एआर रहमान की टिप्पणी पर विवाद: क्या देश असहज सच्चाइयों को सुनने से डर रहा है?

जब कलाकारों, लेखकों या सामान्य नागरिकों को आईना दिखाने पर दंडित किया जाता है, तब समस्या वो दर्पण नहीं है क्योंकि उस पर तो दरारें पहले से थीं. बदला यह है कि हमें देखना छोड़ देने की ट्रेनिंग दी जा रही है- टूटन को नकारने की, स्वीकार को ग़द्दारी मानने की. हम सब जानते हैं कि रहमान ने सिर्फ वही बात कही जो हममें से लाखों लोग देख रहे हैं. उन पर बरसी आग बताती है कि हमें झूठ नहीं, सच असहज करता है.

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रहमान के आलोचक कहते हैं कि वे नकारात्मक चित्र खींचते हैं. पर घाव का नाम लेना निराशावाद नहीं; उपचार का पहला कदम है. (फोटो: पीटीआई/इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

मुंबई फिल्म उद्योग में बढ़ते धार्मिक ध्रुवीकरण पर एआर रहमान की टिप्पणी देशव्यापी आत्ममंथन का क्षण होनी चाहिए थी क्योंकि वह न तो उकसाने वाली थी, न ही पक्षपातपूर्ण- बल्कि एक ऐसे कलाकार की शांत, चिंतनशील अभिव्यक्ति थी, जिनका जीवनभर का काम आस्था, भाषा और राष्ट्र की सीमाओं से परे रहा है. पर प्रतिक्रिया त्वरित और ज़हरीली रही. ट्रोल्स झुंड बनाकर उन पर टूट पड़े, उन पर पक्षपात और ‘देशद्रोह’ के आरोप लगाए, मानो समस्या का नाम लेना, उसकी ओर इशारा भर करना ही गुनाह हो गया हो. कुछ हमले सीधे गाली-गलौज की शक्ल में थे, तो कहीं कुछ तथाकथित उदार (लिबरल) लोगों की चिकनी-चुपड़ी बातों में कड़वाहट घुली दिखी. अनजाने में ही, इन प्रतिक्रियाओं ने उनकी उसी चिंता की पुष्टि कर दी, जिसे उन्होंने व्यक्त किया था.

यह प्रकरण रहमान की ‘राजनीति’ नहीं, बल्कि हमारी सुनने की घटती क्षमता को उजागर करता है. ऐसे समय में, जब पहचान को हथियार बनाया जा रहा है, सच स्वयं ही विद्रोह लगने लगा है. ध्रुवीकरण केवल ऊपरी शह से नहीं संचालित होता; उसे नीचे से स्वीकार्यता और इनाम मिलता है- आक्रोश की अर्थव्यवस्था, एल्गोरिदमिक बढ़ावा और ऐसा सार्वजनिक विमर्श जो असल स्थिति से अधिक तमाशे को तरजीह देता है.

रहमान का संगीत कई पीढ़ियों को सिखाता रहा है कि सामंजस्य का अर्थ समानता नहीं होता; वह भिन्नताओं को एक-दूसरे से गुंजित करने की कला है. ऐसी आवाज़ को निशाना बनाकर प्रताड़ित करना, यह स्वीकार करना है कि बतौर नागरिक हमारी आत्मा में कलह कितनी गहरी उतर चुकी है. जो समाज अपने आप में सुरक्षित होता है, वह इसके प्रतिबिंब से नहीं डरता. असल बेईमानी ऐसे किसी बंटवारे का नाम न लेना नहीं है, बल्कि उसके अस्तित्व से इनकार में है- और मौन या चुप्पी को एकता और शांति समझ लेने में.

जब सामंजस्य से रहने के आह्वान को शत्रुता माना जाए, जब बहुलता की याद दिलाना आक्रमण समझा जाए, तब यह संकेत है कि असहिष्णुता कितनी गहराई से हमारी सार्वजनिक चेतना में समा चुकी है. आज विभाजनकारी तर्क तेज़ी से फैलते हैं, ज़्यादा तालियां पाते हैं और एकता की बातों से कहीं अधिक भावनात्मक ऊर्जा खींचते हैं.

