नई दिल्ली: मणिपुर के मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह ने शुक्रवार (6 फरवरी, 2026) को सभी संबंधित पक्षों से शांति बनाए रखने और हिंसा का सहारा न लेने की अपील की. यह अपील उस समय की गई जब राज्य में ‘लोकप्रिय सरकार’ के गठन में समुदाय के विधायकों की भागीदारी को लेकर कुकी-बहुल जिलों में विरोध-प्रदर्शन हुए.
बुधवार (4 फरवरी, 2026) को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले सिंह ने यह अपील इंफाल स्थित मुख्यमंत्री सचिवालय में कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता करने के बाद की, जहां पूर्वोत्तर राज्य में मौजूदा हालात पर चर्चा हुई.
समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार (6 फरवरी) को कुकी-बहुल चूड़ाचांदपुर ज़िले में दो आदिवासी संगठनों द्वारा ‘पूर्ण बंद’ लगाए जाने के बाद सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ, जबकि तीन पहाड़ी ज़िलों में प्रदर्शनकारियों ने राज्य में लोकप्रिय सरकार के गठन में तीन कुकी-जो-हमार विधायकों की भागीदारी के खिलाफ रैली निकाली और आरोप लगाया कि इन विधायकों ने समुदाय के साथ विश्वासघात किया है.
गुरुवार (5 फरवरी, 2026) की शाम, चूड़ाचांदपुर ज़िले में कुकी विधायक नेमचा किपगेन के भाजपा-नेतृत्व वाली सरकार में उपमुख्यमंत्री के रूप में शामिल होने के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के दौरान एक भीड़ की सुरक्षा बलों से झड़प हो गई.
सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में सिंह ने कहा, ‘आज शाम मैंने अपने सचिवालय में माननीय मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की, ताकि मौजूदा स्थिति का जायज़ा लिया जा सके और अशांति को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक निर्णय लिए जा सकें.’
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि किसी भी समुदाय के लिए उम्मीद खोने की कोई गुंजाइश नहीं है. उन्होंने कहा, ‘करुणा हमारा मार्गदर्शक सिद्धांत बनी हुई है, और सभी के लिए बेहतर जीवन की संभावनाएं खतरे में नहीं हैं. मैं सभी से ईमानदारी से अपील करता हूं कि वे शांति बनाए रखें, संविधान और कानून के अनुसार आचरण करें और हिंसा का सहारा न लें.’
चूड़ाचांदपुर ज़िले में किपगेन और दो अन्य विधायकों – एलएम खौते और न्गुरसांगलूर सनाते – के पुतले भी जलाए गए. ये तीनों कुकी-ज़ो और हमार समुदाय से हैं और सत्तारूढ़ भाजपा के विधायक हैं. कांगपोकपी और तेंगनौपाल ज़िलों में भी विरोध रैलियां निकाली गईं.
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, ज़ोमी जनजाति के शीर्ष निकाय ज़ोमी काउंसिल ने सरकार में शामिल हुए तीनों विधायकों को तीन दिनों के भीतर अपने कार्यालय में पेश होने के लिए बुलाया है.
शुक्रवार रात जारी एक बयान में चूड़ाचांदपुर स्थित नागरिक संगठन ने कहा कि विधायकों को इस उम्मीद के साथ चुना गया था कि वे समुदाय के अधिकारों, आवाज़ों और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करेंगे. हालांकि, उनके हाल के कार्यों से जनता में व्यापक निराशा हुई है.
परिषद ने चेतावनी दी कि ‘बातचीत के लिए उसके आह्वान’ का जवाब न देने पर उसे उचित संगठनात्मक उपाय करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिसमें विधायकों के ज़ोमी काउंसिल परिसर में प्रवेश पर रोक लगाना भी शामिल है.
कुकी जो काउंसिल (केजेडसी) ने गुरुवार (5 फरवरी) को कहा था कि इन विधायकों ने 13 जनवरी के लुंगथू प्रस्ताव का उल्लंघन किया है, जिसमें यह तय किया गया था कि समुदाय के सदस्य तभी सरकार गठन में भाग लेंगे, जब केंद्र और राज्य प्राधिकरणों की ओर से लिखित आश्वासन होगा कि विधायिका सहित केंद्र शासित प्रदेश के रूप में एक अलग प्रशासन बनाया जाएगा.
