नई दिल्ली: जनवरी के आखिरी सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू कामगारों के न्यूनतम वेतन से जुड़ी जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए राज्य सरकारों से इस मुद्दे पर विचार करने का आग्रह किया, लेकिन सीधा निर्देश देने से इनकार कर दिया.
इस दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने ट्रेड यूनियनों और न्यूनतम मजदूरी के प्रभाव को लेकर कुछ ऐसी टिप्पणियां कीं, जिन पर आर्थशास्त्री, श्रमिक संगठनों और नागरिक अधिकार समूहों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है.
29 जनवरी, 2026 को घरेलू कामगारों के अधिकारों से जुड़ी इस याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सभी राज्य सरकारों से यह ज़रूर कहा कि वे घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी अधिसूचित करने के मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें. हालांकि अदालत ने इसे विधायी और कार्यपालिका के क्षेत्र में दखल का मामला बताते हुए कोई बाध्यकारी आदेश पारित करने से परहेज़ किया.
अदालत ने जनहित याचिका का निपटारा करते हुए उम्मीद जताई कि राज्य सरकारें घरेलू कामगारों के शोषण को रोकने और उनके कल्याण के लिए कोई ‘उपयुक्त तंत्र’ विकसित करेंगी.
क्या कहा अदालत ने
यह याचिका देश के विभिन्न राज्यों से घरेलू कामगारों के दस संगठनों द्वारा दायर की गई थी, जिसमें केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों तथा केंद्र शासित प्रदेशों को पक्षकार बनाया गया था. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि कई राज्यों में घरेलू कामगारों को अब भी न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 और बाद में आए वेज कोड, 2019 के दायरे से बाहर रखा गया है. इसके कारण घरेलू कामगार न केवल न्यूनतम मजदूरी की गारंटी से वंचित हैं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा जैसे बुनियादी अधिकारों से भी दूर हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 21 और 23 का सीधा उल्लंघन है.
हालांकि कानूनी आदेश से ज़्यादा सुर्खियों में अदालत कक्ष के भीतर हुई बहस और मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियां रहीं. सुनवाई की शुरुआत में ही मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिका पर सुनवाई को लेकर असहजता जताते हुए कहा कि अगर इस तरह के मामलों में निर्देश दिए गए तो ‘हर घर मुकदमेबाज़ी में फंस जाएगा’.
उन्होंने यह भी कहा कि न्यूनतम मजदूरी तय करने से लोग घरेलू कामगार रखना बंद कर देंगे, जिससे कामगारों को ही नुकसान होगा. मुख्य न्यायाधीश ने यह टिप्पणी भी की कि ट्रेड यूनियनें देश में औद्योगिक विकास को रोकने के लिए ‘काफी हद तक जिम्मेदार’ रही हैं.
इन टिप्पणियों पर वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने आपत्ति जताई और घरेलू कामगारों की स्थिति की तुलना बंधुआ मज़दूरी से करते हुए कहा कि न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान ‘बेगार’ के समान है, जिसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही असंवैधानिक ठहरा चुका है. उन्होंने यह भी कहा कि घरेलू काम का स्वरूप राज्य-दर-राज्य नहीं बदलता, फिर भी कई राज्य जानबूझकर इन्हें न्यूनतम मजदूरी के दायरे से बाहर रखे हुए हैं.
मुख्य न्यायाधीश ने जवाब में यह तर्क दिया कि सुधार की ‘अति-उत्सुकता’ कभी-कभी अनचाहे परिणाम पैदा करती है और न्यूनतम मजदूरी तय करने से मांग-आपूर्ति का संतुलन बिगड़ सकता है.
