नॉर्थईस्ट डायरीः मेघालय में संदिग्ध संक्रमण से दो अग्निवीर प्रशिक्षुओं की मौत, जांच के आदेश

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में मेघालय, मणिपुर, मिज़ोरम और असम के प्रमुख समाचार.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: मेघालय सरकार ने शिलांग स्थित प्रशिक्षण केंद्र में संदिग्ध मेनिंगोकोकल बैक्टीरियल संक्रमण से दो अग्निवीर ट्रेनी की मौत के कुछ दिनों बाद शुक्रवार (27 फरवरी) को स्वास्थ्य परामर्श जारी करते हुए लोगों से भीड़भाड़ वाले स्थानों से बचने और स्वास्थ्य संबंधी प्रोटोकॉल का पालन करने की अपील की है.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, असम रेजिमेंटल सेंटर (एआरसी) के 30 से ज़्यादा ट्रेनी में से एक की एक हफ़्ते पहले मिलिट्री हॉस्पिटल शिलांग में मौत हो गई थी. एक और की 23 फरवरी को मौत हो गई, जबकि बाकी, जिन्हें क्वारंटाइन किया गया है, मेडिकल निगरानी में हैं.

मेनिंगोकोकल इन्फेक्शन (Meningococcal infection) एक तेज़ी से बढ़ने वाली गंभीर बीमारी है जो बैक्टीरिया निस्सेरिया मेनिंगिटिडिस (Neisseria meningitidis) की वजह से होती है, जिससे जानलेवा मेनिनजाइटिस (दिमाग की परत का इन्फेक्शन) या मेनिंगोकोसेमिया (ब्लड पॉइज़निंग) हो सकता है. इसके लक्षणों में तेज़ बुखार, तेज़ सिर दर्द, गर्दन में अकड़न और बिना सफेद हुए रैश शामिल हैं.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के आयुक्त-सचिव जोराम बेदा द्वारा 26 फरवरी को जारी ‘मेनिंगोकोकल रोग’ संबंधी परामर्श में कहा गया कि ईस्ट खासी हिल्स जिला निगरानी इकाई ने सक्रिय महामारी विज्ञान जांच शुरू कर दी है.

परामर्श में कहा गया, ‘मामले की जांच, संपर्कों की पहचान (कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग), लैबोरेटरी रिव्यू और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की प्रक्रिया जारी है.’

सरकार ने लोगों को आश्वस्त किया है कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और फिलहाल नियंत्रण में है. राज्य के अन्य किसी क्षेत्र में कोई नया संदिग्ध मामला सामने नहीं आया है. सरकार ने कहा कि मानक प्रकोप प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल के तहत नजदीकी संपर्कों की पहचान और निगरानी सहित सभी आवश्यक सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय लागू किए जा रहे हैं.

सरकार ने लोगों को भीड़भाड़ वाले स्थानों से बचने, भीड़ में मास्क पहनने, श्वसन स्वच्छता बनाए रखने तथा साबुन और सैनिटाइजर से नियमित रूप से हाथ धोने की सलाह दी है. साथ ही अचानक तेज बुखार, सिर दर्द, उल्टी, तेजी से फैलने वाले बैंगनी धब्बेदार चकत्ते, बाद के चरण में हाथ-पैरों का पीला पड़ना, रक्त संचार संबंधी समस्या, शॉक या मल्टी-ऑर्गन फेलियर जैसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में रिपोर्ट करने को कहा गया है.

इस बीच सेना के एक प्रवक्ता ने कहा कि असम रेजिमेंटल सेंटर में संदिग्ध मेनिंगोकोकल संक्रमण का कोई नया मामला सामने नहीं आया है. उन्होंने बताया, ‘एहतियात के तौर पर पहले मामलों के संपर्क में आए लोगों को मिलिट्री अस्पताल में आइसोलेशन में रखा गया है. हमने मास्क लगाना और आने-जाने पर रोक लगाने का प्रोटोकॉल जारी रखा है.’

मणिपुर: हिंसा मामलों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गुरुवार (26 फरवरी) को मणिपुर में हुई जातीय हिंसा की जांच के लिए 4 जून 2023 को गठित तीन सदस्यीय जांच आयोग का अध्यक्ष पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस बलबीर सिंह चौहान को नियुक्त किया.

