हिमंता बिस्वा शर्मा: नफ़रती ज़हर और सांप्रदायिकता का पर्याय

हिमंता बिस्वा शर्मा भाजपा में शामिल होने के बाद कई कट्टर आरएसएस कार्यकर्ताओं से भी ज़्यादा आक्रामक और मुस्लिम विरोधी हो चले है. उन्होंने अपने संवैधानिक पद का इस्तेमाल नफ़रती भाषणों के लिए किया है.

/
हिमंता बिस्वा शर्मा. (फोटो: पीटीआई/इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

‘मेरा काम मिया लोगों को परेशान करना है.’ असम राज्य में सबसे ऊंचे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति – मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा – द्वारा अपने काम के बारे में दिया गया यह बयान हर लिहाज़ से असाधारण है.

और यह एक ऐसा काम है जिसे वह साफ़ तौर पर बहुत गंभीरता से लेते हैं. असम के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने पूरे कार्यकाल के दौरान वह अपने संवैधानिक पद का इस्तेमाल असम में बंगाली मूल और मुस्लिम धार्मिक पहचान वाले लोगों पर अत्याचार करने और उनके ख़िलाफ़ नफ़रत भड़काने के लिए करते रहे हैं.

2011 की जनगणना के अनुसार, ऐसे लोग असम की आबादी का एक तिहाई हिस्सा हैं. वह उन्हें अपमानजनक तरीक़े से ‘मिया’ कहते हैं.

मिया या मियां दक्षिण एशिया में मुस्लिम भद्रलोक के लिए इस्तेमाल होने वाला एक आम सम्मानजनक शब्द है. हालांकि, असम में बंगाली मूल के मुसलमानों के लिए मिया शब्द का इस्तेमाल अपमान के तौर पर किया जाने लगा.

शिक्षक और कवि हफ़ीज़ अहमद ने 2016 में एक कविता लिखी, जो बंगाली मूल के प्रताड़ित असमिया लोगों के दिलों की आवाज़ बनकर सामने आई. हफ़ीज़ अहमद की कविता की शुरुआती पंक्तियां हैं:

लिखो
मैं एक मिया हूं
एनआरसी में मेरा सीरियल नंबर 200543 है
मेरे दो बच्चे हैं
एक और आने वाला है
अगली गर्मियों में.
क्या तुम उससे भी नफ़रत करोगे
जैसे मुझसे करते हो?

इस कविता ने मिया कविता के विरोध का एक पूरा आंदोलन शुरू कर दिया. पिछले दशक में मिया कवियों ने बेझिझक मिया शब्द को अपनाया है, और इसका इस्तेमाल गर्व, पहचान तथा अपनी बात कहने के प्रतीक के तौर पर किया है.

शर्मा गर्व से उन कई तरीक़ों के बारे में बताते हैं जिनसे उन्होंने ‘मिया लोगों को परेशान किया है.’ वह अक्सर 1.5 लाख बीघा ज़मीन से मिया लोगों को हटाने का दिखावा करते हैं.

मिया लोगों के प्रति अपनी दुश्मनी को ज़ाहिर करते हुए मुख्यमंत्री घोषणा करते हैं कि उनके पास ‘छिपाने के लिए कुछ नहीं है. हम कुछ उत्पात करेंगे, लेकिन क़ानून के दायरे में… हम ग़रीब और दबे-कुचले लोगों के साथ हैं, लेकिन उनके साथ नहीं जो हमारी जाति (समुदाय) को नष्ट करना चाहते हैं.’

राज्य विधानसभा में जब उनसे खुलेआम भेदभाव वाली उनकी नीतियों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने आक्रामक तरीक़े से कहा, ‘मैं पक्ष लूंगा, तुम क्या कर सकते हो? ‘मिया’ मुसलमानों को असम पर क़ब्ज़ा नहीं करने देंगे.’

वह असमिया हिंदू समुदाय से आग्रह करते हैं कि वे पहचानें कि उनका ‘असली दुश्मन’ कौन है. राज्य सरकार ने ‘पिछड़े दूरदराज़ के इलाक़ों’ में रहने वाले ‘मूल निवासियों’ को हथियारों के लाइसेंस देने की नीति की घोषणा की है, जिनके बारे में शर्मा का दावा है कि वे ‘असुरक्षित महसूस कर रहे थे’.

जब उनसे पूछा गया कि क्या निवासियों को हथियार देने से राज्य में स्थिति ‘विस्फोटक’ हो सकती है, तो शर्मा ने जवाब दिया, ‘मैं चाहता हूं कि असम में स्थिति विस्फोटक हो.’

शर्मा ने घोषणा की कि नागरिकता की जांच के लिए बनाए गए अर्ध-न्यायिक फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल अब सिर्फ़ मुस्लिम पहचान वाले लोगों के मामलों की सुनवाई करेंगे, जबकि छह अन्य ग़ैर-मुस्लिम धार्मिक पहचान वाले लोगों – हिंदू, बौद्ध, सिख, ईसाई, पारसी और जैन – के ख़िलाफ़ मामले वापस ले लिए जाएंगे. साथ ही गोरखा और राजबोंगशी पहचान वाले लोगों के मामले भी.

उन्होंने घोषणा की कि राज्य में मतदाता सूची के ‘विशेष पुनरीक्षण’ के तहत सिर्फ़ मिया मुसलमानों को नोटिस दिए जा रहे हैं. उदालगिरी में एक रैली में हिमंता बिस्वा शर्मा ने घोषणा की कि जिन्हें उन्होंने ‘हमारे लोग’ कहा, उनसे दस्तावेज़ मांगने की कोई ज़रूरत नहीं है. उन्होंने दावा किया कि दस्तावेज़ उन लोगों से मांगे जाने चाहिए जिन्हें हाल ही में बेदख़ल किया गया था और आरोप लगाया कि बांग्लादेश से लोग रोज़ाना असम में घुस रहे हैं. उन्होंने जनता से आग्रह किया कि वे पहचानें कि असम के असली दुश्मन कौन हैं.