नफ़रत प्रदर्शन बन चुकी है; आक्रोश पहचान का बैज और इस समय में संयम कायर लगता है, सूक्ष्मता संदिग्ध और सहानुभूति लगभग विध्वंसक. रहमान के शब्द कोई घोषणापत्र नहीं थे; वे एक आह के क़रीब थे- उस दुनिया और उस देश के बदलने की शांत स्वीकृति, जिन्हें वे प्रेम करते हैं. कि ऐसी बात पर भी गालियों की बाढ़ आ जाए, यह बताता है कि हम असुविधाजनक सत्यों को सुनने के लिए कितने अनिच्छुक हो गए हैं- जब तक वे हमारे पूर्वाग्रहों को पोषित न करते हों.

कहने वाला ही शत्रु बन जा रहा है, इसलिए नहीं कि वह ग़लत है, बल्कि इसलिए कि जिस बात पर आप यक़ीन किए बैठे हैं, निश्चित मान रहे हैं, वो उसमें ख़लल दाल रहा है- और यही ‘न्यू इंडिया’ का नया स्वभाव बनता जा रहा है.

यह प्रतिक्रिया केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं; यह व्यापक सांस्कृतिक बदलाव का दर्पण है, जहां पहचान को कठोर हथियार बनाया जा रहा है और भिन्नता को ख़तरे के रूप में देखा जाता है. सिनेमा- जो कभी भारत की सबसे बहुलतावादी कला थी भी इससे अछूता नहीं रहा. मुंबई फिल्म उद्योग समुदायों के पार सहयोग से पनपा जहां लेखक, गीतकार, संगीतकार, अभिनेता, तकनीशियन- अनेक प्रवासी, अनेक अल्पसंख्यक- सब सृजन और कल्पना की साझा भाषा से बंधे. उसकी जादूगरी इसी संगम में थी. गीत, कथाएं और पात्र सहजता से धार्मिक और भाषाई सीमाएं लांघते रहे, एक ऐसी लोकप्रिय संस्कृति गढ़ते हुए, जो हमारी राजनीति से अधिक समावेशी थी.

रहमान उसी विरासत के प्रतीक हैं. वंदे मातरम् से जय हो  तक, सूफ़ी रंग से टेक्नो-फोक प्रयोगों तक- उनकी रचनाएं विविध सांस्कृतिक धाराओं को साझा भावनात्मक ताने-बाने में पिरोती हैं. उनका संगीत यह नहीं पूछता कि आप कौन हैं; वह एक साझा मानवता मानकर चलता है.

पर रहमान पर हमला एक बड़े पैटर्न का हिस्सा है. कलाकार, लेखक, शिक्षाविद् और पत्रकार- जो बहुलता की बात करते हैं या ध्रुवीकरण को लेकर चेताते हैं- तेज़ी से ‘राष्ट्र-विरोधी’, ‘अभिजात्य’ या ‘पक्षपाती’ ठहराए जा रहे हैं. भाषा बदलती है, पर प्रवृत्ति वही है: उस हर कथा को अवैध ठहराना जो राष्ट्र की एकरूप कल्पना को चुनौती दे.

हम भूलते जा रहे हैं कि भारत की प्रतिभा कभी एकरूपता में नहीं, बल्कि विरोधाभासों को साधने की क्षमता में रही है. भारतीय अर्थों में धर्मनिरपेक्षता का मतलब आस्था को सार्वजनिक जीवन से मिटाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि कोई एक आस्था उस पर हावी न हो. बहुलता कोई मजबूरी नहीं, बल्कि आधारभूत मूल्य थी.

आज हम उस नैतिक कल्पना के क्षरण को देख रहे हैं. राजनीति ने जान लिया है कि भय, आशा से अधिक प्रभावी ढंग से समर्थन जुटाता है. एल्गोरिदम क्रोध को बढ़ाते हैं क्योंकि वह हमें बांधे रखता है. टीवी बहसें सबसे ऊंची आवाज़ को पुरस्कृत करती हैं. ऐसे माहौल में सामंजस्य फीका और जटिलता थकाऊ लगती है.

‘हम बनाम वे’ की सरल कहानी, साझा जीवन की ‘अव्यवस्थित सच्चाई’ से कहीं आसान बिकती है. रहमान के आलोचक कहते हैं कि वे नकारात्मक चित्र खींचते हैं. पर घाव का नाम लेना निराशावाद नहीं; उपचार का पहला कदम है. इनकार संक्रमण को फैलने देता है क्योंकि जब कलाकार भय से चुप हो जाते हैं, समाज अपनी सबसे संवेदनशील एंटेना को खो देता है. संस्कृति प्रचार बन जाती है, कला सजावट- वोट-बटोरू कथा के अधीन.

