नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (6 फरवरी) को राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर द्वारा स्थापित जन सुराज पार्टी की उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव को चुनौती दी गई थी.
मालूम हो कि जन सुराज ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि सरकार ने वोटरों को लुभाने के लिए कल्याणकारी योजना का गलत इस्तेमाल किया है. पार्टी ने चुनाव के दौरान अवैध प्रक्रियाओं का हवाला देते हुए और नए सिरे से चुनाव कराने की मांग की थी.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, इस संबंध में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने चुनाव हारने के बाद न्यायिक मंच का सहारा लेने की कोशिश करने पर पार्टी को फटकार लगाई.
उल्लेखनीय है कि बिहार में प्रशांत किशोर की पार्टी ने 2025 के चुनावों में 243 विधानसभा सीटों में से 242 पर चुनाव लड़ा था, लेकिन एक भी सीट जीतने में असफल रही थी.
सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा, ‘आपकी पार्टी को कितने वोट मिले? जब जनता नकार देती है, तो आप लोकप्रियता पाने के लिए अदालत का सहारा लेते हैं.’
कोर्ट ने साफ किया कि किसी राजनीतिक दल के कहने पर पूरे राज्य का चुनाव रद्द करने का आदेश नहीं दिया जा सकता. इसके लिए हर उम्मीदवार के खिलाफ भ्रष्टाचार के ठोस और अलग आरोप होने चाहिए.
हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि क्योंकि ये मसला एक राज्य से जुड़ा है इसलिए इस मामले पर फैसला करने के लिए उच्च न्यायालय ही उपयुक्त मंच है.
जन सुराज पार्टी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सीयू सिंह ने कहा कि जिस योजना के तहत मतदाताओं को भुगतान किया गया था, उसकी घोषणा चुनाव से ठीक पहले की गई थी और भुगतान आदर्श आचार संहिता लागू होने के दौरान किए गए थे.
इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, ‘हम मुफ्त सुविधाओं के मुद्दे पर विचार करेंगे. लेकिन हमें सत्यनिष्ठा भी देखनी होगी… हम केवल चुनाव हार चुकी पार्टी के कहने पर ऐसा नहीं कर सकते. सत्ता में आने पर आप भी ठीक यही करेंगे.’
याचिकाकर्ता ने अंततः याचिका वापस ले ली.
गौरतलब है कि प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनाव को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें आचार संहिता लागू होने के दौरान महिलाओं को सीधे 10,000 रुपये हस्तांतरित करने पर सवाल उठाया गया था.
इस याचिका में कहा गया था कि 25 से 35 लाख महिला मतदाताओं को सीधे पैसे दिया जाना चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करता है. इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 112, 202 और 324 का उल्लंघन बताया गया था.
इसके अलावा दोनों चरणों के मतदान के दौरान स्वयं सहायता समूह जीविका से जुड़ी लगभग 1.8 लाख महिला लाभार्थियों की मतदान केंद्रों पर तैनाती को भी अवैध और अनुचित बताया गया था.