उन्होंने राज्य के लोगों से मिया लोगों को ‘परेशान करते रहने’ का आग्रह किया. ‘पहले लोग डरे हुए थे; अब मैं ख़ुद लोगों को परेशान करते रहने के लिए प्रोत्साहित कर रहा हूं’. ऐसा इसलिए करना चाहिए क्योंकि ‘अगर उन्हें परेशानी होगी, तभी वे असम छोड़ेंगे’. शर्मा दावा करते हैं कि अगर आप उन्हें परेशान नहीं करेंगे, तो ‘आपके अपने घर में लव जिहाद होगा.’

वह ऐसे तरीक़े बताते हैं जिनसे मिया लोगों को परेशान किया जाना चाहिए. शर्मा कहते हैं, ‘रिक्शा का किराया अगर 5 रुपये है, तो उन्हें 4 रुपये दो.‘ उन्हें आधी रात को फ़ोन करो. ‘जब उन्हें परेशानी होगी, तभी वे असम छोड़ेंगे.’

ये किसी सरकार के मुखिया, जो कभी-कभी दिमाग़ी तौर पर अस्थिर जान पड़ता है, की बेतरतीब, अचानक, अनियंत्रित बयानबाज़ी नहीं हैं. मुख्यमंत्री के तौर पर अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान शर्मा के बयानों का यही अंदाज़ रहा है.

(फोटो साभार: फेसबुक)

वह मिया लोगों पर अजीबोग़रीब साज़िशों या भिन्न प्रकार के जिहाद का आरोप लगाते हैं. मैं यहां इनमें से कुछ का उल्लेख कर रहा हूं:

डेमोग्राफ़िक आक्रमण

शर्मा का सबसे ज़्यादा दोहराया जाने वाला दावा यह है कि मिया लोग पड़ोसी बांग्लादेश से आए अवैध ‘घुसपैठिए’ हैं, जो असम पर एक ख़तरनाक ‘डेमोग्राफ़िक आक्रमण’ कर रहे हैं.

वह जानबूझकर इस ऐतिहासिक सच्चाई को छिपाते हैं कि असम में ज़्यादातर मिया लोग उन लोगों के वंशज हैं जो क़ानूनी तौर पर पूर्वी बंगाल से, ख़ासकर 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में, पलायन करके आए थे. यह पाकिस्तान के भारत से अलग होने और बांग्लादेश के पाकिस्तान से अलग होने से बहुत पहले की बात है. वे असम तब आए थे जब पूर्वी बंगाल और असम दोनों एक अविभाजित देश का हिस्सा थे.

ग़रीब, ज़मीन के भूखे, मेहनती और परिश्रमी पूर्वी बंगाल के मज़दूरों को औपनिवेशिक प्रशासकों और असमिया ज़मींदारों ने उन्हें असम की बंजर ज़मीनों और नदी के द्वीपों में धान की खेती करने के लिए बुलाया था. उनमें से कुछ हिंदू थे. उनमें से कई मुसलमान थे.

इसके बाद ख़ूनी बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष के दौरान विस्थापितों के कई और जत्थे आए.

इन बंगाली मूल के प्रवासियों – मुस्लिम और हिंदू दोनों – ने भारत के बंटवारे के बाद असम की भाषा और संस्कृति को अपना लिया. भाषा आंदोलन के दौरान, उनमें से ज़्यादातर लोगों ने असमिया को अपनी भाषा बताया. उन्हें ना-असमिया (या नव-असमिया) कहा जाता था. वे अपने बच्चों को असमिया-मीडियम स्कूलों में भेजते हैं, और जिन इलाक़ों में ज़्यादातर ना-असमिया लोग रहते हैं, वहां बांग्ला-मीडियम स्कूल नहीं हैं. 1961 के जनगणना कमिश्नर ने असमिया संस्कृति और भाषा के साथ घुलने-मिलने की उनकी ईमानदार इच्छा को रिकॉर्ड किया था.

हालांकि, ज़मीन और संस्कृति दोनों को लेकर होने वाली चिंताओं ने 1970 के दशक के आख़िर में असम आंदोलन को हवा दी. इस जन आंदोलन का निशाना बंगाली मूल के लोग थे, हिंदू और मुस्लिम दोनों. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भाषा और सांस्कृतिक आकांक्षाओं के आंदोलन को एक सांप्रदायिक आंदोलन में बदल दिया, जो ख़ास तौर पर बंगाली मूल के मुसलमानों को हमले का निशाना बना रहा था, न कि बंगाली हिंदुओं को. ख़ास तौर पर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने असमिया संस्कृति तथा ज़मीन की चिंताओं के इस आंदोलन को बंगाली मूल के असमिया मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक खुली जंग में बदल दिया.

यह ध्यान देने वाली बात है कि शर्मा की राजनीतिक परवरिश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माहौल में नहीं हुई थी. 2015 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने से पहले तक वह कांग्रेस के सदस्य थे. वह कांग्रेस के टिकट पर लगातार तीन बार विधायक चुने गए और 2006 से मंत्री के रूप में काम किया. लेकिन भाजपा में शामिल होने के बाद उनका भाषण कई कट्टर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं से भी ज़्यादा आक्रामक और मुस्लिम विरोधी हो गया.

भाजपा में शामिल होने के बाद से उन्होंने जो नया रूप अपनाया है, उसमें वह लगातार नफ़रत फैलाने वाली बातें करते हैं, जिनमें अक्सर अजीबोग़रीब साज़िशों की कहानियां शामिल होती हैं.

