‘मक़बूल फ़िदा हुसैन: जीवनी और विचार‘ का यह अंश चित्रकला को भाषा की तरह समझने की एक साहसिक बौद्धिक कोशिश है. अखिलेश यहां कला, भाषा और बोली के रिश्तों के माध्यम से समकालीन भारतीय चित्रकला की आत्मा को पहचानने का प्रयास करते हैं. स्वामीनाथन, रज़ा, गायतोण्डे और विशेषतः मक़बूल फ़िदा हुसेन के उदाहरणों से वे दिखाते हैं कि सच्ची कलात्मक ‘ज़बान’ स्थानीय अनुभवों से जन्म लेकर वैश्विक अर्थ ग्रहण करती है.
यह पाठ सिर्फ़ हुसेन की जीवनी का हिस्सा नहीं, बल्कि भारतीय आधुनिकता, सांस्कृतिक अस्मिता और अभिव्यक्ति के संकट पर गहन विचार है. कला को समझने के लिए यह प्रस्तावना एक वैचारिक द्वार खोलती है.
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चित्रकला की क्या भाषा है? यदि है तो उसका क्या व्याकरण है? इन प्रश्नों के उत्तर पुस्तकों में नहीं मिलते, आपको कई भाषाएं और उनके निजी व्याकरण दिखायी देते हैं. स्वामीनाथन की चित्र-भाषा हुसेन की भाषा से भिन्न है. पिकासो का व्याकरण पॉल क्ली के व्याकरण से जुदा है. इन चारों चित्रकारों का इस दुनिया को देखने का ढंग अलग है और यह भेद इन्हें अलग-अलग ज़बान देता है. भाषा का एक अर्थ ज़बान भी है.
समकालीन भारतीय कला की भाषा क्या है? इसका व्याकरण और इसका चलन कैसा है? आदि प्रश्नों से जूझने पर इस भाषा का एक रूप हमें दिखलायी देना शुरू होता है और उसका अपनी बोलियों से क्या संबंध है, इसके धुंधले संकेत नज़र आते हैं. इस धुंधलके में इन चमकदार और उजले संकेतों के प्रमाण चौंकाते भी हैं. यहां यह स्पष्ट करना ठीक ही होगा कि भाषा शब्द का अर्थ उस भाषा के प्रचलित अर्थ में नहीं है जिसमें पढ़ा और लिखा जा रहा है. लिखने और पढ़नेवाली भाषा के पाठकों का सीमित होना हम जानते हैं.
पचास करोड़ हिंदीभाषियों के बीच समकालीन सर्वोच्च लेखक निर्मल वर्मा और कृष्ण बलदेव वैद के पाठक पचास हज़ार भी होंगे, इस पर संदेह किया जा सकता है. इस हिंदीभाषी समाज में तमिल स्वामीनाथन, उर्दूभाषी हुसेन, स्पैनिश पिकासो और स्वीस पॉल क्ली की ज़बान प्रचलित है.
भाषा और ज़बान के इस विचित्र फ़र्क़ के सामने भाषा और बोलियों के फ़र्क़ को देखना और उसके साथ के संबंधों के बीच तालमेल देखना, दिखलाना अब और कठिन जान पड़ता है. मोटे तौर पर चित्रकला की भाषा के अर्थ में हम समकालीन चित्रकला की उन प्रवृत्तियों को रख सकते हैं जो शहरी और महानगरीय कला गतिविधियों के केंद्र में है, जिसे हम एक नक़ली धारणा—मुख्यधारा—के रूप में जानते हैं. इस तथाकथित मार्क्सवादी मुख्यधारा का मूल्यांकन, मुठभेड़, मुलाक़ात आदि राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर काम कर रहे आधुनिक चित्रकारों, समालोचकों और कलाप्रेमियों आदि से होती रहती हैं, जबकि बोलियों के रूप में स्थानीय लोगों के आदान-प्रदान के बीच प्रकट हो रही कला की वे प्रवृत्तियां हैं जिन्हें हम आंचलिक, सामुदायिक और आदिवासी कला की तरह वर्गीकृत करते हैं.
मधुबनी, कालीघाट, पटुआ, तंजावुर आदि चित्रशैलियां उन अनेक प्रकटनों में से कुछ हैं. मूलतः चित्रकला में बोलियों का असर दिखायी देता है. हर चित्रकार अपनी बोली का व्याकरण तैयार करने के संघर्ष में मारा जाता है. जिन चित्रकारों को यह सौभाग्य प्राप्त होता है कि वे अपनी बोली की एक ज़बान बना सकें, वे अपनी इस ज़बान से मनुष्य के ‘देखने’ को बदलना प्रस्तावित करते हैं. भारतीय चित्रकला के संदर्भ में मक़बूल फ़िदा हुसेन ने यह काम किया है. उन्होंने समकालीन कला को न सिर्फ़ तत्कालीन ब्रिटिश कला के यथार्थवादी रूमानियतभरे लिजलिजे कीचड़ से बाहर निकाला, बल्कि उसे सार्वकालिक समरूप बनाते हुए, अन्तरराष्ट्रीय पहचान भी दी है.
