नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस दीपक गुप्ता ने बुधवार (25 फरवरी) को कहा कि अदालतें अब पर्यावरण के नुकसान को सही ठहराते हैं और उन्होंने वनतारा को क्लीन चिट देने से लेकर ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को इजाज़त देने तक कई न्यायिक फैसलों की आलोचना की.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान के निमली में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट द्वारा आयोजित अनिल अग्रवाल डायलॉग 2026 में उन्होंने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट पर्यावरण संरक्षण में बेहद सक्रिय और पहल करने वाली भूमिका निभाते थे. दुर्भाग्य से अब ऐसा नहीं रहा.’
उन्होंने कहा कि अब अदालतें पर्यावरणीय नुकसान को सही ठहराने के लिए कुछ तयशुदा शब्दावली का इस्तेमाल करती हैं. गुप्ता ने कहा, ‘अब प्रक्रिया (प्रोसीजर) पर्यावरण से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है. अदालतें अधिकतर केवल यह देखती हैं कि प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं.’
उन्होंने कहा, ‘मुझे खेद है, लेकिन अदालत की भूमिका वहीं खत्म नहीं हो जाती. भले ही प्रक्रिया का पालन हुआ हो, यदि अंतिम परिणाम पर्यावरणीय आपदा है, तो अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए.’
पूर्व जज ने कहा, ‘मैं दो उदाहरण देना चाहता हूं. निकोबार केस ऐसा है जिसमें एनजीटी के प्रोसीजर का पालन किया गया था. प्रोसीजर को फॉलो किया जा सकता है. मैंने एक अदालत का आदेश पढ़ा जिसमें अंडमान में पाम के बागानों के लिए पेड़ काटने की अनुमति दी गई, जो पारिस्थितिकी के लिए बेहद नुकसानदेह है. और इसके बदले हरियाणा और राजस्थान में प्रतिपूरक वृक्षारोपण किया जाएगा. यह कैसी बात है? प्रतिपूरक वनीकरण मजाक बन गया है.’
दूसरे उदाहरण के रूप में उन्होंने वनतारा मामले का जिक्र किया. उन्होंने कहा, ‘मुझे समझ नहीं आता कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को कैसे संभाला. मुझे तो यह एक स्टेज-मैनेज्ड केस लगता है. ऐसा प्रतीत होता है कि वनतारा से जुड़े लोगों ने ही याचिका दायर करवाई.’
उन्होंने कहा कि जहां आम तौर पर किसी मुख्यमंत्री की टिप्पणी से असहमति होने पर उच्च न्यायालय जाने को कहा जाता है, वहीं इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आयोग गठित किया और आयोग ने एक सप्ताह में रिपोर्ट देकर सब कुछ ठीक बता दिया.
ज्ञात हो कि द वायर ने पहले भी अपनी रिपोर्ट्स में बता चुका है कि वर्ष 2024 से प्रकाशित कई खोजी समाचारों में यह आरोप लगाया गया है कि वनतारा द्वारा गैर-स्थानीय (विदेशी) वन्यजीव प्रजातियों की मांग ने दुनिया भर में अवैध वन्यजीव व्यापार को बढ़ावा दिया होगा. हालांकि, द वायर को जारी एक बयान में वनतारा ने इन आरोपों को ‘निराधार’ और ‘भ्रामक’ बताया था.
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल सितंबर में वनतारा को कई पहलुओं पर क्लीन चिट देते हुए कहा था कि उसके द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, रिलायंस के स्वामित्व वाले गुजरात के जामनगर स्थित चिड़ियाघर-सह-बचाव-पुनर्वास केंद्र द्वारा पशु अधिग्रहण ‘नियामक अनुपालन’ के अनुसार किया गया था.
अदालत ने यह भी कहा था कि वह इस मामले को बंद कर रही है और एसआईटी की रिपोर्ट को स्वीकार किया जाता है.
जस्टिस गुप्ता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) में पहले वन अधिकारी, नौकरशाह, विशेषज्ञ और वकील शामिल होते थे, लेकिन अब इसमें केवल सरकारी अधिकारी रह गए हैं.

उन्होंने कहा, ‘अब इसकी रिपोर्टें अक्सर सरकार के पक्ष में जाती दिखती हैं, जैसा कि हमने अरावली मामले में देखा.’ हालांकि उन्होंने कहा कि अरावली से जुड़े अन्य मुद्दों पर वह टिप्पणी नहीं करना चाहते क्योंकि मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.
द वायर ने पहले रिपोर्ट किया था कि कैसे 60 रिटायर्ड सिविल सेवकों के एक समूह ने जुलाई 2025 में उस समय के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बीआर गवई को चिट्ठी लिखकर सीईसी की निष्पक्षता पर चिंता जताई थी, जो अब केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अधीन आ गई है.
पूर्व जज ने आगे कहा, ‘आखिर में हम सब जजों को दोष देते हैं. न्यायाधीश विशेषज्ञों की रिपोर्ट पर निर्भर रहते हैं. अगर विशेषज्ञ रिपोर्ट सही नहीं है तो वे क्या कर सकते हैं? बहुत कम न्यायाधीश ऐसे होते हैं जो विशेषज्ञ रिपोर्ट से आगे जाकर उसका विश्लेषण भी करते हैं.’
उन्होंने संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्रों में अदालतों की सक्रिय भूमिका की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क से भी अदालतें प्रभावित हो जाती हैं.
चारधाम सड़क परियोजना का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पहले सड़क की चौड़ाई छह या सात मीटर रखने का आदेश दिया गया था, लेकिन सेना की जरूरत का हवाला देते हुए अधिक चौड़ाई की मांग वाला हलफनामा दाखिल किया गया.
उन्होंने दावा किया कि विश्वसनीय स्रोतों से उन्हें पता चला कि यह सेना की वास्तविक आवश्यकता नहीं थी. उन्होंने कहा, ‘कई बार बड़े ठेके और अन्य हित भी भूमिका निभाते हैं, इसलिए पर्यावरण पीछे छूट गया है.’
उन्होंने कहा कि देशभर में इको-सेंसिटिव जोन कम किए जा रहे हैं और इसके लिए आसानी से अनुमति दी जा रही है.
दिल्ली में पटाखों पर प्रतिबंध और 10 साल पुराने डीजल वाहनों पर लगी रोक से जुड़े आदेशों के पलटे जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘दुख होता है कि आगे बढ़ने के बजाय हम पीछे जा रहे हैं.’ हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में स्थिति बेहतर होगी.