शर्मा ने शुक्रवार, 15 अगस्त, 2025 को गुवाहाटी में देश के स्वतंत्रता दिवस समारोह के मंच का इस्तेमाल करते हुए एक आक्रामक चेतावनी दी कि राज्य की मूल पहचान को अवैध घुसपैठ से अब सबसे अधिक ख़तरा है. राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद उन्होंने हर मूल असमिया से दुश्मन के ख़िलाफ़ अपनी ज़मीन, संस्कृति और जीवन शैली की रक्षा के लिए एक साथ खड़े होने का आग्रह किया.

उन्होंने कहा, ‘यह सिर्फ़ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं है, यह हमारे अस्तित्व की लड़ाई है. अगर हम चुप रहे, तो अगले दस सालों में हम अपनी पहचान, अपनी ज़मीन और वह सब कुछ खो देंगे जिसकी वजह से हम असमिया हैं. अगर हमने अभी कार्रवाई नहीं की तो पवित्र कामाख्या मंदिर की पहाड़ियों पर भी अतिक्रमण हो सकता है.’

उन्होंने पिछले 78 सालों में शासन करने वाली सभी सरकारों पर घुसपैठ को नज़रअंदाज़ करने और कई ज़िलों में जनसंख्या बदलाव को जड़ जमाने देने का आरोप लगाया. ‘हमने पहले ही कई ज़िलों में समझौता कर लिया है. एक गर्वित असमिया के तौर पर मैं अब और समझौता करने को तैयार नहीं हूं.’

शर्मा ने अगले 30 सालों के लिए ‘ध्रुवीकरण की राजनीति’ का तरीक़ा बताया. उन्होंने ऐलान किया कि यह ज़रूरी है, ‘अगर हम (ग़ैर-बंगाली मुस्लिम असमिया लोग) जीना चाहते हैं’. ध्रुवीकरण हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नहीं है, बल्कि ‘असमिया और बांग्लादेशियों के बीच’ है. उन्होंने भरोसा दिलाया कि उनकी नीतियां न तो नफ़रत की हैं और न ही सांप्रदायिकता की, बल्कि एक ‘गंभीर और लंबे समय से चली आ रही’ समस्या को पहचानने की हैं जिसके साथ ‘असम दशकों से जी रहा है.’

उन्होंने आगे कहा कि ‘हमारा मक़सद असम की पहचान, सुरक्षा की रक्षा करना है…’ उन्होंने कहा, ‘आप देखेंगे कि हर जगह, हिंदुओं की आबादी की वृद्धि दर में कमी हो रही है और असम के हर ब्लॉक में मुस्लिम आबादी बढ़ रही है.’ पीटीआई  ने उनको उद्धृत करते हुए लिखा, ‘एक तरह से, असम के लोगों के सरेंडर का एक अध्याय शुरू हो गया है.’

शर्मा ने दावा किया कि अब असम की आबादी में मिया लोगों की हिस्सेदारी 40% है. चूंकि 2011 के बाद से कोई जनगणना नहीं हुई है, इसलिए उन्होंने अपने आंकड़े का सोर्स नहीं बताया.

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि मुस्लिम बांग्लादेशी जानबूझकर बड़ी संख्या में असम में आ रहे हैं ताकि राज्य की आबादी में अपनी हिस्सेदारी 50 और फिर 60% तक बढ़ा सकें. फिर, उन्होंने डराते हुए कहा, वे असम को बांग्लादेश में मिलाने की मांग करेंगे. उन्होंने आरोप लगाया कि बांग्लादेश ‘अक्सर कहता है कि नॉर्थ-ईस्ट को काटकर बांग्लादेश में मिला देना चाहिए. उन्हें युद्ध लड़ने की ज़रूरत नहीं है. एक बार जब उनकी आबादी (बंगाली मूल के मुसलमानों की) 50 प्रतिशत से ज़्यादा हो जाएगी, तो यह (असम) अपने आप उनके पास चला जाएगा.’

उन्होंने भाजपा की राज्य कार्यकारिणी की बैठक में इस स्थिति के बारे में और विस्तार से बताया. उन्होंने चेतावनी दी कि अपनी ज़िंदगी में ही असम के लोग एक के बाद एक गांवों और क़स्बों पर ‘क़ब्ज़ा’ होते देखेंगे. ज़्यादा मुस्लिम आबादी वाले ज़िलों का नाम लेते हुए उन्होंने दावा किया कि इन इलाक़ों में असम के लोग मुश्किल ज़िंदगी जी रहे हैं और उन्हें ‘दूसरे दर्जे का नागरिक’ बनाया जा रहा है.

उन्होंने असम और भारत की पवित्र भूमि में ‘सनातन’ को बचाने का आह्वान किया. मुसलमानों के बारे में कहा कि वे अलगाववाद में विश्वास करते हैं और धर्म को देश से ऊपर रखते हैं. उन्होंने राजनीतिक विरोधियों के बारे में कहा कि वे ऐसे लोग हैं जो चुनाव जीतने के बाद घुसपैठियों की ‘तेल मालिश’ करने के अलावा कुछ नहीं करते.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

उन्होंने 2024 में झारखंड में अपने चुनाव अभियान में मुसलमानों द्वारा इसी कथित डेमोग्राफ़िक साज़िश की बात की. झारखंड के रामगढ़ ज़िले के एक निर्वाचन क्षेत्र में एक जनसभा में शर्मा ने कहा, ‘असम में 40 साल पहले बांग्लादेश से घुसपैठ शुरू हुई थी. उस समय कांग्रेस सत्ता में थी. वे समझ नहीं पाए कि 40 साल बाद क्या होगा. अब असम में घुसपैठियों की संख्या 1.25 करोड़ हो गई है. यह एक बहुत बड़ी समस्या बन गई है और असम के लोग अपनी पहचान खो चुके हैं. इसीलिए मैं झारखंड आ रहा हूं और कह रहा हूं कि हमारे जैसी ग़लतियां न करें. हमने 40 साल पहले ग़लती की थी, हमने अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं की. आप रोहिंग्याओं को अंदर न आने दें… बंगाल और असम ने ग़लतियां कीं. उस समय हमें जो करना चाहिए था वह हम नहीं कर पाए. उस समय हमारे पास नरेंद्र मोदी नहीं थे… अब मोदी जी झारखंड के साथ हैं.’