देश के किसी अन्य कलाकार में इतनी निर्बाध ऊर्जा, दृढ़ता और स्थिरता नज़र नहीं आती. इसका एक कारण सम्भवतः यह भी हो सकता है कि आज़ाद भारत के युवा चित्रकार जिन दिनों इस यथार्थवादी कीचड़ को हटाने के लिए यूरोप की तरफ़ पलायन कर रहे थे, उन दिनों हुसेन हिन्दुस्तान के गांवों में होनेवाली रामलीला की मण्डली के पीछे घूमते हुए, इस देश में राम की सत्ता और राम की सहज उपस्थिति को महसूस कर रहे थे. वे सीख रहे थे इस देश की बोलियों को. समझ रहे थे विविध परम्पराओं को. इस देश में महात्मा गांधी के बाद हुसेन दूसरे ऐसे व्यक्ति हैं जिनके इहलोक का ज्ञान भारतीय संस्कृति और परम्पराओं में रचा-बसा है.
एक अर्थ में हुसेन की ज़बान समकालीन भारतीय चित्रकार की ज़बान है. इस ज़बान का, अपने पूर्ववर्ती और मौजूदा बोलियों से रिश्ता स्पष्ट देखा जा सकता है. हुसेन ने आज़ाद हिन्दुस्तान की कला को एक नया स्वतन्त्र स्वरूप प्रदान किया है. इसका व्याकरण विपुल सांस्कृतिक चेतना को समेटता है.
हुसेन के चित्र भारतीय जनमानस के चित्र हैं. उनमें प्रेम है, विछोह है, छींटाकशी है, अपने होने का विनय है, चकित चौकन्नापन है. वे उकसाती हुई कृतियाँ हैं. आनंद में डूबी मौजूदगी है. मुखर है, मूक है, मुबारक़ है, मक़बूल है. यह सब उन बोलियों से आता है जिनका हुसेन सामना करते रहते हैं.
एक ऐसे समय में जब भाषा स्वयं अपने अभिव्यक्त न हो पाने का गहरा दबाव महसूस कर रही है, जब भाषा पर वैश्विक होने का बाज़ारू दबाव है, उस वक़्त हुसेन के चित्र मनुष्य की आस्था और विश्वास को जिलाए हुए हैं. बाज़ार के तेज़ी से बदल रहे इस समय में यदि हम नज़र डालें तो पाते हैं कि छह अरब लोगों तक पहुंचने के लिए लगभग सभी भाषाएं बेचैन हैं. हिंदी में लिखे गये पाठ का चीनी भाषियों के लिए कोई अर्थ नहीं है जबकि उसे एक अरब लोग वापरते हैं. भाषा के इस कम से कमतर होते जा रहे पाठक के पास पहुंचने के भरोसे को, ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक पहुंचाने के लिए, अनुवाद ही सहारा दिखता है.
इस भागती दुनिया में भाषा को अपने अभिव्यक्त न हो पाने का अहसास उसे अव्यक्त भाषा में बदलता जा रहा है. अभिव्यक्त होने की यह आकांक्षा सतह पर मुखर नज़र नहीं आती बल्कि अन्तश्चेतना में तुतलाती दिखती है. इस आकांक्षा के चलते भाषा में ऐसे शब्दों की भरमार दिखलायी पड़ती है जो उसकी स्थानीय बोलियों से नहीं आ रहे हैं. ये अन्तरराष्ट्रीय शब्द हैं. हिंदी भाषा में पहले और बाद के दो शब्दों का उदाहरण लें तो बीसवीं शताब्दी की शुरुआत के आसपास शामिल हुए शब्दों में ‘पनडुब्बी’ शब्द submarine के गुणों को व्याख्यायित करता हुआ पाठक की कल्पना को उसके बिलकुल नज़दीक ले जाता है बल्कि उसके साथ डुबा देता है. पनडुब्बी शब्द में न पानी है न डूबना, फिर भी उसके अर्थ में पानी में डूबना उतने ही गहरे शामिल है जितने गहरे submarine चल रही है.
