तमिलनाडु: राज्यपाल आरएन रवि का विधानसभा से वॉकआउट, स्टालिन बोले- सदन और परंपराओं का अपमान

तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने साल के पहले विधानसभा सत्र में परंपरागत अभिभाषण पढ़े बिना विधानसभा से वॉकआउट किया. इसके बाद लोक भवन की ओर से जारी बयान में सरकार पर निवेश, महिला सुरक्षा, दलित अत्याचार, आत्महत्या और शिक्षा जैसे अहम मुद्दों की अनदेखी का आरोप लगाया गया.

मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और राज्यपाल आरएन रवि. (फोटो: पीटीआई फाइल/द वायर)

नई दिल्ली: तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने सोमवार (20 जनवरी) को एक बार फिर विधानसभा से वॉकआउट कर दिया और साल के पहले सत्र के उद्घाटन पर होने वाला परंपरागत अभिभाषण पढ़े बिना सदन छोड़ दिया.

बाद में उन्होंने सोशल मीडिया के ज़रिये उन मुद्दों को सामने रखा, जिनके बारे में उनका कहना था कि राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए अभिभाषण में उन्हें पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया गया.

राज्यपाल और तमिलनाडु सरकार के बीच जारी टकराव की यह ताज़ा कड़ी है. राजनीतिक हलकों में इसे राज्य के प्रशासन में राज्यपाल की भूमिका और शक्तियों के दायरे को लेकर बढ़ते तनाव के तौर पर देखा जा रहा है.

यह पहली बार नहीं है जब आरएन रवि ने परंपरागत अभिभाषण पूरा किए बिना सदन छोड़ा हो. उनके इस कदम पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने विधानसभा में एक प्रस्ताव पेश किया. स्टालिन ने कहा कि उनकी पार्टी देशभर की समान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ मिलकर संविधान में आवश्यक संशोधन लाने की कोशिश करेगी, ताकि विधानसभा सत्र की शुरुआत राज्यपाल के अभिभाषण से करने की परंपरा को समाप्त किया जा सके.

मुख्यमंत्री ने कहा, ‘राज्यपाल ने परंपराओं और संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन किया है. राज्य सरकार द्वारा तैयार अभिभाषण में राज्यपाल के व्यक्तिगत विचार जोड़ने या उससे अलग कुछ कहने का कोई प्रावधान नहीं है.’

उन्होंने रवि पर यह भी आरोप लगाया कि वे जानबूझकर ऐसे कदम उठा रहे हैं, जो ‘सदन का अपमान’ हैं.

ख़बरों के मुताबिक, राज्यपाल सुबह 9:29 बजे विधानसभा पहुंचे और महज़ सात मिनट बाद, 9:36 बजे सदन से बाहर चले गए. इसके कुछ ही देर बाद, सुबह 10:02 बजे तमिलनाडु के ‘लोक भवन’ के आधिकारिक एक्स अकाउंट से अंग्रेज़ी में एक विस्तृत बयान जारी किया गया.

गौरतलब है कि पिछले साल आरएन रवि के निर्देश पर राजभवनों का नाम बदलकर ‘लोक भवन’ किया गया था. इसके बाद 11:18 बजे तमिल भाषा में भी वही बयान साझा किया गया.

इस बयान में कुल 13 बिंदुओं के ज़रिये यह बताया गया कि राज्यपाल ने उनके लिए तैयार किए गए अभिभाषण को पढ़ने से इनकार क्यों किया.

बयान में दावा किया गया कि राज्यपाल का माइक्रोफोन बार-बार बंद किया गया और उन्हें अपनी बात रखने की अनुमति नहीं दी गई. इसमें यह भी कहा गया कि अभिभाषण में कई ऐसे दावे शामिल थे जिनका कोई ठोस आधार नहीं था और जिनमें भ्रामक जानकारियां दी गई थीं, जबकि जनता से जुड़े कई अहम मुद्दों को पूरी तरह छोड़ दिया गया.

लोक भवन के बयान में राज्य सरकार के उस दावे को भी खारिज किया गया, जिसमें कहा गया था कि तमिलनाडु में 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आया है.

बयान के अनुसार, यह दावा ‘हक़ीक़त से कोसों दूर’ है. इसमें कहा गया कि संभावित निवेशकों के साथ हुए कई समझौते (एमओयू) केवल काग़ज़ों तक सीमित हैं और वास्तविक निवेश इसकी तुलना में बेहद कम है. बयान में यह भी कहा गया कि निवेश से जुड़े आंकड़े संकेत देते हैं कि तमिलनाडु निवेशकों के लिए धीरे-धीरे कम आकर्षक होता जा रहा है. चार साल पहले तक राज्य फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (एफडीआई) पाने वाले राज्यों में चौथे स्थान पर था, जबकि अब वह छठे स्थान पर टिके रहने के लिए संघर्ष कर रहा है.

महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भी बयान में गंभीर आरोप लगाए गए. इसमें कहा गया कि अभिभाषण में इस मुद्दे को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया गया, जबकि पॉक्सो के तहत बलात्कार के मामलों में 55 प्रतिशत से अधिक और महिलाओं के यौन उत्पीड़न के मामलों में 33 प्रतिशत से ज़्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

बयान में यह दावा भी किया गया कि बीते एक साल में नशे की लत के कारण लगभग 2,000 लोगों ने आत्महत्या की, लेकिन सरकार ने इस गंभीर समस्या को हल्के में लिया. एक अन्य बिंदु में कहा गया कि कुल मिलाकर पिछले वर्ष 20,000 लोगों ने आत्महत्या की, और सरकार इस संकट को लेकर संवेदनशील नहीं दिखाई दे रही है.

लोक भवन के बयान में दलितों के ख़िलाफ़ बढ़ते अत्याचारों और दलित महिलाओं के साथ यौन हिंसा के मामलों में तेज़ी से हो रही बढ़ोतरी का भी ज़िक्र किया गया और कहा गया कि इन मुद्दों को अभिभाषण में पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया.

इसके अलावा, शिक्षा के स्तर में कथित गिरावट, हज़ारों ग्राम पंचायतों का बिना चुनाव के निष्क्रिय पड़े रहना, और कई हज़ार मंदिरों में ट्रस्टी बोर्ड न होने जैसे मुद्दों को भी सरकार की अनदेखी के उदाहरण के तौर पर गिनाया गया. बयान में कहा गया कि इन मंदिरों का संचालन सीधे राज्य सरकार के हाथ में है.

राज्यपाल ने यह भी कहा कि एमएसएमई सेक्टर उद्योग चलाने से जुड़ी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लागतों के कारण भारी दबाव में है, और लगभग सभी क्षेत्रों में निचले स्तर के कर्मचारियों के बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है.

बयान का आख़िरी बिंदु राष्ट्रगान से जुड़ा था. इसमें कहा गया कि ‘एक बार फिर राष्ट्रीय गान का अपमान हुआ है और संविधान द्वारा निर्धारित मौलिक कर्तव्य की अनदेखी की गई है.’

राज्यपाल के वॉकआउट के तुरंत बाद आई रिपोर्टों में यह अटकलें भी लगाई गई थीं कि इसकी वजह यह हो सकती है कि राज्य गीत ‘तमिल थाई वाज़्थु’ के बाद राष्ट्रगान नहीं बजाया गया.