उन्होंने असम से तुलना करते हुए कहा कि यह चुनाव ‘सनातन को बचाने और सुरक्षित रखने’ का चुनाव है. उन्होंने आरोप लगाया कि असम की तरह ही, ‘घुसपैठिए’ बांग्लादेश से बंगाल के रास्ते आए और ग़ैर-भाजपा सरकारों ने उन्हें सुरक्षा दी, और उन्होंने राज्य के सामाजिक ताने-बाने को बदल दिया है.

उन्होंने आरोप लगाया कि ‘घुसपैठियों’ की आमद से, एक ख़ास समुदाय झारखंड की राज्य व्यवस्था और समाज पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश कर रहा है. ‘ये घुसपैठिए हमारी बेटियों से शादी करते हैं, हमारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करते हैं. हमें अपने खाने, बेटियों और ज़मीन के लिए लड़ना होगा.’

एक और रैली में उन्होंने पूछा, ‘अगर ‘घुसपैठिए’ आते रहे, तो 20 साल बाद झारखंड आदिवासियों का होगा या हिंदुओं का? इन घुसपैठियों की पहले से ही अपने घर पर दो शादियां हो चुकी हैं और वे आकर आदिवासी बेटियों को धोखा देकर शादी करते हैं ताकि ज़मीन छीन सकें; अगर भाजपा सत्ता में आती है, तो हम सभी घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें क़ानूनी तरीक़ों से बाहर निकालेंगे.’

झारखंड में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि इस कथित डेमोग्राफ़िक साज़िश से लड़ना ‘मेरे लिए कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि ज़िंदगी और मौत का सवाल है.’ 

‘लैंड जिहाद’

इससे पहले, अगस्त 2024 में गुवाहाटी में भाजपा की राज्य कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने कहा, ‘एक-एक करके, एक ‘ख़ास समुदाय’ के लोगों ने मूल निवासियों से ज़मीन छीन ली और हमें हमारी ही ज़मीन पर अल्पसंख्यक बना दिया. राज्य सरकार ने फ़ैसला किया है कि हम पुराने गोआलपारा ज़िले में उस ‘ख़ास समुदाय’ के लोगों को ज़मीन बेचने पर रोक लगाने वाला क़ानून लाएंगे.’

उन्होंने आगे कहा कि उन लोगों ने ‘ख़ास समुदाय’ से चंडीगढ़ शहर के बराबर ज़मीन ख़ाली करवाई है, लेकिन अब भी, ‘ख़ास समुदाय’ ने 20 चंडीगढ़ के बराबर ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर रखा है. वह यह भी कहते हैं कि असम सरकार ने फ़ैसला किया था कि कोई मुस्लिम किसी हिंदू से या कोई हिंदू किसी मुस्लिम से मुख्यमंत्री की सहमति के बिना ज़मीन नहीं ख़रीद सकता.

शर्मा ने कहा कि सरकार ने देखा कि हिंदुओं द्वारा मुसलमानों को ज़मीन बेचने के बहुत ज़्यादा मामले थे, जबकि इसका उल्टा कम होता था. इसी वजह से, अगस्त 2024 में, असम कैबिनेट ने एक प्रस्ताव को मंज़ूरी दी जिसके तहत सरकार अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच सभी ज़मीन ट्रांसफ़र की जांच करेगी.

शर्मा ने कहा कि असमिया और मूल निवासी मुसलमानों को ज़मीन ट्रांसफ़र के लिए कई अनुमतियां दी गईं, जिन पर सरकार को कोई आपत्ति नहीं थी. हालांकि, उन्होंने दावा किया कि राज्य की आबादी में ही नहीं, बल्कि संपत्ति बनाने के मामले में भी काफ़ी बदलाव आया है. उन्होंने पीटीआई से कहा, ‘अब तक, हम सोच रहे थे कि सिर्फ़ संख्या बढ़ी है, लेकिन अब देखिए कि संपत्ति का पैटर्न भी बदल गया है.’

शर्मा ने 2015 में स्वतंत्रता दिवस के सरकारी समारोहों का इस्तेमाल करते हुए असम के लोगों को यह चेतावनी दी कि राज्य कई तरह के ‘जिहाद’ का सामना कर रहा है – प्यार से लेकर ज़मीन तक – उनके दावे के अनुसार जिनका मक़सद स्थानीय लोगों के नियंत्रण को कमज़ोर करना था. उन्होंने (ग़ैर-बंगाली मुस्लिम) नागरिकों से कहा कि वे कथित लैंड जिहाद से असम के भविष्य की रक्षा करने की व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी लें: ‘अज्ञात ख़रीदारों को ज़मीन का छोटा-सा टुकड़ा भी न बेचें.’

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार भूमिहीन स्थानीय परिवारों को ज़मीन के अधिकार देने पर काम कर रही है ताकि राज्य में उनकी क़ानूनी और आर्थिक हिस्सेदारी मज़बूत हो सके.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

‘लव जिहाद’

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा यह दावा करते हुए ‘लव जिहाद’ की मनगढ़ंत मुस्लिम विरोधी साज़िश की थ्योरी को भी बढ़ावा देते हैं कि उनकी महिलाओं को ‘लव जिहाद’ के ज़रिए उनके घरों से ले जाया जा रहा है. उनका आरोप है कि जब हिंदू पुरुष हिंदू लड़कियों से रोमांस करते हैं, तो वह प्यार होता है. लेकिन जब मुस्लिम पुरुष हिंदू लड़कियों से रोमांस करते हैं, तो वह प्यार नहीं होता. रोमांस की आड़ में एक ख़तरनाक साज़िश होती है.

