घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन तय करने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, कहा- कोई काम पर नहीं रखेगा

सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन लागू करने और उनके लिए व्यापक क़ानून बनाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि अगर न्यूनतम वेतन तय कर दिया गया, तो लोग घरेलू कामगारों को रखना ही बंद कर देंगे. अदालत ने साथ ही यह भी टिप्पणी की कि देश में औद्योगिक विकास रुकने के लिए काफी हद तक ट्रेड यूनियनें ज़िम्मेदार रही हैं.

घरेलू कामगारों की एक रैली. (फाइल फोटो: अखिल कुमार)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (29 जनवरी) को उस याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें यह घोषणा करने की मांग की गई थी कि घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन मिलना उनका मौलिक अधिकार है.

अदालत ने कहा कि वह केंद्र और राज्यों को कानून में बदलाव करने का निर्देश नहीं दे सकती.

समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि देश में औद्योगिक विकास रुकने के लिए काफी हद तक ट्रेड यूनियनें जिम्मेदार रही हैं.

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ‘देश में कितने औद्योगिक संस्थान ट्रेड यूनियनों की वजह से बंद हो गए हैं, यह देखिए. पारंपरिक उद्योग – सब ‘झंडा’ वाली यूनियनों की वजह से बंद हुए हैं. ये काम नहीं करना चाहते. ट्रेड यूनियन के नेता देश के औद्योगिक विकास को रोकने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं.’

उन्होंने कहा, ‘शोषण जरूर है, लेकिन उससे निपटने के और भी तरीके हैं. लोगों को उनके व्यक्तिगत अधिकारों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए था, उन्हें अधिक कुशल बनाया जाना चाहिए था और कई अन्य सुधार किए जाने चाहिए थे.’

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सीजेआई ने यह भी कहा कि यह तर्क आकर्षक लग सकता है कि न्यूनतम वेतन अनिवार्य न होने पर घरेलू कामगारों के समानता, भेदभाव-रहित व्यवहार और निष्पक्ष रोजगार के अधिकार (अनुच्छेद 14, 15 और 16) का उल्लंघन होता है, लेकिन जरूरत से ज़्यादा सक्रिय ट्रेड यूनियनें अंततः इन कामगारों को ही असहाय स्थिति में छोड़ सकती हैं.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘इसके परिणामों पर विचार कीजिए. ट्रेड यूनियनें इन लोगों को छोड़ देंगी और इनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं बचेगी.’

पीठ ने यह चिंता भी जताई कि तय किए गए न्यूनतम वेतन का एक बड़ा हिस्सा रोजगार एजेंसियों द्वारा हड़प लिया जा सकता है. अदालत ने इसका उदाहरण खुद सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा हुआ बताया.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘ये रोजगार एजेंसियां लोगों का शोषण करती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कुशल कामगारों के लिए एजेंसियों को 40,000 रुपये प्रति व्यक्ति दिए, लेकिन उन गरीब लड़कियों को सिर्फ 19,000 रुपये मिले. इसी तरह भरोसा टूटता है. देश में करोड़ों लोग घरेलू कामगार रखते हैं. जब आप उन्हें एजेंसियों के जरिए रखते हैं, तो क्या होता है? घरेलू कामगारों से जुड़े कई गंभीर अपराध तब होते हैं, जब उन्हें एजेंसियों के जरिए लगाया जाता है, न कि सीधे मानवीय संबंध के आधार पर.’

देश भर में लाखों घरेलू कामगारों की दुर्दशा को स्वीकार करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि न्यायपालिका कानून बनाने के काम में दखल नहीं दे सकती.

अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘जब तक संसद या विधानसभा कोई कानून नहीं बनाती, तब तक कोई बाध्यकारी आदेश नहीं दिया जा सकता. ऐसा निर्देश देना इस अदालत के लिए उचित नहीं होगा.’

हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ताओं – जिसमें घरेलू कामगारों का संगठन पेन थोज़िलालर्गल संगम भी शामिल है – से कहा कि वे राज्यों और केंद्र सरकार के सामने घरेलू कामगारों की समस्याएं उठाते रहें, ताकि सरकार इस पर उचित फैसला ले सके.

अदालत ने कहा कि यह मामला राज्यों के स्तर पर विचाराधीन है और उम्मीद जताई कि घरेलू कामगारों के शोषण को रोकने के लिए कोई उपयुक्त व्यवस्था बनाई जाएगी.

इस याचिका में मांग की गई थी कि घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन न देना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाए और पूरे देश में न्यूनतम वेतन लागू किया जाए. याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि घरेलू कामगार – जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं – असंगठित क्षेत्र का सबसे कमजोर वर्ग हैं और उन्हें कानूनी सुरक्षा नहीं मिलती.

उन्होंने बताया कि सिंगापुर जैसे कई एशियाई देशों में घरेलू कामगारों को बिना कानूनी सुरक्षा के काम पर नहीं रखा जा सकता. वहां छुट्टी, काम की शर्तें और अन्य सुविधाएं कानून से तय हैं.

लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने आर्थिक और श्रम नीतियों में अदालत के हस्तक्षेप पर आपत्ति जताई. उन्होंने चेतावनी दी कि अच्छे इरादों से बनाए गए कानूनों के कई बार गलत नतीजे निकलते हैं.

उन्होंने कहा, ‘अगर न्यूनतम वेतन तय कर दिया गया, तो लोग घरेलू कामगारों को रखना ही बंद कर देंगे. हर घर को अदालत में घसीटा जाएगा.’

उन्होंने यह भी कहा कि ट्रेड यूनियन मॉडल हर क्षेत्र में सफल नहीं रहा है और कई बार इससे नुकसान हुआ है.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘न्यूनतम वेतन लागू होते ही यूनियनें यह सुनिश्चित करेंगी कि हर घर पर मुकदमा हो. इससे हर भारतीय घर कानूनी लड़ाई का मैदान बन जाएगा.’

जस्टिस बागची ने कहा कि ऐसा नहीं है कि घरेलू कामगारों के लिए कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं है. उन्होंने कहा, ‘असंगठित कामगार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम कई पहलुओं को कवर करता है.’ हालांकि उन्होंने याचिकाकर्ता की चिंताओं को सही माना.

अदालत ने यह भी कहा कि रोजगार एजेंसियां कई बार कामगारों के शोषण में भूमिका निभाती हैं.

जब याचिकाकर्ता ने मांग की कि न्यूनतम वेतन न देना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन घोषित किया जाए, तो मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि बिना लागू करने की ठोस व्यवस्था के ऐसी घोषणाएं सिर्फ औपचारिक बातें होंगी.

उन्होंने कहा, ‘आपकी सभी मांगें कानून बनाने से जुड़ी हैं. जब तक संसद से कानून नहीं बनवाया जाता, तब तक कोई प्रभावी आदेश नहीं दिया जा सकता, और ऐसा निर्देश यह अदालत नहीं दे सकती.’

रामचंद्रन ने बताया कि कुछ राज्यों ने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन तय किया है, लेकिन कई राज्यों ने अब तक ऐसा नहीं किया है, जबकि घरेलू काम की प्रकृति पूरे देश में एक जैसी है.

उन्होंने 29 जनवरी 2025 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें अदालत ने घरेलू कामगारों की दयनीय स्थिति पर चिंता जताई थी और बताया था कि इस विषय पर कानून बनाने की कोशिशें बार-बार असफल रही हैं.