ज्ञात हो कि लगातार जारी जातीय हिंसा को देखते हुए 13 फरवरी 2025 को मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था. इस संघर्ष में अब तक 270 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लोग विस्थापित हुए हैं.
कुकी-जो नागरिक समाज संगठन और सरकार के साथ ‘सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस’ (एसओओ) समझौते में शामिल विद्रोही समूह कुकी-जो क्षेत्रों के लिए विधानसभा सहित एक केंद्र शासित प्रदेश की मांग कर रहे हैं. अलग प्रशासन की मांग सबसे पहले 2023 में कुकी-जो विधायकों ने उठाई थी.
समुदाय के लिए अलग प्रशासनिक इकाई की मांग के बीच केंद्र द्वारा राष्ट्रपति शासन हटाए जाने के बाद बुधवार (4 फरवरी) को भाजपा विधायक युमनाम खेमचंद सिंह ने मणिपुर के 13वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. किपगेन और नगा पीपुल्स फ्रंट के विधायक लोसी दीखो ने मणिपुर के उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.
हमार जनजाति के विधायक एन. सानाते भाजपा-नेतृत्व वाले एनडीए के उस दल का हिस्सा थे, जिसने राज्य में सरकार गठन का दावा पेश करने के लिए इंफाल में राज्यपाल अजय कुमार भल्ला से मुलाकात की थी. एक अन्य कुकी-जो विधायक एलएम खौते भी उस दल में शामिल थे.
मणिपुर कैबिनेट ने हाईकोर्ट के आदेश के बाद पंचायत चुनाव कराने का फैसला किया
नॉर्थईस्ट नाउ के मुताबिक, राज्य कैबिनेट ने मणिपुर हाईकोर्ट के उस आदेश के अनुपालन में – जो राष्ट्रपति शासन के दौरान पारित हुआ था और जिसमें छह महीने के भीतर चुनाव कराने का निर्देश दिया गया था, जल्द से जल्द पंचायत चुनाव कराने का निर्णय लिया है.
यह बैठक राज्य के 13वें मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद के पद संभालने के बाद दूसरी कैबिनेट बैठक थी, जो शुक्रवार दोपहर मुख्यमंत्री सचिवालय में हुई. कुकी नेता और उपमुख्यमंत्री नेमचा किपगेन ने वर्चुअल माध्यम से बैठक में भाग लिया.
मणिपुर हाईकोर्ट ने 29 अगस्त 2025 को राष्ट्रपति शासन के तहत चल रही मणिपुर सरकार को छह महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने का निर्देश दिया था. यह आदेश मुख्य न्यायाधीश केम्पैया सोमशेखर और जस्टिस गुनेश्वर शर्मा की पीठ ने लंबे समय से लंबित स्थानीय निकाय चुनावों की सुनवाई के दौरान दिया था. राज्य में आखिरी बार पंचायत चुनाव 2017 में हुए थे.
मणिपुर में पंचायतों के लिए छठे आम चुनाव जून 2023 में होने थे, लेकिन इस संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति के कारण उन्हें रद्द कर दिया गया था.
कहा जा रहा है कि राज्य कैबिनेट ने इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता और मणिपुर से लोकसभा सदस्य बिमोल आकोइजम द्वारा पूछे गए सवालों के बाद चर्चा की. उन्होंने पंचायत चुनाव कराने में हो रही देरी के कारणों के बारे में पूछा था.
उन्होंने यह भी जानना चाहा था कि क्या सरकार संविधान के तहत स्थानीय स्वशासन के दायित्व को निभाने के लिए समय पर चुनाव कराने के उद्देश्य से कोई कदम उठा रही है. इसके अलावा, उन्होंने यह भी सवाल किया था कि क्या सरकार के पास उन चुनौतियों से निपटने की कोई योजना है, जो समय पर चुनाव कराने में बाधा बन रही हैं.
पंचायती राज के केंद्रीय राज्य मंत्री एसपी सिंह बघेल ने बिमोल आकोइजम के सवाल के जवाब में लोकसभा को बताया कि मणिपुर में पंचायत चुनाव अक्सर प्रशासनिक कारणों, अदालती मामलों, मुकदमेबाज़ी, पंचायतों के परिसीमन और सीटों के आरक्षण जैसे मुद्दों के कारण टलते रहते हैं, जो राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं.