उन्होंने एक क़ानून लाने की योजनाओं की घोषणा की जिसके तहत ‘लव जिहाद’ में कथित तौर पर शामिल किसी भी व्यक्ति को, उसके माता-पिता के साथ गिरफ़्तार किया जाएगा.

अगस्त 2024 में भाजपा कार्यकारिणी की एक बैठक में उन्होंने कहा, ‘हमने चुनावों के दौरान लव जिहाद की बात की थी. कुछ ही दिनों में हम एक नया क़ानून लाएंगे जिसके तहत लव जिहाद के अपराध का दोषी पाए जाने पर आजीवन कारावास का दंड दिया जाएगा.’

कथित लव जिहाद के खिलाफ हुआ एक प्रदर्शन. (फाइल फोटो: पीटीआई)

‘फ़र्टिलाइज़र जिहाद’

मुख्यमंत्री ने मिया समुदाय पर अपने मछली उत्पादन के ज़रिए ‘केमिकल और बायोलॉजिकल हमला’ करने का आरोप लगाया, जिससे किडनी और लिवर की बीमारियों में ‘बढ़ौतरी’ हुई है.

इसके लिए उन्होंने ‘फ़र्टिलाइज़र जिहाद’ शब्द गढ़ा. गुवाहाटी में प्राकृतिक खेती के संवर्धन तथा क्रियान्वयन के एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने कहा, ‘हमने अपने चुनाव अभियान के दौरान ‘फ़र्टिलाइज़र जिहाद’ के ख़िलाफ़ लड़ने का अपना संकल्प किया था. हमें खाद का इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन इसका ज़्यादा इस्तेमाल शरीर को नुक़सान पहुंचा सकता है.’ राजनीतिक विरोधियों ने कहा कि हानिकारक और ज़्यादा खाद के इस्तेमाल को रोकना पूरी तरह से सरकार की ज़िम्मेदारी है, लेकिन सिर्फ़ एक समुदाय पर ज़्यादा खाद इस्तेमाल करने का आरोप लगाने का कोई आधार नहीं है.

उन्होंने सुझाव दिया कि असम के उपभोक्ताओं को ऊपरी असम (जहां मिया समुदाय के लोग कम हैं) में पैदा हुई मछली ख़रीदनी चाहिए, जहां ऑर्गेनिक तरीक़ों को बढ़ावा दिया जाता है (और जहां मछुआरे मुस्लिम नहीं हैं).

शर्मा ने लोगों से ‘मिया मुस्लिम’ मछली उत्पादकों द्वारा पैदा की गई मछली न ख़रीदने की अपील की. ​​उन्होंने कहा कि इसका कारण यह है कि वे मछली पैदा करने के लिए यूरिया खाद का इस्तेमाल करते हैं. उन्होंने दावा किया कि इससे किडनी की बीमारियां होती हैं.

राज्य के मुख्यमंत्री होने के नाते वे ऐसे काम करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकते हैं. मगर वे कार्रवाई न कर के खुले तौर पर मुस्लिम समुदाय के बहिष्कार की बात कर रहे हैं. मछली असम के खाने का एक ज़रूरी हिस्सा है. नगांव, मोरीगांव और कछार में इसका सर्वाधिक उत्पादन होता है, ये ऐसे इलाक़े हैं जहां मछली पालन उद्योग में मुस्लिम व्यापारियों की अहम भूमिका है.

दरांग जिले के खारूपेटिया इलाक़े के एक किसान अमजद अली ने उनके आरोप पर कड़ी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा, ‘हमारे समुदाय के लोग वही सब्ज़ियां (और मछली) खाते हैं जो हम उगाते और बेचते हैं. ‘फ़र्टिलाइज़र जिहाद’ से उनका क्या मतलब है?’

‘बाढ़ जिहाद’

फ़र्टिलाइज़र जिहाद का अजीब दावा काफ़ी नहीं था कि शर्मा ने एक अजीब दावा कर दिया. अगस्त 2024 के मानसून के दौरान गुवाहाटी शहर में भारी बाढ़ आई. इससे व्यापक रूप से राज्य की नीतियों की आलोचना हुई. बड़े पैमाने पर हो रही सार्वजनिक आलोचना का जवाब देते हुए शर्मा ने दावा किया कि यह भी ‘बाढ़ जिहाद’ का नतीजा था.

उन्होंने एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी पर इस जिहाद को छेड़ने का आरोप लगाया, जिसके मालिक और चांसलर महबूबुल हक असम के करीमगंज ज़िले के बंगाली मूल के मुस्लिम हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी मेघालय (यूएसटीएम), मेघालय के री-भोई ज़िले में एक पहाड़ी ढलान पर स्थित है जिसकी ढलान गुवाहाटी की तरफ़ है.

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेघालय. (फोटो साभार: एक्स/ @ustm_A)

शर्मा ने दावा किया कि यूनिवर्सिटी ने मेडिकल कॉलेज बनाने के लिए ढलान पर लगे पेड़ काट दिए और इसी वजह से गुवाहाटी में बाढ़ आई. उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है कि यूएसटीएम के मालिक ने जिहाद शुरू कर दिया है. हम लैंड जिहाद की बात करते हैं, उन्होंने असम के ख़िलाफ़ बाढ़ जिहाद शुरू कर दिया है. नहीं तो, कोई भी इस तरह बेरहमी से पहाड़ियों को नहीं काट सकता.’

उन्होंने समझाया, ‘जो कोई भी प्रकृति से प्यार करता है, ख़ासकर कोई शिक्षण संस्थान, वह इस तरह से उन्हें नष्ट नहीं कर सकता. मुझे इसे जिहाद कहना होगा… मुझे विश्वास है कि यह जानबूझकर किया गया है. नहीं तो, वे किसी आर्किटेक्ट को बुलाकर पहाड़ियों और पेड़ों को बचाते हुए भी बिल्डिंग बना सकते थे. वे ड्रेनेज बना सकते थे… उन्होंने किसी आर्किटेक्ट से मदद नहीं ली. सिर्फ़ बुलडोजर का इस्तेमाल करके बेरहमी से ज़मीन खोद दी है.’

