उसी साम्राज्य या राज्य के लिए प्रयुक्त होते थे, जिस पर शासक का नियंत्रण होता था- पूरे उपमहाद्वीप के लिए नहीं.
कुछ इसी तरह के तथ्य इतिहासकार हरबंस मुखिया से बातचीत में भी सामने आते हैं. वह ‘अखंड भारत’ को एक राजनीतिक नारा बताते हुए कहते हैं कि इसका इतिहास से कोई संबंध नहीं है.
हिंदू महासभा और अखंड भारत
विशेषज्ञ बताते हैं कि ‘अखंड भारत’ की अवधारणा प्राचीन इतिहास से नहीं, बल्कि 20वीं सदी के हिंदुत्ववादी विचारकों से उत्पन्न है. विनायक दामोदर सावरकर ने इस विचार को गढ़ा, जिन्होंने ‘हिंदुत्व’ के आधार पर एक अखंड भारत की कल्पना की थी. सावरकर का ‘हिंदू’ की परिभाषा अत्यंत विशिष्ट थी: उन्होंने मुसलमानों और ईसाइयों को ‘भारतीय सभ्यता के अनुकूल नहीं’ माना, क्योंकि उनके धार्मिक पवित्र स्थान भारत के बाहर थे.
सावरकर ने 1937 में यह स्पष्ट किया कि हिंदू और मुसलमान ‘दो विरोधाभासी राष्ट्र’ थे, हालांकि, इसके बाद भी वह ‘अखंड भारत’ की बात करते रहे. यह विरोधाभास दिलचस्प है: यदि भारत कभी एक एकीकृत इकाई था, तो विभाजन की आवश्यकता क्यों पड़ी?
इसके भी ऐतिहासिक साक्ष्य मिलते हैं कि पहले तो हिंदुत्ववादी नेताओं ने भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने के लिए इसके विभाजन का समर्थन किया लेकिन बाद में अखंड भारत की कल्पना को बढ़ावा देने लगे.
दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. शम्सुल इस्लाम बर्मा (अब म्यांमार) के विभाजन के वक्त की एक घटना बताते हैं, ‘सन् 1935 की बात है. महात्मा ओतामा हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे. इसी दौरान ने अंग्रेजों ने बर्मा को अलग राष्ट्र बनाने के लिए बातचीत शुरू किया. तब महात्मा ओतामा ने इसका विरोध किया. उनका तर्क था कि हिंदू और बौद्ध एक होते हैं, जिसके बाद ओतामा को अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और सावरकर के नेतृत्व में हिंदू महासभा ने उस विभाजन को स्वीकार किया.’
बाद के वर्षों में हिंदू महासभा से जुड़े आर्य समाज के वरिष्ठ पदाधिकारी भाई परमानंद ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि 1905 में वह और लाला लाजपत राय पत्र के जरिए भारत के भविष्य पर चर्चा कर रहे थे. लाला लाजपत राय को लिखे पत्र में भाई परमानंद का विचार था, ‘उस समय मेरे लिए वर्तमान एकता (हिंदू-मुस्लिम) की कल्पना करना असंभव था. मेरा विचार यह था कि सिंध से आगे का इलाक़ा अफ़ग़ानिस्तान और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के साथ मिलकर एक बड़े मुस्लिम राज्य में शामिल किया जाए. इस क्षेत्र के हिंदुओं को वहां से हट जाना चाहिए, जबकि भारत के शेष हिस्सों में रहने वाले मुसलमानों को इस क्षेत्र में जाकर बस जाना चाहिए.’

प्रोफेसर इस्लाम कहते हैं कि ’20वीं शताब्दी की शुरुआत में लाला लाजपत राय ने भी मुस्लिमों को अलग राष्ट्र देने की वकालत की थी.’
वह जोड़ते हैं, ‘बौद्धों को अलग और मुसलमानों को अलग करने का विचार हिंदू राष्ट्रवादियों ने दिया और अब अखंड भारत बनाने की बात करते हैं.’
गौरतलब है कि लाला लाजपत राय हिंदू महासभा से जुड़े थे और अध्यक्ष पद पर भी रहे थे. इसी तरह वर्तमान में अखंड भारत की बात करने वाले योगी आदित्यनाथ के गुरु अवैद्यनाथ भी हिंदू महासभा से जुडे़ थे.
आरएसएस और अखंड भारत
‘अखंड भारत’ की अवधारणा हिंदुत्व विचारधारा का मूल स्तंभ रही है. आरएसएस के दस्तावेज़ों, भाषणों और प्रशिक्षण सामग्री में यह विचार बार-बार उभरता है. आरएसएस की पाठ्यपुस्तकों में यह सिखाया जाता है कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और तिब्बत कभी भारत का हिस्सा हुआ करते थे. संघ के स्वयंसेवकों के यहां अक्सर अखंड भारत का नक्शा देखने को मिलता है.