दूसरी तरफ़ ‘कम्प्यूटर’ शब्द आपसे एक अर्थहीन शब्द की तरह आ कर टकराता है. इस शब्द से आप कम्प्यूटर के बारे में कुछ भी जान-समझ नहीं सकते. इस शब्द में हिंदी भाषा की कोई स्थानीयता नहीं है, वह एक ठोस पत्थर की तरह भाषा को भीतर से घायल करता हुआ भाषा में भटक रहा है. भाषा का यह बधियाकरण तथाकथित वैश्वीकरण के कारण हुआ है. भाषा को इस वैश्विकी पा लेने की जल्दी वैसी ही है जैसी आज हिंदी सिनेमा में दिखलायी जाती है. इसमें नायक-नायिका समुद्र तट पर एक-दूसरे की तरफ़ से दौड़ते हुए आते हैं और ज़ोर से टकराते हैं. यह ज़ोर से टकराना आपको धीमी गति से दिखलाया जाता है. नायिका भाषा है, जिसे नायक विश्व से, ज़ोर से टकराना है और इस ज़ोर से टकराने पर धीमी गति से कुछ भी जन्म नहीं लेता, फिर भी उत्तेजना है और उसी से काम चल रहा है.
यहां आपके देखने पर भी उन्हें सन्देह है अतः यह ज़ोर से धीमी गति से टकराना आपको तीन बार दिखलाया जाता है.
यहां एक विसंगति ग़ौरतलब है—भाषा को, स्त्रीलिंग को, बधिया किया गया है. हिंदी भाषा का दूसरा बधिया हिंग्रेजी, चूंकि हिंदी एक उदारवादी भाषा है, के नाम पर भी हो रहा है. अख़बारों, पत्रिकाओं, कविताओं और कहानियों में प्रचुर मात्रा में अंग्रेज़ी के शब्द और वाक्य देवनागरी में इस चुनौती के साथ लिखे जा रहे हैं कि यह वाक्य समझने पर दूसरा मुफ़्त.
इस वैश्विक स्थिति के प्रारम्भ में भाषा और उसकी बोलियों पर विचार करना अब और कठिन जान पड़ता है. इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि अन्य सभी कला विधाओं की चर्चा, समालोचना, मीमांसा उसी भाषा में होती है जिसे स्वयं अभिव्यक्ति का संकट घेरे है, जिसके भीतर कई आधुनिक पत्थर पांव पटक रहे हैं. जाने-अनजाने यह संकट अन्य कला माध्यमों का भी बनता जा रहा है. पिछले पचास वर्षों में अन्य कला माध्यमों से यह प्रश्न प्रमुखता से पूछा गया है कि वह क्या सम्प्रेषित करता है?
यह दुखद पहलू है कि जिन भाषाओं ने मनुष्य को अभिव्यक्त करने का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया है, उसने जो प्रकट है, सम्प्रेषित है, संलग्न है, उसे प्रकट, सम्प्रेषित और अभिव्यक्त होने के लिए अश्लील हिंसा का सहारा लिया है. इस प्रश्न का इतना दबाव है कि ग़ुलाम मोहम्मद शेख़ जब भोपाल विधानसभा में अपना चित्र लगाते हैं तब पास ही उसका वर्णन भी ठोकने पर बाध्य होते हैं.
कई चित्रकार इस दबाव को महसूस करते नज़र आते हैं, तभी वे अपने सम्प्रेषित न हो पाने, चुनांचे न जाने किससे पिछड़ जाने की शिकायत करते दीखते हैं. संगीत या चित्रकला पर यह दबाव कि ‘कलाकृति क्या सम्प्रेषित कर रही है’ या ‘यह राग क्या प्रकट कर रहा है’, यह भाषा का दबाव है, और भाषा पर दबाव है स्थानीयता ख़त्म कर वैश्विक समझ पैदा करने का, उपस्थित विश्व को कल्पित विश्व में बदलने का, एक ऐसी अवस्था पैदा करने का जिसमें मनुष्य यदि सम्प्रेषित नहीं कर रहा है तो वह योग्य नहीं है.
यदि वह मानसिक या आध्यात्मिक रूप से वार्तालाप करने में सक्षम है, यह योग्यता नहीं है. सिर्फ़ भाषा में सम्प्रेषण कर पाना चाहिए. भाषा पर दबाव है एक ऐसे मनुष्य को जन्म देने का जो विश्वभर में बोलता हो, अभिव्यक्त होता हो, जिससे कुछ भी छिपा नहीं है, जिसके लिए कोई रहस्य नहीं है. कुछ भी अव्यक्त नहीं है. स्थानीय नहीं है. ज़ोर से दौड़कर आना है और धीमी गति से टकराना है. मानसिक या आध्यात्मिक संवाद नहीं, सिर्फ़ सम्प्रेषित होना है, भले ही यह रास्ता साम्प्रदायिकता से आता हो या साम्यवाद से.
एक योग्य मनुष्य अभिव्यक्त होता है और विडम्बना यह है कि वह सिर्फ़ भाषा में सम्प्रेषण करे. कला के अन्य माध्यम सम्प्रेषित नहीं कर पाते हैं. इसकी सूचना उसे उस भाषा में मिलती है जो स्वयं अभिव्यक्त होने को तरस रही है.