उन्होंने यह भी कहा कि आज बड़े शहरों में घरेलू कामगारों का शोषण ट्रेड यूनियनों से ज़्यादा एजेंसियां कर रही हैं. इस संदर्भ में उन्होंने यह उदाहरण भी दिया कि सुप्रीम कोर्ट में काम करने वाले एक बाहरी एजेंसी के ज़रिए रखे गए कामगारों को 40 हज़ार रुपये लिए जाने के बावजूद केवल 19 हज़ार रुपये ही मिलते हैं.
अदालत की टिप्पणियों पर अर्थशास्त्री का नज़र

अदालत की इन टिप्पणियों पर अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. द वायर हिंदी से बातचीत में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे को एक स्थिर (स्टैटिक) नजरिये से देख रहा है, जबकि अर्थव्यवस्था को ‘गतिशील दृष्टि’ (डायनमिक) से देखने की ज़रूरत है.
उनके मुताबिक, अगर घरेलू कामगारों को न्यूनतम मजदूरी दी जाती है तो इससे अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ेगी, क्षमता उपयोग में सुधार होगा और अंततः निवेश व विकास को बढ़ावा मिलेगा. उन्होंने यह भी साफ किया कि केवल मज़दूरी बढ़ाने से अपने आप फॉर्मलाइज़ेशन नहीं होता, बल्कि इसके लिए अलग से सामाजिक सुरक्षा कानूनों की ज़रूरत होती है.
औद्योगिक प्रगति को रोकने का ठीकरा ट्रेड यूनियनों पर फोड़ने को लेकर अरुण कुमार ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश तथ्यों से ठीक से अवगत नहीं हैं. उन्होंने कहा:
पहले यह साफ होना चाहिए कि वे औद्योगिक गिरावट से क्या मतलब ले रहे हैं. अगर इसका मतलब उद्योगों के उत्पादन में गिरावट है, तो यह सही नहीं है. भारत में उद्योगों का उत्पादन लगातार बढ़ा है. हां, विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी कम हुई है, लेकिन इसका कारण सेवा क्षेत्र की तेज़ वृद्धि है. कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी भी अर्थव्यवस्था में घटी है, जबकि वहां कोई ट्रेड यूनियन नहीं है. अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र है, जहां यूनियन नहीं हैं, और उसकी हिस्सेदारी भी घट रही है.
अर्थव्यवस्था की विकास दर बार-बार इसलिए गिरती है क्योंकि मांग की कमी रहती है. इसकी वजह यह है कि कामगारों और किसानों की आमदनी कम है. इसलिए यह कहना कि ट्रेड यूनियन औद्योगिक गिरावट की जिम्मेदार हैं, वास्तविकता के उलट है.
जब अरुण कुमार से यह पूछा गया कि आखिर तेज़ आर्थिक वृद्धि के दावे और असंगठित कामगारों की बदहाल स्थिति के बीच विरोधाभास क्यों है, अर्थशास्त्री ने कहा, ‘भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल नहीं है. मैं लंबे समय से कहता आ रहा हूं कि भारत के जीडीपी आंकड़े असंगठित क्षेत्र को स्वतंत्र रूप से नहीं मापते. यह क्षेत्र नोटबंदी के बाद से लगातार कमजोर हुआ है, लेकिन इसकी गिरावट को संगठित क्षेत्र की वृद्धि के आधार पर छिपा दिया जाता है. अगर सही सुधार किए जाएं, तो भारत की औसत विकास दर करीब 2.5 प्रतिशत के आसपास होगी.’
अरुण कुमार ने कहा कि असंगठित क्षेत्र ‘रिज़र्व आर्मी ऑफ लेबर’ की तरह काम करता है, जो संगठित क्षेत्र के श्रमिकों की ‘बार्गेनिंग पावर’ को भी कमजोर करता है.
कुमार ने ट्रेड यूनियनों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते जोड़ा, ‘ट्रेड यूनियनों को असंगठित क्षेत्र के कामगारों को संगठित करना होगा. यह मुश्किल काम है, लेकिन उनके हित में यही ज़रूरी है.’