यहां एक गहरी त्रासदी है जिसे अधिकांश प्रगतिशील साथी भी नज़रअंदाज़ करते है क्योंकि जो लोग रहमान जैसी आवाज़ों पर हमला करते हैं, वे अक्सर राष्ट्र-गौरव की रक्षा का दावा करते हैं. पर देशभक्ति को सोच और समझ की अनुरूपता या एकरूपता में बदलकर वे उसे दरिद्र बना देते हैं. आत्मविश्वासी राष्ट्र आत्ममंथन से नहीं डरता. असहमत होते हुए भी वह अपने कवियों, संगीतकारों, शिक्षकों और छात्रों को बिना देशद्रोह का संदेह किए सुन सकता है.

इतिहास बताता है कि जो समाज अपने कलाकारों और अन्य आलोचकों पर टूट पड़ते हैं, वे मजबूत नहीं, बल्कि भंगुर बनते हैं- संदेह और असहमति सहने में असमर्थ. स्वयं रहमान का संगीत एक और संभावना सुझाता है- कि सुंदरता संगम से जन्म लेती है, संघर्ष से नहीं; कि सामंजस्य भिन्नता की अनुपस्थिति नहीं, उसका बेहतर संयोजन है.

प्रश्न यह नहीं कि रहमान सही हैं या ग़लत. क्या हम ईमानदारी से इनकार कर सकते हैं कि आज भी शहरी भारत के बड़े हिस्सों में मुसलमानों या दलितों के लिए घर किराये पर लेना या घर खरीद पाना आसान है? क्या हम यह दिखावा कर सकते हैं कि रोज़मर्रा का भेदभाव केवल इसलिए समाप्त हो गया है कि उसे स्वीकार करना असहज है?

इन वास्तविकताओं से मुंह मोड़ना आशावाद नहीं, पलायन है.

हम इतने नाज़ुक कब हो गए कि एक सौम्य टिप्पणी भी हमला लगे? हमने कब तय किया कि राष्ट्र की रक्षा दिलों को चौड़ा करके नहीं, बल्कि संकुचित करके होगी? परिपक्व लोकतंत्र आत्म-परीक्षण के बोझ से कभी ढहता नहीं. श्रेष्ठ देशभक्ति आलोचना को दबाने की वृत्ति नहीं, बल्कि जो हमें छोटा बनाता है, उसका सामना करने का साहस है.

जब कलाकारों, लेखकों या सामान्य नागरिकों को दर्पण दिखाने पर दंडित किया जाता है, समस्या दर्पण की नहीं होती क्योंकि दरारें पहले से थीं. बदला यह है कि हमें देखना छोड़ने की ट्रेनिंग दी जा रही है- टूटन को नकारना, स्वीकार को ग़द्दारी मानना. दर्पण घाव देते नहीं हैं बल्कि उन्हें दिखाते हैं. दर्पण तोड़ना उपचार पर उसी कम्फर्ट जोन को चुनना है जो हमें अपने विद्वेष और पूर्वाग्रहों के साथ रखता है. और जो राष्ट्र अपने चेहरे और उस पर उभर आए घावों और विरोधाभासों को नहीं देख पाता, वह मौन को सामंजस्य और आज्ञाकारिता को एकता समझ बैठता है.

हम सब जानते हैं कि रहमान ने सिर्फ वही बात कही जो हममें से लाखों लोग देख रहे हैं. उन पर बरसी आग बताती है कि हमें झूठ नहीं, सच असहज करता है. और जो राष्ट्र सच को देशद्रोह समझने लगे, वह दोनों खो बैठता है.

समाधान उन्हें चुप कराने में नहीं, बल्कि असुविधाजनक सत्य से सामना करने में है. हमें पूछना होगा- क्रोध करुणा से अधिक प्रामाणिक क्यों लगता है? हम सह-अस्तित्व की कठिन साधना के बजाय बहिष्कार के आसान रोमांच को क्यों चुनते हैं?

(लेखक राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य हैं.)

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेज़ी में आउटलुक में प्रकाशित हुआ है.)