अपने अमेरिकी वकीलों के ज़रिये नियामक एजेंसी का समन लेने को राज़ी हुए गौतम और सागर अडानी

गौतम अडानी और सागर अडानी ने अमेरिका के सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन (एसईसी) के कानूनी समन को अपने अमेरिकी वकीलों के माध्यम से स्वीकार करने पर सहमति दे दी है. इसके साथ ही भारत सरकार की आपत्तियों के कारण 14 महीनों से अटकी समन प्रक्रिया समाप्त हो गई है. अब अदालत में आगे की कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है.

अडानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडानी. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: अरबपति गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी ने अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन-एसईसी) की ओर से भेजे गए कानूनी समन को अपने अमेरिकी वकीलों के माध्यम से स्वीकार करने पर सहमति दे दी है. इसके साथ ही 14 महीनों से चला आ रहा वह गतिरोध खत्म हो गया है, जिसके दौरान भारत सरकार की ओर से बार-बार आपत्तियां उठाए जाने के कारण अदालत के दस्तावेज़ अडानी पक्ष तक नहीं पहुंच पाए थे.

अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट की जिला अदालत में शुक्रवार (30 जनवरी) को दाखिल एक कोर्ट फाइलिंग के अनुसार, ’23 जनवरी, 2026 को प्रतिवादियों के अमेरिकी वकीलों ने समन की तामील स्वीकार करने पर सहमति जता दी, जिससे अदालत को इस संबंध में लंबित याचिका पर फैसला देने की आवश्यकता नहीं रही.’

इस सहमति के बाद अदालत को एसईसी की उस मांग पर विचार नहीं करना पड़ा, जिसमें उसने भारतीय अधिकारियों को दरकिनार कर ईमेल के ज़रिये या अडानी समूह के अमेरिकी वकीलों के माध्यम से समन भेजने की अनुमति मांगी थी.

एसईसी ने जस्टिस निकोलस जी. गारौफिस को बताया कि उसने पक्षकारों की सहमति से तैयार की गई एक स्टिपुलेशन और प्रस्तावित आदेश अदालत में दाखिल किया है. फाइलिंग के मुताबिक, इस दस्तावेज़ को गौतम अडानी और सागर अडानी की सहमति से प्रस्तुत किया गया है और इसके ज़रिये वैकल्पिक तरीकों से समन की अनुमति देने संबंधी एसईसी की लंबित याचिका का निपटारा हो गया है.

स्टिपुलेशन, यानी मुक़दमे के दोनों पक्षों के बीच किया गया औपचारिक समझौता, यह तय करता है कि प्रतिवादी एसईसी के आरोपों पर किस समय-सीमा के भीतर जवाब देंगे. समझौते के अनुसार, अदालत द्वारा स्टिपुलेशन को मंज़ूरी दिए जाने के 90 दिनों के भीतर प्रतिवादियों को या तो संघीय सिविल प्रक्रिया नियम 12(a) के तहत अपना जवाब दाखिल करना होगा या फिर नियम 12(b) के तहत शिकायत को ख़ारिज करने की याचिका दायर करनी होगी.

सरल शब्दों में, न्यायाधीश की मंज़ूरी के बाद अडानी पक्ष के पास 90 दिन होंगे या तो आरोपों पर औपचारिक जवाब देने के लिए, या फिर अदालत से मामला ख़ारिज करने की मांग करने के लिए.

हालांकि, इस समझौते में यह भी साफ़ किया गया है कि समन की तामील से जुड़े मुद्दे को छोड़कर, प्रतिवादी अपने सभी कानूनी बचाव के अधिकार सुरक्षित रखते हैं. इनमें यह दलील भी शामिल है कि अमेरिकी अदालत को उनके ख़िलाफ़ इस मामले में सुनवाई का अधिकार नहीं है. यानी समन स्वीकार करने के बावजूद अडानी पक्ष अमेरिकी अदालत के क्षेत्राधिकार को चुनौती दे सकता है.

अदालती दस्तावेज़ों के अनुसार, चूंकि गौतम और सागर अडानी भारत में रहते हैं, इसलिए एसईसी ने 17 फ़रवरी, 2025 को हेग कन्वेंशन के तहत भारत के क़ानून एवं न्याय मंत्रालय के विधि कार्य विभाग से औपचारिक रूप से मदद मांगी थी. लेकिन अब तक इस प्रक्रिया के ज़रिये समन की तामील नहीं हो सकी थी.