सरकारी अधिसूचना के अनुसार, वह 1 मार्च से अध्यक्ष का कार्यभार संभालेंगे. अधिसूचना में यह भी कहा गया कि वर्तमान अध्यक्ष, सेवानिवृत्त जस्टिस अजय लांबा का इस्तीफा सरकार ने स्वीकार कर लिया है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले वर्ष नवंबर में आयोग को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए 20 मई 2026 तक का समय दिया गया था. यह आयोग को दिया गया पांचवां विस्तार है. इससे पहले रिपोर्ट जमा करने की अंतिम तिथि 20 नवंबर 2025 थी. जांच आयोग के दो कार्यालय हैं – एक मणिपुर के इंफाल में और दूसरा नई दिल्ली में.

(मणिपुर में हिंसा की फाइल फोटो: Twitter/@MangteC)

मामले से जुड़े एक व्यक्ति ने बताया कि सेवानिवृत्त जस्टिस लांबा ने व्यक्तिगत कारणों से इस्तीफा दिया. उनके अनुसार, जांच ऐसे महत्वपूर्ण चरण में पहुंच चुकी है जहां भौतिक साक्ष्य और गवाहों के बयान नई दिल्ली में दर्ज किए जाएंगे. इसके लिए समिति के सभी सदस्यों की प्रतिदिन नई दिल्ली कार्यालय में उपस्थिति आवश्यक होगी. यात्रा और अन्य व्यवस्थाओं से जुड़ी निजी कठिनाइयों के कारण उन्होंने इस्तीफा दिया, जिसका जांच से कोई संबंध नहीं था.

केंद्रीय गृह मंत्रालय की अधिसूचना में कहा गया कि 4 जून 2023 को जारी अधिसूचना तथा 13 सितंबर 2024, 3 दिसंबर 2024, 20 मई 2025 और 16 दिसंबर 2025 को किए गए संशोधनों के क्रम में, मणिपुर हिंसा जैसे सार्वजनिक महत्व के निश्चित विषय की जांच के लिए गठित आयोग के अध्यक्ष पद से 28 फरवरी, 2026 से प्रभावी जस्टिस अजय लांबा के इस्तीफे को स्वीकार किए जाने के बाद, केंद्र सरकार ने जांच आयोग अधिनियम, 1952 की धारा 3(3) के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए 1 मार्च 2026 से पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस बलबीर सिंह चौहान को आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया है.

यह आयोग, जिसकी अध्यक्षता पहले गौहाटी हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अजय लांबा कर रहे थे, 3 जून 2023 को गठित किया गया था. समिति में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हिमांशु शेखर दास और सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी अलोका प्रभाकर भी सदस्य हैं. आयोग को 3 मई 2023 से शुरू हुई विभिन्न समुदायों को निशाना बनाकर की गई हिंसा और दंगों के कारणों तथा उनके फैलाव की जांच का दायित्व सौंपा गया है.

आयोग को प्रारंभिक रूप से निर्देश दिया गया था कि वह अपनी पहली बैठक (4 जून 2023) से छह महीने के भीतर, यथाशीघ्र अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपे.

सरकारी अधिसूचना के अनुसार, आयोग हिंसा से पहले की घटनाओं के क्रम, उससे जुड़े सभी तथ्यों, जिम्मेदार अधिकारियों या व्यक्तियों द्वारा किसी प्रकार की लापरवाही या कर्तव्य में चूक, तथा हिंसा और दंगों को रोकने और उनसे निपटने के लिए उठाए गए प्रशासनिक कदमों की पर्याप्तता की जांच करेगा.

गौरतलब है कि मई 2023 में मणिपुर में मेईतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय हिंसा भड़क उठी थी. तब से अब तक करीब 260 लोगों की मौत हो चुकी है और 60,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं.

असम: कार्यकर्ता ने पूर्वी सीमांत क्षेत्र में अवैध कोयला खनन पर चिंता जताई

असम के पूर्वी सीमांत क्षेत्र में अवैध कोयला खनन के बढ़ते दायरे पर चिंता जताते हुए एक पर्यावरण कार्यकर्ता ने राज्य सरकार से आग्रह किया है कि डिगबोई वन प्रभाग के अंतर्गत आने वाले चार संवेदनशील आरक्षित वनों को वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया जाए. उनका कहना है कि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील तिराप-टिपोंग वन गलियारे की सुरक्षा के लिए यह कदम आवश्यक है.

असम ट्रिब्यून के मुताबिक, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा को गोलाघाट के जिला आयुक्त के माध्यम से हाल ही में सौंपे गए ज्ञापन में पर्यावरण कार्यकर्ता अपूर्व बल्लभ गोस्वामी ने जगुन, लेखापानी और मार्गेरिटा वन रेंजों में कथित ‘रैट-होल’ खनन गतिविधियों का मुद्दा उठाया.