इस वैश्विक उपस्थिति को ललचाता मनुष्य अपनी स्थानीयता के बारे में अकसर ग्लानि से भरा मिलता है. वह भाषा भी उसकी कोई सहायता नहीं करती जिसमें वह सम्प्रेषित कर रहा है. उस भाषा को वैश्विक न हो पाने की ग्लानि है. भाषा पांव पटक रहे पत्थरों से घायल है. भीतरी रक्त-स्राव और बाहरी ज़ोर से धीमी गति से टकराना उसे मजबूर करता है कि वह अपने स्थानीय संबंधों को छुपा, वैश्विकता की सुर्ख़ी लगाये.
दूसरी तरफ़ बोलियों का अपना संसार है. वह अपने भीतर विश्व को समेटे है. उसे अपने सम्प्रेषित न हो पाने का भ्रम नहीं है. उसका सम्प्रेषण सीधा और स्पष्ट है. मधुबनी, पटुआ, तंजावुर आदि अनेक शैलियां अपनी सम्पूर्णता में मौजूद हैं. पिछली कुछ शताब्दियों में भारतीय बोलियों का जिन दो अन्य ज़बानों से सम्बन्ध बना वह फ़ारसी और अंग्रेज़ी रही हैं. जहां एक ओर फ़ारसी से टकराने पर ‘मुग़ल क़लम’ जैसी अद्वितीय भाषा का जन्म हुआ, वहीं दूसरी तरफ़ अंग्रेज़ी से टकराने पर ‘पञ्चांग कला’ पैदा हुई. इस पञ्चांग कला के जनक राजा रवि वर्मा की स्थिति वैसी ही है जैसी स्वयं इस भाषा की है.
अपनी स्थानीयता को जिस तत्कालीन वैश्विक अभिव्यक्ति की कल्पना में, रवि वर्मा ने छोड़ा था यदि वह उन्हें नहीं मिली तो इसका एकमात्र कारण रवि वर्मा की प्रतिभाहीन अवसरवादिता और अदूरदर्शिता है. वे उस स्थानीयता को अपनाने की कोशिश कर रहे थे जो उनकी अपनी नहीं थी. यथार्थवाद के चित्रकारों की नक़ल कर रवि वर्मा किस तरह वहां की स्थानीयता से अपने सम्बन्ध बनाते? लिहाज़ा, वे जिस भाषा को उसकी बोलियों में नहीं जानते थे, उस भाषा के अपने अज्ञान प्रदर्शन में हकलाते हुए नज़र आते हैं.
उनके तमाम चित्र अपनी विषयक आक्रामकता के बावजूद, अभिव्यक्त होने की उत्तेजना में लड़खड़ाते और हकलाते नज़र आते हैं. उनके चित्रों की पौराणिक स्थानीयता भी उनकी अपनी नहीं बल्कि उनके मालिकों की देखी और सोची हुई अश्लीलता है. यह यथार्थवाद वही है जिसे सम्प्रेषित होने का लालच है. यह यथार्थवाद वही है जिसे विश्व हड़पने की इच्छा है, जिसके गन्दे राज्य में सूरज कभी अस्त न होता था और उसके ग़ुलामों को क्या-क्या करना पड़ता था. इस यथार्थवाद का मक़सद सिर्फ़ सांस्कृतिक लूट था और उस लूट का अचूक असर ऐसा रहा कि आज भी कई प्रतिभाशाली(?) इस यथार्थवाद को ही भारतीय चित्रकला की परम्परा मानते हैं.
हमें अपने इस समकालीन कला संसार की इस अदृश्य समकालीनता में स्थानीयता के ही दर्शन होते हैं. हुसेन के चित्रों में गुप्तकालीन शिल्प हैं तो रज़ा के चित्रों में मालवा की स्मृति. स्वामीनाथन के चित्र आदिम अनुभव के संकेत हैं तो गायतोण्डे के चित्रों में मनुष्य का भाषा के प्रति सम्मोहन. चारों चित्रकारों की स्थानीयता एक वैश्विक स्थानीयता है. इनकी ज़बान सर्वसाधारण की ज़बान है जिसमें मिठास है, आत्मसम्मान है, अद्भुत वर्ण है. ये चित्र मनुष्य होने की आस्था के चित्र हैं. इन चित्रों में अभिव्यक्ति होने की ललक नहीं बल्कि सहज स्फूर्त प्रकटन है. भाषा और बोली को इन चित्रों में अलगाना कठिन है.
इन चारों की ज़बान हिन्दुस्तानी चित्रकला की ज़बान है.
(साभार: राजकमल प्रकाशन)
