नई दिल्ली: जिस अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर सौदे को लेकर भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी वर्षों तक कांग्रेस पर हमलावर रहे, वही कंपनी अब नए नाम लियोनार्डो (Leonardo) के साथ अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस की साझेदार बनकर भारत के रक्षा क्षेत्र में दोबारा एंट्री कर चुकी है.
भारत में वीवीआईपी हेलीकॉप्टर डील घोटाले की वजह से लंबे समय प्रतिबंधित रही इटली की रक्षा कंपनी लियोनार्डो (पहले अगस्ता वेस्टलैंड) और अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ने भारत में एकीकृत हेलीकॉप्टर निर्माण इकोसिस्टम स्थापित करने के लिए समझौता ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग – एमओयू) पर हस्ताक्षर किया है.
भारत-यूरोपीय संघ के बीच व्यापार और रक्षा समझौते की घोषणा के ठीक बाद मंगलवार (3 फरवरी) को रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह और रक्षा मंत्रालय के अधिग्रहण विभाग के महानिदेशक ए. अंबरासु की मौजूदगी में दोनों कंपनियों ने एमओयू पर हस्ताक्षर किए.

इस मौके पर रक्षा सचिव ने इसे ‘दो प्रतिष्ठित औद्योगिक इकाइयों का मिलन’ बताते हुए कहा कि रक्षा क्षेत्र में 100 प्रतिशत आत्मनिर्भरता संभव नहीं है और लक्ष्य आयात पर निर्भरता कम करना होना चाहिए.
यह बयान ऐसे समय आया है जब सरकार वर्षों से रक्षा क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भरता’ होने का राजनीतिक दावा करती रही है.
इस प्रस्तावित इकोसिस्टम के ज़रिये भारतीय सशस्त्र बलों और नागरिक क्षेत्र के लिए हेलीकॉप्टर बनाए जाने की बात कही जा रही है. कंपनी के अनुसार इसमें चरणबद्ध स्वदेशीकरण, मेंटेनेंस-रिपेयर-ओवरहॉल सुविधाएं और पायलट प्रशिक्षण शामिल होंगे. लेकिन अब तक सार्वजनिक तौर पर यह साफ़ नहीं किया गया है कि तकनीक हस्तांतरण किस स्तर तक होगा और किन अहम प्रणालियों पर भारत की वास्तविक पकड़ बनेगी.
दिलचस्प है कि दो सप्ताह में यह अडानी डिफेंस का दूसरा सौदा है. 27 जनवरी, 2026 को अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ने ब्राज़ील की एम्ब्राएर के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत भारत की पहली फिक्स्ड-विंग वाणिज्यिक विमान फाइनल असेंबली लाइन स्थापित की जाएगी.
नाम बदला, पहचान वही?
अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर सौदा वर्ष 2010 में यूपीए सरकार के दौरान हुआ था. इसके तहत भारत सरकार ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य शीर्ष संवैधानिक पदाधिकारियों के लिए 12 AW101 हेलीकॉप्टर खरीदने का करार किया था, जिसकी कीमत लगभग 3,600 करोड़ रुपये थी.
2013 में इटली में हुई जांच के बाद आरोप लगे कि कंपनी ने इस सौदे को हासिल करने के लिए भारत में बिचौलियों और अधिकारियों को रिश्वत दी. इसके बाद भारत सरकार ने सौदा रद्द कर दिया, अगस्ता वेस्टलैंड और उसकी मूल कंपनी फिनमैकेनिका को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया और सीबीआई व ईडी से जांच कराई गई.
2014 में कंपनी को भविष्य में भारतीय निविदाओं भाग लेने से बैन कर दिया गया.
2016 में फिनमैकेनिका ने अपना नाम बदलकर लियोनार्डो एस.पी.ए. कर लिया और अगस्ता वेस्टलैंड को अपने हेलीकॉप्टर डिविजन में मिला लिया. साल 2021 में मोदी सरकार ने कुछ शर्तों के साथ भारत सरकार ने लियोनार्डो पर लगा प्रतिबंध हटा दिया, हालांकि केस से जुड़े सभी कानूनी सवाल पूरी तरह समाप्त नहीं हुए.
मार्च 2023 में इस प्रतिबंध को हटाए जाने की आलोचना करते हुए कांग्रेस ने एक सवाल पूछा था, जिसका जवाब अब मिल चुका है.
कांग्रेस का सवाल था- क्या अब हम अडानी समूह को इटली की रक्षा कंपनियों के साथ सौदा करते देखेंगे?

उल्लेखनीय है कि इस प्रेस विज्ञप्ति और प्रतिबंध हटाए जाने से भी कुछ साल पहले अप्रैल 2016 में पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी ने मोदी सरकार पर ब्लैकलिस्ट की गई कंपनी को ‘पिछले दरवाज़े से’ दोबारा एंट्री देने की कोशिश करने का आरोप लगाया था.