उन्होंने कहा कि तिनसुकिया जिला के डूमडूमा वन प्रभाग के अंतर्गत जगुन रेंज में चल रही खनन गतिविधियां 231.65 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले देहिंग पटकाई राष्ट्रीय उद्यान से सटे वन क्षेत्रों पर दबाव बना रही हैं.

एक ‘रैट होल’ खदान की प्रतीकात्मक तस्वीर. (फोटो साभार: Flickr/Environmental Change and Security Program (CC BY-NC-ND 2.0 DEED)

गोस्वामी ने प्रस्ताव दिया कि तिराप, टिपोंग, सालेकी और मकुमपानी आरक्षित वनों को वन्यजीव अभयारण्य का दर्जा दिया जाए. उनका तर्क है कि अभयारण्य घोषित होने से अतिक्रमण और खनन के खिलाफ मजबूत वैधानिक सुरक्षा मिलेगी तथा कोयला पट्टी क्षेत्र में जैव विविधता, हाथियों के आवागमन गलियारों और महत्वपूर्ण नदी प्रणालियों का दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित किया जा सकेगा.

डिगबोई वन प्रभाग से जुड़े एक पूर्व वन अधिकारी ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि उच्च कानूनी दर्जा मिलने से संवेदनशील वन क्षेत्रों में निगरानी और नियमों के पालन को बेहतर बनाया जा सकेगा.

एक स्थानीय वन्यजीव कार्यकर्ता ने यह भी कहा कि अभयारण्य की स्पष्ट सीमाएँ तय होने से असम-अरुणाचल प्रदेश सीमा के कुछ हिस्सों, विशेषकर बदलती धारा वाली लेका हाका नदी के आसपास, बार-बार पैदा होने वाले अधिकार क्षेत्र संबंधी भ्रम को दूर करने में मदद मिल सकती है और प्रशासनिक निगरानी मजबूत होगी.

मिजोरम: बाहरी लोगों से विवाह करने वाली महिलाओं के पारंपरिक अधिकारों को सीमित करेगा नया कानून

मिजोरम विधानसभा ने मंगलवार (24 फरवरी) को महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभावों वाले एक बड़े विधायी कदम के तहत सर्वसम्मति से मिजो विवाह एवं संपत्ति उत्तराधिकार (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया, जिससे विवाह और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में राज्य के पारंपरिक कानूनों के दायरे में बदलाव किया गया है.

संशोधन के अनुसार, गैर-मिजो व्यक्तियों से विवाह करने वाली मिजो महिलाएं, साथ ही उनके बच्चे और पोते-पोतियां, अब मिजो पारंपरिक कानून के दायरे में नहीं आएंगे. इसमें संपत्ति के उत्तराधिकार से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं.

इस विधेयक को मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने सदन में पेश किया, जो विधि एवं न्याय विभाग का प्रभार भी संभालते हैं. संशोधन पेश करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि वर्ष 2014 में बनाए गए मूल अधिनियम की कई धाराओं और उपधाराओं में उभरती सामाजिक परिस्थितियों तथा विभिन्न संगठनों से प्राप्त सुझावों के मद्देनजर सुधार और संशोधन आवश्यक हो गए थे.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

उन्होंने कहा कि मौजूदा अधिनियम की धारा 2 वर्तमान में मिजोरम में पुरुषों और महिलाओं से जुड़े सभी विवाहों को कवर करती है.

हालांकि, संशोधित प्रावधान के तहत यह अधिनियम अब केवल उन विवाहों पर लागू होगा, जिनमें दोनों पक्ष मिजो जनजाति से संबंधित हों या जहां पुरुष साथी मिजो जनजाति से हो.

संशोधन के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लालदुहोमा ने सदन को बताया कि गैर-मिजो से विवाह करने वाली मिजो महिलाएं अब मिजो विवाह एवं संपत्ति उत्तराधिकार अधिनियम या मिजो पारंपरिक कानून के अधीन नहीं रहेंगी.

उन्होंने आगे कहा कि ऐसी महिलाओं तथा उनके बच्चों और पोते-पोतियों को पारंपरिक कानून के उद्देश्य से मिजो नहीं माना जाएगा और उन्हें इस ढांचे के तहत अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा भी प्राप्त नहीं होगा.

मुख्यमंत्री ने बताया कि संशोधन विधेयक प्रमुख नागरिक समाज संगठनों और वैधानिक संस्थाओं के साथ व्यापक विचार-विमर्श और सुझावों के बाद तैयार किया गया है. इनमें मिजो ह्मेइच्हे इंसुइख्खाम पावल, मिजोरम राज्य महिला आयोग, यंग मिजो एसोसिएशन, मिजोरम उपा पावल तथा मिजोरम विधि आयोग शामिल हैं.