हेग कन्वेंशन एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जो देशों के बीच कानूनी दस्तावेज़ों की तामील की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है. भारत में इस संधि के तहत ऐसे अनुरोधों को संभालने की ज़िम्मेदारी क़ानून एवं न्याय मंत्रालय को दी गई है.

एसईसी का कहना है कि भारत सरकार ने इस प्रक्रिया में बार-बार अड़चनें डालीं. अप्रैल 2025 में मंत्रालय ने यह कहकर अनुरोध खारिज कर दिया कि दस्तावेज़ों पर आवश्यक मुहर और हस्ताक्षर नहीं थे. जबकि एसईसी के मुताबिक, हेग कन्वेंशन के तहत ऐसी औपचारिकताओं की कोई ज़रूरत नहीं होती और इससे पहले भारत में समन की सफल तामील के मामलों में भी ऐसी मांग नहीं की गई थी.

इसके बाद मई 2025 में एसईसी ने विस्तृत स्पष्टीकरणों के साथ अनुरोध दोबारा भेजा, लेकिन मंत्रालय ने महीनों तक किसी भी फॉलो-अप पर जवाब नहीं दिया. दिसंबर 2025 में मंत्रालय ने एक नई आपत्ति उठाते हुए एसईसी के एक आंतरिक नियम का हवाला दिया और दावा किया कि इस मामले में एजेंसी को हेग कन्वेंशन का सहारा लेने का अधिकार नहीं है. एसईसी ने इस आपत्ति को पूरी तरह निराधार बताया.

इन लगातार बाधाओं के चलते एसईसी ने 21 जनवरी, 2026 को अदालत का रुख किया और हेग कन्वेंशन की प्रक्रिया को दरकिनार कर समन ईमेल के ज़रिये या सीधे अडानी पक्ष के अमेरिकी वकीलों के माध्यम से भेजने की अनुमति मांगी.

हालांकि, इस याचिका के दाखिल होने के महज़ दो दिन बाद ही अडानी पक्ष के अमेरिकी वकीलों ने समन स्वीकार करने पर सहमति दे दी. 23 जनवरी को समन स्वीकार किए जाने के साथ ही प्रतिवादियों ने हेग कन्वेंशन के ज़रिये औपचारिक तामील पर ज़ोर देने का अपना अधिकार छोड़ दिया, जिसके लिए भारतीय अधिकारियों का सहयोग आवश्यक होता.

अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, गौतम और सागर अडानी का प्रतिनिधित्व अमेरिका की तीन प्रमुख क़ानूनी फर्में कर रही हैं-सुलिवन एंड क्रॉमवेल, निक्सन पीबॉडी और हेकर फ़िंक.

गौरतलब है कि एसईसी ने 20 नवंबर, 2024 को गौतम अडानी और सागर अडानी के ख़िलाफ़ सिविल फ्रॉड के आरोप दर्ज किए थे. एजेंसी का आरोप है कि सौर ऊर्जा परियोजनाओं के ठेके हासिल करने के लिए भारतीय सरकारी अधिकारियों को सैकड़ों मिलियन डॉलर की रिश्वत देने की एक योजना को अंजाम दिया गया.

ये आरोप सितंबर 2021 में अडानी ग्रीन एनर्जी द्वारा जारी किए गए बॉन्ड ऑफ़र से जुड़े हैं, जिसके ज़रिये अमेरिकी निवेशकों से 175 मिलियन डॉलर से अधिक की राशि जुटाई गई थी. एसईसी का दावा है कि इस बॉन्ड ऑफ़र से जुड़े दस्तावेज़ों में कंपनी की भ्रष्टाचार-रोधी नीतियों को लेकर भ्रामक और ग़लत जानकारी दी गई थी.

इसी दिन अमेरिकी संघीय अभियोजकों ने इससे जुड़े आपराधिक मामले भी दर्ज किए थे, जिनमें सिक्योरिटीज़ फ्रॉड और वायर फ्रॉड की साज़िश जैसे आरोप शामिल हैं. ये आपराधिक मामले एसईसी की सिविल कार्रवाई से अलग प्रक्रिया के तहत चल रहे हैं.

अडानी समूह ने इन सभी आरोपों को सिरे से ख़ारिज करते हुए इन्हें निराधार बताया है और कहा है कि वह अपने पास उपलब्ध सभी क़ानूनी विकल्पों का इस्तेमाल करेगा.