नई दिल्ली: राज्यसभा सांसद सस्मित पात्रा ने मंगलवार (10 फरवरी) को यह उल्लेख करते हुए कि वैधानिक संस्था प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) का कार्यकाल खत्म हुए एक साल से ज़्यादा हो चुका है और उसके अध्यक्ष ने पद छोड़े हुए भी करीब दो महीने बीत चुके हैं, सरकार से ‘तत्काल कदम’ उठाने की अपील की ताकि ‘स्वतंत्र, निष्पक्ष और जिम्मेदार प्रेस’ के हित में परिषद का कामकाज सुनिश्चित किया जा सके.
ओडिशा से राज्यसभा का प्रतिनिधित्व करने वाले बीजू जनता दल के सदस्य पात्रा ने सदन में कहा कि 14वीं प्रेस काउंसिल का कार्यकाल अक्टूबर 2024 में समाप्त हो गया था और इसकी पिछली अध्यक्ष, सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश रंजना देसाई ने पिछले दिसंबर में पद छोड़ दिया था.
सरकार से इस मामले को गंभीरता से लेने का आग्रह करते हुए पात्रा ने कहा कि नए अध्यक्ष की नियुक्ति पूरी करने और नई परिषद के गठन के लिए ‘तुरंत कदम’ उठाए जाने चाहिए, क्योंकि यह ‘लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा’ और ‘मीडिया की जवाबदेही को मजबूत करने’ के लिए जरूरी है.
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया एक वैधानिक, अर्ध-न्यायिक और स्वायत्त संस्था है, जिसका दोहरा उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करना और ‘अखबारों और समाचार एजेंसियों के मानकों को बनाए रखना और उन्हें बेहतर बनाना’ है.
अध्यक्ष को छोड़कर इसके 28 सदस्य होते हैं. अध्यक्ष की नियुक्ति एक समिति करती है, जिसमें उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष और परिषद के भीतर से चुना गया एक सदस्य शामिल होता है.
दो सदस्य राज्यसभा के सांसद होते हैं जिन्हें उपराष्ट्रपति नामित करते हैं, तीन सदस्य लोकसभा के सांसद होते हैं जिन्हें अध्यक्ष नामित करते हैं और एक-एक सदस्य विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), बार काउंसिल ऑफ इंडिया और साहित्य अकादमी द्वारा नामित किया जाता है.
शेष 20 सदस्यों में से 13 कार्यरत पत्रकार होने चाहिए – जिनमें छह संपादक और सात गैर-संपादक हों – छह सदस्य विभिन्न आकार के अखबारों के मालिकों में से होने चाहिए और एक सदस्य किसी समाचार एजेंसी का प्रबंधक होना चाहिए.
मीडिया उद्योग से जुड़े ये 20 सदस्य विभिन्न ‘संघों/संस्थाओं’ के माध्यम से नामांकन प्रक्रिया के तहत चुने जाते हैं. परिषद के भीतर की एक जांच समिति की मंजूरी के बाद ये संस्थाएं नाम प्रस्तावित करती हैं.
हालांकि 2024 में पिछली परिषद का कार्यकाल खत्म होने के बाद से कुछ नए सदस्यों के नाम अधिसूचित किए गए हैं, लेकिन इस समय कार्यरत पत्रकार श्रेणी से कोई भी सदस्य नहीं है. पीटीआई ने पिछले महीने रिपोर्ट किया था कि अध्यक्ष के बिना परिषद के गठन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती.
पिछले साल अगस्त में सरकार ने संसद में बताया था कि पीसीआई में कार्यरत पत्रकारों के नामांकन की प्रक्रिया दिल्ली हाईकोर्ट में विचाराधीन (सब-ज्यूडिस) है.
पिछले महीने हाईकोर्ट ने अपने पुराने फैसले को बरकरार रखते हुए मुंबई प्रेस क्लब को उन ‘संघों’ में शामिल करने का आदेश दिया जो पीसीआई के लिए नाम भेज सकते हैं, जबकि जांच समिति ने पहले उसे जगह देने से इनकार कर दिया था. हालांकि, पीठ ने एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने जांच समिति के अपने दावे को ठुकराने के फैसले को चुनौती दी थी.
पीठ के हवाले से बताया गया कि जांच समिति ने सितंबर 2024 में एडिटर्स गिल्ड का दावा इस आधार पर खारिज कर दिया था कि उसके द्वारा जमा किए गए कई दस्तावेज नोटराइज्ड नहीं थे, ‘सक्षम प्राधिकारी को मिनट्स सौंपने का कोई प्रमाण’ नहीं दिया गया था, उसके ‘सक्षम प्राधिकारी के प्रमाणपत्र में लगातार कामकाज का उल्लेख नहीं था’ और उसने यह घोषणा भी नहीं दी थी कि उसका दावा ‘वैध है और किसी भी तरह के रुकावटों/विवाद/मुकदमे से मुक्त है.’
पिछले साल जारी एक बयान में मुंबई प्रेस क्लब ने आरोप लगाया था कि पीसीआई की जांच समिति ने उसका और एडिटर्स गिल्ड दोनों का दावा इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि पिछली परिषद में उनके प्रतिनिधि कश्मीर में पत्रकारों की हिरासत और कोविड-19 महामारी के दौरान बड़े पैमाने पर हुई छंटनियों जैसे मुद्दों पर मुखर थे– जो, उसके मुताबिक, ‘शायद कुछ हलकों में पसंद नहीं किया गया.’