वाईएमए की केंद्रीय समिति के एक नेता ने कहा कि धारा 2 में प्रस्तावित बदलाव मिजो महिलाओं द्वारा गैर-मिजो लोगों से बढ़ते विवाहों की पृष्ठभूमि में सुझाया गया था.

उनके अनुसार, ऐसी महिलाओं और उनके वंशजों को मिजो और अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता समाप्त करने का प्रावधान एक निवारक के रूप में काम कर सकता है.

उन्होंने यह भी कहा कि यह संशोधन मिजो समुदाय के संभावित सामाजिक समावेशन के खतरे से बचाव का उपाय भी बन सकता है.

इस बीच, राज्य के सबसे बड़े महिला संगठन मिज़ो ह्मेइछे इंसुइखौम पावल (एमएचआईपी) ने शुक्रवार को राज्य सरकार से विधेयक वापस लेने की मांग करते हुए इसे मिजो महिलाओं के लिए संभावित रूप से ‘असुरक्षित’ बताया.

वहीं, आलोचनाओं का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने कानून का बचाव किया. उन्होंने कहा कि यह विधेयक मिजो कस्टमरी लॉ रिव्यू कमेटी की सिफारिशों पर आधारित है, जिसमें 10 संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे.

मेघालय में देश के सर्वाधिक एचआईवी पीड़ित , 10,000 से अधिक मरीज़ इलाजरत

पूरे देश में सबसे ज्यादा एचआईवी संक्रमण के मामले मेघालय में हैं और राज्य में 10,000 से अधिक मरीज उपचार प्राप्त कर रहे हैं. यह जानकारी राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डब्ल्यू. शायला ने बुधवार (25 फरवरी) को विधानसभा में दी.

उन्होंने बताया कि स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकार ने पहले ही 25 करोड़ रुपये की पांच वर्षीय इंटरवेंशन प्लान को मंजूरी दे दी है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, मंत्री ने बताया कि वर्तमान में राज्य में एचआईवी से पीड़ित 10,293 लोग एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) ले रहे हैं.

मेहताब चांडी ए. संगमा के प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि एचआईवी/एड्स मामलों में ‘चिंताजनक वृद्धि’ से निपटने के लिए अगले पांच वर्षों में मिशन मोड कार्यक्रम के तहत 25 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं.

(फोटो: पीटीआई)

मंत्री के अनुसार, पिछले दस वर्षों में बीमारी से जुड़ी कुल 749 मौतें दर्ज की गईं. इनमें सबसे अधिक 435 मौतें ईस्ट खासी हिल्स जिला में हुईं, इसके बाद वेस्ट जयंतिया हिल्स जिला और ईस्ट जयंतिया हिल्स जिला का स्थान रहा.

अन्य जिलों – री भोई, ईस्टर्न वेस्ट खासी हिल्स, वेस्ट खासी हिल्स, साउथ वेस्ट खासी हिल्स, वेस्ट गारो हिल्स, ईस्ट गारो हिल्स, साउथ गारो हिल्स, नॉर्थ गारो हिल्स और साउथ वेस्ट गारो हिल्स जिला – में अपेक्षाकृत कम मौतें दर्ज की गईं.

शायला ने कहा कि यह ध्यान देने वाली बात है कि दर्ज की गई सभी मौतें समय-समय पर हुए संक्रमण (opportunistic infections) की वजह से हुईं और किसी भी मौत की वजह सीधे एचआईवी/एड्स नहीं बताई गई.

संक्रमण बढ़ने के कारणों पर मंत्री ने बताया कि एचआईवी और एड्स (रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम के तहत गोपनीयता प्रावधान और सामाजिक कलंक बड़ी चुनौती बने हुए हैं.

उन्होंने कहा, ‘एचआईवी स्थिति को गोपनीय रखना अनिवार्य है. बिना सहमति के जांच नहीं की जा सकती और किसी को दवा लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. सबसे बड़ी समस्या सामाजिक कलंक है, जिसके कारण लोग जांच कराने से डरते हैं.’

उन्होंने बताया कि इन चुनौतियों के बावजूद स्वास्थ्य विभाग उपचार बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियान तेज कर रहा है.

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन ने वर्ष 2025-26 के लिए मेघालय एड्स नियंत्रण सोसाइटी को 17.8 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है. यह राशि जागरूकता कार्यक्रमों, वेयरनेस प्रोग्राम, टारगेटेड आउटरीच, ओपिओइड सब्स्टीट्यूशन थेरेपी सेंटर, स्क्रीनिंग और केयर सपोर्ट सर्विस को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल की जाएगी.