यूनिवर्सिटी को 2021 में एक्रेडिटेशन के पहले साइकिल में एनएएसी का ‘A’ ग्रेड एक्रेडिटेशन मिला था. उस समय इस यूनिवर्सिटी में 6000 छात्र थे. शर्मा ने स्टाफ़ और छात्रों से यूनिवर्सिटी का बॉयकॉट करने की अपील की, और इसे बाढ़ जिहाद का ‘एकमात्र समाधान’ बताया.

उन्होंने यूनिवर्सिटी की मान्यता रद्द कर दी. इन सबके बावजूद यूएसटीएम को शिक्षा मंत्रालय द्वारा घोषित नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ़्रेमवर्क 2024 में टॉप 200 यूनिवर्सिटी में शामिल किया गया. यह नॉर्थईस्ट की एकमात्र प्राइवेट यूनिवर्सिटी है जो इस लिस्ट में शामिल हुई है.

हिंदुओं के ख़िलाफ़ ‘बीफ़’ को हथियार बनाना

शर्मा ने दावा किया कि मुसलमान जानबूझकर बीफ़ का कचरा और बचा हुआ बीफ़ इधर-उधर फेंक रहे हैं, जिसका मक़सद उसी इलाक़े में रहने वाले हिंदुओं को भगाना है.

उन्होंने आरोप लगाया कि यह मुसलमानों द्वारा अपनाई गई एक नई रणनीति है. ‘पहले, अगर कुछ मुस्लिम परिवार हिंदू मोहल्ले में रहते थे, तो वे इस बात का ध्यान रखते थे कि हिंदुओं के लिए कोई समस्या पैदा न हो. अगर उन्हें बीफ़ खाना होता था, तो वे मुस्लिम-बहुल इलाक़ों में रहने वाले अपने लोगों के पास जाते थे.’

उन्होंने आगे कहा, ‘लेकिन अब ऐसा हो गया है कि वे बचा हुआ खाना और कचरा इधर-उधर फेंक देते हैं ताकि पड़ोस में रहने वाले हिंदुओं को आख़िरकार वह जगह छोड़नी पड़े.’

इस तरह, उन्होंने दावा किया कि राज्य में हिंदुओं के ख़िलाफ़ बीफ़ को ‘हथियार’ के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है.

‘वोट जिहाद’

शर्मा ने एक और जिहाद का आरोप लगाया, जिसे उन्होंने ‘वोट जिहाद’ कहा. उनका कहना है कि हिंदू समुदाय के वोट भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों सहित कई पार्टियों में बंटे हुए हैं.

उन्होंने दावा किया कि मुसलमान अलग तरह से और सांप्रदायिक आधार पर वोट देते हैं. मुस्लिम मतदाताओं द्वारा डाले गए कुल वोट में से 90% वोट समुदाय में पहले से हुई चर्चाओं के आधार पर डाला जाता है, जो व्यक्तिगत पसंद के बजाय एक सामूहिक फ़ैसले को दर्शाता है. इसी को वह ‘वोट जिहाद’ कहते हैं.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

उन्होंने दावा किया, ‘अगर हम कांग्रेस के 39 प्रतिशत वोटों का विश्लेषण करें, तो यह पूरे राज्य में फैला हुआ नहीं है. इसका पचास प्रतिशत 21 विधानसभा क्षेत्रों में केंद्रित है जो अल्पसंख्यक बहुल हैं. इन अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में भाजपा को 3 प्रतिशत वोट मिले.’

शर्मा ने कहा, ‘यह साबित करता है कि हिंदू सांप्रदायिकता में शामिल नहीं होते हैं. अगर असम में कोई सांप्रदायिकता में शामिल होता है, तो वह सिर्फ़ एक समुदाय, एक धर्म है. कोई और धर्म ऐसा नहीं करता है.’ 

धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथाओं को कलंकित करना

मैंने बताया कि कैसे शर्मा ने एक मनगढ़ंत दावा किया कि एक बंगाली मूल के मुस्लिम की मशहूर प्राइवेट यूनिवर्सिटी ने ‘बाढ़ जिहाद’ छेड़ा है. लेकिन वह यहीं नहीं रुके. उन्होंने यूनिवर्सिटी पर अपने हमले को और तेज़ कर दिया. यूनिवर्सिटी के बड़े मेन गेट को निशाना बनाया जिस पर तीन गुंबद हैं.

उन्होंने ऐलान किया, ‘वहां जाना शर्म की बात है, आपको ‘मक्का’ के नीचे से जाना पड़ता है. हम कह रहे हैं कि वहां एक नामघर (सामुदायिक प्रार्थना हॉल, असम की नव-वैष्णव परंपरा का हिस्सा) भी होना चाहिए. ‘मक्का-मदीना’, चर्च. तीनों बनाओ… हम तीनों के नीचे से गुज़रेंगे, सिर्फ़ एक के नीचे से क्यों गुज़रेंगे.’

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यूनिवर्सिटी जिहादोरबाप (स्लैंग, जिसका मतलब है ‘जिहाद का बाप’) में लगी हुई है. ‘मैं इसे जिहाद कहकर बहुत नर्मी दिखा रहा हूं. यह हमारी शिक्षा प्रणाली को बर्बाद कर रहा है. जो भी हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति पर हमला करता है, उसे जिहाद कहते हैं.’

इस तरह शर्मा अक्सर बंगाली मूल के असमिया मुसलमानों की धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथाओं पर हमला करते हैं, उनका मज़ाक़ उड़ाते हैं और उन्हें कलंकित करते हैं.