अर्थशास्त्री के मुताबिक संविधान ने राज्य से केवल न्यूनतम नहीं बल्कि ‘लिविंग वेज’ सुनिश्चित करने का वादा किया है, और राज्य का न्यूनतम मजदूरी तक लागू न करना अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने जैसा है. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को राज्य को उसकी इस जिम्मेदारी की याद दिलानी चाहिए.
‘जब सीजेआई स्वीकार रहे हैं कि एजेंसियां शोषण कर रही हैं, तो फिर हस्तक्षेप क्यों नहीं’
अदालत के फैसले और टिप्पणियों पर ट्रेड यूनियनों की प्रतिक्रिया भी बेहद तीखी रही है. द वायर हिंदी से बातचीत में सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (सीआईटीयू) के दिल्ली महासचिव अनुराग सक्सेना ने कहा कि अदालत की टिप्पणियां ‘पूरी तरह आउट ऑफ कॉन्टेक्स्ट’ हैं और वास्तविकता से उनका कोई लेना-देना नहीं है.
उनके मुताबिक, केंद्र सरकार ने आज तक घरेलू कामगारों के लिए कोई ठोस कानून नहीं बनाया है और इसी मजबूरी में मज़दूर संगठनों को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा.
उन्होंने सवाल उठाया कि जब मुख्य न्यायाधीश खुद स्वीकार कर रहे हैं कि एजेंसियां कामगारों का शोषण कर रही हैं, तो फिर हस्तक्षेप क्यों नहीं किया जा रहा. उन्होंने यह भी पूछा कि अगर देश चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, तो कामगारों की हालत क्यों नहीं सुधर रही और प्रति व्यक्ति आय क्यों नहीं बढ़ रही.
वकीलों के संगठन कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) ने मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि ये टिप्पणियां न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत हैं, बल्कि न्यायपालिका की संस्थागत विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुंचाती हैं.
संगठन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट स्वयं कई फैसलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान जबरन श्रम के समान है. ऐसे में ट्रेड यूनियनों और घरेलू कामगारों के संघर्षों को खारिज करना संविधान की भावना के खिलाफ है. सीजेएआर ने इसे मुख्य न्यायाधीश के जनवरी 2025 के फैसले, अजॉय मलिक बनाम उत्तराखंड राज्य, के भी विपरीत बताया, जिसमें घरेलू कामगारों के लिए कानूनी ढांचा बनाने की बात कही गई थी.
ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन्स (AICCTU) ने भी बयान जारी कर मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों को ‘चौंकाने वाला और तथ्यहीन’ बताया. संगठन ने कहा कि औद्योगिक प्रगति रुकने के पीछे ट्रेड यूनियनों की नहीं, बल्कि कुप्रबंधन और पूंजी के जानबूझकर दुरुपयोग की भूमिका रही है. एक्टू ने याद दिलाया कि आठ घंटे का कार्यदिवस, न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा जैसे अधिकार मज़दूरों और ट्रेड यूनियनों के लंबे संघर्षों का नतीजा हैं, न कि किसी दया का परिणाम.
भाकपा (माले) लिबरेशन ने भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को घरेलू कामगारों और पूरे मज़दूर वर्ग के अधिकारों पर ‘कुठाराघात’ करार दिया है. पार्टी ने कहा कि ट्रेड यूनियनों को विकास विरोधी बताना उन ऐतिहासिक संघर्षों को मिटाने की कोशिश है, जिनके बिना आज भी गुलामी और बंधुआ मज़दूरी सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा बनी रहती.
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भले ही औपचारिक रूप से राज्यों से उम्मीद जताकर समाप्त हो गया हो, लेकिन अदालत की टिप्पणियों ने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया है कि क्या भारत में श्रम अधिकारों को सामाजिक न्याय के सवाल के रूप में देखा जाएगा, या उन्हें केवल बाज़ार की मांग-आपूर्ति के तराज़ू पर तौला जाता रहेगा?