एंटनी ने कहा था, ‘प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा सरकार अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर सौदे और उसकी मूल कंपनी फिनमैकेनिका के मामले में झूठ का जाल बुनने की कोशिश कर रही है. मोदी सरकार इस मामले में सच्चाई छिपाने और प्रतिबंधित कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड व उसकी मूल कंपनी को मदद पहुंचाने की साजिश कर रही है.’
बता दें कि एंटनी कथित घोटाले के सामने आने के समय रक्षा मंत्री थे.
2021 में कंपनी पर से प्रतिबंध हटाए जाने के बाद कांग्रेस ने सरकार पर आरोप लगाया था कि प्रतिबंध हटाने और लियोनार्डो को सक्रिय रक्षा साझेदार के रूप में शामिल करने के पीछे कोई सीक्रेट डील हो सकती है. उस समय कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर लिखा था, ‘पहले #Augusta भ्रष्ट था, अब भाजपा लॉन्ड्री में धुलकर साफ़ हो गया!’
मोदी और भाजपा ने तब क्या कहा था?
2013 से 2014 के बीच भाजपा ने अगस्ता वेस्टलैंड सौदे को ‘यूपीए सरकार का बड़ा घोटाला’ बताते हुए कांग्रेस पर तीखा हमला बोला था. उस समय तत्कालीन भाजपा नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी रैलियों में कहा था कि यह सौदा ‘कांग्रेस की भ्रष्टाचार संस्कृति’ का उदाहरण है.
2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार के मामलों में ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ की नीति अपना रही है और अगस्ता वेस्टलैंड जैसे मामलों में दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा.
भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने बार-बार यह सवाल उठाया था कि जब भारतीय कंपनियां हेलीकॉप्टर बना सकती हैं तो विदेशी कंपनियों को क्यों फायदा पहुंचाया गया.
लियोनार्डो और अडानी डिफेंस के बीच हुए डील में क्या है?
भारत में इटली के राजदूत एंटोनियो एनरिको बार्टोली ने लियोनार्डो और अडानी डिफेंस की साझेदारी को रक्षा उद्योग के ‘दो वैश्विक चैंपियनों’ के बीच नए अध्याय की शुरुआत बताया और भारत को इटली का भरोसेमंद साझेदार कहा. उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि भारतीय निवेश इटली में बढ़ेगा.
यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत और यूरोपीय देशों के बीच रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके राजनीतिक और रणनीतिक निहितार्थों पर सार्वजनिक बहस सीमित रही है.
अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस के निदेशक जीत अडानी ने इस गठजोड़ को भारत को ‘वैश्विक एयरोस्पेस पावरहाउस’ बनाने की दिशा में अहम क़दम बताया. कंपनी का दावा है कि इससे उच्च कौशल वाले रोज़गार पैदा होंगे और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूती मिलेगी. हालांकि, रोजगार की वास्तविक संख्या, उनकी प्रकृति और दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर कोई ठोस विवरण साझा नहीं किया गया है.
कंपनी के सीईओ आशीष राजवंशी के अनुसार, अगले दस वर्षों में भारतीय सशस्त्र बलों को 1,000 से अधिक हेलीकॉप्टरों की ज़रूरत होगी. सेना, वायुसेना, नौसेना और तटरक्षक बल के लिए अलग-अलग श्रेणियों-हल्के यूटिलिटी, मीडियम-लिफ्ट, इंटरमीडिएट और समुद्री बहुउद्देश्यीय हेलीकॉप्टरों-की मांग बताई जा रही है. लेकिन यह भी सवाल बना हुआ है कि क्या इन आवश्यकताओं की पूर्ति के नाम पर भारत लंबे समय तक विदेशी तकनीक और निजी कॉरपोरेट साझेदारियों पर निर्भर रहेगा.
लियोनार्डो, जिसे पहले अगस्ता वेस्टलैंड के नाम से जाना जाता था, का भारत में नाम पहले भी विवादों से जुड़ा रहा है. ऐसे में इस नई साझेदारी पर पारदर्शिता, जवाबदेही और संसदीय निगरानी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है.
रक्षा सौदों के इतिहास को देखते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भरता’ के दावों से आगे बढ़कर यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि देश को वास्तव में कितनी तकनीकी संप्रभुता हासिल होगी और किस कीमत पर.
सवाल सिर्फ आत्मनिर्भरता का नहीं, बल्कि पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही का भी है. हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी पहले से हेलीकॉप्टर निर्माण में अनुभव रखती है, इसके बावजूद बड़े रक्षा सौदों में निजी कंपनियों को प्राथमिकता देना नीति और नीयत दोनों पर सवाल खड़े करता है.