मुस्लिम लोगों के प्रति सरकारी दुश्मनी का सार्वजनिक संदेश देने के मक़सद से असम विधानसभा ने शुक्रवार को दो घंटे की जुम्मे की नमाज़ के ब्रेक को ख़त्म करने के लिए वोट किया. यह छुट्टी उनकी धार्मिक प्रथाओं के प्रति सम्मान का प्रतीक थी और यह एक पुरानी परंपरा थी.

झारखंड में एक रैली में शर्मा ने शेखी बघारते हुए कहा, ‘मुल्ला बनाना हमारा काम नहीं है. मैंने एक दिन में 700 मदरसे बंद कर दिए.’

वह कभी-कभी खुलेआम इस्लामी धार्मिक मान्यताओं का मज़ाक़ उड़ाते हैं. उन्होंने असम के कुछ ग्रामीणों से कहा, ‘सूअर पालन करना अच्छा है – यह ऐसी चीज़ है जिसे मियां लोग नहीं चुराएंगे.’ उन्होंने यह दावा करते हुए लोगों से ज़्यादा सूअर पालने का आग्रह किया कि इससे ज़मीन पर क़ब्ज़ा भी रुकेगा.

उन्होंने बांग्ला बोलने वाले मुसलमानों पर बहुविवाह और बाल विवाह जैसी प्रथाओं को जारी रखने का आरोप लगाकर उन्हें बदनाम किया. इसीलिए वे राज्य के ‘मूल निवासी’ होने का दावा नहीं कर सकते. ‘अगर मिया लोग मूल निवासी बनने की कोशिश करते हैं, तो हमें कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन बाल विवाह बंद करना होगा, बहुविवाह बंद करना होगा, उन्हें लड़कियों को स्कूल भेजना होगा. मूल निवासियों की एक परंपरा होती है.’

‘असम के लोगों की एक परंपरा है. असम के लोग लड़कियों को शक्ति के बराबर मानते हैं, वे लड़कियों से प्यार करते हैं… मूल निवासी बनने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मूल निवासी बनने के लिए आप दो-तीन लोगों से शादी नहीं कर सकते. यह असम के लोगों की परंपरा नहीं है. अगर वे मूल निवासी बनना चाहते हैं, तो वे 11-12 साल की उम्र में लड़कियों की शादी नहीं कर सकते. अगर वे मूल निवासी बनना चाहते हैं, तो बच्चों को मदरसों में पढ़ाने के बजाय उन्हें डॉक्टर और इंजीनियर बनने के लिए पढ़ाएं.’

एएनआई ने शर्मा के हवाले से रिपोर्ट किया, ‘बांग्लादेश से लोग असम आते हैं और हमारी सभ्यता तथा संस्कृति के लिए ख़तरा पैदा करते हैं. मैंने 600 मदरसे बंद कर दिए हैं और मेरा इरादा सभी मदरसों को बंद करने का है क्योंकि हम मदरसे नहीं चाहते. हम स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी चाहते हैं.’ वह कर्नाटक के बेलगावी के शिवाजी महाराज गार्डन में एक चुनावी रैली को संबोधित कर रहे थे.

दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए शर्मा ने कहा कि मदरसों का अस्तित्व ख़त्म हो जाना चाहिए. ‘मदरसा’ शब्द ग़ायब हो जाना चाहिए. क़ुरान घर पर पढ़ाएं, लेकिन बच्चों को स्कूल में विज्ञान और गणित पढ़ाया जाना चाहिए.’

उन्होंने जानबूझकर इस सच्चाई को फिर से छिपाया कि देश के अधिकांश मदरसे धार्मिक शिक्षा के अलावा धर्मनिरपेक्ष विषय भी पढ़ाते हैं.

पाञ्चजन्य’ और ‘ऑर्गेनाइजर’ के मीडिया सम्मेलन में हिमंता बिस्वा शर्मा. (फोटो साभार: panchjanya.com)

नफ़रत, बहिष्कार और मताधिकार छीनने का राज

मुख्यमंत्री कभी भी ऐसी बातें करना बंद नहीं करते जिससे यह लगे कि ग़ैर-बंगाली, ग़ैर-मुस्लिम असमिया लोग ज़िंदा रहने के लिए एक निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं. राज्य विधानसभा में उन्होंने घोषणा की कि वह ‘मिया मुसलमानों को पूरे असम पर क़ब्ज़ा नहीं करने देंगे’.

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, शर्मा ने गुवाहाटी में पत्रकारों से कहा कि उन्होंने भाजपा के सदस्यों को राज्य में चल रहे वोटर लिस्ट रिवीज़न के दौरान ‘मिया’ वोटरों के ख़िलाफ़ शिकायतें दर्ज करने का निर्देश दिया है.

उन्होंने चुनौती भरे अंदाज़ में कहा, ‘इसमें छिपाने जैसा कुछ नहीं है. मैंने मीटिंग्स की हैं, मैंने वीडियो कॉन्फ़्रेंस की हैं, और मैंने लोगों से कहा है कि जहां भी संभव हो, वे फॉर्म 7 भरें.’ चुनाव आयोग का फॉर्म 7 एक ऐसा दस्तावेज़ है जो किसी वोटर का नाम राज्य के वोटर लिस्ट से हटाने के लिए भरा जाता है. इससे मिया लोग लगातार दबाव में रहेंगे. उन्हें ऐसा इसलिए करना चाहिए ‘ताकि उन्हें (मिया लोगों को) थोड़ा भागदौड़ करनी पड़े, परेशानी हो, ताकि वे समझें कि असमिया लोग अभी भी ज़िंदा हैं.’

वह बार-बार बंगाली मूल के मुसलमानों को असमिया लोगों से अलग करते हैं. वह कहते हैं, वे असमिया नहीं हैं. वे बांग्लादेशी हैं. और उन्हें असम में नहीं बल्कि बांग्लादेश में वोट देना चाहिए. वह ऐलान करते हैं, ‘हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि वे असम में वोट न दे सकें.’