ध्यान रहे इसी तरह का एक नक्शा महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के हाथ में था, जब उसे फांसी के तख्त तक ले जाया जा रहा था. फांसी दिए जाने से पहले गोडसे ने नारा लगाया था – ‘अखंड भारत अमर रहे’.
गोडसे की भतीजी हिमानी सावरकर ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में अपने चाचा की अंतिम इच्छा बताई थी, ‘उन्होंने लिखकर दिया था कि मेरे शरीर के कुछ हिस्से को संभालकर रखो और जब सिंधु नदी स्वतंत्र भारत में फिर से समाहित हो जाए और फिर से अखंड भारत का निर्माण हो जाए, तब मेरी अस्थियां उसमें प्रवाहित कीजिए. इसमें दो-चार पीढ़ियां भी लग जाएं तो कोई बात नहीं.’
संघ प्रमुख मोहन भागवत भी कई मौकों ‘अखंड भारत’ और ‘हिंदू राष्ट्र’ की बात कर चुके हैं. साल 2022 में भागवत ने घोषणा की थी कि अखंड भारत ’10-15 वर्षों में’ हकीकत बन जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि वे इस प्रक्रिया में ‘ब्रेक नहीं हैं, केवल एक्सीलरेटर है’ और ‘जो रोकने की कोशिश करेंगे, वे खत्म हो जाएंगे.’
इस भाषा के असामान्य रूप से आक्रामक होने को लेकर उठे सवालों के बाद तब आरएसएस के सह सरकार्यवाह मनमोहन वैद्य ने भागवत के बयान का बचाव करते हुए कहा था कि ‘अखंड भारत’ का विचार भू-राजनीतिक नहीं बल्कि भू-सांस्कृतिक है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 2012 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए एक इंटरव्यू में कह चुके हैं कि ‘अखंड भारत’ का अर्थ सांस्कृतिक एकता है.’
हरबंस मुखिया सवाल उठाते हैं कि ‘अगर सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य की ही बात है तो दक्षिण पूर्व एशिया को भी अखंड भारत में शामिल कर लेना चाहिए. वहां भी हिंदू संस्कृति का प्रभाव था, अब भी है. ऐसे में अखंड भारत को अफगानिस्तान और म्यांमार तक मत रोकिए, आगे भी ले चलिए, इंडोनेशिया को भी शामिल कीजिए.’ हंसते हुए मुखिया कहते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार सुशांत सिंह फॉरेन पॉलिसी में लिखते हैं, ‘अखंड भारत’ की अवधारणा आरएसएस के मूल सिद्धांतों – संगठन (संगठित एकता) और शुद्धि (जाति की शुद्धता) – से जुड़ी हुई है.’ संघ की विचारधारा के अनुसार, भारत केवल एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य नहीं, बल्कि एक प्राचीन, सांस्कृतिक-धार्मिक सभ्यता है, जिसकी सीमाएं आज के राजनीतिक नक्शों से कहीं बड़ी हैं.
राजनीतिक-धार्मिक परियोजना
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘अखंड भारत’ की अवधारणा महज़ सांस्कृतिक स्मृति नहीं, बल्कि एक राजनीतिक-धार्मिक परियोजना है. यह उस दक्षिण एशिया की कल्पना करती है, जो इस्लाम के आगमन से पहले का था और इसीलिए यह विचार स्वभावतः बहुलतावाद, धर्मनिरपेक्षता और आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा से टकराता है.
जब भाजपा और आरएसएस के नेता पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे संप्रभु देशों को ‘भारतवर्ष’ का हिस्सा बताते हैं, तो यह केवल इतिहास की बहस नहीं रह जाती. यह पड़ोसी देशों के साथ संबंधों, भारत के संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और देश के भीतर अल्पसंख्यकों की स्थिति से भी जुड़ जाती है.
सोमनाथ से लेकर लखनऊ तक, मंच और प्रतीक बदलते हैं, लेकिन संदेश एक ही रहता है – एक ऐसा भारत, जो इतिहास को अपनी वैचारिक ज़रूरतों के मुताबिक ढालता है. सवाल यह नहीं है कि अतीत को कैसे याद किया जाए, बल्कि यह है कि क्या उस अतीत की एक कल्पित व्याख्या को वर्तमान और भविष्य की राजनीति का आधार बनाया जाना चाहिए.