उन्होंने घोषणा की कि राज्य में विशेष मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान ‘चार से पांच लाख मिया वोटर्स’ को वोटर लिस्ट से हटा दिया जाएगा. उन्हें इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा कि यह साफ़ तौर पर एक ग़ैर-क़ानूनी दावा था, क्योंकि सिर्फ़ चुनाव आयोग ही लोगों को वोटर लिस्ट में जोड़ने या हटाने के लिए अधिकृत है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान को खुलेआम चुनौती देते हुए वह अक्सर यह भी कहते हैं, ‘भारत हिंदुओं का है और हमेशा रहेगा…’ 2025 में दिल्ली राज्य चुनावों में प्रचार करते हुए शर्मा ने कहा, ‘राम मंदिर बनने के बाद, लोगों ने हिंदुओं की ताक़त को समझना शुरू कर दिया है. हिंदुओं ने इस देश को जन्म दिया है और हिंदुओं ने ही इसे विकसित किया है. हम हिंदू थे, हम हिंदू हैं और हम हिंदू ही रहेंगे. भारत एक हिंदू राष्ट्र है; यह एक हिंदू सभ्यता है. हिंदुओं को दूसरे नंबर पर नहीं रखा जा सकता. हिंदुओं ने इस देश को बनाया और संवारा है, और वे इसे विश्वगुरु बनाएंगे; मदरसे के छात्रों को डॉक्टर और इंजीनियर बनना चाहिए, मुल्ला क्यों बनें? असम में, मैंने मुल्ला बनाने वाली दुकानें बंद कर दी हैं.’

मुख्यमंत्री ने एक चुनावी भाषण में कहा कि उनका मानना ​​है कि देश भर में कई ‘बाबर’ छिपे हुए हैं और उन्होंने ख़ास तौर पर असम, बंगाल, हरियाणा के नूंह और उत्तर प्रदेश का ज़िक्र किया. उन्होंने दावा किया कि इन लोगों को बाहर निकालने के बाद देश सुरक्षित और विकसित होगा.

उन्होंने असम में मदरसों को बंद करने के बारे में भी बार-बार शेखी बघारी, और कहा कि उनका लक्ष्य बाक़ी सभी मदरसों को बंद करना है. उन्होंने वक़्फ़ बोर्ड पर मोदी की कार्रवाई से नाराज़ लोगों से भी अपनी नाराज़गी को क़ाबू में रखने को कहा, और कहा कि अभी और भी बहुत कुछ होने वाला है.

‘मुझे नहीं पता कि हम राजनीतिक रूप से ख़ुद को कितना बचा पाएंगे, लेकिन अगर हमारा समाज एकजुट है, अगर हम अपनी संस्थाओं की ज़िम्मेदारी लेते हैं और अगर हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को दो महापुरुषों के आदर्शों के साथ ज़िंदा रखते हैं, तो शायद हम असमिया के रूप में जी पाएंगे’. आज मिया लोग ‘बस किसी चीज़ से डरे हुए हैं. जिस दिन वह डर समाप्त होगा, हम असम के ऊपरी ज़िलों को छोड़कर पूरे असम में बांग्लादेश (हाल ही में हिंदू पुरुषों की लिंचिंग की ओर इशारा है) जैसा नज़ारा देखेंगे. और यही हमारे जीवन की असली सच्चाई है’.

न्यूयॉर्क के बार्ड कॉलेज में पॉलिटिकल स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर एमेरिटस संजीव बरुआ इस बातचीत और सार्वजनिक कार्रवाई को एक ‘चिंताजनक ट्रेंड’ बताते हैं. वह कहते हैं कि बंगाली मुसलमानों ‘की बड़ी आबादी राज्य के कंस्ट्रक्शन जैसे सेक्टर में मज़दूर के रूप में काम करते’ हैं, और वे काम की तलाश में राज्य के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाते हैं.

वह कहते हैं, ‘अब ग़ैर-क़ानूनी होने को एक ख़ास जातीय समुदाय से जोड़ा जा रहा है. यह अब किसी व्यक्ति की वास्तविक नागरिकता की स्थिति का मामला नहीं रहा.’

शर्मा असम के लोगों से ‘इज़रायल से सीखने’ की अपील करते हैं. वह कहते हैं कि मिडिल ईस्ट में वह देश मुस्लिम कट्टरपंथियों से घिरा हुआ है. ईरान और इराक़ जैसे पड़ोसी देशों के बावजूद, कम आबादी होते हुए इज़रायल ने साइंस, टेक्नोलॉजी के बल पर और मेहनत से एक मज़बूत समाज बनाया है.

उन्होंने बंगाली मूल के मुस्लिम लोगों से बस्तियां और खेत छीनकर उन्हें ‘स्थानीय असमिया’ लोगों को सौंपने की योजनाओं के बारे में बात की. इस तरह, वह साफ़ तौर पर मानते हैं कि उनकी सरकार द्वारा बंगाली मूल के असमिया मुसलमानों को उनके खेतों और घरों से बड़े पैमाने पर हटाने की सोच फ़िलिस्तीन में इज़रायली बस्तियों के मॉडल से प्रेरित है.

शर्मा सांप्रदायिक भाईचारे और धार्मिक सद्भाव की अपीलों को साफ़ तौर पर ख़ारिज करते हैं, और उन्हें ‘सभ्यता की लड़ाई में समुदाय को कमज़ोर करने की साज़िश’ बताते हैं. मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा लगातार नफ़रत भरी बातों से बंगाली मूल के मुस्लिम असमिया लोगों का मनोबल टूटता है तथा उनके भीतर असुरक्षा की भावना पैदा होती है और इससे उनके मन-मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है.

(लेखक पूर्व आईएएस अधिकारी और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.)

(विस्तृत शोध सहयोग के लिए ओमैर ख़ान का आभार हूं. मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों कीकोलिकानामक संस्था से जुड़े हैं.)